कहानी भारत की : भूमिका
भारत कहानी की शुरुआत कम से कम 10000 वर्ष पहले शुरू होती है जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान सहित भारत के पश्चिमी भागों में एक नदी बहती थी जिसे ऋग्वेद ने सरस्वती कहकर पुकारा है। भूगर्भशास्त्र और हिमालयी अध्ययन यह प्रमाणित करते है की सरस्वती का जीवन-अवधि कम से कम 80000 ईसा पूर्व से लेकन 2000 ईसा पूर्व तक था जब यह पूरी तरह सुख गई। तब के सरस्वती का यह किनारा ही भारत के पहले सभ्यता की स्थापना, उत्थान और पतन का गवाह बनी। क्योंकि जीवन अनुकूल परिस्थितियों की उपस्थिति ने ही पहले पहल सरस्वती सहित ने समकालीन नदियों के किनारे सभ्यता के विकास को संभव बनाया था, इससे जुड़े लोगों ने सरस्वती को नदीतीमा कह कर संबोधित किया और उसकी खूब प्रशंसा की। यह सरस्वती ही थी जिसने जिसने इसके किनारे बसे समूहों का आरंभिक व्यवस्था के सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक मूल्यों को निर्णीत करने में एक महती भूमिका का निर्वहन किया था, उस मानव सभया का पहला आधिकारिक ग्रंथ ऋग्वेद सरस्वती नदी की महिमा, उसके आवेगों और उसके द्वारा प्रवाहित जल की मात्रा एवं प्रकृति सहित उससे उत्पन्न सौन्दर्य बोध का खूब वर्णन किया है। इस तरह से सरस्वती नदी का तट ही वह पालना था जिसमे इस सभ्यता की नीव पड़ी और समय के साथ एक विशाल क्षेत्र को अपने में समेत लिया जिसके अवशेष आज हमे हड़प्पा, मोहन-जो-दाड़ो, कलिबनगन, राखीगढ़ी, धौलविरा और लोथल में मिलते है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है की ये शहर अचानक एक ही दिन मे बनकर तैयार हो गए थे। इनके सभ्यतागत आदर्श, तकनीक, सामाजिक व्यवस्था और नैतिक मूल्यों के साथ साथ इसके आध्यात्मिक अनुभव को परीपक्व होने में की वर्ष लगे होंगे। यह समस्त अनुभवों को मानव इतिहास के पहले ग्रंथ में संरक्षित रखा गया है। शहरों में जहां हरियूपीया का जिक्र है वही इस पूरे दौर का राजनीतिक चिंतन, राजत्व की प्रकृति सहित उसके सामंजस्य सूत्र भी लिख दिए गए जिसपर इस सभ्यता की बुनियाद टिकी हुई थी। वह समस्त परंपरा ऋग्वेद सहित अन्य वेदों में वर्णित है। इसे ‘सनातन कहा जाता है क्योंकि वह स्वयं सत्य है प्रमाणित है। उसे किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। इसी कारण से वह अपौरुषेय है।
भारत एक सनातन राष्ट्र है इसका सरलतम अर्थ यह है की एक राष्ट्र के रूप मे इसकी अवधारणा परंपरा से प्राप्त होती है। अर्थात एक राष्ट्र के रूप मे इसकी कल्पना परंपरा से ही है न की आधुनिक यूरोप के तरह यह किसी क्रांति या किसी राजशाही संधि का परिणाम। अपने आरंभ से लेकर वर्तमान तक भारत अपने इस सनातन बोध के प्रति अत्यंत सजग रहा है। पहले इस्लामिक आक्रांता, फिर अंग्रेजी-साहबों की धूर्तता और तत्पश्चात काँग्रेसी व्यवस्था के खूनी पंजों ने इस सनातन भारत के बुनियाद, इतिहास और विरासत को तोड़ने-मड़ोरने की भरपूर चेष्टा की। खासकर वर्तमान समय में भारत का सनातन स्वरूप सूचना क्रांति और उससे उपजे कु-सूचना युग (age of misinformation) के कारण एक वैचारिक द्वंद्व मे फंसा दिखाई देता है। इस द्वन्द्व में एक तरफ जहां इसके अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बोध है तो वही दूसरी तरफ इस 1500 सालों के दौरान थोपी गई औपनिवेशिकता का बोझ।
लेकिन इसका एक सकारात्मक पहलू भी है की जब जब भारत की सनतानता पर हमले हुए है इसका अंतरतम उतनी ही चेष्टा से उस हमले का प्रतिकार किया है। इस प्रतिकार के क्रम मे उसने समकालीन सिद्धांतों को ही कही अधिक परिष्कृत रूप से और अधिक समावेशी रूप से प्रयोग किया है। इसका एक नवीनतम उदाहरण है 2014 का चुनाव। जब मनमोहन सिंह देश के संसाधनों पर अवैध रूप से अल्पसंख्यकों को कब्जा करने के लिए उकसा रहे थे तो सनातन समाज ने उसका लोकतान्त्रिक रूप से ही प्रतिकार कर दिया है। इसकी व्याख्या चाहे जिस रूप मे भी की जाए यह सच है की आज भारत में पुनर्जागरण का दौर है और हाँ यह उस तथाकथित सामाजिक-धर्म सुधार आंदोलनों से बिल्कुल अलग है जिसे अंग्रेजी-साहेबों के निर्देशों एवं नियंत्रण मे राजा राममोहन राय ने शुरू किया था। आज हम उस युग मे जी रहे है जब नया भारत उठ खड़ा हो रहा है और अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर देख रहा है। इस संदर्भ मे यह अपेक्षित है की हम सभी इसकी सनातनता के रहस्यों से अवगत है। इसके तीन आवश्यक कारण है;
1. वैज्ञानिकता पर आधारित जीवन दर्शन
2. विमर्शों पर आधारित संस्कृति
3. विविधता के प्रति एक गहरी आस्था
वैज्ञानिकता पर आधारित जीवन दर्शन
वैज्ञानिकता ही भारतीयता/सनातनता का पर्याय है और इस वैज्ञानिकता का मतलब वह तथाकथित द्वन्द्वात्मक वर्ग संघर्ष बिल्कुल भी नहीं है जो की अपने सिद्धांत मे उतना ही अवैज्ञानिक है जितना की व्यवहार में। एक सनातनी का दिन प्रतिदिन का धार्मिक कर्मकांड हो या उसका समस्त सामाजिक आचार, विचार और व्यवहार, विज्ञान के मूलभूत सिद्धांत और उसके निष्कर्षों के अनुरूप ही निष्पादित किए जाते है। वैज्ञानिक आधार पर यह प्रमाणित है ऋग्वेद का नासदीय सूक्त ही इस ब्रह्मांड के सृजन का सूत्र (formula) है। यह कहने की आवश्यकता नहीं की यज्ञों के हवन से जहां वायु की शुद्धता सुनिश्चित होती है तो मंत्रों के उच्चारण के दौरान सृजित ध्वनियों के कंपन से एक तरह की सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को महसूस किया जा सकता है।
विमर्शों पर आधारित संस्कृति
विचार विमर्श ही इस सनातन संस्कृति का प्राण रहा है। अगर भारत की सभ्यता ज्ञान की सभ्यता थी तो इसका आधार इसका विचार विमर्श पर आधारित होना ही था। यही वह कारण है जिसके कारण भारत अपने इतिहास के अधिकतम अवधि मे विश्व गुरु कहलाने का गौरव रखता था। इस्लामिक आक्रान्ताओं और फिर ब्रिटिश राज द्वारा समर्थित सत्ता ही ज्ञान है (power is knowledge) की अवधारणा ने एक ऐसी मानसिकता का विकास किया जो इसके इस धरोहर के प्रति दुराग्रही चरित्र वाला था। दुर्भाग्य से 1947 के बाद स्थापित व्यवस्था भी कही अधिक दुराग्रही साबित हुई। समग्रतः कॉंग्रेसी व्यवस्था अपने स्व से इतर किसी भी वैकल्पिक विचार को स्वीकार नहीं करती थी। इस संयोग नहीं है की आजादी के बाद कोई भी भारत मे सनातन केंद्रित भारतविद् पैदा नहीं हुआ। इसके उलट हम नैमिषारण्य में महीनों चले वैचारिक विमर्श को जानते है। हम जनक की सभा के बारे मे जानते है। हम सभी लोग काशी का शास्त्रार्थ का बारे मे कुछ न कुछ जरूर जानते है। आचार्य शंकर और मंडन मिश्र के शास्त्रार्थ के बारे मे तो अवश्य ही सुने ही होंगे। इसका एक सबसे महानतम पहलू यह था की इस विचार विनिमय के पश्चात जो कुछ भी छन कर बाहर आता था उसे स्वीकार किया जाता था और फिर वही समकालीन समाज के मूल्य बनते थे। क्या यह आश्चर्य नहीं है की शंकराचार्य के दिग्विजयों ने अखिल भारत को जाने अनजाने अद्वैतवादी बना दिया। गहन स्तरीय अध्ययन और तार्किक शास्त्रार्थ के माध्यम से शंकराचार्य ने अद्वैत के बारे मे समाज को बताया था और तब से आजतक जाने अनजाने पूरा का पूरा सनातन समाज कमोवेश रूप से उसे स्वीकार कर अद्वैतवादी बना हुआ है। हम सभी जानते है की तर्कों पर आधारित विचारों का एक अपना सम्मोहन होता है जिसके अपने परिणाम भी प्राप्त होते है। इस संदर्भ की तुलना वर्तमान मे टेलीविजन की बहसों से कर सकते है। आपको किस वक्ता का विचार सम्मोहित करता है और क्यों और इसी के अनुरूप उसके परिणाम की भी कल्पना की जा सकती है और इसी सूत्र का प्रयोग आप चुनावों मे मतदाताओं के व्यवहार को समझने मे कर सकते है।
विविधता के प्रति एकता
यह इसकी मूलभूत पहचान है। इसके अन्तर्गत एक सनातनी इस तथ्य मे विश्वास रखता है की ‘सत्य एक है’ लेकिन उसे विभिन्न रूपों मे जाना जा सकता है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है की भारत के इतिहास मे किसी को भी इसलिए नहीं मारा गया की वह सनातन के सामाजिक-धार्मिक-चिंतन प्रणाली से असहमति व्यक्त करता है। साथ ही यह भी की इसे अपने इतिहास के किसी भी चरण मे किसी भी विचार को स्वीकार करने मे झिझक नहीं हुई, शर्त केवल इतनी ही थी ही वह विचार तर्कसंगत एवं वैज्ञानिक हो और मानव मन की जिज्ञासाओं को संतुष्ट कर दे। इस सनातन भारत ने बुद्ध को भी एक एक अवतार मान लिया। संख्या दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि को भगवान का एक अवतार मान लिया गया। वैविध्य विचार हों, दर्शन हों या विश्वास हो, सनातन भारत ने सबको स्वीकार किया है। एक सनातनी, परम की एकता पर विश्वास रखता है और यह मानता है की वहाँ तक पहुँचने के अनेक रास्ते हो सकते है और वह रास्ता की व्यक्ति की योग्यता, क्षमता एवं उसके प्रयासों पर निर्भर करती है। ज्ञातव्य है की पूरा का पूरा अनिश्वरवादी परंपरा जैसे की बौद्ध, जैन और आजीवक के साथ साथ षडदर्शनों की परंपरा भी विविधता से परिपूर्ण है और सब भारतीय समाज को स्वीकार्य है।
बुनियादी विचार
क्योंकि सनातनता एक बहुत ही व्यापक विचार है और जिसके कई आयाम है इसके कुछ बुनियादी विचारों को समझना समीचीन होगा। वर्तमान का हिन्दू धर्म अतीत में सनातन के नाम से जाना जाता था जिसके पास यह व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्र के स्तर तक एक एक सुनियोजित चिंतन की प्रणाली थी। सनातन धर्म में धर्म, अर्थ, कला साहित्य और सौन्दर्य की अपनी प्रणाली थी जो किसी भी रूप मे संकीर्णता से पड़े थी। यह अपने मूल स्वरूप मे किसी भी तरह की नस्लीय, जातीय या मजहबी उन्माद/आक्रामकता से मुक्त थी।
सनातन धर्म के शीर्ष पर वेद आते है जो सनातन सभ्यता और संस्कृति के प्राण है। वेदों का अध्ययन दिव्यता की ओर ले जाता है और इसे पढ़ने वाले इसमें वर्णित ज्ञान के वशीभूत होकर इसपर मोहित हो जाते है। इसकी महत्ता सिर्फ भारत के लिए नहीं है बल्कि इसमे निहित आदर्श सम्पूर्ण मानवता के है। सांसारिक विज्ञान के साथ साथ आधुनिक विज्ञान के जटिल से जटिल सिद्धांत भी इसमे प्राप्य है।
एक सनातनी को अपने धर्म आचार विचार की जानकारी के लिए बुनियादी तौर पर अपने मूल ग्रंथों को पढ़ने की जरूरत है न के उसके अनुवाद या उसके पूर्वाग्रही वैचारिक भाष्य । इसके लिए संस्कृत की जानकारी होनी जरूरी है।
संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है। जो की देवभाषा की अधिकारी है वह विभेद को कैसे जन्म दे सकती है। सनातन की परंपरा में ईश्वर (God) का विचार वही तक मान्य है जहां तक वे वेद के अनुसार प्रतिस्थापित ज्ञान परंपरा से साम्यता स्थापित करते है। ईश्वर का अस्तित्व तभी तक है जब तक वो वेदों के द्वारा स्थापित प्रणाली को मानते है। इस अर्थ में सनातन परंपरा में आस्तिकता का अर्थ वह है जो वेदों में विश्वास करता हो जबकी नास्तिकता का अभिप्राय उससे है जिसके आस्था वेदों में प्रति न हो।
वेद ज्ञान के आरंभिक श्रोत है और उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर ईश्वर का अस्तित्व भी ज्ञान के सापेक्ष है। जब तक ईश्वर ज्ञान प्राप्ति मे लगे रहते है वे ईश्वर होने के अधिकारी है। और यह ज्ञान के प्रति वेदों की उद्घोषणा एक मनुष्य को भी ईश्वर हो जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
मनुष्यता की सर्वोच्च अवस्था ही ईश्वर है जो ज्ञान का अधिकारी है। और यह ज्ञान कहीं से भी संकीर्ण नहीं है। विविधता भरे जगत मे ज्ञान की सीमा कैसे ते हो सकती है। उसी के अनुरूप सनातन भगवान की शक्तियां अलग अलग है उनके कर्म अलग अलग है और उसी के अनुरूप उनसे संबंधित पूजा प्रणाली विकसित हुई है। लेकिन सभी में एक साम्यता यह है सभी वैदिक परंपरा के अनुगामी है और एक मात्र सर्वोच्च सत्ता जो की ब्रह्म है के अधीन है। सनातन सिद्धांत एक स्पष्ट रूप परिमार्जित सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करते है। इसके पर सुस्पष्ट भौगोलिक विस्तार था जिसके अंदर मे यह फलित हुआ और जिसकी रक्षा की कामना कई गई है।
राष्ट्र की भौगोलिक अवधारणा
भारत का वर्णन विष्णु पुराण (२.३.१)इस प्रकार करता है
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।
अर्थात समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश है उसे भारत कहते हैं तथा उसकी संतानों (नागरिकों) को भारती कहते हैं।
रामायण और भारत
रामायण दो शब्दों की संधि है अर्थात राम + आयन। यहाँ यह महत्वपूर्ण है के वामपंथी इतिहासकारों ने राम को (Roam) का अपभ्रंश रूप बताया है जबकि आयन को फारसी के आईन (जैसे के आईंन-ए-अकबरी) बताकर रामायण को राम का चरित्र चित्रण कहकर उसकी ऐतिहासिकता को मिथ्या बताया गया है। सच यह है की राम भारत के नायक है जिन्होंने भारत के भूगोल को निर्धारित किया है। यहाँ यह महत्वपूर्ण है की संस्कृत शब्द ‘आयन’ का अर्थ दिशा होता है जैसे की उत्तरायण या दक्षिणायन। अर्थात रामायण अपने स्वरूप मे राम की यात्राओं को वर्णित करता है और इस तरह से राम भारत उस भूगोल को सुनिश्चित करते है जिसे विष्णु पुराण ने भारत भूमि कहा है।
विचित्रंजं बुद्वीपम् मनोहरम जीवितं मनोहराम अर्थात भारत विचित्र है। यहाँ मनुष्यों का जीवन बाद मनोहारी है’ भारत की विविधता को बताने वाले ये शब्द गौतम बुद्ध के अंतिम शब्द है जिसमे उन्होंने भारत के लोगों की विविधताओं के बारे मे स्पष्ट बात कही है। ध्यातव्य हो की इस विविधता को उन्होंने मनोहारी कहा है।
राष्ट्रप्रेम
मद्रास की हिन्दी प्रचार प्रेस द्वारा जारी 1930 मे प्रकाशित रामायण के संस्करण में एक श्लोक मिलता है जो इस प्रकार है:
मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
इस संस्करण के मुताबिक ऋषि भारद्वाज राम से कहते है की की राम इस संसार में मित्र, धन और अन्न की इस संसार में बड़ी प्रतिष्ठा है, लेकिन मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं. आरंभिक राष्ट्रवाद का श्लोक एक अन्य रूपों मे भी रामायण के कुछ संस्करणों मे मिलता है जो इस प्रकार है;
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
इसका प्रसंग यह है लक्ष्मण लंका जो की स्वर्णमयी (जहां नितांत भौतिकवाद का प्रतीक) है को देखकर अचंभित हो जाते है। लेकिन राम इससे अछूते है। राम लक्ष्मण से कहते है की लक्ष्मण, यह लंका सोने की होने पर भी मेरी रुचि का विषय नहीं है क्योंकि मां और मातृभूमि ही स्वर्ग से बढ़कर हैं.'
राष्ट्रवाद की पश्चिमी अवधारणा
वर्तमान में समसामयिक वैश्विक व्यवस्थ यूरोपीय की राष्ट्र राज्य की प्रणाली से संचालित होती है जो मूलतः अब्राहमिक सांप्रदायिक चिंतन प्रणाली पर आधारित है जो नस्लीय सर्वश्रेष्ठता के उन्माद पर टिकी है जो एक तरह का “एक” को ही मानती है जैसे की एक रीलिजन, एक राष्ट्र-राज्य, एक संप्रदाय, एक विश्वास, एक किताब, एक राष्ट्र-राज्य, एक सीमा रेखा। और जो इस तथाकथित ‘एक’ से अलग है उसे तब तक बर्दाश्त (tolerate) किया जाता जब तब वह स्वयं इतना ताकतवर नहीं हो जाता की वह उस विभिन्नता को समाप्त न कर दे।
पश्चिम अपने इसी बुनियादी विश्वास और चिंतन की मूलभूत प्रणाली के कारण जहां भी गया वहाँ उन्होंने खूब हिंसा की। वर्तमान अमेरिका, लैटिन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों मे यूरोपियों ने वहाँ की स्वदेशी/देशी वासियों को समाप्त ही कर दिया। वहाँ का हर राष्ट्र-राज्य और उसका नेता कदाचित ‘हिटलर’ ही रहा है। हाँ भले ही सत्ता के दम पर कितना ही बढ़िया आख्यान (narrative) लिखवा लिया हो।
भारत की विशिष्टता
भारत का चिंतन पश्चिम से बिल्कुल अलग रहा है जो एकदम विशिष्ट है और यह किसी भी अर्थ मे पश्चिमी मूल्यों से मेल नहीं खाता है । भारत अपने विश्वास और चिंतन की मूलभूत प्रणाली मे विविधता को स्वीकार करता है या कहें तो विविधता को एक उत्सव की तरह मान्यता देता/देखता है और उसका जश्न मनाता है। भारत किसी को बर्दाश्त (tolerate) नहीं करता बल्कि यह उसे स्वीकार (accept) करता है। ऐसे कितने ही उदाहरण भरे पड़े है जहां हमने भिन्नता का ‘स्वागत’ किया है। भारत की विशिष्टता इस अर्थ में निहित है की यह अपने मूल स्वरूप मे एक ‘सांस्कृतिक इकाई’ है जिसकी एक स्पष्ट भौगोलिक पहचान है जो सम्पूर्ण दक्षिण और पूर्व एशिया को अपने मे समेटे हुए है। क्योंकि यह एक स्पष्ट सांस्कृतिक इकाई है, ‘यूरोपीय राष्ट्रवाद’ का कोई भी मान्य सिद्धांत इस पर लागू नहीं होता है। इतना ही नहीं इस दिशा (यूरोपीय राजनीतिक व्यवस्था) मे किया गया प्रयास भी निरर्थक ही सिद्ध हुआ है जिसके अवांछनीय परिणाम प्राप्त हुए है। यह इसकी विडंबना रही की पिछले 1000 सालों से भारत अब्राहमिक वैचारिक प्रणाली से शासित करने का प्रयास करते रहे लेकिन कभी भी उत्साहवर्धक परिणाम नहीं मिला और अन्तः एक भारत वर्तमान मे खंड खंड हो गया। वैसे ही आजादी के बाद भी जो ‘गोविंद’ ‘जॉन’ के स्थान पर सत्ता की गद्दी पर बैठा, यूरोपीय प्रतिमानों को ही सार्वभौम मान लिया और परिणाम फिर से वही मिला। इसकी अपने प्रकृति (default consciousness) के विरोध में थोपे गए यूरोपीय प्रादर्श हमेश संघर्षरत रहे और भारत और इससे खंडित हुए भूभाग भी आज तक इस दिशा में जूझ रहे है।
अब जब यह माना जा चुका है की हर समाज की अपनी विशिष्टताएं होती है जो उनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों के अनुरूप होती है तो भारत के बारे में भी बने और प्रचारित किए गए यूरोपीय दुराग्रह को छोड़कर आगे की राह बनाई जाय। वर्तमान भारत के साथ साथ सम्पूर्ण दक्षिण एशिया सहित पूर्वी एशिया के गणराज्यों को एक सांस्कृतिक इकाई मानकर सामूहिक प्रयास किए जाएं तभी वर्तमान चुनौतियों से निपटा जा सकेगा और इन सभी समूहों/समाजों मे शांति स्थापित/सुनिश्चित की जा सकेगी। जातीय/मजहबी संकीर्णता पर आधारित उन्मादी आचरण एक आधुनिक विचारधारा है जिसे मध्यकालीन इस्लामिक आक्रान्ताओं ने शुरुआत की लेकिन औपनिवेशिक सत्ता ने इसका प्रयोग अन्य क्षेत्रों में भी किया। फिर आजादी के मार्क्सवादी दुराग्रहों ने एक राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में इसको वैधता प्रदान की गई।
सनातन की परंपरा मे हिंसा सिर्फ मार काट ही नहीं होती बल्कि इसके कई रूप होते है। यह सबसे पहले विचारों मे जन्म लेता है और फिर अन्य क्रियाकलापों में दिखलाई पड़ता है। अब्राहमिक चिंतन प्रणाली का ‘एक’ का विचार की आधुनिक हिंसा की जननी है। ‘एक’ का विचार ऐसा विचार है जिसके अनुसार उस एक से अलग किसी अन्य का अस्तित्व हो ही नहीं सकता है। और यही विचार अपने आप मे हिंसा को जन्म देता है। पश्चिमी समाज के सारे प्रतिस्था चाहे वास परिवार हो, चर्च हो या राष्ट्र राज्य हो अब्राहमिक चिंतन प्रक्रिया के अनुरूप चलते है जिसके कारण यूरोपीय शैली के किसी भी प्रतिस्थान में हिंसा या ही जाती है। वर्तमान में पश्चिमी समाजों मे प्रचलित व्यवस्था जो अहिंसक होने का दावा करती हो या तो वैदिक विचारों के प्रचार प्रसार के कारण आई है या वह उनका सिर्फ स्क्रीन सैवर है जो तात्कालिक है। सनातन परंपरा समय के साथ समृद्ध होती गई है जिसके कारण इसका अध्ययन वैश्विक स्थिरता के लिए बहुत आवश्यक है। इसके कई आयाम है जो जीवन के हर क्षेत्र मे व्याप्त है। सुविधा के लिए उपयोगिता को दो भागों में बांटकर अध्ययन किया जा सकता है।
व्यक्तिगत
स्तर पर
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सामूहिक स्तर
पर
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लौकिक और अलौकिक दोनों का संतुलन
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राष्ट्र की स्पष्ट भौगोलिक विस्तार
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जन्म से मृत्यु तक के अलग अलग संस्कार
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राज्य सहित ग्राम स्तर तक शासन/प्रशासन की संरचना
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वर्ण और जाति आधारित आर्थिक उत्पादन पर आधारित श्रम विभाजन के साथ चार
पुरुषार्थ
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करारोपण की अवधारणा
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संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण के निमित्त दान की प्रतिष्ठा
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सैन्य प्रचालन के आदर्श और सीमाएं
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सामाजिक स्तर पर मेल जोल के निमित्त विभिन्न उत्सव एवं त्योहार
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राज्य व्यवस्था के विभिन्न सिद्धांत
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भौगोलिक निष्ठा को सुनिश्चित करने लिए तीर्थों की पवित्रता की स्थापना
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प्रजा के निजी स्तर पर के दिन चर्या से राज्य के हस्तक्षेप से उन्मुक्ति
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