लोकतंत्र, मीडिया और काँग्रेस
लोकतंत्र में दावे करने वाले अनेक तत्व होते है खासकर भारत में। यहाँ की न्यायपालिका भी लोकतंत्र का खूब उपदेश देती है भले ही उसका चरित्र और चिंतन कितना ही तानाशाही न हो। नानी पालकीवाला ने आज से लगभग 40 वर्ष ही कहा था ‘हम लोग न्यायिक तानाशाही की ओर बढ़ रहे है’। तब से आज तक की 40 वर्षों की यात्रा मे हमने तानाशाही की तरफ की यात्रा काफी हद तक पूरी कर ली है। अब शायद यह सिर्फ समय की बात है की कब यह कहा जाएगा की अमुक पार्टी की सरकार लोकतान्त्रिक नहीं अतः हम उसे चुनावी दौड़ से बाहर करते है। वैसे यहाँ एक राज्य की अपदस्थ सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सत्तासीन करवाया जा चुका है।
कोर्ट ही क्यों हमारे यहाँ मीडिया स्वयं खुद को यह कहते नहीं थकता की ‘मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है’ जबकी आपातकाल के दिनों में भी आज का यह मीडिया एक को छोडकर पीठ के बल रेंग रहा था। 1960-70 के दशक से चली शिक्षा व्यवयस्था जिसने काँग्रेस और उसके सहयोगी तंत्र के अनुरूप लोगों के मौलिक और स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दिया है , समसामयिक मीडिया खबरों को अपने इन्ही वैचारिक पूर्वाग्रहों की चाशनी में छान का परोस रहा है और एक अतिअग्रही (Manipulated) नागरिक से स्वतंत्र चिंतन की प्रवृति को समाप्त करने पर तुला हुआ है।
लोकतान्त्रिक होने की घोषणा का हाल यह है की आज विश्व का हरेक तानाशाह भी स्वयं को लोकतान्त्रिक होने का दावा करता है। चाहे वह परवेज मुशर्रफ रहे हो यह वर्तमान में सीरिया का व्यवस्था। और तो और अफगानिस्तान का तालिवान भी स्वयं को लोकतान्त्रिक होने का दावा करते है। और यह सब होता है मीडिया के द्वारा। उसमे प्रायोजित खबरों, संपादकीय और विज्ञापनों के बल पर। और कोई भी मीडिया प्रिन्ट हो या टेलीविजन इतना साहस नहीं कर पाता की वह जारी व्यवस्था के कोई भी जायज सवाल कर पाए। भारत की स्थिति तो और भी चिंताजनक है। भारत में कॉंग्रेस के तंत्र नें पत्रकारों, मीडिया प्रमुखों संस्थानों की कमर ही तोड़ दी है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा संबोधित "खान मार्केट गैंग" का मूल चरित्र वास्तव में एक बिके हुए मीडिया तंत्र का प्रतिनिधत्व करता है वर्तमान सत्ता (स्पष्तः भाजपा का) का विरोध तो करता है परंतु वह स्वयं एक छोटे अभिजात वर्ग या कहें तो सिर्फ काँग्रेस और काँग्रेस समर्थित समूहों के विचारों के विचारों का पक्षपाती है। सोनिया गांधी जिसका असली नाम अंटोनियों माइनो है, कोई भी साहस नहीं कर पाता की उससे इस पर कुछ पूछ सकें। राजदीप के अंटोनियों माइनो के साथ वाले साक्षात्कार को सास-बहु टाइप प्रायोजित संवाद की संज्ञा दी जाती है। वैसी ही स्थिति यहाँ के हर समूह की है। शेखर गुप्ता काँग्रेस के इशारे पर सैन्य विद्रोह की झूठी खबर छपवाता है और आज तक वह स्वतंत्र घूम रहा है। 1970-80 के दशक में उदित हुए सारे के सारे पत्रकार ऐसे ही दोगले किस्म का टुच्चा पत्रकार है।
अभी जारी रहेगा ....
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