भारत : सनातनता की पड़ताल

भारत एक सनातन राष्ट्र है इसका सरलतम अर्थ यह है की एक राष्ट्र के रूप मे इसकी अवधारणा परंपरा से प्राप्त होती है। अर्थात एक राष्ट्र के रूप मे इसकी कल्पना परंपरा से ही है न की आधुनिक यूरोप के तरह यह किसी क्रांति या किसी राजशाही संधि का परिणाम। अपने आरंभ से लेकर वर्तमान तक भारत अपने इस सनातन बोध के प्रति अत्यंत सजग रहा है। पहले इस्लामिक आक्रांता, फिर अंग्रेजी-साहबों की धूर्तता और तत्पश्चात काँग्रेसी व्यवस्था के खूनी पंजों ने इस सनातन भारत के बुनियाद, इतिहास और विरासत को तोड़ने-मड़ोरने की भरपूर चेष्टा की। खासकर वर्तमान समय में भारत का सनातन स्वरूप सूचना क्रांति और उससे उपजे कु-सूचना युग (age of misinformation) के कारण एक वैचारिक द्वंद्व मे फंसा दिखाई देता है। इस द्वन्द्व में एक तरफ जहां इसके अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बोध है तो वही दूसरी तरफ इस 1500 सालों के दौरान थोपी गई औपनिवेशिकता का बोझ।

लेकिन इसका एक सकारात्मक पहलू भी है की जब जब भारत की सनतानता पर हमले हुए है इसका अंतरतम उतनी ही चेष्टा से उस हमले का प्रतिकार किया है। इस प्रतिकार के क्रम मे उसने समकालीन सिद्धांतों को ही कही अधिक परिष्कृत रूप से और अधिक समावेशी रूप से प्रयोग किया है। इसका एक नवीनतम उदाहरण है 2014 का चुनाव। जब मनमोहन सिंह देश के संसाधनों पर अवैध रूप से अल्पसंख्यकों को कब्जा करने के लिए उकसा रहे थे तो सनातन समाज ने उसका लोकतान्त्रिक रूप से ही प्रतिकार कर दिया है। खैर इसकी व्याख्या चाहे जिस रूप मे भी की जाए यह सच है की आज भारत में पुनर्जागरण का दौर है और हाँ यह उस तथाकथित सामाजिक-धर्म सुधार आंदोलनों से बिल्कुल अलग है जिसे अंग्रेजी-साहेबों के निर्देशों एवं नियंत्रण मे राजा राममोहन राय ने शुरू किया था। आज हम उस युग मे जी रहे है जब नया भारत उठ खड़ा हो रहा है और अपने उज्ज्वल भविष्य की छाँव दे रहा है। इस संदर्भ मे यह अपेक्षित है की हम सभी इसकी सनातनता के रहस्यों से अवगत है। मेरे अनुसार अन्य बातों के साथ इसके तीन आवश्यक कारण है;

1. वैज्ञानिकता पर आधारित जीवन दर्शन

2. विमर्शों पर आधारित संस्कृति

3. विविधता के प्रति एक गहरी आस्था


वैज्ञानिकता पर आधारित जीवन दर्शन

जी हाँ! वैज्ञानिकता ही भारतीयता/सनातनता का पर्याय है और इस वैज्ञानिकता का मतलब वह तथाकथित द्वन्द्वात्मक वर्ग संघर्ष बिल्कुल भी नहीं है जो की अपने सिद्धांत मे उतना ही अवैज्ञानिक है जितना की व्यवहार में। एक सनातनी का दिन प्रतिदिन का धार्मिक कर्मकांड हो या उसका समस्त सामाजिक आचार, विचार और व्यवहार, विज्ञान के मूलभूत सिद्धांत और उसके निष्कर्षों के अनुरूप ही निष्पादित किए जाते है। वैज्ञानिक आधार पर यह प्रमाणित है ऋग्वेद का नासदीय सूक्त ही इस ब्रह्मांड के सृजन का सूत्र (formula) है। यह कहने की आवश्यकता नहीं की यज्ञों के हवन से जहां वायु की शुद्धता सुनिश्चित होती है तो मंत्रों के उच्चारण के दौरान सृजित ध्वनियों के कंपन से एक तरह की सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को महसूस किया जा सकता है।

विमर्शों पर आधारित संस्कृति

विचार विमर्श ही इस सनातन संस्कृति का प्राण रहा है। अगर भारत की सभ्यता ज्ञान की सभ्यता थी तो इसका आधार इसका विचार विमर्श पर आधारित होना ही था। यही वह कारण है जिसके कारण भारत अपने इतिहास के अधिकतम अवधि मे विश्व गुरु कहलाने का गौरव रखता था। इस्लामिक आक्रान्ताओं और फिर ब्रिटिश राज द्वारा समर्थित सत्ता ही ज्ञान है (power is knowledge) की अवधारणा ने एक ऐसी मानसिकता का विकास किया जो इसके इस धरोहर के प्रति दुराग्रही चरित्र वाला था। दुर्भाग्य से 1947 के बाद स्थापित व्यवस्था भी कही अधिक दुराग्रही साबित हुई। समग्रतः कॉंग्रेसी व्यवस्था अपने स्व से इतर किसी भी वैकल्पिक विचार को स्वीकार नहीं करती थी। इस संयोग नहीं है की आजादी के बाद कोई भी भारत मे सनातन केंद्रित भारतविद् पैदा नहीं हुआ। इसके उलट हम नैमिषारण्य में महीनों चले वैचारिक विमर्श को जानते है। हम जनक की सभा के बारे मे जानते है। हम सभी लोग काशी का शास्त्रार्थ का बारे मे कुछ न कुछ जरूर जानते है। आचार्य शंकर और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ के बारे मे तो अवश्य ही सुने ही होंगे। इसका एक सबसे महानतम पहलू यह था की इस विचार विनिमय के पश्चात जो कुछ भी छन कर बाहर आता था उसे स्वीकार किया जाता था और फिर वही समकालीन समाज के मूल्य बनते थे। क्या यह आश्चर्य नहीं है की शंकराचार्य के दिग्विजयों ने अखिल भारत को जाने अनजाने अद्वैतवादी बना दिया। गहन स्तरीय अध्ययन और तार्किक शास्त्रार्थ के माध्यम से शंकराचार्य ने अद्वैत के बारे मे समाज को बताया था और तब से आजतक जाने अनजाने पूरा का पूरा सनातन समाज कमोवेश रूप से उसे स्वीकार कर अद्वैतवादी बना हुआ है। हम सभी जानते है की तर्कों पर आधारित विचारों का एक अपना सम्मोहन होता है जिसके अपने परिणाम भी प्राप्त होते है। इस संदर्भ की तुलना वर्तमान मे टेलीविजन की बहसों से कर सकते है। आपको किस वक्ता का विचार सम्मोहित करता है और क्यों और इसी के अनुरूप उसके परिणाम की भी कल्पना की जा सकती है और इसी सूत्र का प्रयोग आप चुनावों मे मतदाताओं के व्यवहार को समझने मे कर सकते है।

विविधता के प्रति एकता

यह इसकी मूलभूत पहचान है। इसके अन्तर्गत एक सनातनी इस तथ्य मे विश्वास रखता है की ‘सत्य एक है’ लेकिन उसे विभिन्न रूपों मे जाना जा सकता है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है की भारत के इतिहास मे किसी को भी इसलिए नहीं मारा गया की वह सनातन के सामाजिक-धार्मिक-चिंतन प्रणाली से असहमति व्यक्त करता है। साथ ही यह भी की इसे अपने इतिहास के किसी भी चरण मे किसी भी विचार को स्वीकार करने मे झिझक नहीं हुई, शर्त केवल इतनी ही थी ही वह विचार तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक हो और मानव मन की जिज्ञासाओं को संतुष्ट कर दे। इस सनातन भारत ने बुद्ध को भी एक एक अवतार मान लिया। संख्या दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि को भगवान का एक अवतार मान लिया गया। वैविध्य विचार हों, दर्शन हों या विश्वास हो, सनातन भारत ने सबको स्वीकार किया है। एक सनातनी, परम की एकता पर विश्वास रखता है और यह मानता है की वहाँ तक पहुँचने के अनेक रास्ते हो सकते है और वह रास्ता की व्यक्ति की योग्यता, क्षमता एवं उसके प्रयासों पर निर्भर करती है। ज्ञातव्य है की पूरा का पूरा अनिश्वरवादी परंपरा जैसे की बौद्ध, जैन और आजीवक के साथ साथ षडदर्शनों की परंपरा भी विविधता से परिपूर्ण है और सब भारतीय समाज को स्वीकार्य है।

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