दक्षिण एशिया :सांस्कृतिक एकता के भारतीय तत्व

जिसे हम सब आज भारतीय उपमहाद्वीप कहते है वह वास्तव में वृहत्तर भारत है। इसका निर्माण किसी एक दिन में नहीं हुआ था बल्कि वह सतत रूप से लगभग 200 ईसापूर्व से शुरू होकर मौर्य, गुप्त, चोल, पाण्ड्य और हर्ष यदि राजाओं के काल तक चलता रहा। अगर देखा जाए तो व्यापार, साहसिक यात्राएं और राज्य विस्तार (सैनिक अभियान और वैवाहिक संबंध) ये तीन ऐसे बुनियादी विचार है जो किसी भी प्रदेश के लोगों द्वारा बाहरी प्रदेशों के लोगों और समाजों से संबंधों को सुनिश्चित करते है। इन तरीकों से ही सभ्यतागत और सांस्कृतिक विचार विमर्श के अवसर जन्म लेते है और फिर सभ्यता-संस्कृति का प्रचार प्रसार होता है।

बृहतर भारत का निर्माण भी इसी आधार पर हुआ है। 2000 ईसापूर्व से बने संबंध समय के साथ और गहरे होते चले गए और इस तरह मध्य एशिया, पश्चिम एशिया सहित यूरोप फिर दक्षिण एशिया, म्यांमार, चीन सहित सुदूर पूर्व जापान तक इसके प्रभाव दिखाई पड़ने लगे। मेसोपोटामिया के कई नगरों जैसे उर, किश, लगश, सुसा, टेल अस्मर आदि से प्राप्त मुहरें विशेष रूप से सिंधु घाटी सभ्यता के साथ व्यापार की महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। लोथल जैसे बंदरगाह नगरों में भी कई मुहरें पाई गईं, जो मेसोपोटामिया और मध्य एशिया से मिले मुहरों से मिलती जुलती हैं, जो इस बात को सिद्ध करते है की दोनों सभ्यताओं में व्यापार-संबंध अत्यंत प्राचीन काल से ही चल रहे थे। यह व्यापार फिर आगे तक भी हो रहा था। प्लिनी (Pliny) (23 ई.–79 ई.) अपनी प्रसिद्ध रचना 'नेचुरल हिस्ट्री' (Naturalis Historia) ने भारत के प्रति रोम से धन के प्रवाह पर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने लिखा कि भारत से मसाले, रत्न और अन्य विलासिता की वस्तुएँ आयात करने के बदले रोम से सोना और चांदी बड़ी मात्रा में बाहर जा रहा था, जिससे रोमन अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा था। यह व्यापार संभवतः शुंगकाल में हो रहा था। इससे भारतीय शासकों को भी भारी राजस्व प्राप्त होता था। विलासिता की वस्तुएँ: तो थी ही मसाले, रत्न और कपड़े निर्यात की मुख्य वस्तुएं होती थीं, जिसकी माँग रोमन समाज में व्यापक थी। जहां तक व्यापारिक मार्गों की बात है यह व्यापार सिल्क रूट के जरिए हो रहा था जिसे मथुरा जुड़ा हुआ था क्योंकि यमुना का उल्लेख: प्लिनी ने 'जोमेनस' नाम से किया है जो मथुरा और 'क्लीसोबोरा' के बीच बहती थी। प्लिनी ने यह भी उल्लेख किया है कि, “यदि हवाएँ अनुकूल होती थी तो मुजिरिस से यूरोप तक मात्र 40 दिनों में जाना संभव था।“ प्राचीन यूरोप में केरल स्थित “कोडुंगलूर शहर” को “मुजिरिस” के नाम से जाना जाता था। प्राचीन समय में यह क्षेत्र, मसालों और कीमती रत्नों के व्यापार के कारण एक व्यस्त व्यापारिक बंदरगाह हुआ करता था। मुजिरिस को भारत में आगमन के लिए “दुनिया का प्रवेश द्वार” माना जाता था।

यह तो थी व्यापार और वाणिज्य की बात। बुद्ध का आगमन भारतीय संस्कृति के परिवेश को एक नया बौद्धिक परिवेश को सुनिश्चित करने की दिशा मे अप्रतिम रहा है। बुद्ध अपने सभी समकालीन विचारकों में शायद सबसे अधिक प्रभावित करणे वालों में थे। बुद्ध के द्वारा प्रतिपादित विचार दर्शन आज भी दुनिया के बहुसंख्यक आबादी को आलोकित कर रही है। यज्ञीय कर्मकांडों के विरोध मे जन्मी बुद्ध के विचारों ने लौकिक जीवन, पारलौकिक जीवन और दोनों के बीच के संबंधों में एक क्रांतिकारी आयाम प्रदान कर दिया। उनके अनुभवजन्य ज्ञान की यह संसार दुखमय है, इस दुख का कारण है और इस दुख से उनमुक्ति संभव है से जो धर्मचक्र प्रवर्तन की जो धार सारनाथ से निकली वास समकालीन संसार को छ गई। कई बड़े बड़े राज्य इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। भगवान बुद्ध ने स्वयं ही अपने शिष्यों से देश देशांतरों के अपनी शिक्षाएं प्रचारित कने की प्रेरणा देते है और फिर तत्पश्चात लगभग अगले सात सौ सालों तक बुद्ध की शिक्षाओं पर आधारित विचार वैश्विक बन जाते है। श्रमणों की साहसी यात्राएं, राज्य द्वारा नियुक्त आदेश वाहक यदि समकालीन परिदृश्य को बुद्धमय बना देते है। सरल सिद्धांत, माध्यम मार्ग, और क्रियात्मक उपदेश पर आधारित और उत्साही अनुगामी के कारण इसकी स्वीकरती तुरत मिलती चलती जाती है। फिर इसका सामाजिक संगठन के योगदान तो था ही। उपली नई था, आम्रपाली वेश्या थी, मल्लिका दासी थी जबकि बुध स्वयं राजकुल से थे। सामाजिक एकीकरण के इस सूत्र ने एक तरह से चमत्कार कर दिया। कश्मीर, गांधार, महिषमंडल, वनवासी, अपरांत, योन से लेकतक इसका प्रभाव पर। अशोक के अभिलेख मिस्र, सीरिया, यूनान आदि में दूत भेजे जाने का उल्लेख करते हैं।

सिल्क रूट, जिसे रेशम मार्ग भी कहते हैं के स्थलीय मार्ग पर भारत का केंद्रीय स्थान था। यह चीन, भारत, मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और यूरोप को जोड़ता था। इस मार्ग के माध्यम से भारत से मसाले, कपड़े, गहने, सुगंध, ही नहीं पहुच रहे थे बल्कि बौद्ध धर्म भी सिल्क रूट के ज़रिए चीन, मध्य एशिया और पूर्वी एशिया में फैला। भारत के नगर, जैसे तक्षशिला, वाराणसी, पाटलिपुत्र आदि सिल्क रूट के प्रमुख पड़ाव रहे। इस मार्ग से व्यापार के साथ-साथ संवाद, संस्कृति, भाषा, कला, और धर्म का भी स्पष्ट आदान-प्रदान हुआ। भारत, चीन और केंद्रीय एशिया के बौद्ध हस्तशिल्प, भित्तिचित्र और स्तूप इस मार्ग से जुड़े हैं। ज्ञान, संस्कृति, कला और वास्तुकला का भी दूरस्थ क्षेत्रों तक विस्तार हुआ। भारत के कई राजवंशों खासकर कुषाणों और गुप्त राजाओं ने इस मार्ग के किनारे बसे शहरों को संरक्षण और बढ़ावा दिया। कई यात्रियों और विद्वानों (जैसे फाह्यान, ह्वेनसांग—चीन से भारत आए) का आगमन भी इसी के कारण संभव हुआ। UNESCO के “Architecture, Monuments and Urbanism के अनुसार सिल्क रूट के नगरों ने भारतीय और वैश्विक संस्कृति, वास्तुकला और समाज को आपस में जोड़ने व विकसित करने में अद्वितीय भूमिका निभाई। ये केंद्र आज भी सांस्कृतिक संवाद और साझी विरासत के प्रतीक हैं।

सिल्क रूट की समुद्री शाखा (Maritime Silk Routes) पर केंद्रित बंदरगाह नगर जैसे सूरत, कोचीन, कालीकट, ताम्रलिप्ति आदि भी व्यापार, संस्कृति और शिल्प-विज्ञान के अंतरराष्ट्रीय केंद्र रहे। इन बंदरगाहों के माध्यम से रेशम, मसाले, सूती वस्त्र, बहुमूल्य पत्थर, धर्म (बौद्ध, जैन, हिंदू, बाद में इस्लाम), कला, स्थापत्य शैली और प्रौद्योगिकी का अभूतपूर्व आदान-प्रदान हुआ। इससे शहरी नियोजन, स्थापत्य शिल्प, बाहरी संपर्क और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में विविधता आई। समुद्री सिल्क रूट के जरिए बने सांस्कृतिक नेटवर्क ने न केवल व्यापारिक समृद्धि लाई, बल्कि विभिन्न सभ्यताओं को आपस में जोड़ने, संवाद और सह-अस्तित्व को भी बढ़ावा दिया।

उपर्युक्त रेशम मार्ग के अतिरिक्त एक मसाला मार्ग (Spice Route) भी सह अस्तित्व में था जो अत्यंत प्राचीन काल से ही चर्चित था। इसके माध्यम से भारत, दक्षिण-पूर्व एशिया और दूसरे एशियाई देशों के मसाले—जैसे काली मिर्च, दालचीनी, लौंग, जायफल, इलायची, अदरक आदि—पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप पहुँचाए जाते थे। भारत का पश्चिमी तट, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि देशों के बंदरगाह मसाला मार्ग के महत्त्वपूर्ण केंद्र थे। यहाँ से मसाले अरब व्यापारियों के जरिये मिस्र, अफ्रीका, और रोम होते हुए यूरोप तक जाते थे। कभी-कभी मसाला मार्ग सिल्क रूट से भी जुड़ जाता था, जहां से मसाले उँट/घोड़ों के कारवां द्वारा मध्य एशिया से भूमध्यसागर क्षेत्र तक पहुँचते थे। मसाला मार्ग न सिर्फ व्यापार के लिए बल्कि संस्कृतिक, धार्मिक और मानव सभ्यता के मेल के लिए भी महत्वपूर्ण रहा। मसालों की मांग के कारण ही कई पश्चिमी देशों ने भारत और पूर्वी एशिया की खोज शुरू की थी (जैसे कोलंबस, वास्को-डि-गामा आदि)। भारत का केरल (विशेषकर मलाबार तट) “स्पाइस कोस्ट ऑफ इंडिया” के नाम से प्रसिद्ध हो गया। भारतीय मसाले यूरोप, अरब, अफ्रीका इत्यादि के भोज्य पदार्थों का अहम हिस्सा बने। मसालों के प्रयोग ने विश्वभर की व्यंजन संस्कृति को बदल दिया। जाने अनजाने भारतीय मसलों ने दुनिया को आपस में जोड़ा, भूगोल बदला और भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक प्रभाव का जरिया बने।

हम आज जानते है की दक्षिण एशिया की अधिकांश सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएँ भारत से प्रभावित है। बौद्ध धर्म का प्रभाव श्रीलंका, भूटान, तिब्बत और दक्षिण-पूर्व एशिया तक देखा जा सकत है। इसी तरह से दक्षिण एशिया की अधिकांश प्राचीन भाषाएँ संस्कृत के शब्दकोष और व्याकरणिक नियमों से प्रभावित हैं। मंदिर, स्तूप, गुम्बद, मठ: भारत में विकसित मंदिर स्थापत्य और स्तूप, अफगानिस्तान (बामियान बुद्ध), श्रीलंका (अनोरा धातु), नेपाल और भूटान के मठों के रूप में पूरे दक्षिण एशिया में फैले। शून्य, दशमलव, आयुर्वेद, योग, वास्तुशास्त्र, पंचांग आदि दक्षिण एशिया में आम हैं।

अगर राजकीय अभियानों के आधार पर भारत के प्रभावों की चर्चा करें तो चोल वंश (विशेषकर राजराज चोल और राजेंद्र चोल) दक्षिण भारत का सबसे प्रसिद्ध समुद्री साम्राज्य रहा था का अप्रतिम योगदान रहा है। उनकी संगठित नौसेना (navy) भारतीय इतिहास में सबसे प्रभावशाली मानी जाती है। चोलों ने 11वीं शताब्दी में श्रीलंका, मालदीव, मलय द्वीप समूह, थाईलैंड, कंबोडिया आदि क्षेत्रों में सफल सैन्‍य अभियान चलाए। श्रीलंका, मलय देश और सुमात्रा के हिस्से लम्बे समय तक चोल साम्राज्य के अधीन रहे। श्रीविजय और मजापहित साम्राज्य यद्यपि ये साम्राज्य आज के इंडोनेशिया में थे, लेकिन इनकी नींव और संस्कृति पर गहरा भारतीय (हिन्दू-बौद्ध) प्रभाव था, जिसका प्रसार समुद्री मार्ग से हुआ।भारतीय साम्राज्य और व्यापारी इन क्षेत्रों में नौसैनिक शक्ति के माध्यम से पहुँचे। गुजरात और पश्चिमी तट के राज्य (लाट, सातवाहन, चउल, बड़ौदा आदि) ने कारोबारी और सुरक्षात्मक नौसेना रखी थी।

भारतीय संस्कृति ने यूरोप के ज्ञान, विज्ञान, व्यापार, कला और भाषा को प्रेरित किया—विशेषकर मध्यकाल और उसकी पूर्ववर्ती शताब्दियों में, प्रमुख स्रोत व्यापार और बौद्धिक संवाद रहे।प्राचीन यूरोप पर भारतीय संस्कृति का प्रभाव मुख्य रूप से व्यापार (मसाले, वस्त्र, रत्न), विज्ञान (गणित, अंक प्रणाली, ज्योतिष), धार्मिक विचार (बौद्ध/हिंदू दर्शन), कला (गंधार आर्ट) और लेखन-पुस्तक ज्ञान जैसे क्षेत्रों में देखने को मिलता है। भारतीय “दशमलव पद्धति” और “शून्य” के ज्ञान ने यूरोपीय गणित को क्रांतिकारी रूप से बदला।

भारत और चीन के बीच प्राचीन समय से ही व्यापार, धर्म, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में घनिष्ठ संबंध रहे हैं। यह संबंध मुख्यतः स्थल मार्ग (सिल्क रूट, कंबोज, तक्षशिला, कश्मीर होते हुए) और समुद्री मार्गों के जरिये स्थापित हुए। भारत में उत्पन्न बौद्ध धर्म प्रथम शताब्दी ईस्वी से चीन पहुँचा। कई चीनी भिक्षु (फाह्यान, ह्वेनसांग, इत्सिंग आदि) भारत आए, यहाँ की बौद्ध शिक्षा, साहित्य और तीर्थस्थलों से प्रभावित हुए। ये भिक्षु भारत से बौद्ध ग्रंथ, चित्र, मूर्तियाँ लेकर चीन लौटे और वहाँ बौद्ध धर्म, संस्कृत भाषा व भारतीय दर्शन का प्रचार किया। नालंदा, विक्रमशिला जैसे भारतीय विश्वविद्यालयों में चीनी छात्र आते। संस्कृत बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में बड़े पैमाने पर अनुवाद हुआ, जिससे चीनी बौद्ध साहित्य समृद्ध हुआ।

भारत और चीन के बीच व्यापारी भूमि मार्ग से (कश्मीर, तक्षशिला, युन्नान, सिन्त्स्यांग, तिब्बत आदि) व्यापारिक काफ़िले चलते थे। चीन से रेशम, कागज, चीनी मिट्टी; भारत से मसाले, कपड़े, गहने, कीमती पत्थर आदि का लेन-देन होता था। भारतीय खगोलशास्त्र, गणित, आयुर्वेद व वास्तुशास्त्र का प्रभाव चीन में देखा गया। चीनी कागज, बारूद, सिल्क निर्माण आदि की जानकारी भारत पहुँची।दोनों देशों ने एक-दूसरे के दूत, विद्वान और कलाकारों का स्वागत किया। चीन के राजदूतों की भारत यात्रा और भारतीय शासकों के दरबार में चीनी दूतों का उल्लेख ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है।

प्राचीन काल में भारत का दक्षिण-पूर्व एशिया, विशेषकर इंडोनेशिया (जावा, सुमात्रा) और कंबोडिया, से गहरा समुद्री और सांस्कृतिक संबंध रहा। इसे भारत-आसियान संपर्क (Indianization of Southeast Asia) भी कहा जाता है। इंडोनेशिया और कंबोडिया में कई सदियों तक हिंदू और बौद्ध धर्म राजधर्म रहा। कंबोडिया में खमेर साम्राज्य के काल में हिंदू धर्म अपनाया गया, बाद में बौद्ध धर्म प्रभावी हुआ। बोरबुदुर और कंबोडिया (अंकोरवाट) के विशाल मंदिर भारतीय वास्तुकला, शिल्प और मिथकों से प्रेरित हैं। यहाँ शिव, विष्णु, रामायण, महाभारत से संबंधित प्रतिमाएँ और कथाएं प्रचलित हैं। जावा, सुमात्रा व कंबोडिया के लोक कथाओं, नृत्य-नाट्य, कठपुतली (Wayang) में रामायण-महाभारत प्रवेश कर गए। “रामायण” व “महाभारत” के स्थानीय संस्करण आज तक लोकप्रिय हैं। यह समुद्री साम्राज्य भारत और चीन के बीच वाणिज्यिक पुल थे।

भारतीय व्यापारी, ब्राह्मण, कारीगर और कलाकार यहाँ जाकर बस गए और धार्मिक, सांस्कृतिक गतिविधियाँ शुरू कीं। नगरों, राजाओं, नदियों, पर्वतों के नाम संस्कृत आधारित हैं (जैसे “सिंहपुरा”, “अंग्कोर”, “द्वारवती”, “शिवग्राम” आदि)। कई संस्कृतिक पर्व, तीज-त्योहार आज भी भारतीय शैली के समान हैं।

बाली (Bali) इंडोनेशिया का एक प्रमुख द्वीप है, जिसे विश्वभर में उसकी अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और हिंदू परंपरा के लिए जाना जाता है। यह दक्षिण-पूर्व एशिया में अत्यंत प्राचीन और स्थायी हिंदू धर्म के केंद्रों में से एक है। प्राचीन काल में भारतीय व्यापारी, ब्राह्मण और धार्मिक शिक्षक समुद्री मार्ग से जावा, सुमात्रा और बाली द्वीप पहुँचे। इनकी प्रेरणा से बाली में हिंदू धर्म, दर्शन, संस्कार, कला और रीति-रिवाज स्थापित हुए। 10वीं-14वीं शताब्दी में जब मुख्यभूमि इंडोनेशिया (जावा, सुमात्रा) में इस्लाम आया, कई हिंदू परिवार, ब्राह्मण, कलाकार बाली द्वीप चले गए और वहाँ अपनी सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखा। यहाँ के हिंदू धर्म को अगम बाली (Agama Hindu Dharma) कहा जाता है, जिसमें भारतीय हिंदू धर्म के साथ-साथ स्थानीय जड़-पूजा, पूर्वज-पूजा आदि भी सम्मिलित हैं। धार्मिक रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार (गैलुंगन, न्येपी), यज्ञ, मंदिर पूजन, और हर गतिविधि भारतीय हिंदू संस्कृति से गहरी प्रेरित हैं। बाली के मंदिर (Pura), नृत्य, नाट्यकला, मूर्तिकला, वास्तुकला—सबमें भारतीय (विशेषकर शैव, वैष्णव, ब्राह्मण परंपरा) तत्व दिखते हैं। रामायण, महाभारत की कथाएँ यहाँ के मुख्य धार्मिक/सांस्कृतिक नाट्य रूपों (Wayang, Barong) में प्रमुख हैं। बाली की शादियाँ, संस्कार, जीवनचक्र पूर्णत: हिंदू ग्रंथों और विधियों पर आधारित हैं। अधिकांश बालीवासी अपने को भारतीय मूल के क्षत्रिय-वैश्य-ब्राह्मण समुदाय से जोड़ते हैं। बाली में सामाजिक व्यवस्था, मंदिर, नगर नियोजन एवं कृषि प्रणाली (Subak) भी वैदिक-पुराणिक परंपराओं से प्रेरित है।

रामायण के नायक भगवान श्रीराम दक्षिण एशिया के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में पूजे और माने जाते हैं। मुख्य देश जहाँ “राम” का नाम और उनके चरित्र किसी न किसी रूप में समाज, धर्म तथा संस्कृति में महत्वपूर्ण हैं। नेपाल: यहाँ के राजा खुद को “श्रीराम का वंशज” मानते आए हैं। अनेक राम मंदिर, त्यौहार व रामलीला प्रचलित है।

श्रीलंका: रावण की नगरी “लंका” का जिक्र और रामायण का नायक श्रीराम यहाँ लोककथाओं में आते हैं; कई स्थानों को रामायण के घटनाओं से जोड़ा जाता है। थाईलैंड किंग का आधिकारिक नाम “राम” से जुड़ा रहता है (जैसे ‘Rama IX’)। “रामकीयन” (Ramakien) नामक महाकाव्य, रामायण पर आधारित थाई संस्करण है। राम, सीता, हनुमान मुख्य पात्र हैं। कंबोडिया (Cambodia): “रेमकेर” (Reamker) नाम से रामायण कथा का अनुवाद, शुभ संस्कार, नृत्य-नाट्य रूप में खासा लोकप्रिय है। लाओस: यहाँ “Phra Lak Phra Ram” के नाम से रामायण कथा नाट्यशैली में प्रसिद्ध है। मलेशिया: “Hikayat Seri Rama” नामक महाग्रंथ मिलती है—यह मलय भाषा में रामायण का रूपांतरण है। इंडोनेशिया (जावा, बाली): “काकाविन रामायण” (Kakawin Ramayana, Old Javanese Ramayana) विशेष रूप से प्रसिद्ध है। बाली के मंदिरों व मुख्य समारोहों में रामकथाओं की झलक और नाट्य रूप (Wayang Kulit, dance drama) पारंपरिक हैं। म्यांमार (बर्मा): संस्कृत-पाली मिश्रित “Yama Zatdaw” के नाम से रामायण कथा विकसित है। इन देशों में रामायण की कहानियाँ, नायक, आदर्श और नैतिक शिक्षाएँ न केवल धार्मिकता में, बल्कि उनकी कला, साहित्य (काव्य, लोकगीत), वास्तुकला, राजनीति (शाही पदवी ‘राम’), नृत्य-नाटक, धार्मिक उत्सव और लोकाचार में गहराई से समाहित हैं। रामायण ने पूरे दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया को एक सांस्कृतिक धागे से जोड़ दिया है।


Comments

Anonymous said…
❤️
Anonymous said…
Bahut badhiya likhe hai

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