मकर संक्रांति का परिचय
मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का पर्व है, जो हर साल 14 जनवरी को मनाया जाता है।
सूर्य सिद्धांत, प्राचीन भारतीय खगोलीय ग्रंथ, मकर संक्रांति को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के रूप में परिभाषित करता है, जो सूर्य सिद्धांत के सौर मासों की आधारशिला है। यह तिथि वर्तमान में जनवरी 14 या 15 को पड़ती है, लेकिन प्रीसेसन (अयन चालन) के कारण प्राचीन काल में यह शीतकालीन संक्रांति (दिसंबर 21-22) के साथ मेल खाती थी।
सूर्य सिद्धांत में सौर वर्ष की गणना 365 दिन, 6 घंटे, 12 मिनट, 30 सेकंड बताई गई है, जो साइडेरियल (निरयण) वर्ष पर आधारित है। लगभग 400 ईसा पूर्व से 0 ईस्वी तक, मकर संक्रांति शीत संक्रांति के साथ संरेखित थी, जब सूर्य का उदय मकर राशि में होता था। 285 ईस्वी में सिद्धांत के अनुसार साइडेरियल और ट्रॉपिकल वर्ष मेल खाते थे, तब मकर संक्रांति 21 दिसंबर को थी। प्रीसेसन के कारण (50 आर्क सेकंड/वर्ष), मकर संक्रांति अब उत्तरायण से 23 दिन पीछे है। 1500 ईस्वी के आसपास यह जनवरी 14 पर स्थिर हुई, संभवतः नीलकंठ सोमयाजी की गणना से।तब यह तिल की फसल से भी जुड़ती थी। 1900 के बाद मुख्यतःमकर संक्रांति की तारीख 14 जनवरी पर स्थिर रही है, लेकिन खगोलीय गणनाओं के अनुसार यह पहले 12-13 जनवरी पर पड़ती थी और धीरे-धीरे 14 जनवरी पर आ गई। लगभग 1500 वर्ष पूर्व आर्यभट्ट के समय (लगभग 500 ईस्वी) में यह उत्तरायण के साथ मेल खाती थी, जो अब 21 दिसंबर को होता है।
2019 से यह कभी-कभी 15 जनवरी पर शिफ्ट हो गई। पृथ्वी की धुरी के प्रीसेशन (Ayanamsa) के कारण सूर्य का मकर राशि प्रवेश हर 72 वर्षों में एक दिन आगे बढ़ता है। इसलिए सदियों से तारीख धीरे-धीरे बदली.
भगवान राम के जन्म वर्ष (लगभग 5114 ईसा पूर्व, 10 जनवरी) में मकर संक्रांति चैत्र मास (अप्रैल) के आसपास नहीं, बल्कि दिसंबर-जनवरी के बीच दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर संक्रमण के समय पड़ती रही होगी। खगोलीय प्रीसेशन के कारण उस समय सूर्य का मकर राशि प्रवेश वर्तमान ग्रेगोरियन कैलेंडर में 20-25 दिसंबर के आसपास होता था। प्लैनेटेरियम सॉफ्टवेयर से सिद्ध 5114 BCE में मकर संक्रांति संभवतः 22-25 दिसंबर को रही, जब सूर्य साइडेरियल मकर में प्रवेश करता। यह उत्तरायण प्रारंभ से मेल खाता था।
ऋग्वैदिक जुड़ाव के बिंदु:
सूर्य पूजा: ऋग्वेद में सूर्य को जगत का पालनहार और प्रकाश का स्रोत माना गया है। मकर संक्रांति पर सूर्य की यह यात्रा (उत्तरायण) देवताओं के दिन की शुरुआत होती है, जो वैदिक सूर्योपासना का ही विस्तार है।
उत्तरायण: यह वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन (पितरों का काल) से उत्तरायण (देवताओं का काल) में प्रवेश करता है। यह शुभ और पुण्यकारी माना जाता है, जिसका उल्लेख वैदिक काल से है।
ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रान्ति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं. चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं‚ अतः इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है. महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिये उत्तरायण पक्ष में पड़ने वाले मकर संक्रान्ति के दिन का ही चयन किया था. मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं. मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिये व्रत किया था.
यह पर्व सूर्य के मकर राशि में प्रवेश (धनु से मकर), पिता-पुत्र (सूर्य-शनि) के मिलन और दान-पुण्य (तिल, गुड़) का उत्सव है, जो वेदों के सूर्य देव (आदित्य) की पूजा और पृथ्वी की उर्वरता से जुड़ा है, हालांकि इसे बाद के ग्रंथों (जैसे पुराणों) में विस्तार मिला, जिसमें गंगा के सागर से मिलन और असुरों पर विष्णु की विजय जैसे प्रसंग जोड़े गए, जो इसे वैदिक परंपराओं का ही विकसित रूप बनाते हैं।
भारत के विभिन्न प्रान्तों में मकर संक्रान्ति का पर्व विविध रूपों में मनाया जाता है. हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में एक दिन पूर्व ही मनाया जाता है. इस दिन अँधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल‚ गुड़‚ चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है. उत्तर प्रदेश में इसे ‘खिचड़ी’त्योहार कहते हैं तथा इस दिन खिचड़ी का दान और सेवन अत्यन्त पुण्यकारी माना जाता है. राजस्थान में इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां तिल के लड्डू‚ घेवर आदि वस्तुओं पर रुपया रखकर अपनी सास को प्रणाम करते हुए उनसे आशीर्वाद लेती है. साथ ही महिलाएँ किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं. महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएँ अपनी पहली संक्रान्ति पर कपास‚ तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं. तिल- गुड़ नामक हलवे के बाँटने की प्रथा भी है. लोग एक दूसरे को तिल-गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं – ‘तिल गूड़ ध्या आणि गोड गोड बोला’ अर्थात् ‘तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो.’
उत्तराखण्ड के लोग मकर संक्रान्ति को ‘उत्तरायणी’ या ‘घुघुती’ त्योहार के रूप में मनाते हैं और काले कौए को घुघुते, खजूर के पकवान खाने के लिए बुलाया जाता है. इस दिन बागेश्वर में बड़ा मेला भी लगता है. बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है.
उत्तराखण्ड के लोग मकर संक्रान्ति को ‘उत्तरायणी’ या ‘घुघुती’ त्योहार के रूप में मनाते हैं और काले कौए को घुघुते, खजूर के पकवान खाने के लिए बुलाया जाता है. इस दिन बागेश्वर में बड़ा मेला भी लगता है. बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है. मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं. इसलिए यहाँ गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है. असम में यह पर्व ‘माघ-बिहु’ अथवा ‘भोगाली-बिहु’ के नाम से मनाया जाता है.
तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति का पर्व ‘पोंगल के रूप में चार दिनों तक मनाने की परम्परा है. प्रथम दिन भोगी-पोंगल‚ द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल‚ तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अन्तिम दिन कन्या-पोंगल. इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकठ्ठा कर जलाया जाता है‚ दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशुधन की पूजा होती है. पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आँगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है‚ जिसे पोंगल कहते हैं. इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है. उसके बाद सभी लोग खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। गुजरात में उत्तरायण तो ओडिशा में मकरा चाउला के रूप में मनाते हैं। कोणार्क सूर्य मंदिर जैसे स्थानों पर मेले लगते हैं।
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