उपनिवेशवाद का प्रादेशिक विस्तार : सांस्कृतिक पहचानों की समाप्ति
2. क्योंकि औवनिवेशिक राज की औपचारिक शुरुआत बंगाल से ही शुरू हुई थी, इसकी शुरुआत इसी भूभाग से करते है। बंगाल मुग़लों के अधीन एक महत्वपूर्ण सूबा था परंतु अलवर्दी खाँ ने पतनशील व्यवस्था का लाभ उठाते हुए उसने केंदीय मुग़लों को मालगुजारी देते हुए पर्याप्त स्वायत्ता का उपभोग किया। उसकी मृत्यु के पश्चात सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना जिसने अपने विरोधी शौकत गंज हत्या कर अपनी नवाबी को सुरक्षित कर लिया लेकिन औपनिवेशिक राज के के द्वारा दस्तक के दुरुपयोग जिसके कारण नवाब को आर्थिक राजस्व मे कमी होती जा रही थी, को रोकने का असफल प्रयास किया। इसी क्रम कंपनी ने अपने फ़ैक्टरीज (factories) की किलेबंदी करने की जिद ने सिराज के साथ उकसा दिया और उसने 4 जुन 1756 को कासिमबाजार की कोठी पर उसने एक सफल आक्रमण किया। कलकत्ता के फोर्ट विलियम (Fort William) पर भी नवाब का अधिकार हो गया। परंतु यह विजय अल्पजीवी ही रही और अंततः अली नगर की संधि (9 फरवरी 1757) के द्वारा अंग्रेजों को सब कुछ वापस कर दिया गया। इधर अंग्रेजों ने मीरजाफर के साथ गुप्त संधि जिसमे उसे नवाब बनाने को प्रलोभन दिया गया। इसकी परिणति प्लासी की लड़ाई मे हुई। सिराज की सेना हर गई और मीरजाफर को बंगाल का नवाब बना। राजनीतिक नियंत्रण की यह प्रक्रिया अर्थात भारत की राजनीतिक व्यवस्था में अंग्रेजों का औपचारिक प्रवेश इसी दिन (23 जून 1757) से मानी गई जिसका वर्णन राज समर्थित इतिहासकारों ने खूब किया है। उनके लिए यह यह दिन यहाँ के राज्य व्यवस्था में घुसपैठ का दिन था जिसने उनके पक्ष मे संप्रभुता में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित की थी और उस तरह से यह लड़ाई भारत के इतिहास मे लड़ी गई लड़ाइयों मे सबसे निर्णायक लड़ाइयों मे एक बन गई। क्लाइव ने इस युद्ध को क्रांति की संज्ञा दी है।
3. इस युद्ध के बाद के घटनाक्रमों से कंपनी को पर्याप्त संसाधनो की प्राप्ति हुई। बंगाल मे अब अन्य यूरोपीय शक्तियों का प्रभाव ही समाप्त हो गया। प्लासी की लड़ाई इस अर्थ मे महत्वपूर्ण थी की इसने तात्कालिक रूप भूभागीय अध्यारोहण की प्रक्रिया की प्रारंभ किया जो 1857 मे जाकर पूरा हुआ जब अंग्रेजों ने भारत मे साम्राज्यीय विस्तार को 1857 के दवाब मे छोड़ दिया और उसके बाद एक बहुआयामी औपनिवेशिक प्रक्रिया की प्रक्रिया आरंभ हो गई जो कमोवेश आज भी हम भारतीयों को जकड़े हुए है। कंपनी ने बंगाल से प्राप्त धन का प्रयोग चीनी व्यापार के निवेश तो किया ही तीसरे कर्नाटक युद्ध के फ़्रांसीसियों को पराजित करने के लिए किया। कलकत्ता मे कंपनी की अपनी टकसाल भी बना ली जहां से कंपनी का अपना पहला सिक्का 19 अगस्त 1757 को जारी किया। कहते है की इतिहास का प्रतिशोध बहुत क्रूर होता है क्योंकि अब मीर जाफ़र स्वयं कंपनी का शिकार बन गया। बर्दमान, मिदनापुर, चटगांव की मिली जमींदारी के पुरस्कार स्वरूप -कंपनी ने मीर जाफ़र स्थान पर मीर कासिम को बंगाल का नवाब बना दिया। कई इतिहासकारों ने इस घटना को ही बंगाल की दूसरी क्रांति (पहली क्रांति प्लासी की लड़ाई) कही है। मीर कासिम के द्वारा प्रशासनिक प्रयोग कोई उपलब्धि अर्जित नहीं कर सका। उसने कंपनी के प्रभाव से बचने के लिए अपनी राजधानी का स्थानांतरण कर मुर्शिदाबाद से मुंगेर ले आया। उसने सेना तथा प्रशासन का आधुनिकीकरण भी किया और इन सब चीजों के लिए बंगाल को अतिरिक्त राजस्व की आवश्यकता थी। बंगाल यद्यपि एक समृद्ध सूबा था परंतु राजस्व की वसूली नगण्य थी क्योंकि वहाँ का कारोबार कम्पनी या उसके कर्मचारियों व अधिकारियों के अवैध नियंत्रण मे थी जो कंपनी को मुग़ल बादशाह फरुखशियर मे फरमान (दस्तक) से प्राप्त हुई थी। मुंगेर की संधि जिसमे भारतीय व्यापारी 25% से 30% की तुलना मे कम्पनी के माल पर 9% कर लगाने की बात काही गई थी, कंपनी की कलकत्ता काउन्सिल ने नकार दिया। खिन्न होकर मीर क़ासिम ने तब सारे कारोबारी टैक्स ही समाप्त कर दिए यानि हिंदुस्तानी कारोबारी भी 25% से 30% टैक्स से छुट्टी पा गए। इस तरह उसके इस प्रयास से दस्तक के दुरुपयोग के उत्पन्न अव्यवस्था से स्वदेशी व्यापारी भी लाभान्वित हो सके। सुरेश पटवा ने अपनी पुस्तक ग़ुलामी की कहानी मे इस घटना को विश्व मे प्रथम मुक्त व्यापार प्रणाली के रूप मे देखा है।
4. अब एक बार फिर मीर क़ासिम को अपदस्थ कर दिया गया और मीर जाफ़र फिर से नवाब बनाया जाय। कंपनी ने जैसे ही पटना पर क़ब्ज़ा (24.06.1763) कर लिया परंतु मीर कासिम ने फैक्ट्री प्रमुख सहित 200 अंग्रेजों को बंदी बना लिया परंतु कासिम हार कर पटना भाग गया। फिर वहाँ से भागकर अवध के नवाब वज़ीर शुजाउद्दौल्ला और मुग़ल सम्राट शाह आलम से जा मिला। मीर कासिम के भागते ही East India Company अब कम्पनी बहादुर बन गई जिसने आने बातों के साथ साथ यह जाफ़र के दरबार के रोजमर्रा के मामलों पर नियंत्रण एक स्थायी रेसीडेंट की नियुक्ति करते हुए यह तय किया गया की मीर जाफ़र 6,000 घुड़सवार और 12,000 से ज़्यादा पैदल सेना नहीं रखेगा। साथ ही कम्पनी और उसके अधिकारियों व कर्मचारियों को टैक्स न चुकाने की पूरी छूट रहेगी परंतु हिंदुस्तानी और अन्य विदेशी कारोबारी 25% से 30% टैक्स देते रहेंगे।
5. मीरकासिम भागकर अवध पहुँच जहां उसने अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर एक ढीले ढाले सैन्य संघ बनाया। 1764 के शरद ऋतु में लड़ाई फिर से शुरू हो गई और अंग्रेजी कमांडर मेजर मुनरो के नेतृत्व मे तीनों की संयुक्त सेना को करारी हार दी (22.10.1764)। यद्यपि अवध का नवाब शुजा-उद-दौला के साथ छोटी छोटी झड़पें होती रही जबकि कासिम भागकर दिल्ली चला आया जहां उसने बड़ी ही गरीबी मे पलवल के पास 1777 मृत्यु को प्राप्त हुआ। मुग़ल बादशाह शाह आलम को अंग्रेजों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। बक्सर की लड़ाई का महत्व इस बात मे है इसका भारत के इतिहास पर प्रभाव ज्यादा निर्णायक रहा। प्लासी ने कंपनी को बंगाल के सिंहासन पर कठपुतली नवाब स्थापित करने में सक्षम बनाया था, लेकिन बक्सर ने तो पूरे अवध सहित उत्तर-पश्चिम सीमा और मुग़लों के माध्यम से दिल्ली तक को अपने नियंत्रण में लाने का एक अनूठा अवसर प्रदान दिया और अंततः पलासी ने जिस प्रक्रिया की शुरुआत की थी बक्सर ने उसे पूरी की। अब दिल्ली से पूर्व अंग्रेजों को कोई चुनौती देने वाला नहीं बचा था। उनका दिल्ली प्रयाण सिर्फ समय की बात थी। बक्सर के युद्ध में मिली आशातीत जीत के बाद क्लाइव के नेतृत्व मे मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय तथा अवध के नवाब शुजाउद्दौला के साथ क्रमश: इलाहाबाद की प्रथम एवं द्वितीय के संधि की गई। इलाहाबाद की प्रथम संधि (12.08.1765) के अनुसार कंपनी को मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय से बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई। कंपनी ने अवध के नवाब से कड़ा और इलाहाबाद के जिले लेकर मुगल सम्राट शाहआलम द्वितीय को दे दिए। कंपनी ने मुगल सम्राट को 26 लाख रूपये की वार्षिक पेंशन देना स्वीकार किया। इलाहाबाद की द्वितीय संधि (16.08.1765) जो की क्लाइव एवं शुजाउद्दौला के मध्य सम्पन्न हुई थी के शर्तों के अनुसार इलाहाबाद और कड़ा को छोड़कर अवध का शेष क्षेत्र नज्मुद्दौला को वापस कर दिया गया। अब कंपनी द्वारा अवध की सुरक्षा हेतु नवाब के खर्च पर एक अंग्रेजी सेना अवध में रखी गई। साथ ही कंपनी को अवध में कर-मुफ्त व्यापार करने की सुविधा प्राप्त हो गयी। इलाहाबाद की संधि के बाद जहां मुगल बादशाह शाहआलम ने कंपनी को उड़ीसा, बिहार, बंगाल का राजस्व और दीवानी अधिकार सौप कर क्षेत्रीय संप्रभुता मे भागीदार बनाया वही अवध के नवाब शुजाउदौला ने करीब करीब 60 लाख रुपए की रकम कंपनी को हुए नुकसान के बदले में देते हुआ इलाहाबाद का किला और कड़ा का क्षेत्र मुग़ल सम्राट के लिए छोड़ना पड़ा। इस बीच बंगाल मे नवाब मीरजाफर की मृत्यु फरवरी 1765 मे हो गई और उसके बाद उसके पुत्र नज्मुदौला को बंगाल का नवाब बना दिया गया।
समग्रतः बक्सर के युद्ध के बाद अंग्रजों की शक्ति और भी अधिक बढ़ गई, और समय के साथ साथ अंग्रेजी सत्ता के सामने भारतीय चुनौती समाप्त हो गई आने वाले लगभग 90 सालों मे अंग्रेज पूरी तरह से भारत के राजनीतिक घटनाक्रम को नियंत्रित करने लगे। एक विदेशी सत्ता के द्वारा भारत मे राजकीय प्रभुसत्ता का आरोहण का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ की भारत की पूरी व्यवस्था ही पलट दी गई जो की तत्कालीन सामाजिक, नैतिक, राजनैतिक और आर्थिक मूल्यों का पतन के रूप मे जानी गई है। बक्सर मे मिली जीत ने वास्तव मे उन बुनियादी प्रशासकीय परिवर्तनों की रूपरेखा तैयार कर दी जिसे ब्रिटिश प्रशासनिक व्यवस्था कहा जाता है यद्यपि उसमे समय समय पर ब्रिटेन के आपसी हितों और यहाँ की घरेलू जरूरतों के अनुसार परिवर्तन भी हुए थे। तात्कालिक तौर पर नवाब की सत्ता का अंत होता दिख रहा था परंतु नई व्यवस्था शासन के किसी भी तरह के उत्तरदायित्व से ही मुफ्त थी। इस वैकल्पिक व्यवस्था को द्वैध शासन कहा गया है, जिसका का अर्थ है शासन को दोहरी व्यवस्था जिसके अंतर्गत 'दीवानी' अधिकार अर्थात भू-राजस्व वसूलने का अधिकार कम्पनी के पास था किन्तु रोजमर्रा के प्रशासन की जिम्मेदारी नवाब के कन्धों पर था। अर्थात कंपनी के लिए इसका अर्थ था उत्तरदायित्व रहित अधिकार जबकि नवाब के लिए इसके मायने थे अधिकार रहित उत्तरदायित्व। कंपनी ने लगान वसूली के लिए मुहम्मद रजा खाँ को बंगाल का तथा शिताब राय को बिहार का दीवान नियुक्त किया। प्राप्त राजस्व में से कम्पनी प्रतिवर्ष 26 लाख रूपए सम्राट को तथा 53 लाख रूपए बंगाल के नवाब को शासन कार्यों के संचालन देती थी और शेष राशि को अपने पास रखती थी। द्वैध शासन प्रणाली के दुष्परिणाम जल्द ही सामने आने लगे। देखते ही देखते यहाँ (बंगाल) की में कानून-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गयी तथा न्याय मात्र बीते समय की बात होकर रह गया। लॉर्ड कार्नवालिस ने इंग्लैंड के हाउस ऑफ कॉमन्स में उसने स्वीकार किया की मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि 1765-1774 ई तक ईस्ट इंडिया कम्पनी की सरकार से अधिक भ्रष्ट, झूठी तथा बुरी सरकार संसार के किसी भी देश में नहीं थी। द्वैध शासन से कृषि व्यवस्था को भी आघात लगा। राजस्व वसूली, सर्वोच्च बोली लगाने वालों को दी जाने लगी। इन सभी कुव्यवस्थाओ के सीधा परिणाम 1770 ई के बंगाल के अकाल ने दिखा दी क्योंकि इस तथाकथित द्वैध व्यवस्था ने कृषकों की कमर तोड़ दी थी।
बक्सर के बाद की प्रक्रिया को समझना
परिणामों की दृष्टि से बक्सर (1764) के बाद की गई संधियों के माध्यम से भारत में विधिक रूप से सत्ता हासिल करने का दौर माना जा सकता है क्योंकि अब लगान वसूली और राज्य की ओर से युद्ध लड़ने के अधिकार अंग्रेज़ों को मिल गए थे। क्लाइव ने संधि में शुजाउद्दौला को शाह आलम से अवध और इलाहाबाद का सूबेदार बनवा कर कई निशाने साधे। सबसे पहले तो शुजाउद्दौला से युद्ध में हर्ज़ाने के बतौर 50 लाख रुपये रखवा लिए। चुनार के क़िले में अंग्रेज़ी फ़ौज रखने की अनुमति ले ली। अवध सूबा में से कारा और इलाहाबाद कम्पनी के नाम लिखवा लिया। शुजाउद्दौला के दरबार में अंग्रेज़ी एजेंट रखना मंज़ूर करवा लिया। शुजाउद्दौला ने शपथ पत्र दिया कि वह मीर क़ासिम और जर्मन समरू जिन्होंने 200 अंग्रेज़ों का पटना में क़त्ल किया था, को अपनी सीमाओं में नहीं घुसना देंगे न पनाह देंगे। और सबसे सबसे बड़ी शर्त सुरक्षा की थी कि जिसमे कम्पनी अवध और इलाहाबाद सूबों पर आक्रमण की दशा में शुजाउद्दौला की तरफ़ से युद्ध में भाग के सकती है और युद्ध का ख़र्चा शुजाउद्दौला को देना होगा। अंतिम शर्त एक ओर अवध और इलाहाबाद की ओर से कम्पनी को युद्ध का अधिकार देती थी और कम्पनी का ख़र्चा कुछ नहीं। अब कंपनी की नज़र एकमात्र योग्य प्रतिस्पर्धी मराठा सत्ता पर थी क्लाइव ने अवध को कम्पनी और मराठों के बीच एक बफ़र स्टेट बना दिया। मराठे पानीपत की तीसरी लड़ाई की हार के सदमे से निकलकर दिल्ली तक मार कर रहे थे। (सुरेश पटवा. ग़ुलामी की कहानी : (1757 से 1857 तक का रोचक सच) (Hindi Edition) से उद्धृत.
अंग्रेज और मैसूर
जब क्लाइव मुग़लों की केन्द्रीय सत्ता के इर्द गिर्द कम्पनी का प्रभाव बढ़ाने मे व्यस्त था लगभग उसी समय सुदूर दक्षिण मे हैदर अली फ़्रांसीसियों के सहयोग से अपनी स्थिति मज़बूत कर रहा था। लेकिन कहावत है की बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी। अंग्रेजों की आक्रामक नीतियों के कारण मैसूर राज्य से विस्तार के लिए संघर्ष होना ही था और हुआ भी यही। वर्तमान कर्नाटक मे मैसूर का राज्य स्थित था जिसपर वोदियार वंशी राजा चकियाँ कृ्ष्णराय का शासन था जो अपने दो धूर्त अधिकारी नन्नराज व देवराज के द्वारा शासन करता था। उनकी योग्यता ने हैदर को अवसर प्रदान किया और हैदर मैसूर का शासक बन गया परंतु उसकी महत्वाकांक्षा ने मराठों के साथ साथ हैदराबाद के निजाम और अंग्रेजों को भी चिंतित कर दिया। 1766 में जब हैदर अली मराठों से एक युद्ध में उलझा था, मद्रास सरकार की अगुवाई मे कंपनी ने उत्तरी सरकार हेतु हैदराबाद के निज़ाम से गठबंधन कर लिया। परंतु चतुरता से हैदर ने मराठों से संधि कर निज़ाम को अपनी ओर मिला लिया और कर्नाटक पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार यह पहला अंग्रेज-मैसूर युद्ध था जो 1767 से 1769 तक लड़ा गया। 1768 तक निज़ाम युद्ध से हट चुका था लेकिन हैदर अली ने अकेले ही इस युद्ध को लड़ा और जब 1769 में जब हैदर अली ने मद्रास के क़िले पर धावा बोला तो मद्रास कौंसिल ने युद्ध विराम को मान लिया और दोनों पक्षों के बीच 'मद्रास की संधि' (4.4.1769) हो गई। संधि की शर्तों के अनुसार दोनों पक्षों ने जीते गए भू-भाग लौटा दिए परन्तु 'करुर' का क्षेत्र हैदर के अधीन ही रहा। अंग्रेज़ों ने हैदर अली पर किसी और के आक्रमण के समय रक्षा करने का झूठ वादा भी किया। जब मराठा पेशवा माधव राव ने 1771 मे मैसूर पर धावा बोल दिया तो अंग्रेज़ों ने हैदर की कोई भी मदद नहीं की। हैदर भी समझदार था। 1778 में जब अमेरिकी क्रांति के दौरान जब अंग्रेजों और फ़्रांसीसियों के बीच की प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर थी तो अंग्रेज़ों ने माहे को 1779 में अपने क़ब्ज़े में ले लिया। हैदर अली के लिए माहे का महत्वपूर्ण इस बात मे था की उसे यही से सैनिक साजो समान को आपूर्ति होती थी। हैदर अली मैसूर की पहाड़ियों से उतर कर कर्नाटक के मैदान मे उतरकर अंग्रेजी सेना की एक ब्रिगेड को पोल्लिलोरे में नेस्तनाबूद कर दिया। तब वॉरन हेस्टिंग ने आयरकूट के नेतृत्व में बंगाल सेना को भेजा। उस फ़ौज ने हैदर अली को चिंगलपेट, वांडीवाश, पोर्टिनोवो, चिदम्बरम, टिकोल्लाम में लगातार हराया और अंग्रेजी फौज त्रिनोमलि नागपट्टनम तक घुस गई। दूसरी तरफ जब हैदर अली के लड़के टीपू को पूर्वी तट पर फ़्रान्स का सहयोग मिला तो उसने अंग्रेज़ों से तंजौर और कुड्डालोरे छीन लिया। अभी युद्ध चल ही रहा था की हैदर अली की मौत (7.12.1782) हो गई और अंततः मंगलोर की संधि (मार्च 1784) में दोनो पक्षों ने यथास्थिति स्वीकार कर ली। इस समय की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति यह थी की अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1775 से 1783) के बाद अमेरिका इंग्लैंड के हाथ से निकल चुका था और स्वाभाविक रूप से अंग्रेज भारत पर पूरा ध्यान लगा रहे थे। कार्नवालिस जो अमरेकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों का सेनापति रह चुका था 1786 में उसे बंगाल मद्रास बम्बई की संयुक्त कमान का गवर्नर जनरल बनाकर कलकत्ता भेजा गया। उसने आते ही निज़ाम से गुंटूर की रियासत ले ली इस प्रकार उसने वह कृष्णा नदी के मुहाने से अंदर के इलाक़ों तक भौगोलिक पहुँच को सुनिश्चित कर लिया। बदले में उसने निज़ाम को मैसूर के क़ब्ज़ा किए हुए इलाक़े देने का आश्वासन दिया। टीपू के अनुसार कार्नवालिस का यह प्रयास मंगलोर की संधि की शर्तों का घोर उल्लंघन था। अंग्रेजों की कुटिलता से विचलित हो टीपू ने तंजौर पर हमला (दिसम्बर 178) कर दिया। दोनों पक्षों ने युद्ध की घोषणा कर दी। अंग्रेज़ों ने मराठों और निज़ाम अपने मे मिलकर मैसूर को बाँट लेने का क़रार कर लिया। अंग्रेज़ मराठा और निज़ाम की संयुक्त सेना श्रीरंगपतनम की तरफ़ बढ़ी। बंगलोर को जीत कर टीपू को क़िले में घेर लिया गया और टीपू के साथ एक अपमानजनक संधि की गई जिसके अंतर्गत टीपू को 3,50,00,000/ की राशि और अपने दो नाबालिग़ पुत्रों को गारंटी के तौर पर अंग्रेज़ों को सौंपने पड़े। टीपू अब श्रीरंगपतनम के भौगोलिक प्रदेश का ही राजा बन कर रह गया। उसके पश्चिम और दक्षिण व पूर्व में अंग्रेजों का अधिकार हो गया जबकि उत्तर का इलाक़ा निज़ाम और मराठों के पास चला गया।
अब टीपू के पास कोई चारा नहीं था। उसने अपने प्रतिनिधि फ़्रांस भेजा ताकि अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक सशक्त मोर्चा बनाया जा सके लेकिन आंतरिक मोर्चे पर मराठों का साथ न मिलने को टीपू ने एक धार्मिक रंग दे दिया और जिहाद की शरण ले ली। फ़्रांस मे तब नेपोलियन का शासन था और ब्रिटिश उसके प्रति कोई भी भूल करने को तैयार नहीं थे। लॉर्ड वेलेजलि ने उसी समय कलकत्ता पहुँचकर स्थिति का जायज़ा लिया और युद्ध की तैयारी शुरू कर दी। उसने सबसे पहले निज़ाम को पक्ष में किया परंतु पेशवा ने ऐसे हालत मे तटस्थता की नीति अपनाई। वेलेजलि ने 8 नवम्बर 1798 को टीपू को अपनी तैयारी स्थगित करने को कहा और साथ ही फ़्रांस से प्राप्त सैन्य मदद भी वापस करने को कहा। जब टीपू ने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया तो अंग्रेजों ने मैसूर पर चढ़ाई कर दी (31.12.1798)। जनरल हैरिस की कमान में 11 फ़रबरी 1799 को पूर्व में वेल्लोर की तरफ़ से मैसूर पर हमला किया। दूसरी तरफ़ जनरल स्टूअर्ट की कमान में एक फ़ौज बम्बई से पश्चिमी घाट पार करके रवाना की गई जिसका नेतृत्व रॉबर्ट वेलेजलि का छोटा भाई आर्थर वेलेजलि कर रहा था। इसमें निज़ाम के 10,000 सैनिक भी शामिल थे। इस फ़ौज को जनरल हैरिस की फ़ौज से आकर मिलना था। टीपू पश्चिम की तरफ़ मुक़ाबला करने भागा। बम्बई से आई स्टूअर्ट की फ़ौज ने उसे श्रीरंगपतनम से 70 किलोमटेर पश्चिम में सड़नेर नामक स्थान पर हराया। टीपू वापस पूर्व की तरफ़ भागा जहाँ हैरिस की फ़ौज श्रीरंगपतनम से मात्र तीस किलोमीटर दूर मालवानी पहुँच चुकी था। वहाँ भी अंग्रेज़ों ने टीपूँ को हराया। टीपूँ वापस श्रीरंगपतनम के क़िले में पहुँच कर घिर गया और अंततः मैसूर का पतन भी हो गया। जीत के बाद पूर्व के कनारा और व्यनाद पश्चिम के कोयमटूर और दरपोरम अंग्रेज़ों ने लिए। जिसके कारण पश्चिमी घाट से पूर्वी घाट और विस्तृत तटीय भागों पर उनका क़ब्ज़ा हो गया। गूतयी और गरामकोंडा निज़ाम को मिले जिन्हें भी 1800 में अंग्रेज़ों ने बक़ाया न चुका पाने के कारण हड़प लिया। हर्पणहल्ली और सकोंडा मराठों के लिये सुरक्षित रखे जो पेशवा ने लेने से मना कर दिया। वो भी अंग्रेज़ों ने रख लिए। इस प्रकार पूरा मैसूर राज्य अंग्रेज़ों ने हड़प लिया।
अंग्रेज और मराठे
पानीपत की तीसरी लड़ाई (1761) मे अहमद शाह के नेतृत्व मे अफ़ग़ानों से हारने के बावजूद मराठे 1770 के दशक से पेशवा माधव राव प्रथम के नेतृत्व में अपनी खोई शक्ति को लगभाग प्राप्त कर चुके थे। लेकिन तब तक अंग्रेजों की व्यापारिक एवं वाणिज्यिक महत्वाकांक्षायें मराठों के विस्तार से टकराने लगी थी। चीन के साथ होने वाले कपास का व्यापार ने अंग्रेजो की राजनीतिक महत्वकांक्षाओ को बहुत अधिक बढ़ा दिया। क्योंकि कपास की आपूर्ति गुजरात से होती थी, इसलिए अब यह जरूरी हो गया था की गुजरात तक कंपनी की सीधी पहुँच सुनिश्चित की जाय। इसी समय पेशवा नारायण राव की मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकारी के विवाद ने अंग्रेजो को हस्तक्षेप का मौका दे दिया। रघुनाथ राव ने पेशवा पद पर अपना दावा प्रस्तुत किया जबकी नाना फड़नवीस एवं माधवराव ने उसका विरोध किया। रघुनाथराव अब पेशवा बनने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी से मित्रता कर ली और सूरत की सन्धि के अनुसार वह बम्बई सरकार को डेढ़ लाख रुपये मासिक ख़र्च देकर कंपनी से 2500 सैनिकों की सुरक्षा मांगी। इसके बदले राघोवा ने अंग्रेज़ों को बम्बई के समीप स्थित सालसेत द्वीप, ठाणे जंबूसर (गुजरात) तथा बसीन को देने का वचन दे दिया। इस संधि मे कुल सोलह शर्तें थी। उसमें से एक शर्त यह भी थी कि मराठे, बंगाल एवं कर्नाटक पर आक्रमण नहीं करेंगे जबकी भड़ौच तथा सूरत की आय पर अंग्रेजो का अधिकार होगा। यहाँ यह उल्लेखनीय है की 1173 के रेगुलेटिंग अधिनियम के अनुसार इस संधि को कलकत्ता के गवर्नर जनरल की अनुमति आवश्यक थी। साथ ही यह 1758 के उस संधि का भी उल्लंघन भी करता था जब अंग्रेजों ने मराठों को युद्ध न करने का आश्वासन दिया था। इस संधि के अनुपालन मे अंग्रेजी सेना (बम्बई की सरकार) पुना की ओर बढ़ी। अरस नामक स्थान पर मराठे पराजित हो गए और अंग्रेजों ने सालसेट पर अधिकार कर लिया। इसी बीच बंगाल सरकार ने इस युद्ध को रोकने का आदेश दिया। परंतु न तो युद्ध ही रुक और ना ही इस संबंध मे मराठों से कोई शांति वार्ता हो सकी। तभी एक अन्य मराठा सरदार ने भी मराठों के विरुध्द युद्ध छेद दिया। अंततः दो दो मोर्चों पर एक साथ युद्ध को देखते हुए मराठों ने 1776 में अंग्रेजों से पुरंदर की संधि कर ली। रघुनाथ राव को गुजरात के कोपरगांव निर्वासित कर दिया गया। रघुनाथ के कृत्य के लिए अंग्रेजों की 10 लाख की रकम क्षतिपूर्ति के रूप मे अंग्रेजों को दी गई और साथ ही सूरत की संधि भी रद्द कर दी गई। अंग्रेजों के द्वारा जीते गए प्रदेश अंग्रेजों के ही पास रहने दिया गया। परंतु अभी भी बंगाल में बैठा गवर्नर जनरल ऊहापोह की स्थिति मे था। तभी मराठों ने राजद्रोही सरदार सदाशिव भाऊ को मार दिया। कुछ और घटनाक्रम ऐसा घाट की अंग्रेजों के मराठों पर शक हो गया की मराठे फ्रांसीसियों से नजदीकी बढ़ा रहे हैं जबकी अंग्रेजों ने एक बार फिर से छल कर मराठा सरदारों (नाना फड़नवीस एवं सखा राम) में फूट दलवा दी। मराठों के फ्रांसीसी के संबंध मे आवश्यक स्पष्टीकरण के बावजूद वारेन हेस्टिंगस के समर्थन पर बंबई की सरकार ने 1778 में मराठों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। परंतु इस बार मराठों के सामने अंग्रेजी सेना हर गई और इस तरह प्रथम अंग्रेज मराठा युद्ध की समाप्ति बड़गाँव की संधि से हो गई। इस संधि के द्वारा अंग्रेजों को रघुनाथ राव के अलावा दो अंग्रेज अधिकारी भी बंधक के रूप में मराठों को सौपना था। साथ ही अंग्रेजों के द्वारा जीते गए समस्त प्रदेश भी। हेस्टिंगस के द्वारा इस संधि को अस्वीकार करने के बाद एक बाद फिर से अंग्रेजों ने मराठों के विरुद्ध सैन्य अभियान किया परंतु एक बार फिर से अंग्रेजों की हार होने लगी। अंततः 1782 मे सलवाई की संधि के द्वारा दोनों पक्षों मे अल्पकालिक शांति स्थापित हो सकी। इस संधि के द्वारा अंग्रेज सालसेट एवं भडौँच के अलावा सभी विजित प्रदेश छोड़ने के लिए तैयार हो गए। अंग्रेजों के अब रघुनाथ राव का साथ छोड़ने के बदले में मराठों ने उसे पेंशन देना स्वीकार कर लिया। इस संधि की एक अन्य सहर्तों के अनुसार 6 महीने के अंदर हैदर अली जो की मराठों के साथ था के द्वारा जीते गए प्रदेश भी अंग्रेजों को वापस किया जाना था। लेकिन जब तक हैदर जींद रहा नाना ने इस संधि को स्वीकार नहीं किया। दिसम्बर 1782 मे हैदर की मृत्यु के बाद ही इस सलबाई की संधि पर हस्ताक्षर हो सका।
मराठों के साथ दूसरे युद्ध के कारणों में आंतरिक के साथ साथ यूरोप मे नेपोलियन का खतरा जैसे कुछ विदेशी वातावरण भी जिम्मेदार थे। 1800 में नाना फड़नवीस की मृत्यु के पश्चात पूना दरबार षडयंत्रो का केन्द्र बन गया। नाना फड़नवीस की कुशलता इस बात मे थी वे अंग्रजो की कुटिलता से परिचित हो गए थे और वो जब तक रहे मराठो को सहायक संधि से दूर रखा। लेकिन उनकी मृत्यु होते ही 1801 में पेशवा बाजीराव द्रितीय ने जसवंत राव होल्कर के भाई बिठठू जी की हत्या कर दी। बदले मे होल्कर ने पूना पर आक्रमण कर दिया और पेशवा और सिंधिया की सेना को पराजित कर दिया। पूना पर होल्कर का नियंत्रण तो स्थापित हो गया लेकिन पेशवा बाजीराव द्रितीय ने भागकर बेसीन में शरण ली जहां अंग्रेजों के साथ बेसीन की संधि (Treaty of Bassein, 1802) की गई। इस संधि से कंपनी को जहां सूरत का प्रदेश मिला वहीं पेशवा को अंग्रेजी संरक्षण दिया गया। पेशवा ने पूना दरबार में अंग्रेजी सेना को रखना भी स्वीकार कर लिया और अंग्रेजो को निजाम से चौथ वसूली का भी अधिकार दिया। पेशवा ने गायकवाड़ के विरुद्ध युद्ध न करने का वचन देते हुए अपने विदेशी संबंध भी कंपनी के अधीन कर दिया। संधि की शर्तों के अनुसार अब पेशवा ने कंपनी के अलावा किसी अन्य विदेशी शत्रु को न रखने का भी वचन दिया। इस संधि के अनुपालन में बाजीराव को पुनः पेशवा बनने की लिए मराठों से युद्ध अनिवार्य बन गया था। लार्ड वेलेजली भी एक घोर साम्राज्यवादी गवर्नर था ही। उत्तर एवं दक्षिण दोनों ओर से इस समय तक की सबसे विशाल संख्या के साथ अंग्रेजी सेनाओं ने कुच किया। 13 मई 1803 को अंग्रेजी सेना के साथ बाजीराव पुना में प्रवेश कर गया। पूरी तैयारी के साथ 6 अगस्त 1803 को जनरल आर्थर ने मराठों के साथ युद्ध की घोषणा की। अंग्रेजों ने पूरी तैयारी के साथ मराठों पर हर तरफ से भीषण आक्रमण किया। अंग्रेजी इतिहासकारों के द्वारा वर्णित यह दक्षिण भारत के इतिहास की सबसे शानदार और आश्चर्यजनक विजय थी। वेलेजली ने अगस्त मे अहमदनगर पर अधिकार कर लिया तो उसके अगले महीने में सिंधिया और भोसले की संयुक्त सेना को असाये नामक स्थान पर पराजित कर दिया गया। नवंबर 1803 में अरगॉन के युद्ध मे भोसले पूरी तारक पराजित हो चुके थे। दिसम्बर तक भोसले गविलगढ़ का किला भी हार चुके थे। उत्तरी भारत मे लेक ने कानपुर, अलीगढ़, दिल्ली और आगरा को जीत लिया। अंतिम रूप से सिंधिया की सेना लसवाड़ी नामक स्थान पर समाप्त हो गई। कटक और गविलगढ़ का पतन होते ही भोसले ने अंग्रेजों से देवगांव की संधि कर ली और युद्ध से अलग हो गए। सिंधिया भी सूरजी अर्जन गांव की संधि कर अंग्रेजों से हर मन ली। देवगाँव की संधि के अनुसार भोंसले ने अंग्रेज़ों को समस्त पूर्वी तट सहित कटक का प्रान्त दे दिया। इसमे बालासौर के अलावा वरदा नदी के पश्चिम का समस्त भाग शामिल था। मराठा संघ भंग करते हुआ भोसलें की राजधानी नागपुर में एक ब्रिटिश रेजीडेण्ट भी रखने का प्रावधान किया गया। भोसलें ने अंग्रेज़ों ने यह भी आश्वासन दिया की वह अपने यहाँ कम्पनी सरकार की अनुमति के बिना किसी भी यूरोपीय अथवा अमेरिकी को नौकरी नहीं देगा। व्यावहारिक तौर पर इस संधि ने भोसले को सिंधिया से अलग कर दिया। सुरजी अर्जन गांव की संधि भी 1803 के आखिर मे सम्पन्न हुई थी। इस संधि के द्वारा सिंधिया ने निज़ाम और गायकवाड के ऊपर से ऊपर अपने सारे दावे त्याग दिए साथ ही अंग्रेजों को गंगा-यमुना दोआब, दिल्ली का क्षेत्र, बुंदेलखंड का कुछ भाग, भडौच, गुजरात के कुछ जिले, अहमदनगर का गढ़ तथा गोदावरी नदी तक विस्तृत अजंता का क्षेत्र दे दिया। सिंधिया ने मुग़ल सम्राट पर से अपना नियंत्रण छोड़ दिया और साथ ही उसने राजपूताना के राज्यों की राजनीति में भी कोई हस्तक्षेप न करने का वचन दिया। सन्धि के अनुसार सिंधिया दरबार में एक ब्रिटिश रेजीडेन्ट रखने का भी प्रावधान किया गया और अब अंग्रेज़ों की अनुमति केर के बिना अपने दरबार मे किसी भी विदेशी को नहीं रखा जा सकता था। अंतिम तौर पर सिंधिया ने अपने फ्रांसीसी सेना को भंग कर दी और अपने यहाँ ब्रिटिश सहायक सेना रखने को तैयार हो गया। सिंधिया के 823 फ्रांसीसी निर्मित तोपें भी अंग्रेजों को सौप दी गई। इस सन्धि के द्वारा शिन्दे की स्वतंत्रता समाप्त हो गई तथा उत्तरी भारत के अधिकांश भाग में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हो गई।
परंतु अभी तक पेशवा, सिंधिया और भोंसले ही अंग्रेजों से हरे थे। होल्कर अभी भी अंग्रेजी प्रभाव से बाहर था। जहां होल्कर अंग्रेजों से मराठों के उपरोक्त हार काअ बदला लेना चाहता था वही वेलेजली भी होल्कर को अंग्रेजी संरक्षण में लेकर मराठों की अवशिष्ट शक्ति को समाप्त कर देना चाहता था। हूस यह था की जब सिंधिया और भोंसले बरार मे अंग्रेजों से युद्ध कर रहे थे, होल्कर ने उज्जैन को लूटते हुए जयपुर पर धावा बोल। जयपुर पहले से ही अंग्रेजों की परमोच्चता को मन बैठ था। होल्कर के इस कृत्य को अंग्रेजों ने सीधी चुनौती मानी। विराम और वार्ता की एक छोटी सि अवधि के वाद अंग्रेजों ने तीन ओर से होल्कर पर आक्रमण किया और होल्कर के दुस्साहस के सामने अंग्रेजी सेना भाग खड़ी हुई। वेलेजली की खूब आलोचना हुई और अब उसके स्थान पर कॉर्नवालिस नया गवर्नर बनकर भारत आया और उसने युद्ध के स्थान पर संधि की नीति अपनाई लेकिन जब तक यह कार्यान्वित हो पता 2805 मे उसके मृत्यु हो गई। नए गवर्नर ने 1805 मे सिंधिया से मुस्तफापुर की संधि और दिसम्बर 1805 मे होल्कर के साथ राजघाट की संधि कर ली। मुस्तफापुर की संधि के द्वारा सिंधिया ने अपने को अंतिम रूप से होल्कर से अलग कर लिया और सुरजी अर्जन गांव की संधि की पुष्टि कर दी। राजघाट की संधि के द्वारा होल्कर ने चम्बल नदी के उत्तर पश्चिम के बहु भागों से अपना दावा त्याग दिया और अंग्रेजों ने नदी के दक्षिण पूर्व के प्रदेशों पर उसके दावों को मान लिया।
मराठों के साथ अंतिम लड़ाई लॉर्ड हेसिटंग्स के भारत का गवर्नर जनरल बनकर आने के बाद पिंडारियो के विरुद्ध अंग्रेजी अभियान से शुरू हुई। पिंडारी मूलतः लूटमार करने वाले दल थे जो मराठों की ओर से युद्ध करटीए थे और बदले में उन्हे लूट से प्राप्त रकम का निश्चित हिस्सा मिलता था। पानीपत के तृतीय युद्ध के पश्चात वे मराठों के की सेना में भर्ती हो गए थे तथा मालवा क्षेत्र में उनका विशेष प्रभाव था। क्योंकि पिंडारी लूट मार करते थे अंग्रेजों ने नवम्बर, 1817 में सिंधिया के साथ ग्वालियर की सन्धि की, जिसके अनुसार महादजी शिंदे को पिंडारियों के दमन में अंग्रेजों का सहयोग करना था और साथ ही चंबल नदी से दक्षिण-पश्चिम के राज्यों पर अपना प्रभाव हटा लेना था। पिंडारियो के विरुद्ध हेसिटंग्स की प्रत्यक्ष कार्यवाही ही अंततः तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध में परिणत हो गया जिसकी समाप्ति जून, 1817 पूना सन्धि से हुई। इस संधि के अनुसार पेशवा ने मराठा संघ की अध्यक्षता त्याग दी और इस तरह मराठा संघ समाप्त हो गया और अंग्रेज पूरे मध्य भारत में अपने प्रभाव को विस्तृत कर लिए।
मराठों द्वारा अंग्रेजों के साथ की गई संधियां
• सूरत की संधि - 1775 - रघुनाथ राव तथा ईस्ट इंडिया कंपनी
• पुरन्दर की संधि - 1776 - पेशवा माधवराव नारायण राव तथा अंग्रेज
• बड़गांव की संधि - 1779 - पेशवा माधवराव नारायण राव तथा अंग्रेज
• सालबाई की संन्धि - 1782 - पेशवा माधवराव नारायण राव तथा अंग्रेज
• बसीन की संधि - 1802 - बाजीराव द्वितीय तथा अंग्रेज
• देवगांव की संधि-1803-बरार के भोंसले तथा अंग्रेज
• सुर्जी-अर्जन गांव की संधि - 1803 - सिंधिया तथा अंग्रेज
• राजापुर घाट की संधि - 1804 - होल्कर तथा अंग्रेज
• पूना की संधि - 13 जून 1817 - बाजीराव द्वितीय तथा अंग्रेज
• ग्वालियर की संधि - 5 नवम्बर 1817 - दौलत राव सिंधिया तथा अंग्रेज
• मंदसौर की संधि - 6 जनवरी 1818 - होल्कर तथा अंग्रेज
बंगाल, मैसूर एवं मराठे के संदर्भ मे हम देखते हैं की इन राज्यों तक अंग्रेजों का प्रसार सीधे तौर पर सैन्य हस्तक्षेप के द्वारा संभव हो पाया था। लेकिन लॉर्ड वेलेजली (Lord Wellesley- 1798-180) ने सहायक संधि (Subsidiary Alliance).के नाम से एक ऐसी प्रणाली विकसित की जिसे यद्यपि फ्रांसीसी गवर्नर डुप्ले के भुगतान आधारित सैन्य सेवा की नीति से उधार ली गई थी लेकिन अंग्रेजों ने इसमे परिवर्तनों के साथ भारत मे अपने राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के विस्तार के लिए अनिवार्य रूप से प्रयोग किया। इस प्रणाली में भारतीय राज्यों को अपने यहाँ ब्रिटिश सेना की एक स्थायी टुकड़ी को भुगतान आधारित शर्तों पर रखना होता था। इसके बदले कंपनी इसे स्वीकार करने वाले राजाओं की बाह्य आक्रमण की सूरत में सुरक्षा का वचन देती थी। संधि की शर्तों के अनुसार कंपनी को उस राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना होता था लेकिन व्यवहार मे हुआ इसका उलट ही। इसके साथ ही एक रेज़िडन्ट की भी नियुक्ति होती थी जो राज्यों के दरवार मे रहकर वहाँ के कामकाज पर नियंत्रण रखता था। इस संधि के अनुसार देशी राज्य बिना पूर्व अनुमति के किसी भी यूरोपीय को अपनी सेवा में नियुक्त नहीं नहीं कर सकता और ना ही किसी अन्य बाहरी शक्तियों से अपने विदेशी संबंधों का संचालन कर सकते थे। इसका सीधा परिणाम यह हुआ की भारतीय राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता, राष्ट्रीय चरित्र अथवा वह सब जो किसी देश को प्रतिष्ठित बनाते हैं, बेचकर सुरक्षा मोल ले ली। अंग्रेज रेजीडेंटों के माध्यम से प्रशासन में अत्यधिक हस्तक्षेप किया गया। इस संधि ने किसी भी तरह के प्रशासनिक सुधार का अवसर ही समाप्त कर दिया। भुगतान के रूप मे कंपनी ने कथित तौर पर राज्य की आय का 1/3 भाग की मांग की। की ऐसे मौके भी आए जब धन के बदले प्रादेशिक भूभाग ही ले लिया। ऐसी लगभग सौ संधियों की गई थी। छोटे राज्यों जिनकी प्रादेशिक सत्ता अल्प थी उन्होंने नकद देना ही स्वीकार किया। सर्वप्रथम इस संधि पर हस्ताक्षर हैदराबाद के निज़ाम ने किये थे। 1798 ई. में निज़ाम के फ्रांसीसी संबंधों को समाप्त कर दिया और ब्रिटिश अनुमति के बिना वे मराठों से कोई संधि नहीं कर सकते थ। मैसूर दूसरा राज्य था जिसने 1799 ई. में इस संधि पर हस्ताक्षर किये। 1801 ई. में वेलेज़ली ने अवध के नवाब को इस संधि पर हस्ताक्षर करने के लिया बाध्य किया। 1802 ई. में पेशवा बाजीराव द्वितीय भी अपने राज्य को इस संधि के तहत ले आये। बहुत से अन्य मराठा राज्यों,जैसे 1803 ई. में सिंधिया व भोसले ने भी इस संधि पर हस्ताक्षर किये। अंतिम मराठा संघ जैसे होल्कर ने भी इस संधि की शर्तों को स्वीकार कर लिया।
परंतु ब्रिटिश साम्राज्य का अंतिम सीमांकन का काम लार्ड डलहोजी (Lord Dalhousie - 1848-56) के कार्यकाल ही जाकर काफी हद तक पूरा हो सका। उसने साम्राज्य के विस्तार का कोई भी मौका नहीं गंवाया। कंपनी के साम्राज्य के विस्तार ने निमित्त उसने लिए उचित या अनुचित साधनों की कोई परवाह नहीं की। उसके व्यपगत सिद्धांत (Doctrine of lapse) के अनुसार हिन्दू परंपरा के अनुसार निःसंतान राजा की मृत्यु पर गोद लिए हुए पुत्रों को उसने संपत्ति या राज्य का वरिष मानने से इनकार कर दिया। इस आधार पर उसने सबसे पहले सातारा (1848) को ब्रिटिश साम्राज्य मे मिलाया। फिर उड़ीसा के संभलपुर (1849), वर्तमान आगरा के निकट जैतपुर (1849), उदयपुर (1852) नागपूर (1853) और झांसी (1853) को ब्रिटिश साम्राज्य का एक हिस्सा बना लिया गया। उसने करौली को भी अंग्रेजी राज्य मिलाने का प्रयास किया परन्तु कंपनी के संचालक मंडल के कारण इसमें असफल हो गया। परंतु इसका सबसे विवादास्पद निर्णय अवध का अंग्रेजी राज्य में विलय था। अवध का राज्य वैसे बक्सर के बाद से ही एक तरह से अंग्रेजी सरकार के ही प्रभाव में था और वहाँ के हर नवाब कंपनी को संतुष्ट रखने का ही प्रयास करते थे। मोटे तौर पर पर अवध कंपनी की हर माँगों को पूरा करता रहा था चाहे 1801 के विस्तृत भूभाग की मांग हो या धन की। 1847 मे जब वजीद आली शाह अवध का नवाबबना तो उसने भी कंपनी सरकार के प्रति निष्ठावान ही बना रहा। परंतु नया अंग्रेज रेज़िडन्ट स्लीमैन ने अवध के कुशासन को लेकर ज्यादा ही सचेत था। उसने अपनी रिपोर्टों में अवध की अव्यवस्था को अराजकता के रूप मे पेश किया शासन-व्यवस्था में सुधार लाने के लिए कठोर कार्यवाही की आवश्यकता पर खूब बल दिया लेकिन वह अवध का अंग्रेजी राज्य मे वियाली का पक्षधर नहीं था। तब डलहौजी ने 1854 में एक नया रेजीडेन्ट नियुक्त किया। नए रेजिडेंट ने 1855 की अपनी रिपोर्ट में अवध कुशासन को बढ़ चढ़ा कर बताया जिसे डलहौजी ने तथ्यों के साथ छेद छड़ कर संचालक-मंडल को पेश किया और इस तरह उसे अवध में सीधे हस्तक्षेप की अनुमति मिली। उसने 1801 की संधि को भंग कर नाममात्र की नवाबी के साथ प्रशासन का सारा कार्य कंपनी को सौंप देने की मांग कर दी। वाजिद अली शाह ने इसे स्वीकार नहीं किया। और अंततः डलहौजी ने एक आदेश से अवध के राज्य को अंग्रेजी राज्य मे विलय कर लिया।
अंग्रेजों का पंजाब मे विस्तार
गुरू नानक जो हुमायूँ के समकालीन थे सिक्ख सम्प्रदाय की स्थापना की स्थापना की थी इसकी कई परम्पराएं हिंदुओं से मिलती थी। संगत (धर्मशाला) और पंगत (लंगर) सिखों के बिल्कुल आरंभिक संस्थायें थी जहां वे आपस मे प्रतिदिन मिलते थे. आगे चलकर गुरू अंगद ने गुरूमुखी लिपि का आरम्भ किया तो गुरू अमरदास ने हिन्दुओं से पृथक होने वाले कई कार्य किए. हिन्दुओं से अलग विवाह पद्धति लवन को प्रचलित किया. रामदास ने अमृतसर नगर की स्थापना तो की ही साथ ही साथ अपने तीसरे पुत्र अर्जुन को गुरू का पद सौंपते हुए इन्होंने गुरू पद को पैतृक बनाया. पाँचवे गुरू अर्जुन (सन् 1581 ई.-1605 ई.) ने सिक्खों के धार्मिक ग्रंथ आदिग्रंथ की रचना की जिसमे इसमें गुरू नानक उपदेश, गीत और प्रार्थनाएँ संकलित की गई। गुरू अर्जुन ने अमृतसर जलाशय के मध्य में हरमन्दर साहब का निर्माण कराया परंतु यही से मुग़लों के साथ उनका संघर्ष प्रारंभ होता है। राजकुमार खुसरो की सहायता करने के कारण जहाँगीर ने (1606 ई.) में गुरू अर्जुन को मरवा दिया. अब मुग़लों की प्रतिक्रिया को देखते हुए सिक्खों के छठे गुरू हरगोबिन्द (1606-44 ई.) ने इस संप्रदाय को सैन्य संगठन का रूप दिया और अकाल तख्त का निर्माण करवाया. इन्होंने अमृतसर की किलेबंदी करवाई और स्वयं को सच्चा पादशाह कहना शुरू किया. सिक्खों के सातवें गुरू हरराय (1644-61 ई.) की नजदीकियां दाराशिकोह से थी। सिक्खों के दसवें एवं अंतिम गुरू, गुरू गोबिन्द सिंह (1675-1708 ई.) ने मुग़ल राज्य से संघर्ष को अच्छी तरह से समझ लिया था। इन्होंने सिखों लिेए पाँच ककार (केश, कंघा, कृपाण, कच्छा और कड़ा) को रखने का प्रावधान किया। इन्होंने की सिखों के खालसा पंथ की स्थापना कर उसे एक सैन्य रूप प्रदान कर दिया। नादेड़ नामक स्थान पर गुल खाँ नामक पठान ने उनकी हत्या (1708) कर दी। उनकी मृत्यु के बाद बन्दा बहादुर ने सिख संप्रदाय का नेतृत्व अपने हाथ मे लिया। बन्दा का उद्देश्य पंजाब में एक सिक्ख राज्य स्थापित करने का था. इसके लिए इन्होंने लौहगढ़ को राजधानी बनाते हुए गुरू नानक एवं गुरू गोबिन्द सिंह नाम के सिक्के चलवाए। बन्दा ने सरहिन्द के मुगल फौजदार वजीर खाँ की हत्या कर दी। फिर मुगल बादशाह फर्रूखसियर के आदेश पर 1716 ई में बंदा सिंह को गुरूदासपुर पर नांगल जगह पर पकड़कर मौत के घाट उतार दिया गया। बन्दा की मौत के बाद सिक्ख कई टुकड़ों में बंट गए थे। मुग़लों के पतन, नादिर शाह के आक्रमण और फिर लगातार होने वाले अफ़गान आक्रमणों के कारण पंजाब का पूरा क्षेत्र की भागों मे बंटा हुआ था। परंतु 1748 ई में नवाब कर्पूर सिंह की पहल पर सभी सिख टुकड़ियों का दल खालसा में विलय हो गया। दल खालसा को जस्सा सिंह आहलूवालिया के नेतृत्व में रखा गया. इसी दल को आगे बारह मिसलों मे बंता गया। 1760 के बाद से पंजाब में इन सिख मिसलों का प्रभाव बढ़ने लगा था। ये सभी 'मिसल' समानता के आधार पर बनाए गए थे जो पूरे इलाके मे शासन कर रहे थे। लेकिन इसी अव्यवस्थता के दौर मे शूकरचकिया मिसल मे महाराजा रणजीत सिंह का जन्म हुआ था। उन्होंने इस अराजकता का लाभ उठाते हुए उन्होंने पंजाब को एक सशक्त सूबे के रूप में एकजुट किया और अंग्रेजी विस्तार से अपने राज्य को बचाकर भी रखा। 1798 ई में रणजीत सिंह के शासक बनते ही लाहौर (1799) और अमृतसर (1805) पर अधिकार कर लिया. इससे वह सिखों का सबसे महत्वपूर्ण सरदार बन गया। उनके राज्य मे पेशावर (1834), कश्मीर, लाहौर और मुल्तान भी शामिल था। इस प्रकार उन्होंने झेलम नदी से सतलुज नदी तक का समस्त प्रदेश अपने अधिकार में कर लिया. तक किया। अंग्रेज गवर्नर मैटकाफ ने रणजीत सिंह को सलाह दी कि वह सतलुज पार के प्रदेशों पर अपना अधिकार छोड़ दे। किन्तु 1808 में रणजीत सिंह ने मैटकाफ की सलाह को धत्ता बताते हुए पुनः सतलुज पार किया तथा फरीदकोट मालेरकोटला और अम्बाला पर अधिकार कर लिया। किन्तु 1809 में अमृतसर की संधि के बाद रणजीत सिंह यह स्वीकार करने के लिए बाध्य हो गया कि सतलुज पार के प्रदेशों पर अंग्रेजों का अधिकार है। इस संधि के बाद यद्यपि महाराजा को पश्चिम में अपने राज्य का विस्तार करने के लिए खुली छूट मिल गई और उसने 1818 में मुल्तान, 1819 में कश्मीर और 1834 में पेशावर पर अधिकार कर लिया किन्तु इस संधि ने परोक्ष रूप से यह भी सिद्ध कर दिया कि रणजीत सिंह अग्रेजों का सामना करने में समर्थ नहीं है। आगे चलकर सिंध और फिरोजपुर के संबंध में भी उसने अपनी असमर्थता ही प्रकट की।
जून, 1839 में उसकी मृत्यु के बाद राज्य में अराजकता फैल गई और वास्तविक शक्ति खालसा सेना के हाथ में चली गई। रणजीत सिंह के बाद उसके अयोग्य पुत्र खड़गसिंह को गद्दी पर बीठाया गया। ध्यानसिंह को उसका वज़ीर बनाया गया। अक्टूबर-नवम्बर, 1839 में ध्यानसिंह ने खड़गसिंह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। खड़गसिंह को बन्दी बना लिया गया और उसके पुत्र नौनिहाल सिंह को गद्दी पर बिठाया गया। ध्यान सिंह अब नौनिहाल सिंह का वजीर बन गया। जनवरी, 1841 में पुनः राजा के विरुद्ध विद्रोह किया गया और महाराजा रणजीत सिंह के एक अन्य पुत्र शेरसिंह को गद्दी पर बिठाया गया। सितम्बर, 1843 में अजीत सिंह सन्धावालिया ने शेरसिंह की हत्या कर दी। सितम्बर, 1843 में ही महाराजा राणजीत सिंह के एक अन्य अल्पवयस्क पुत्र दलीपसिंह को गद्दी पर बिठाया गया। अफगान संघर्ष में अपनी पराजय के बाद अंग्रेज यह चाहते थे कि सिंध की तरह पंजाब का भी ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया जाए। 1844 में लार्ड हार्डिंग गवर्नर जनरल बना। उसने पंजाब की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर पंजाब की सीमाओं को सैनिक छावनियों में बदल दिया। परंतु शीघ्र ही खालसा सैनिक यह समझ गए कि अंग्रेज उनसे युद्ध करना चाहते है। काफी समय तक अनिश्चितता की स्थिति बनी रही। अन्तत: सबराओं की निर्णायक लड़ाई (10 फरवरी, 1846) में लालसिंह और तेजासिंह के विश्वासघात के कारण खालसा सेना की पराजय हुई। और अब अंग्रेजों का लाहौर पर अधिकार हो गया।
लाहौर की संधि 9 मार्च, 1846 मे अनुसार खालसा सेना की पराजय के बाद महाराजा को लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया गया। महाराजा ने स्वयं और अपने उत्तराधिकारियों की ओर से सतलुज के पार के अपने समस्त प्रदेश सदैव के लिए अंग्रेजों को दे दिए। सतलुज और व्यास नदियों के मध्य स्थित सभी दुर्गों पर कम्पनी का अधिकार हो गया। सिखों को डेढ़ करोड़ रुपया युद्ध के दण्ड के रूप में देना पड़ा। महाराजा की सेना 12,000 घुड़सवार और 20,000 पदाति तक ही सीमित कर दी गई। महाराजा कम्पनी की अनुमति के बिना किसी यूरोपीय को अपनी सेवा में नहीं रख सकता था। अल्पवयस्क दलीपसिंह को महाराजा के रूप में स्वीकार किया गया। सर हेनरी लॉरेन्स को लाहौर में कम्पनी का रेजीडेन्ट नियुक्त किया गया। भैरोवाल की संधि (22.12.1846) के अनुसार दलीप सिंह के संरक्षण हेतू अंग्रेजी सेना का प्रवास में मान लिया गया। 20 अगस्त 1847 ई में महारानी जिंदा को राजा दलीप सिंह से अळग कर 48000 रूपए वार्षिक पेंशन देकर शेखपुरा भेज दिया। कुल मिलाकर उक्त संधि के संबंध में यह कहा जा सकता है कि इस संधि के द्वारा पंजाब को इतना शक्तिहीन कर दिया गया कि उसका ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल होना केवल समय का प्रश्न ही रह गया था।
यद्यपि लाहौर की संधि के प्रावधानों के तहत ब्रिटिश सेना को 1846 के अंत तक लौट जाना था किन्तु महाराजा के अल्पव्यस्क होने के बहाने लार्ड हार्डिंग ने सेना को यथावत् बनाए रखा।। महाराजा की अल्पावस्था के कारण पंजाब का शासन अंग्रेजों के द्वारा चलाया जाने लगा। इसी प्रकार लाहौर पर अंग्रेजी रेजीडेन्ट का प्रभुत्व स्थापित हो गया। 1846 में मुल्तान के गवर्नर मूलराज को 20 लाख रुपया और रावी नदी के उत्तर का प्रदेश कम्पनी को सौंपने के लिए बाध्य किया गया। अंग्रेजों की इस मांग से खिन्न होकर मूलराज ने दिसम्बर 1847 में इस्तीफा दे दिया। जनवरी, 1848 में लार्ड डलहौजी ने भारत के गवर्नर जनरल के रूप में कार्यभार संभाला। वह एक साम्राज्य वादी गवर्नर जनरल था। मार्च, 1848 को नाहन सिंह को मुल्तान का गवर्नर नियुक्त किया गया। कार्यभार संभालने में सहायता करने के लिए दो अंग्रेज अधिकारी भी उसके साथ भेजे गए। इन अधिकारियों के निरंकुश व्यवहार के कारण मुल्तान के लोगों ने विद्रोह कर दिया। शीघ्र ही विद्रोह की ज्वाला सारे पंजाब में फैल गई। अंग्रेज भी यही चाहते थे कि विद्रोह सारे प्रान्त में फैल जाए ताकि उन्हें पंजाब को अपने साम्राज्य में मिलाने का बहाना मिल जाए। अत: अवसर का लाभ उठाते हुए लार्ड डलहौजी ने अक्टूबर, 1848 में विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। इस युद्ध में सिक्ख पराजित हुए। लार्ड डलहौजी की 29 मार्च 1849 ई की घोषणा द्वारा पंजाब का विलय अंग्रेजी राज्य में कर लिया। राजा दलीप सिंह को 50000 पौंड की वार्षिक पेंशन दे दी गई और पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेज दिया। सिक्ख राज्य का प्रसिद्ध हीरा कोहिनूर को महारानी विक्टोरिया को भेज दिया गया।
सिंध का विलय
सिंध वर्तमान मे पाकिस्तान का एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र है। उसकी मरुभूमि के साथ भू-सामरिक स्थिति ऐसी थी की वह एक साथ रूस और ईरान के खिलाफ एक आधार प्रदान करता था। सिंध के माध्यम से अंग्रेज अफगानिस्तान तक अपने पहुँच को सुरक्षित बनाना कहते थे। इससे उन्हे रूसी प्रभाव से भारत को बचाने मे पूरी मदद मिलती। इसी वजह सिंध अंग्रेजों के लिए वह बड़ा ही महत्वपूर्ण रहा। सिंध का इतिहास 18वीं शताब्दी से प्रारंभ होता है। इस समय सिंध पर कल्लौरा सरदार राज्य करते थे। परंतु मीर फतह अली खां के शासन दौरान सिंध की राजनीतिक महत्ता स्थापित हुई। मीर फतह अली खां की मृत्यु (1800) के बाद सिंध का बंटवारा उनके चार भाइयों मे बीच कर दिया गया जोकी सिंध के चार अमीर कहलाने लगे. इस समय यूरोप मे नेपोलियन का उदय हो चुका था। और इस बात की पूरी संभावना थी की नेपोलियन ब्रिटिश विस्तार के खिलाफ सैन्य अभियानं चलाता, अंग्रेजों ने 1809 में सिंध के अमीरों के साथ एक मित्रता की संधि की। इस संधि के अनुसार फ्रांसीसियों को सिंध में बसने की अनुमति नहीं दी जानी थी। परंतु जब पंजाब मे महाराजा रणजीत सिंह का उदय हुआ तो सिंध की सुरक्षा की जरूरत पड़ी। रणजीत सिंह के आक्रमण से रक्षा के लिए कम्पनी ने सिंध के अमीरों को एक नई सहायक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इस सहायक संधि (1832) के अनुसार सिंध में एक सहायक सेना की तैनाती के साथ सिंध के अमीरों ने अपने और सिखों के मध्य अपने संबंधों में कम्पनी की मध्यस्थता को भी स्वीकार कर लिया। फरवरी, 1839 में सिंध के अमीरों और अंग्रेजों के मध्य एक नई संधि पर हस्ताक्षर किए गए जिसके अनुसार तीन लाख रुपया वार्षिक की दर पर शिकारपुर और भक्कर के स्थानों पर भी सहायक सेना तैनात की गई. इतना ही नहीं प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839-42) के समय भी सिंध के अमीरों को अंग्रेजी सेना की सहायता का भार उठाना पड़ा. जब चार्ल्स नेपियर को सिंध में कम्पनी का रेजीडेन्ट नियुक्त हुआ तो उत्तरी और दक्षिणी सिंध की सेना उसके अधीनकैट हुआ उसे ही पूर्ण सैनिक और असैनिक अधिकार प्रदान किए गए। लार्ड एलनबरो के काल मे सिंध के अमीरों को एक नई संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इस संधि में भविष्य के लिए अधिक प्रतिभूति (Security) और कुछ प्रदेशों की मांग की गई। परंतु उत्तराधिकार का संघर्ष ने सीधे ही अंग्रेजों को सिंध मे मामले मे हस्तक्षेप का मौका दिया। इसमे अंग्रेजों ने पुराने सरदार मीर फतह अली खां के भाई अलीमुराद का समर्थन किया। इस संदर्भ मे अंग्रेजों और अमीरों के बीच हुआ युद्ध के बाद सिंध के समस्त भू-भाग को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया (1843)।
वर्तमान भारत की मुख्यभूमि से बाहर ब्रिटिश विस्तार
भारत के बाहर ब्रिटिश प्रभाव का मुख्यतः देश के अंदर विजित क्षेत्रों जो की तब तक ब्रिटिश साम्राज्य का एक भाग समझ जाता था की बाह्य शक्तियों से सुरक्षा से प्रेरित था। इन बाह्य शक्तियों मे सबसे प्रमुख थे रूस का विस्तार। इंग्लैंड एवं रूस मे एक तरह की पारंपरिक शत्रुता बनी रहती थी। अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी की वहाँ तक रूस का प्रभावी विस्तार होने की पूरी आशंका थी। इसकी दो वजहें थी एक तो अफगानिस्तान की आंतरिक राजनीति कभी स्थिर नहीं रही और रूस भी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा वाला राष्ट्र था। अफगानिस्तान के एक आंतरिक घटनाक्रम मे दोस्त मोहम्मद 1826 ई. में तत्कालीन आमिर शाहशुजा को अपदस्थ कर अफगानिस्तान का अमीर बन गया। शाहशुजा ने गद्दी प्राप्त करने का असफल प्रयास किया। परंतु दोस्त मोहम्मद की आशंका समाप्त नहीं हो सकी पूर्वी सीमा से उसे अंग्रेजों व रणजीतसिंह से डर था तो उत्तर और पश्चिमी सीमा से रूस और फारस का आतंक।
भारत मे लार्ड ऑकलैण्ड के गवर्नर बनने पर उसे, अंग्रेजों के सहयोग से रणजीतसिंह से पेशावर मिलने की उम्मीद थी परंतु ऐसा नहीं हो सका क्योंकि ऑकलैण्ड ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। उधर ब्रिटेन की सरकार मध्य पूर्व मे रूस की गतिविधियाँ से चिंतित हो है और अफगानिस्तान में हस्तक्षेप की नीति अपनाई। नवंबर,1836 में एक व्यापारिक मिशन के रूप में काबुल भेजा गया किन्तु दोस्त मोहम्मद इस वार्ता मे पेशावर के साथ ही ईरान के विरुद्ध अंग्रेज से सहायता का आश्वासन चाहता था। कोई औपचारिक संधि नहीं होने के कारण दोस्त मोहम्मद का झुकाव रूस की तरफ होने लगा और अंग्रेजों के द्वारा भेजा गया मिशन असफल हो गया। उधर रूस के कहने पर ईरान अफगानिस्तान की पश्चिमी सीमा की ओर सेनाएँ आगे बढ़ा दी और सामरिक रूप से अत्यंत ही महत्वपूर्ण हेरात पर घेर डाल दिया। इससे ब्रिटिश सरकार ने ने अपनी नौसेना भेज भेकर में ईरान से को हेरात का घेरा उठाने को कहा। साथ ही साथ रूस पर भी दबाव डाला गया। इसका परिणाम यह हुया की ईरान ने हेरात का घेरा उठा लिया और उधर रूस ने भी फारस और अफगानिस्तान से अपने राजदूतों को वापिस बुला लिया। अब बदली हूई परिस्थियों मे अंग्रेज अफगानिस्तान में सीधे हस्तक्षेप करने का निश्चय किया और शाहशुजा की मदद से दोस्त मोहम्मद को अपदस्थ करने हेतु रणजीतसिंह और शाहशुजा के साथ मिलकर एक त्रदलीय संधि (26 जून, 1838) कर ली और सैन्य हस्तक्षेप किया ताकि शाहशुजा को अफगानिस्तान का अमीर बनाया जा सके। अंग्रेजों ने गजनी और कंधार पर अधिकार कर लिया। दोस्त मोहम्मद ने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे बंदी बनाकर कलकत्ता भेज दिया गया। 1840 ई. में शाहशुजा अफगानिस्तान का अमीर बना। परंतु अफगानों ने दोस्त मोहम्मद के पुत्र अकबरखाँ के नेतृत्व में 1841 ई. में विद्रोह कर दिया। इसमे अंग्रेजों को काफी हानी हुई। अंततः ऑकलैण्ड को वापिस इंग्लैण्ड बुला लिया गया। एलनबरो भारत का नए गवर्नर जनरल बनकर (1842) भारत आया। उन्होंने एक बार फिर से सैन्य अभियान पर भरोसा किया और अंग्रेजी सेना ने काबुल और गजनी पर अधिकार कर लिया। दोस्त मोहम्मद को कैद से मुक्त कर दिया गया जिसे पुनः वहाँ का अमीर बने रहें दिया गया। सामरिक दृष्टिकोण से यह प्रथम अंग्रेज-अफ़गान युद्ध बिल्कुल व्यर्थ था। इसमे अंग्रेजों को कोई लाभ नहीं हजुआ परंतु आगे चल कर जब कंधार तथा क़ाबुल को ब्रिटिश साम्राज्य के लिए आवश्यक जाने लगा तो उसने द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध (1878-1880) की नींव डाली क्योंकि अब रूस भी अफ़ग़ानिस्तान को अपने प्रभाव के अंतर्गत रखना चाह रहा था।
डिजरैली के प्रधानमंत्रित्व काल मे लार्ड लिटन के द्वारा एक ब्रिटिश शिष्टमंडल भेजने के प्रस्ताव को शेरअली (अफगानिस्तान का आमिर) था ने अस्वीकार कर दिया था। असन्तुष्ट हो लिटन ने शिमला में काबुल के एजेंट से भेंट (1876) की। इधर अग्रेजों ने क्वेटा प्राप्त कर ली जो की सैन्य दृष्टि से एक महत्वपूर्ण था। परंतु शेरअली पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उधर रूस ने तुर्की पर आक्रमण (1877) कर बाल्कन प्रायद्वीप और ओटोमन साम्राज्य में अपने प्रभाव में वृद्धि कर ली। अंततः भयंकर ब्रिटिश विरोध के चलते बर्लिन सम्मेलन (1878) में इसे पलट दिया गया। अब रूस ने अपना ध्यान अफगानिस्तान पर लगाया और शेरअली के विरोध के बावजूद एक संधि हो गई और एक रूसी रेज़िडन्ट वहाँ रहने लगे। आमिर के साथ वार्ताओं के असफल हो जाने के बाद लिटन ने धमकी भरे पत्र मे आमिर से एक ब्रितश शिष्टमंडल के साथ एक ब्रिटिश रेजीडेण्ट रखने को कहा।आमिर ने उसकी मांग स्वीकार कर ली थी लेकिन जब तक आमिर का पत्र लिटन को मिलता ब्रिटिश सेना अफगानिस्तान में तीन दर्रों से प्रवेश कर चुकी थी। उधर रूस शेरअली को उसकी दशा पर छोङकर स्वयं पीछे खिसक गया। शेर अली भी भाग तब उसका पुत्र याकूबखाँ अफगानिस्तान का नया अमीर बना। अंग्रेजों ने याकूब खाँ से संधि वार्ता प्रारंभ की। इन वार्ताओं के फलस्वरूप दोनों के बीच गंडमक की संधि फलस्वरूप (1879) हो गई। इसके अनुसार अंग्रेजों ने याकूबखाँ को काबुल का अमीर मान लिया। नए अमीर ने काबुल में एक ब्रिटिश रेजीडेण्ट तथा हेरात व कुछ अन्य स्थानों पर एजेण्ट रखना स्वीकार कर लिया। साथ ही अमीर ने अंग्रेजों को खुर्रम दर्रा सौंप कर अपने विदेशी संबंधों का संचालन भी अंग्रेजों के अनुसार करने का वचन दिया। बदलने मे अंग्रेजों ने अमीर को छः लाख रुपये की वार्षिक आर्थिक सहायता और विदेशी आक्रमण से अमीर की रक्षा करने का वचन दिया।
पंजदेह
स्टीफेनों की संधि के बाद बाल्कन प्रायद्वीप और ओटोमन साम्राज्य में रूस के प्रभाव में बड़ी वृद्धि हो गयी थी ब्रिटिश विरोध के चलते बर्लिन सम्मेलन (1878) में इसे पलट दिया गया जिसके भूमध्यसागर में रूसी हितों को बङी हानि पहुँची । फलतः रूस की महत्वाकांक्षा मध्य एशिया के क्षेत्रों मे पूर्ति हो सकती थी जिस पर रूस ने ध्यान दिया। इसी क्रम मे रूस ने मर्व पर अधिकार कर लिया जो अफगानिस्तान की सीमा पर स्थित था। परंतु रूसी चाहते थे की वे हेरात पर अपना अधिकार कर लें। इससे वउनकी हिन्द सागर तक पहुँच सुनिश्चित हो जाती। पंजदह की स्थिति इस मर्व नगर से 100 मील दक्षिण मे थी। पंजदेह के इस सामरिक महत्त्व के कारण रूस यह कहता था को पंजदेह को अफगानिस्तान के अमीर से स्वतंत्र कराया जाना चाहिए। किन्तु अंग्रेजों चाहते थे को इसे संयुक्त आयोग के जिम्मे छोङ दिया जाना चाहिए। तभी रूस की आक्रामक कार्यवाही ने वहाँ से अफगान सैनिकों को खदेङ दिया। यह अंग्रेजों के लिए चुनौती थी लेकिन इंग्लैण्ड या रूस कोई भी पक्ष युद्ध नहीं चाहता था। अंततः 1895 मे जाकर अफगानिस्तान ने पंजदेह के उत्तर के क्षेत्रों में अपना अधिकार त्याग दिया और बुखारा ने आक्सस के दक्षिण में स्थित दरवाजे पर अपना अधिकार त्याग दिया।
तिब्बत और अंग्रेज
तिब्बत की विशिष्ट भौगोलिक अवस्थिति के कारण अन्य देशों से इसका संपर्क कम ही रहता था। साथ ही चीन से निकटता के कारण भी यहाँ से सीधे व्यापार की संभावना नहीं थी।यद्यपि व्यापार की संभावनाओ की तलाश वारेन हेस्टिंगस के समय से ही प्रारंभ हो गई थी परंतु कोई खास सफलता नहीं मिल सकी थी। यहाँ तक की 19 वी सदी के अंतिम दशक मे जब सिक्किम और तिब्बत के बीच सीमा तय कर दी गयी, तब भी तिब्बत इस समझौता को नहीं माना। वे भारतीय माल पर चुंगी तो वसूल कैट ही थे चीन द्वारा स्वीकृत सीमा को भी नहीं मानते थे। लेकिन 20 सदी के आरंभ के साथ वहाँ रूस का प्रभाव बढ़ता दिखाई देने लगा था। इसका कारण यह था की साइबेरिया का रहने वाला एक रूसी नागरीक दोरजीफ वहाँ के सर्वोच्च धर्म-गुरु दलाईलामा का शिक्षक रह चुका था। अपने 20 वर्षीय प्रवास का लाभ उसे मिल रहा था। वहाँ स्थिति के बारे मे लार्ड कर्जन के निष्कर्ष के अनुसार तिब्बत पर चीन की संप्रभुता लगभग समाप्त हो चुकी थी। इस समय रूस एशिया में अपना साम्राजयवादी विस्तार को उत्सुक था।
इन्ही परिस्थितियों मे कर्जन ने एक मिशन तिब्बत भेजेने का निश्चय किया यह कहते हुए की तिब्बतियों ने सिक्किम की सीमा का अतिक्रमण कीय है और उन्होंने ब्रिटिश व्यापारियों मे मार्ग मे भी बाधाएं खड़ी कर दी है। यह मिशन 1903 में खांबाजोग पहुँचा। परंतु बात नहीं बनी और तिब्बतियों ने सैन्य कार्यवाही का सहारा लिया। अंततः ब्रिटिश सेना के सामने तिब्बती तिक नहीं पाए और ब्रिटिश फौज1904 तक तिब्बत की राजधानी ल्हासा मे दाखिल हो गई। दलाईलामा ने अपने प्रतिनिधि को सत्ता सौंप दो और स्वयं कहीं और चला गया। ब्रिटिश मिशन ने अंततः उसी प्रतिनिधि के साथ ल्हासा की संधि (7.9.1904) की और 75 लाख रुपये की राशि क्षतिपूर्ति के रुप मे मांगी गई। जिसे एक लाख रुपये वार्षिक की दर से चुकाना था। पूरी रकम का भुगतान हो जाने तक चुंबीघाटी में ब्रिटिश सेना को रखने का प्रावधान रखा गया। इस तरह चुंबीघाटी जो की तिब्बत के रास्ते की कुंजी था और साथ ही बर्मा और कश्मीर के बीच एक एक सामरिक महत्त्व की जगह भी थी, पर अंग्रेजों का 75 वर्ष तक के लिए अधिकार हो गया। इस संधि के अन्य प्रावधानों के अनुसार यातुंग, ग्यांत्से और गंङतोक में व्यापारिक केन्द्र की स्थापना होनी थी और सबसे महत्वपूर्ण यह की तिब्बत की विदेश नीति पूर्णतया अंग्रेजों के हाथ में होगी। परंतु रूस के पार्टी इसके विरोध को देखते क्षतिपूर्ति की राशि घटाकर 25 लाख रुपये कर दी गई। साथ ही अन्य शर्तों का पालन करते हुआ अगर ये राशि तीन किश्तें समय पर दे दी जायें तो अंग्रेजी सेना चुंबीघाटी से हटा ली जायेगी। ब्रिटिश प्रतिनिधिको केवल ग्यांत्से में रहने की अनुमति दी गई। जब चीन ने इस क्षतिपूर्ति की राशि का भुगतान कर दिया तो अंग्रेजों ने तिब्बत पर पर चीन की संप्रभुता को मान्यता देने के साथ चुंबीघाटी से भी अपनी सेना वापस बुला ली (1908)।
बर्मा का राज्य और अंग्रेज
वर्तमान मे भारत के पूर्व मे बर्मा का 18 वी सदी मे उदय मे हुआ था। परंतु आरंभिक दौर मे अंग्रेज की इसमे कोई रुचि बही थी. स्वयं बर्मा के राजा की भी अपनी ही दुनिया थी जिसमे वो सामान्यतः विदेशी (यूरोपीय) व्यक्तियों से घृणा करता था। 18 वी सदी के उत्तरार्ध मे ब्रिटिश कंपनी के प्रयासों पर बर्मी राज्य ने कोई उत्साह नहीं दिखाई। तब कंपनी ने भी 1811 के बाद संबंधों की स्थापना की दिशा मे कोई प्रयत्न नहीं किया। इसी बीच कुछ उपद्रवकारी भारतीय क्षेत्र में या गए और यहाँ शरण ले लिया। बर्मा की सरकार उनकी मांग कर दी और कहा की उन्हें बंदी बनाकर बर्मी अधिकारियों को सौंप दिया जाय किन्तु कंपनी ने इसे स्वीकार नहीं किया। इस तरह अब अराकान की सीमा के प्रश्न को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया और बर्मा राज्य का रवैया इसकी वजह से दिन-प्रतिदिन कठोर होता चल गया। 1814 ई. में बर्मा सरकार ने गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्ज को एक पत्र लिखा जिसमें ढाका चटगांव, मुर्शिदाबाद और कासिम बाजार के क्षेत्रों की माँग की गई और कहा गया कि ये चारों प्रदेश कंपनी के अधीन होने के पूर्व अराकान को वार्षिक कर देते थे और चूँकि अराकान पर अब बर्मी सत्ता स्थापित हो गई है इसलिए ये चारों प्रदेश बर्मा के अधीन कर दिये जायँ। लेकिन लार्ड हेस्टिंग्ज ने बर्मा सरकार के इस पत्र को कोई महत्त्व नहीं दिया। लार्ड एमहर्स्ट के काल शाहपुरी के छोटे और निर्जन द्वीप को लेकर बर्मा के राज्य के साथ अंग्रेजों विवाद हुआ। शाहपुरी जो की एक छोटे और निर्जन द्वीप था नाफ नदी अराकान और ब्रिटिश सीमा को विभाजित करती थी के के किनारे पर स्थित था।
इसी अवधि मे चटगाँव के पास कुछ अंग्रेज को लेकिन बर्मियों ने पकङ लिया और उधर से गुजरने वाली अंग्रेजी नावों से चुँगी की मांग भी कर दी। अंग्रेजों ने इसका विरोध तो किया ही शाहपुरी में अपनी सैनिक भेजकर शाहपुरी का टापू खाली करवा लिया। बर्मा का राज्य चाहता था की शाहपुरी के क्षेत्र को तटस्थ रहे किन्तु अंग्रेजों के द्वारा अस्वीकार करने के कारण बर्मा राज्य के सैनिकों ने उस पर आक्रमण (1824) कर अधिकार कर लिया। इसी मे साथ प्रथम अंग्रेज-बर्मा के विरुद्ध युद्ध (1824-26) की शुरुआत हो गई। दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध हुआ। परंतु निर्णायक हार बर्मा राज्य की ही हुई और यांदाबू की संधि (1826) के साथ बर्मा के राजा ने अपने राज्य में अंग्रेज रेजीडेण्ट रखना स्वीकार करते हुए असम, कच्छार तथा मणिपुर पर ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार कर लिया। एक करोङ रुपया क्षतिपूर्ति के साथ साथ अराकान व तनासरीम के क्षेत्र भी कंपनी दिए गए। अब अंग्रेज व्यापारियों को रंगून में बसने और व्यापार करने का भी अधिकार मिल गया। परंतु बर्मा के राज्य ने ब्रिटिश गवर्नर जनरल के पास अपना कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा। उधर बर्मा के दरबार मे भी जिस ब्रिटिश रेजीडेण्ट को रखा गया था उसके साथ बुरा व्यवहार किया गया। स्थिति यह हो गई अल बार फिर से 1840 ई. के बाद दोनों के बीच कोई संपर्क नहीं रह सका। इसी बीच 1848 मे जब डलहौजी भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया तो उसे रंगून मे बसे व्यापारियों से बर्मा राज्य के खिलाफ की शिकायतें प्राप्त हुई जिसमे यह आरोप लगाया गया था की बर्मा सरकार अधिक कर की माँग कर रही है। डलहौजी ने इस पर कारवाई का निश्चय किया और अपनी नौसेना वह भेज दी। 1852 मे डलहौजी ने तक एक लाख पौंड क्षतिपूर्ति के रूप मे बर्मा के राजा से मांग की और जनरल गाडविन के नेतृत्व में एक सेना भी भेज दी। गाडविन ने मर्तबान व रंगून पर अधिकार कर लिया। इसके बाद ब्रिटिश सेनाओं ने पीगू और प्रोम पर अधिकार कर लिया। 1852 के अंत मे डलहौजी ने बर्मा के निचले भाग ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया रंगून को उस प्रांत की राजधानी बना दिया। इस युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों को भू-सामरिक दृष्टि से बड़ी बढ़त हासिल हुई। अब चटगाँव से लेकर सिंगापुर तक समस्त समुद्री तट अंग्रेजों के अधिकार थे जबकि बर्मा का राज्य का विस्तार सिर्फ स्थलीय भूमि तक ही रह गया। परंतु ब्रिटिश सरकार इतने से ही मानने वाली कहाँ थी। उन्होंने बर्मा सरकार के साथ नई-नई संधियाँ करके अंग्रेज अपने अधिकारों में वृद्धि करते रहे। 1862 ई. की संधि के अनुसार अंग्रेजों को बर्मा की सीमाओं में रहने का अधिकार मिल गया। 1867 की एक अन्य संधि के द्वारा बर्मा ने लकङी, तेल तथा कीमती पत्थर के अतिरिक्त अन्य सभी वस्तुओं के व्यापार पर से अपना एकाधिकार त्याग दिया। अब बर्मा की राजधानी में ब्रिटिश रेजीडेण्ट के रहने की सुविधा तो दी ही गई, उसे ब्रिटिश नागरिकों के हितों की देखभाल का अधिकार भी प्रदान किया गया। अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा मे रंगून से प्रोम तक एक रेलवे लाइन भी बिछाना था। परंतु 1870 के दौरान बर्मा के राज्य के द्वारा फ्रांस, इटली एवं ईरान के साथ की गई एक संधियाँ जिसके अनुसार बर्मी सैनिक को प्रशिक्षण के साथ साथ कुछ सैन्य साजो समान मिलने थे ने अंग्रेजों को नाराज कर दिया।
इसी बीच वहाँ के राजा मिंदन की मृत्यु हो गई और उसका युवा पुत्र थीबा बर्मा की गद्दी पर बैठा। उत्तराधिकार से संबंधित विवाद मे थीबा ने परिवार के की सदस्यों को मरवा दिया। फिर उसने आगे चलकर एक बार फिर से फ़्रांस के साथ मित्रता की संधि की जिसमे फ़्रांसीसियों को कुछ व्यापारिक रियायतें दी गई थी ने अंग्रेजों को नाराज कर दिया। अंततः अंग्रेज व्यापारियों के दवाब के सामने ब्रिटिश सरकार ने यह निश्चय कर लिया कि संपूर्ण बर्मा को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया जाय। तभी एक अंग्रेजी कंपनी जिसने 10 लाख की कर चोरी की थी उस पर बर्मा सरकार ने कंपनी के ठेके को समाप्त करते हुआ साढे तेईस लाख रुपये का जुर्माना लगाया जिसे चार बराबर किश्तों में भुगतान करना था। परंतु कंपनी ने इसे स्वीकार नहीं किया। कंपनी की अपील पर ब्रिटिश सरकार ने मामले की निष्पक्ष जाँच की मांग की और यह प्रस्ताव किया की इस मामले की जांच के लिए गवर्नर जनरल द्वारा नियुक्त एक प्रतिनिधि की नियुक्ति की जाय। बर्मा राज्य ने इस नहीं माना। फिर अंग्रेजों ने एक अल्टीमेटम भेजकर आने शर्तों के साथ उपरोक्त प्रस्ताव को मानने को कहा कहा। बर्मा की सरकार कुछ शर्तों के साथ उसे मानने को तैयार थी लेकिन अंग्रेजों ने अपनी सेना वहाँ भेज दी और बर्मा के राजा ने आत्म-समर्पण कर दिया। अंततः नाव वर्ष के पहले दिन (1.1.1886) को संपूर्ण बर्मा को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया गया और उसे एक अलग चीफ कमिश्नर वाले प्रांत का दर्ज दे दिया गया।
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