स्कूली शिक्षा : परिदृश्य और बदलाव की आवश्यकता

जिसे हम आज आधुनिक शिक्षा कहते है, वह मोटे तौर पर स्कूली शिक्षा है जो स्वयं में "प्रशियाई शिक्षा प्रणाली" (Prussian education system) का विस्तार है लेकिन एक बदले हुए उद्देश्य के साथ। लगभग 18वीं शताब्दी के अंत और 19वीं शताब्दी की शुरुआत में यह राज्य की एक दीर्घकालीन नीति के रूप में अपनी महत्ता स्थापित कर ली थी। यह अनिवार्य बुनियादी शिक्षा पर आधारित थी। जिसका उद्देश्य एक अनुशासित और राज्य समर्पित नागरिक बनाना था। 1800 के दशक में नेपोलियन युद्धों इसे और मजबूती प्रदान की। अब सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा बना दी गई। यह मानकीकृत पाठ्यक्रम और समय-सारणी पर जोर देता था। छात्रों को अनुशासन, आज्ञाकारिता और राष्ट्रभक्ति सिखाना इसके केंद्र में था। लेकिन इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी की यह मॉडेल रचनात्मक चिंतन (critical thinking) के स्थान पर एक यह मानकर चलता था की मानव को समयबद्ध तरीके से प्रशिक्षित कर उसे बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है ताकि वह राज्य के निमित्त उत्पादन और उपभोग सहित समर्पित सेना की आपूर्ति की एक इकाई बन कर रह जाए। एक पूंजीवादी मॉडेल जो की बाजार केंद्रित होता है, यह मॉडल समय के साथ अमेरिका और अन्य देशों में फैला। इसकी आलोचना की, यह यह रचनात्मकता को दबाता है को कभी भी ध्यान में नहीं रखा गया। फिर जब मार्क्सवादी स्वप्न का दौर आया तो तत्कालीन प्रशा (आधुनिक जर्मनी का पैतृक राज्य) के इस नीतिगत विचार को कही अधिक जेहादी मानसिकता के साथ एक राजकीय नीति के रूप मे अपना लिया गया जिसका वीभत्स रूप हाल के दिनों में देखने को मिल रहा है। इसमें होता यह है की किसी देश की राष्ट्रीय सरकार एक ‘शिक्षा नीति’ को बनाती है जिसका एक उद्देश्य होता है। यद्यपि वह समय समय पर बदलता भी है जो समकालीन सरकार के वैचारिक आयामों के अनुरूप होता है। लेकिन जो नहीं बदलता है वह एक दीर्घकालीन समय में एक ऐसा नागरिक का निर्माण जो शासन तंत्र के अनुरूप हो वह उसके स्थायित्व को सुनिश्चित करें। परीक्षा की व्यवस्था सत्ता के इन उद्देश्यों से सतत बांध कर रखती है या कहें तो उसे उसे पूरा करने में लगा देती है कही अधिक सक्रियता से। विद्वता (merit) का निर्णय सत्ता द्वारा प्रायोजित परीक्षा की प्रणाली से होता है।

ब्रिटेन ने प्रशियाई प्रणाली को उधार लिया क्योंकि नेपोलियन की हार के बाद प्रशिया ने अनुशासित सैनिक तैयार करने के लिए इसे विकसित किया था और ब्रिटेन को भी इसकी जरूरत थी। इसी शिक्षा मॉडल का भारत में भी लागू किया गया जब 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने यह मानकीकृत कक्षा-आधारित प्रणाली भारत लाई गई। 1835 के अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम के तहत लॉर्ड मैकाले ने इस मॉडल को अपनाया, जिससे पाठ्यक्रम, समय-सारणी और अनुशासन पर जोर दिया गया। विधिक रूप से यह 1813 का चार्टर एक्ट था जिसमे कंपनी की सरकार को शैक्षिक व्यवस्था में सुधार के लिए एक लाख रुपये वार्षिक खर्च करने को कहा गया था। परंतु अंग्रेजों और भारतीयों के बीच इस राशि को खर्च करने के तौर-तरीकों को लेकर विवाद हो गया। एच एच विल्सन (H.H.Wilson- 1786–1860) ) जैसे विद्वानों ने संस्कृत में या फारसी भाषा में ही भारत के पारंपरिक शास्त्रीय शिक्षा की वकालत की तो राममोहन रॉय (1772-1833) जैसे बुद्धिजीवियों ने आधुनिक विज्ञान सहित अंग्रेजी शिक्षा की मांग की।

परंतु हमे याद रखना चाहिए की शिक्षा इस तथाकथित तौर तरीके मे आधुनिकता के अपने अर्थ है। इसका इशारा मैकाले द्वारा शुरू की गई शिक्षा की प्रणाली है। शिक्षा की यह आधुनिक प्रणाली विशुद्ध रूप से एक अभिमानी शाही सांस्कृतिक नीति का हिस्सा थी जिसका मूलभूत उद्देश्य था भारत को पश्चिम के रंग मे रंगना। इस अर्थ मे आधुनिक शिक्षा वास्तव मे भारत के सांस्कृतिक रूपांतरण का एक महत्वपूर्ण स्रोत मात्र भर था। ऊपरी स्तर पर इसने ब्रिटिश उपयोगितावाद के सभ्यतावादी मिशन का विचार के लक्ष्य को पूरा करते हुए ज्ञान के भारत के पारंपरिक स्रोतों पर आधारित शिक्षा की स्वदेशी प्रणाली को नष्ट कर दिया।

थौमस् बैबिंग्टन् मैकाले[1]
Thomas Babington Macaulay (1800-1859)

वह वर्ष 1830 का था जब मैकाले पहली बार मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट बना और इसके साथ ही उसे EIC के निर्देशकों को दिशा निर्देश देने के लिए बने संस्थान बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल (Board of Control) का भी सदस्य बनाया गया। अपने 18 महीने के अपने कार्यकाल उसे भारत के बारे में जानने का मौका मिला। उसके इस निष्कर्षों को हम एडवर्ड सईद के प्राच्यवाद (Orientalism) के मदद से कहीं ज्यादा अच्छे तरीके से समझ सकते है। भारत के बारे मे उसके प्रवास (जून 1834 - दिसंबर 1837) दौरान बनी उसकी अवधारणा को सिर्फ एक ही शब्द मे समझा जा सकता है। वह है – घृणा, घृणा और घृणा! भारतीय साहित्य से घृणा, , भारतीय भाषाओं से घृणा, भारतीय कला से घृणा, भारतीय विज्ञान से घृणा, भारतीय धर्म से घृणा, भारतीय दर्शन से घृणा, भारत के नैतिक आदर्शों से घृणा, भारतीय संस्कृति से घृणा, दूसरे शब्दों में भारत की हर चीज़ से घृणा। यही थी उनकी प्राच्यवाद की अपनी समझ जिसमे सत्ता ही जानकारी (power is knowledge) है के अनुरूप ब्रिटिश साम्राज्यवाद भारत के बारे में अपनी समझ को ना केवल आकार दे रहा थे बल्कि दुनिया के अन्य हिस्से मे भारत से संबंधित अध्ययन (indology) को प्रयोगित भी कर रहा था। मैकाले ने भारत से संबंधित हर चीज की कठोरतम शब्दों में निन्दा की। वैसे यह एक एक अलग तथ्य है उसका भारत के वायसराय के कौंसिल में विधि सदस्य (Law Member) के पद को स्वीकार करने की प्रेरणा सिर्फ लालच और लालच ही रही थी। उसने अपनी बहन को लिखा था कि उसे पूरे दस हज़ार पौंड प्रति वर्ष। जबकि कलकत्ता में पांच हज़ार पौंड में बड़ी शान से रहा जा सकता है। फिर उस बचत पर ब्याज मिलेगा।....मैं सारी ज़िंदगी ऐसी शान से रहूँगा जैसे कोई राजकुमार रहता। बस यह लालच ही था जिसने मैकाले को उस इंडिया में ले आया जो उसे बिलकुल भी पसंद नहीं था।

शिक्षा की इस आधुनिक प्रणाली की नींव घोषित तौर पर 1835 ई॰ के मैकाले के मिनट के साथ रखी गई थी। इसकी पृष्टभूमि यह थी की तत्कालीन भारत के गवर्नर जनरल (1828-35) विलियम बेंटिक EIC की वित्तीय कठिनाइयाँ काम करने के उद्देश्य से कम्पनी के प्रशासन मे में भारतीय लोगों की हिस्सेदारी चाहते थे। इसके लिए चार्टर एक्ट में एक प्रावधान किया गया की की सरकारी नौकरी में धर्म जाती या मूल का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा। अब असली चुनौती यही थी की कैसे भारतीयों को उस अंग्रेजी भाषा में शिक्षित करे जिससे उनका काम चल सके। इस काम को लॉर्ड मैकोले ने Indian Education Act के द्वारा पूरा किया गया। मैकाले की सोच स्पष्ट थी। वह भारतीयों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना चाहता था जो अंग्रेजी शासकों एवं आम भारतीयों के बीच दुभाषिये का काम कर सके। मैकाले के ही द्वारा प्रयुक्त अति उत्साह की शब्दाबली कहे तो भारतीयों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना जो रंग और रक्त भले ही भारतीय हों लेकिन अपनी अभिरूचि, विचार, नैतिकता और बौद्धिकता में अंग्रेज हों।

मैकाले ने मान लिया था कि अंग्रेजी पढे लिखे छात्र नए विचारों के वाहक बनेंगे। यही वह प्रसिद्ध अधोगामी विप्रवेशन सिद्धांत (downward infiltration theory) था जिसके अनुसार यदि समाज के उच्च वर्गों के सदस्यों को शिक्षित किया जाता है तो यह समाज के निम्न वर्ग के लोगों के लिए भी एक अवसर होगी क्योंकि निम्न वर्ग समाज में उच्च दर्जे के लोगों के द्वारा अपनाए जाने वाले प्रतिमानों की नकल करेंगे। वास्तव मे इसका उद्देश्य एक वर्ग को ‘अंग्रेज’ बनाकर, उनके माध्यम से अत्यंत निचले पायदान तक समाज पर नियंत्रण स्थापित करने की की थी। परंतु व्यावहारिक मे इसका उद्‌देश्य भारत में प्रशासन के लिए बिचौलियों की भर्ती ही रही। तत्कालीन भारत के प्रबुद्ध नागरिकों मे से कईयों ने उपयोगितावादी कारणों से अंग्रेजी शिक्षा को समर्थन दिया क्योंकि इससे रोजगार मिलने की उम्मीद थी साथ ही सामाजिक स्तर पर इसे प्रतिष्ठा लेकिन साथ ही कुछ ऐसे भी भारतीय थे जिन्होंने समाज के पश्चिमीकरण का विरोध किया। वे अंग्रेजी शिक्षा को वही तक तक स्वीकार् करते थे की रोजगार हासिल करने मे मदद करता था। कुछ ऐसे भी लोग थे जो अंग्रेजी के प्रभाव मे ईसाई भी बन जाते थे। इन दोनों बीच राममोहन रॉय जैसे लोग थे जो पश्चिम के साथ रचनात्मक जुड़ाव की एक शानदार विरासत को भी गढ़ रहे थे यद्यपि वे तथाकथित आधुनिक शिक्षा के पहले शिकार होने वाले लोगों मे से एक थे।

अंग्रेजी शिक्षा ने भारत में सांस्कृतिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति देने के लिए नए विचारों के एक महत्वपूर्ण वाहक के रूप में काम किया साथ ही इसने औपनिवेशिक राज्य को बढ़ावा भी दिया। अठारहवीं शताब्दी मे जब ब्रिटिश शासक अपनी असुरक्षा को लेकर ज्यादा सतर्क थे तो ओरिएंटलिज्म (orientalism) को बढ़ावा दिया। उदाहरण के लिए फोर्ट विलियम कॉलेज जैसी संस्थाओं की स्थापना इसलिए की गई थी ताकि भारत में ब्रिटिश नौकरशाहों को को स्थानीय भाषाओं और शास्त्रीय संस्कृत और फारसी भाषा में आवश्यक प्रशिक्षण दिया जा सके । 1782 में कलकत्ता मदरसा की स्थापना, 1791 में बनारस के संस्कृत कॉलेज की स्थापना आदि इसी उद्देश्य को ध्यान मे रखकर की गई थी। 1818 में कलकत्ता स्कूल बुक सोसायटी की स्थापना भी स्थानीय शिक्षा प्रदान करने वाले स्वदेशी स्कूलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। यहां तक कि हिंदू कॉलेज जो 1817 में स्थापित किया गया था, स्थानीय भाषाओं में पश्चिमी विज्ञान और दर्शन का शिक्षण ही इसके मुख्य उद्देश्यों में से एक था। इस दिशा मे हुई प्रगति की स्थिति को समझने के लिए विलियम बेंटिंक स्थानीय शिक्षा की स्वदेशी प्रणाली की जांच करने के लिए समिति को नियुक्त (1833) किया। लेकिन जब तक विलियम एडम (William Adam 1796-1881) की यह समिति स्थानीय शिक्षा पर अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश करती अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में लिया जा चुका था। निश्चित रूप से शिक्षा की इस आधुनिक प्रणाली मे एक मिशनरी आयाम भी था। 1818 में कलकत्ता के विलियम केरी का यह एक महत्वपूर्ण मकसद था।

शिक्षा पर विलियम एडम (William Adam 1796-1881) की रिपोर्ट[2]

विलियम एडम 1818 में भारत आए और करीब 27 साल यहां रहे इस दौरान वे वह राजा राममोहन रॉय के संपर्क में भी आए। बंगाल और बिहार में शिक्षा की स्थिति का सर्वेक्षण करने और सुधारों का सुझाव देने के लिए 1835 में विलियम एडम की अध्यक्षता मे एक समिति बनाई गई इस समिति (1835-1838) ने कुल तीन रिपोर्ट प्रस्तुत की। यद्यपि इस समिति की कोई उपयोगिता नहीं थी लेकिन इससे तत्कालीन परिदृश्य मे प्रचलित शिक्षा की व्यवस्था पर की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है है। उनके अनुसार दो तरह के विद्यालय थे। नियमित विद्यालय आधुनिक विद्यालयों के समान थे जहां पढ़ाने के शिक्षकों की नियुक्ति की गई थी। विद्यालयों की दूसरी श्रेणी घरेलू विद्यालयों के समान थी जहां परिवार के सदस्य ही पढ़ाते थे। घरेलू विद्यालयों मे नियमित विद्यालयों ली तुलना मे करीब नौ गुना छात्र पढ़ते थे। इस समिट के अन्य निष्कर्ष भी महत्वपूर्ण थे। तब एक प्राथमिक स्कूल में प्रवेश की औसत आयु 8 साल थी और औसत स्कूल छोड़ने की उम्र 14 साल थी। एक स्कूल में छात्रों की औसत संख्या 10 थी। शिक्षक का औसत वेतन 5-8 रुपये प्रति माह के बीच होता था। महिला शिक्षा न के बराबर थी परंतु समग्र साक्षरता 60 प्रतिशत से ऊपर थी। कुरान की शिक्षा देने के लिय प्राथमिक विद्यालय तो थे लेकिन मुसलमानों द्वारा संचालित कॉलेज नहीं था। इसके विपरीत संस्कृत कॉलेजों की संख्या भी अच्छी थी। इन कॉलेजों में भोजन, आवास और शिक्षा मुफ्त थी।

नई शिक्षा का उद्देश्य लोगों के बीच वफादारी का का प्रचार तो किया लेकिन स्वदेशी प्रणाली का विनाश भी कर दिया। भारत की स्थानीय संस्थानों के माध्यम से जिसमे कारण साक्षरता के दर ऊंची बनी रहती थी नई शिक्षा की नीति ने आम भारतीयों को अतीत की तुलना में अधिक अनपढ़ बना दिया। इस संदर्भ मे धर्मपाल द्वारा लिखित ‘The Beautiful Tree: Indigenous Indian Education in the Eighteenth Century’ नामक किताब ने तत्कालीन मद्रास प्रांत के गवर्नर रहे सर थॉमस मुनरो द्वारा 1822 में एक सर्वे के आधार पर बनाई गई रिपोर्ट का जिक्र किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक मद्रास प्रांत (वर्तमान समय का आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल एवं कर्नाटक का कुछ भाग) में कुल 12,498 स्कूल और कॉलेज थे। उस समय मद्रास प्रजिडेंसी की कुल जनसंख्या 12,850,941 थी, यानी प्रत्येक 1000 व्यक्तियों पर एक स्कूल अथवा कॉलेज था।[3] अंग्रेजों का एक अधिकारी था G.W.Litnar जिसने 1823 के आसपास उत्तर भारत का सर्वे किया था, उसके अनुसार कि यहाँ 97% साक्षरता है। [4] मैकोले ने इस स्थिति को बदलने के लिए एक मुहावरा का भी इस्तेमाल किया है “कि जैसे किसी खेत में कोई फसल लगाने के पहले पूरी तरह जोत दिया जाता है वैसे ही इसे जोतना होगा और अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था लानी होगी।”

जैसा की हमने ऊपर कहा है की "प्रशियाई शिक्षा प्रणाली" (Prussian education system) का उद्देश्य एक अनुशासित और राज्य समर्पित नागरिक बनाना था। लेकिन भारत में  इसका उद्देश्य इसका बिल्कुल उलटा था। यहाँ वैसे सारे विषय को बढ़ावा दिया जाना था जो भारतीय लोगों एक होने से रोकती हों। जहां प्रशियाई शिक्षा प्रणाली" को पाठ्यक्रमों के माध्यम से एक जर्मन राष्ट्र राज्य जो गढ़ना था वही भारत जो की अपनी परंपराओं और विरासत में एक स्वाभाविक राष्ट्र था जिसमें वास करने वाले जनगण अबाधित यात्राएं करते थे को तोड़ना था। इस क्रम में जॉन स्ट्रेची का यह कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है जब उसने  कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में भारत के बारे में कहा था  कि "भारत न तो कभी था और न ही कभी होगा।" 

इसलिए उसने सबसे पहले गुरुकुलों को गैरकानूनी घोषित किया, उनको मिलने वाली सहायता को रोकी, फिर संस्कृत के स्थान पर अंग्रेजी को थोपा। गुरुकुलों की समाप्ति से विकेंद्रीकृत शिक्षा व्यवस्था टूट गई। इसका एक और वीभत्स पक्ष यह था भारत एक कृषि प्रधान देश था जहां श्रम की जरूरत लगातार रहती थी। गुरुकुलों की एक लचीली व्यवस्था थी जो तत्कालीन आर्थिक जरूरतों को भी ध्यान मे रखती थी। खेती से संबंधित कुछ अवधि जब श्रम की आपूर्ति की सख्त जरूरत होती थी गुरुकुल बंद रहते थे। और जैसे ही खेतीबाड़ी से फुर्सत मिलती थी एक बार फिर से पठन पाठन का कार्य आरंभ हो जाता था।

इस संदर्भ में एक अन्य बात भी महत्वपूर्ण है की पारंपरिक शिक्षा प्रणाली जो की गुरुकुल जैसे संस्थान की अगुवाई में चलते थे, पारंपरिक शिक्षा को बढ़ावा देते थे। लोककथाएं, मौखिक परंपराएं और सामूहिक स्मृतियां इनके आधार होते थे। जैसा की कहा जाता है इतिहास स्मृतियों से ही निर्मित होता है और यही साझी स्मृतियाँ साझी विरासत का भाव पैदा करता है जिससे राष्ट्र निर्माण होता है। संभव है स्मृतियां पक्षपाती हो। एक ही कथा के कई क्षेत्रीय स्वरूप हो सकते है क्योंकि भारत जैसे विशाल देश में ये इतिहास को मानवीय आयाम देने में सक्षम होती है। भारतीय संदर्भ में, रामायण-महाभारत जैसी स्मृतियां राष्ट्रीय चेतना का आधार बनती थी जो औपनिवेशिक प्रणाली को अस्वीकार्य थी। यह भी एक मूल वजह थी जिसके कारण अंग्रेजों ने भूमि जब्त कर वित्तीय सहायता रोकी और अंग्रेजी परीक्षा पास करने वालों को प्रोत्साहित किया। इससे संस्कृत-केंद्रित शिक्षा पिछड़ गई और छात्र नौकरियों के लिए अंग्रेजी सीखने को मजबूर हुए।​ अंग्रेजों की नीति से समग्र रूप से भारतीय विरासत पर गर्व कम हुआ क्योंकि गुरुकुल राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करते थे। गुरुकुलों की समाप्ति से औपनिवेशिक हितों की सेवा करने वाली प्रणाली स्थापित हुई।​ अंग्रेजी दक्षता को अब रोजगार की शर्त बना दी गई। आर्थिक स्थिरता अंग्रेजी पर केंद्रित हो गई और रोजगार क्लर्कगिरी से कुछ ज्यादा नहीं रह गया। इसी क्रम में गुरुकुलों की समाप्ति नें जनता को श्रमिक भूमिकाओं तक सीमित कर दिया। इससे निरक्षरता बढ़ी ये की असमानता बढ़ी क्योंकि पूरा का पूरा ग्रामीण क्षेत्र इस व्यवस्था से बाहर हो गया। अब रचनात्मकता समाप्त हो गई क्योंकि एकसमान पाठ्यक्रम ने व्यक्तिगत विकास को रोका। परीक्षा की प्रणाली ने भारत की सार्वजनिक शिक्षा में रटंत प्रक्रिया को केंद्र मे ला दिया।

औपनिवेशिक तंत्र का यह दावा की पारंपरिक शिक्षा की प्रणाली से आर्थिक समृद्धि के विचार को ठेस पहुचती है एकदम से खोखला है। आर्थिक उपार्जन दक्षता (skill) पर निर्भर करती है। सच तो यह है की भारत में "जाति" (caste) परंपरा से ही आर्थिक दृष्टि से 'सोशल कैपिटल' (Social Capital) यानी सामाजिक संपत्ति के रूप में भी काम करती है। भारतीय समाज में कई आर्थिक समूह लिप्त थे जाति के रूप में। आज भी है जैसे की तीरुप्पुर (तमिलनाडु) – गाउंडर समुदाय द्वारा वस्त्र उद्योग, सिवाकासी – नाडार समुदाय द्वारा माचिस, पटाखे, प्रिंटिंग, पाटीदार/पटेल – अमेरिका में होटल कारोबार, जैन – भारत व विदेश में डायमंड उद्योग। ये क्लस्टर बिना सरकारी सहायता के, अपने जातीय नेटवर्क के दम पर खड़े हुए और विस्तार पाए। जाति आधारित आर्थिक प्रणाली से यह फायदा होता ;है की शुरुआती पूंजी (Initial Capital), बाजार पहुँच (Market Access), स्थानीय नियमों की जानकारी (Local Law/Regulation व्यक्ति को अपनी जाति-समुदाय से मिलती है। नए व्यापार या स्टार्टअप के लिए अधिकतर लोग बैंक से लोन लेने की बजाय अपनी जाति/समुदाय में उधार (बहुत अच्छे Return, Success Rate के साथ) लेते हैं। अपने ही जाति/समूह में क्रेडिट, बाजार, प्रशिक्षण, जोखिम सहन करने और असफलता की स्थिति में दोबारा शुरू करने में मदद – इसलिए जाति एक 'सोशल कैपिटल' है। जमीनी हकीकत में समुदायों की आर्थिक नेटवर्किंग कहीं ज्यादा कारगर होती है। विवेकानंद ने भी कोलंबो के सम्बोधन में कहा—हिंदू समाज को एकजुट होकर 'वर्ल्ड हिंदू इकोनॉमिक फोरम' बनाना चाहिए ताकि समुदाय में आर्थिक शक्ति बढ़े। व्यवहार में होता यह है की स्थानीय कानूनी, सामाजिक, व्यापारिक जटिलताओं से निपटने के लिए जाति समूह बड़ी मदद करता है—इसी कारण छोटे व्यापारी, उद्यमी सफल होते है। जाति आर्थिक शक्ति और बढ़ानेवाला नेटवर्क है—तकनीकी अर्थ में यह एक 'सोशल कैपिटल' है। औपचारिक संस्थाओं के स्थान पर अनौपचारिक जाति नेटवर्क असली काम करते हैं। समुदाय, जातियां मिलकर व्यापार, शिक्षा, प्रोफेशनल नेटवर्किंग को मजबूत करती हैं। दिन प्रतिदिन के राजनीति मे में जाति को विभाजनकारी बताकर केवल नेगेटिव रूप दिखाया जाता है, जबकि अर्थव्यवस्था में उसी जाति नेटवर्क ने सदियों से भारत को आर्थिक स्तर पर खड़ा किया है। जातीय प्रणाली का आर्थिक पक्ष ही भारत की ताकत थी, जिसके बिना छोटे व्यापारी, क्लस्टर और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पनपी ही नहीं पाती। और सबसे बड़ी बात भारत अपने इतिहास के पूरे दौर में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के केंद्र मे तब रहा जब शिक्षा की आधुनिक स्कूली व्यवस्था नहीं थी। ‘सोने की चिड़िया’ आर्थिक समृद्धि के काल मे अब अंग्रेजी नहीं बोलती थी और जब इसने अंग्रेजी बोलनी सीखी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था मे पिछलग्गू बन कर रह गई। 

इसलिए आवश्यकता इस बात की है कम से कम सामाजिक विज्ञानों और आर्थिक दक्षता को प्रभावित करने वाले शिक्षा को समाज पर ही छोड़ दें। व्यवहार में हो यह रहा है की सरकारी एकरूपता वाली शिक्षा असमानताएँ को बढ़ा रही है। जिनकी संसाधनों तक पहुँच है उनके बच्चे बेहतर स्कूल चुनते हैं जबकि गरीबों को घटिया सरकारी संस्थानों में रहना पड़ता है। सामाजिक विज्ञान की शिक्षा को समाज पर छोड़ने से समुदाय अनुरूप पाठ्यक्रम विकसित होंगे। उदाहरण स्वरूप, ग्रामीण भारत में कृषि-आधारित कौशल अपने आप सिखाए जाएंगे, जो सामाजिक एकजुटता बढ़ाएगा। इससे क्षेत्रीय स्तर पर विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और विचारधाराओं वाली शिक्षा से सामाजिक समझ बढ़ेगी। स्व-नियमित शिक्षा और सामाजिक निर्देशन की उपस्थिति में अपराध और असमानता में स्वाभाविक रूप से कमी आएगी। इससे युवा अधिक जिम्मेदार बनेंगे, क्योंकि प्रतिस्पर्धा नैतिक मूल्यों को प्रोत्साहित करेगी। यह दृष्टिकोण सामाजिक गतिशीलता को मजबूत करेगा, जहाँ शिक्षा एक विविधता पूर्ण समाज के बीच एकीकरण का काम करेगी।

जहां तक आर्थिक रूप से उत्पादकता का सवाल है यह एक माना गया तथ्य है की आर्थिक दक्षता तब होती है जब लागत न्यूनतम हो और उत्पादन अधिकतम हो। जाति आधारित समाज के संदर्भ में उपर्युक्त अध्ययन सटीक बैठता है। इसे समाज पर छोड़ने से प्रतिस्पर्धा और नवाचार बढ़ेंगे। तकनीकी विकास से कौशल-आधारित प्रशिक्षण को आसानी होगी क्योंकि बाजार तक उनकी पहुँच सुगम हो गई है। इससे उद्यमिता में वृद्धि आएगी और बेरोजगारी घटेगी।

[1] https://www.pravakta.com/macaulay-and-our-confusion/

[2] https://www.tetsuccesskey.com/2016/12/adams-report-on-education.html

[3]https://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/vishvagaurav/education-system-of-india-during-vedic-age/

[4] https://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/Pahal-Ek-Prayas/

No comments:

Women's Reservation and Delimitation: A Political Misadventure That Will Quietly Devour Democracy

The history of Indian democracy is a chronicle of promises that change their complexion somewhere between the campaign trail and the ballot ...