नीतीश कुमार, बिहार और बिहारी

भारत की राजनीति मे बिहार को हमेशा एक ‘राजनीति की प्रयोगशाला’ के रूप मे देखा जाता है. हम कह सह सकते हैं की राजनीति मे जो हुआ है यहाँ पर, वही होगा (दुहराया जायगा) कहीं पर और राजनीति में वैविध्य/असमंजस इतना की महारानी वेब सीरीज का डायलॉग याद या जाता है जिसके अनुसार  जब-जब आपको लगता है कि आप बिहार को समझ गए हैं, बिहार कुछ ऐसा कर देता है की आपको झटका लग जाता है और आप फिर से फिर से बिहार को समझने लगते है। बिहार और बिहारी को समझने का सूत्र वाक्य है यह। अगर आप बिहार के इतिहास को पढ़ेंगे और उसे देखने समझने बिहार जाएंगे तो कुछ नहीं पाएंगे। संभव है की आप खुद इतिहास बन जाएं। तभी तेजस्वी ने सच कहा था की दिल्ली वाले बिहार को नहीं समझते हैं। बिहार की चुनाव राजनीति को समझने के लिए मंडल, कमंडल और गठबंधन तो है ही नीतीश कुमार का कुर्सी कुमार बंद जाना भी स्वयं में एक संस्था है जिसे समझना भी उतना ही जरूरी है जितना का राजनीति के अन्य पक्ष।  नीतीश बाबू अवसरवादी राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण और शायद आजादी के बाद का सबसे जटिल चरित्र है। उनके द्वारा किए गए राजनीतिक प्रयोगों को इस चित्र की मदद से आसानी से समझ सकते हैं (साभार:- गूगल इमेज)

भाजपा जो शायद अपनी राजनीतिक यात्रा के सबसे शानदार चरण मे है, बिहार में उसकी स्थिति संशयी ही है। वैसे भाजपा ही क्यों अन्य राजनीतिक पार्टियां भी नीतीश कुमार में दांव में फंसी रहती है। मेरे अनुसार इस बार नीतीश कुमार का पलटना, नीतीश कुमार के अंत की शुरुआत है और इसी के साथ बिहार के लिए नए अवसरों की शुरुआत है। बिहार में जैसे जैसे वो अपनी प्रसंगिता खोते चले जाएंगे, संघीय राजनीति में वह स्वयं को भाजपा का विकल्प बनने की राजनीति करेंगे और इस प्रयास में RJD, काँग्रेस सहित अन्य पार्टियों का का भी समर्थन हासिल करना उनके लिए आसान होगा। लेकिन यह व्यवहार में यह कितना प्रतिफलित होगा वह चुनावी राजनीति में मतदाताओं के द्वारा ही निश्चित हो सकेगा। भाजपा के लिए महत्वपूर्ण यह होने जा रहा है की आने वाले समय मे नीतीश विपक्ष का चेहरा होने जा रहे है। भाजपा को अब राहुल से नहीं बल्कि नीतीश से चुनौती मिलने की उम्मीद है। भाजपा के बारे लोगों के विचार बदलने लगे है। यह भाजपा की घोर विफलता है की सत्ता के 8 सालों मे भी वह अपना कोई इकोसिस्टम नहीं बना पाया। ऐसी विफलताएं है जो भाजपा नीत  केंद्र सरकार और उसके नेतृत्व को कठघड़े मे खड़ा करता है। दिल्ली सहित उसके द्वारा शासित राज्यों मे कानून व्यवस्था की खराब स्थिति, एक अलग ही तरह का मुस्लिम तुष्टीकरण (शाहीन बाग, CAA-विरोधी आंदोलन, दिल्ली दंगे) और औपचारिक रूप से मोनिका अरोरा की पुस्तक को ब्लूमसबेरी के द्वारा प्रकाशित करने से मना कर देना आदि कुछ ऐसे चीजें है जो भुलाये नहीं भूलाया जा सकता। इन सभी घटनाओं में भाजपा नेतृत्व की महान चुप्पी देश के सामान्य मतदाताओं को परेशान किया है।

क्योंकि संदर्भ बिहार का है इस लेख को हम बिहार तक ही सीमित रखेंगे और सामान्य से सवाल की चर्चा करेंगे की बिहारी तेरा क्या होगा? जवाब भी यही है की बिहारी तेरा कुछ नहीं होगा। पूरा देश तेरे राजनीतिक परिक्वता के भले ही गुण गाएगा लेकिन कोई कुछ नहीं देने वाला सिवाय बिहारियों के दिहारी मजदूरी के। कोरोना काल याद है न! हर जगह से खदेड़ा गया था! वही हश्र तुम्हारा आगे भी होगा, उससे कहीं अधिक। अपने बिहार में तो कुछ है नहीं (बिहारी को छोड़कर) राजनीति से उपजा गठबंधन का तंत्र, अपना रोजगार ढूंढेगा या तुम्हारे रोजगार की चिंता करेगा। करीब से देखो तो पता चलेगा की बिहार 1970 के दशक तक कहीं से भी पिछड़ा नहीं था लेकिन सम्पूर्ण क्रांति की जिद ने एक ऐसी लोकतान्त्रिक परिपाटी चला दी की बिहार की भूमि सत्ता विरोधी (केंद्र विरोधी) तंत्र की प्रयोगशाला बन कर रह गई। जब इंदिरा गांधी अम्मा बन कर पूरे भारत मे रेवड़ी बाँट रही थी तो तुमने जय प्रकाश को चुना जो सीधे सीधे केंद्र की सत्ता को लोकतान्त्रिक चुनौती दे रहे थे, जब बाजपेयी केंद्र मे थे तब लालू-राबडी राज ले कर आए और जब मनमोहन का काल केंद्र मे था तो तुमने नीतीश राज को चुना और अब जब केंद्र मे मोदी का समय है तो तुमने महागठबंधन को चुना। अब तुम्ही बताओ क्या विकास कभी आएगा तुम्हारे घर? तुम कभी यह समझ ही नहीं पाए की सत्ता विरोध की अपनी कीमत होती है और उसे चुकानी ही पड़ती है। कीमत चुकाओ और एक बार फिर से पिछड़ा बन कर रहो। जब भारत एक बार फिर आत्मनिर्भर होने की ओर आगे बढ़ेगा, तुम ‘विशेष पैकेज’ की बाट जोहते रहना।

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