कहानी भारत की : पुरातात्विक विरासत

इसकी शुरुआत निश्चित रूप से 1920 मे नहीं हुई थी जब हड़प्पा नामक जगह से पहले पहल खुदाई की गई और एक परिपाटी के अनुसार एक सभ्यता का नाम ‘हड़प्पा सभ्यता’ दे दिया गया। फिर जब इससे जुड़े स्थलों का भौगोलिक रूप से विस्तार हुआ तो उसे ‘सिंधु घाटी की सभ्यता’ नाम दिया गया। फिर जब एक सभ्यता ढूंढ ली गई तो उसके पतन के कारणों को भी ढूँढना था, औपनिवेशिक शासन के निर्देशन में एक नैरेटिव (Narrative) तैयार किया गया और कहा गया की “आर्य आक्रमणों’ के कारण इस सभ्यता का विनाश हुआ है और इस तरह है उतार बनाम दक्षिण का एक फॉल्टलाइन (Faultline) तैयार किया गए जिसके अन्य पक्ष यह रहे है दक्षिण भारत ही भारत के मूल निवासी है और दक्षिण भारतीय ही वास्तव में भारतीय सभ्यता के विरासत के अधिकारी है और उत्तर भारत आक्रमणकारी आर्यों की संतान है। हम इस सनातन की अपौरुषेय पक्ष की

यात्रा हम सम्पूर्ण भारत नहर में पाए गए पुरातात्विक स्रोतों से प्रारंभ करते है जीने पूरा-इतिहास (pre history) कहा जाता है क्योंकि इतिहास के इस चरण में कोई लिखित साक्ष्य उपलब्ध नहीं हो सके है जो पठनीय हो। लेखन के इस परंपरा के अनुसार जिस चरण में हमारे पास पठनीय स्रोतों का मिलना प्रारंभ हो जाता है ‘इतिहास’ कहलाता है। जबकि एक अन्य श्रेणी भी है जहां लिखित स्रोत भी है, लिपियाँ भी है लेकिन पढ़ा नहीं जा सका है. पूरा-इतिहास (prehistory) और इतिहास (history) के बीच की अवस्था को आद्य-इतिहास (Protohistory) का नाम दे दिया जाता है।

पूरा-इतिहास और कालक्रम

जीवाश्मों और चट्टानों की परमाण्विक संरचना की सूक्ष्मता की जाँच करके, भू-वैज्ञानिक पृथ्वी के इतिहास की घटनाओं की तारीखें कुछ विश्वास के साथ निश्चित कर सकता है। अनुमान है कि पृथ्वी की आयु लगभग 4,600 मिलियन वर्ष (यानी 460 करोड़ वर्ष) है जो सामान्य मानवीय कल्पनाओं के आधार पर अधिकांशतः लोगों के लिए बहुत ही अपर्याप्त एवं अनुपयुक्त है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर जीवन-तत्त्व की उत्पत्ति अंतिम अर्थात् 60 करोड़ वर्षों में हुई है जिसे जीवाश्मों का अध्ययन (Palaeontology) करके निकाला गया है। जीवाश्म कई प्रकार के होते है जो इस प्रकार है

अपरिवर्तित जीवाश्म (Unaltered Fossils): ये जीवधारियों के शरीर को बिना किसी परिवर्तन के संरक्षित करते हैं, जैसे बर्फ या अम्बर में दबे जीव।

प्रस्तरीकृत जीवाश्म (Petrified Fossils): इनमें जीवधारियों के कठोर भागों का खनिज पदार्थों द्वारा स्थानांतरण होता है, जिससे वे पत्थर जैसे दिखाई देते हैं। यह प्रक्रिया मृत्यु के बाद होती है, जब कोमल भाग सड़ जाते हैं और कठोर भाग खनिजों से भर जाते हैं

साँचा जीवाश्म (Mould Fossils): इनमें केवल जीवधारी की आकृति का साँचा मिलता है, जिसमें खनिज से बना बाह्य रचना भी हो सकता है

ठप्पा जीवाश्म (Print Fossils): ये चट्टानों पर जीवधारी की संरचना की छाप होती हैं, जैसे पत्तियों या पक्षियों के पंखों की छाप

कोप्रोलाइट (Coprolite): ये विलुप्त प्राणियों के मल के जीवाश्म होते हैं, जो उनके पोषण व्यवहार का ज्ञान देते हैं

भौमिकीय काल और जीवाश्म

जीवाश्मों का अध्ययन विभिन्न भौमिकीय कालों में किया जाता है, जिन्हें मुख्यतः पांच महाकल्पों में विभाजित किया गया है:
आर्कियोजोइक महाकल्प: सबसे प्राचीन, जिसमें कोई ज्ञात जीव नहीं थे।
प्राग्जीव महाकल्प: इसमें साधारण प्रोटोज़ोआ जैसे जीव पाए जाते हैं।
पुराजीवी महाकल्प: इसमें जटिल जीवन रूप विकसित हुए।
मध्यजीवी महाकल्प: डायनासोर और अन्य प्रमुख जीव इसी काल में पाए जाते हैं।
नूतनजीव महाकल्प: वर्तमान समय से संबंधित, जिसमें आधुनिक जीवन रूप विकसित हुए

पुराजीवी महाकल्प (Paleozoic Era) विभिन्न कालों में जीवों के विकास और विविधता को दर्शाते हैं। इस महाकल्प को मुख्यतः छह प्रमुख कालों में विभाजित किया गया है: कैंब्रियन, ऑर्डोविशियन, सिल्यूरियन, डिवोनी, कार्बोनिफेरस, और परमियन। प्रत्येक काल में विशेष प्रकार के जीवाश्म मिले हैं:

1. कैंब्रियन काल (Cambrian)
मोलस्का: गोनिएटाइट्स (Goniatites) और ऐमोनाइट्स (Ammonites) जैसे जीव प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
ब्रैकियोपोडा: प्रोडक्टिड्स और स्पीरीफिरिड्स की प्रजातियाँ अत्यधिक विकसित थीं।

2. ऑर्डोविशियन काल (Ordovician)
एकाइनोडर्माटा: ब्लास्टॉइड्स और आदिम एकाइनॉइड्स इस काल में प्रमुख थे।

3. सिल्यूरियन काल (Silurian)
पौधे: इस काल में पहले स्थलीय पौधों का विकास हुआ, जिसमें फर्न और अन्य प्रारंभिक पौधों के जीवाश्म शामिल हैं।

4. डिवोनी काल (Devonian)
मत्स्य वर्ग: इसे 'मत्स्य युग' भी कहा जाता है, क्योंकि इस काल में मछलियों का विशेष विकास हुआ। फेफड़ेवाली मछलियाँ भी इसी समय पाई गईं।
पौधे: नए प्रकार के पौधों का विकास हुआ, जिनमें रोएँदार पौधे शामिल थे।

5. कार्बोनिफेरस काल (Carboniferous)
वनस्पति: इस काल में विशाल पेड़ जैसे शंकुवृक्ष और साइकैड्स का विकास हुआ। यह काल कोयले के विशाल भंडार के लिए जाना जाता है।
कशेरुकी जीव: इस समय सरीसृपों का अति बाहुल्य था।

6. परमियन काल (Permian)
कशेरुकी जीव: इस काल में सरीसृपों और पहले स्तनधारियों के जीवाश्म पाए गए।

मध्ययजीवी महाकल्प (Mesozoic Era)

यह महाकल्प पृथ्वी के भूवैज्ञानिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण युग है। यह महाकल्प लगभग 252 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ और 66 मिलियन वर्ष पहले समाप्त हुआ। इसे "सरीसृपों का महाकल्प" भी कहा जाता है, क्योंकि इस दौरान डायनासोरों और अन्य सरीसृपों का विकास हुआ। प्रमुख विशेषताएँ

काल विभाजन: मध्ययजीवी महाकल्प को तीन प्रमुख कालों में विभाजित किया गया है:
ट्राइसिक काल (Triassic): लगभग 252 से 201 मिलियन वर्ष पूर्व।
जुरासिक काल (Jurassic): लगभग 201 से 145 मिलियन वर्ष पूर्व।
क्रेटेशियस काल (Cretaceous): लगभग 145 से 66 मिलियन वर्ष पूर्व

जीव-जंतु: इस महाकल्प में डायनासोरों की उत्पत्ति हुई, जो कि इस युग के सबसे प्रमुख जीव थे। इसके अलावा, इस युग में पहले पक्षियों और फूलों वाले पौधों का भी विकास हुआ। मध्ययजीवी महाकल्प में कई महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक घटनाएँ हुईं, जैसे कि महाद्वीपों का विस्थापन और समुद्र स्तर में परिवर्तन। मध्ययजीवी महाकल्प न केवल जीवाश्म विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पृथ्वी के भूगर्भीय विकास और पारिस्थितिकी तंत्र के परिवर्तन को समझने में भी मदद करता है। यह युग जीवों की विविधता और विकास की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण चरण था, जो बाद के नवजीवी महाकल्प (Cenozoic Era) की नींव रखता है।

नूतनजीवी महाकल्प (Cenozoic Era)

यह महाकल्प लगभग 66 मिलियन वर्ष पहले शुरू हुआ और आज तक चल रहा है। नूतनजीवी महाकल्प को "नवजीवों का युग" भी कहा जाता है, जिसमें स्तनधारियों और पक्षियों का विकास हुआ और पृथ्वी पर जीवों की विविधता में वृद्धि हुई। नूतनजीवी महाकल्प (Cenozoic Era) के दौरान मानव का विकास एक महत्वपूर्ण लेकिन जटिल प्रक्रिया थी जो विभिन्न चरणों में और पृथ्वी के अलग-अलग भागों में स्वतंत्रता पूर्वक या उनके प्रवासन (migration) के कारण पूरा हुआ। इस महाकल्प को तीन मुख्य अवधियों में विभाजित किया गया है: पेलियोजीन, नियोजीन, और चतुर्धातुक (Quaternary)।

पेलियोजीन युग (66 से 23 मिलियन वर्ष पूर्व): आधुनिक स्तनधारियों का उदय: इस युग में छोटे आकार के स्तनधारी जीवों का विकास हुआ। प्रारंभिक मानव पूर्वज, जैसे कि आस्ट्रेलियनोपिथेकस, इसी समय विकसित हुए।

नियोजीन युग (23 से 2.58 मिलियन वर्ष पूर्व): इस अवधि में वानर और ऊदबिलाव जैसे प्रजातियों का विकास हुआ। यह युग घास के विस्तार और जंगलों के निर्माण का भी गवाह रहा, जिससे विभिन्न प्रजातियों को नया आवास मिला।

चतुर्धातुक युग (2.58 मिलियन वर्ष पूर्व से वर्तमान): इस युग को दो प्रमुख चरणों में बांटा गया है: प्लेइस्टोसिन और होलोसिन। प्लेइस्टोसिन में हिमयुग का अनुभव हुआ, और इस दौरान कई प्रमुख जीवों का विकास हुआ, जैसे कि मैमथ और होमो सेपियन्स (आधुनिक मानव) भी इसी समय विकसित हुए। होलोसिन (11,700 वर्ष पूर्व से वर्तमान) में मानव सभ्यता ने कृषि और स्थायी बस्तियों की स्थापना की, जिससे सामाजिक संरचनाओं का विकास हुआ।

नूतनजीवी महाकल्प (Cenozoic Era) सांस्कृतिक विकास के दृष्टिकोण से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण थे। भाषा ने मानवों को विचारों, भावनाओं और ज्ञान के आदान-प्रदान में सक्षम बनाया। यह सामाजिक बंधनों को मजबूत करने और सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। धर्म ने नैतिक मूल्यों, सामाजिक नियमों और सामंजस्य को स्थापित किया। यह मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं में दिशा देने वाला एक महत्वपूर्ण कारक रहा। परंपराएँ और रिवाज पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक ज्ञान का हस्तांतरण करते हैं। ये सामूहिक पहचान को मजबूत करते हैं और सामाजिक संरचना को बनाए रखते हैं। इसी तरह कला और लेखन ने मानव अनुभवों और विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम प्रदान किया। यह सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने और भावी पीढ़ियों को प्रेरित करने में सहायक रहा।

इन सभी कालों में जीवाश्मों का अध्ययन यह दर्शाता है कि पृथ्वी पर जीवन की विविधता और जटिलता समय के साथ बढ़ी है। पुराजीवी महाकल्प के जीवाश्म न केवल प्राचीन जीवन के विकास को समझने में मदद करते हैं, बल्कि भूगर्भीय इतिहास की भी जानकारी प्रदान करते हैं

प्रारम्भिक मानव

जहां तक प्रारम्भिक मानव का प्रश्न है सबसे प्राचीन मानवीय जीवाश्म लगभग 42 लाख वर्ष पुराने हैं। ये कद में छोटे थे और उनका मस्तिष्क भी छोटा था। मनुष्यों का विकास इन 42 लाख वर्षों में हुआ और वह अपने वर्तमान रूप में लगभग 50,000 वर्ष पहले पहुँचा था। विभिन्न अवधियों और मानव के विकास के विभिन्न चरणों के जीवाश्म संसार के अनेक भागों; जैसे अफ्रीका, चीन, जावा, सुमात्रा और दक्षिणी यूरोप में पाए गए हैं। दुर्भाग्य से भारत में नर्मदा घाटी में हथनौरा (मध्य प्रदेश का सीहोर जिला) में मिले एकमेव मानव-वंशी जीवाश्म (लगभग 70 हजार वर्ष पुराना) को छोड़कर कोई अन्य मानवीय जीवाश्म नहीं मिले हैं। जिसका कारण यहाँ की जलवायु की स्थिति है हो सकती है। नर्मदा नदी की घाटी में मानव जीवाश्म का मिलना इस अर्थ में अति महत्वपूर्ण है नर्मदा नदी को पवित्र माना जाता है और इसके किनारे बसे प्राचीन मानव सभ्यताओं के अवशेष भारतीय संस्कृति और धार्मिकता के गहरे संबंध को दर्शाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस जीवाश्म की कपाल-क्षमता होमो इरेक्टस की क्षमता के बराबर है। हालांकि कुछ विद्वानों का विचार है कि इसका संबंध होमो इरेक्टस के अंतिम चरण अथवा आद्यप्राज्ञ मानव (होमो सेपियन) से है। नर्मदा घाटी से प्राप्त जीवाश्मों के साथ अन्य प्राचीन जानवरों के जीवाश्म जैसे हाथी और जंगली भैंस भी मिले हैं, जो उस समय की पारिस्थितिकी और मानव जीवन के सांस्कृतिक पक्षों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।


नर्मदा मानव

यह खोज 5 दिसंबर 1982 को हुई थी, जब भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के वैज्ञानिक डॉ. अरुण सोनकिया ने मध्य प्रदेश के हथनोरा गांव में नर्मदा नदी के किनारे मानव खोपड़ी के अवशेष पाए। डॉ. अरुण सोनकिया भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण से जुड़े थे। खोज के दौरान, डॉ. सोनकिया ने एक मानव खोपड़ी का टुकड़ा देखा, जो प्राचीनतम मानव का था। इसके बाद, क्षेत्र में अन्य मानव अवशेष जैसे दाएं कंधे की हड्डी भी मिली। जीवाश्मों की उम्र का आकलन इलेक्ट्रॉन स्पिन रेज़ोनेंस (ESR) डेटिंग पद्धति से किया गया। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार, ये अवशेष 70,000 से 350,000 वर्ष पुराने हो सकते हैं।


पुरापाषाण काल के प्रारंभिक औजार

मनुष्यों द्वारा औजारों के इस्तेमाल की शुरुआत एक अद्वितीय घटना है और यह कहा जा सकता है कि इससे मनुष्य के विभिन्न अध्यबसायों में उसकी सहायता के लिए औजारों और यंत्रों के इस्तेमाल के लिए विज्ञान की नींव स्थापित हुई। पुरापाषाण कालीन अवशेषों के अध्ययन से यह भी समझने में मदद मिलती है कि प्राचीन मानव ने अपने पर्यावरण के साथ कैसे अनुकूलन किया, जैसे कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग। अब यह भली-भाँति प्रमाणित हो चुका है कि औजारों का नियमित प्रयोग अफ्रीका में 26 लाख वर्ष पहले शुरू हुआ और ये बहुत-से प्रारंभिक और परवर्ती मानवीय जीवाश्मों के साथ पाए गए हैं। इंडोनेशिया के मामले में, बहुत-से मानवीय अवशेषों का समय हाल में 16 से 18 लाख वर्ष पुराना निश्चित किया गया है। चीन में पत्थरों के प्रारंभिक औजार 17 से 19 लाख वर्ष पुराने मानवीय जीवाश्मों के साथ पाए गए हैं। दुर्भाग्यवश भारत में प्रस्तर युग के औजारों के साथ कोई मानवीय जीवाश्म नहीं मिले हैं, किंतु हमें भू-वैज्ञानिक काल-निर्धारण से औजारों की पुरातनता के बारे में कुछ जानकारी अवश्य प्राप्त होती है। शिवालिक पहाड़ियों के जिन विभिन्न स्तरों में पत्थरों के औजार पाए गए हैं, वे 12 लाख से 20 लाख वर्ष तक पुराने हैं। पत्थरों के प्रारंभिक औजारों की एक अन्य वैज्ञानिक तारीख महाराष्ट्र के पुणे जिले में बोरी नाम के पुरातत्त्वीय स्थल से प्राप्त हुई है, जो 13.8 लाख वर्ष पुरानी है। जब हम भारत में प्रारंभिक मानवीय आवास अथवा उपस्थिति के साक्ष्य का आकलन करते हैं तो हमें पता चलता है कि इसका काल अफ्रीका क्षेत्र के बाद का है, किंतु एशिया के शेष देशों का समकालीन है।

पुरापाषाणयुगीन संस्कृतियाँ

भारत में पुरापाषाण युग को, औजार-प्रौद्योगिकी के आधार पर तीन अवस्थाओं में बाँटा जाता है। ये अवस्थाएँ हैं :

(i) पूर्व पुरापाषाणयुग - हस्त कुठार (हैंड ऐक्स) और विदारणी (क्लीवर) उद्योग ।

(ii) मध्य पुरापाषाणयुग- शल्क (फ्लेक) से बने औजार ।

(iii) उत्तर पुरापाषाणयुग - शल्कों और फलकों (ब्लेड) पर बने औजार।

पूर्व पुरापाषाणयुगीन संस्कृति

प्रारंभिक पुरापाषाण काल (Early Palaeolithic) के दौरान मानव ने विभिन्न प्रकार के प्रमुख औजारों का निर्माण किया। यह काल लगभग 500,000 से 50,000 ईसा पूर्व तक फैला हुआ है। इस अवधि में बनाए गए औजार मुख्य रूप से कच्चे और मोटे पत्थरों से बने थे, जिनका उपयोग शिकार और खाद्य संग्रह में किया जाता था। हस्त कुठार (Hand Axe) एक बहुउपयोगी औजार था, जिसका उपयोग काटने, चीरने और मांस को तैयार करने के लिए किया जाता था। गंडासा (Cleaver) एक धारदार औजार होता था, जिसका एक किनारा तेज होता था और इसका उपयोग मांस काटने में किया जाता था। खंडक (Chopper) से चीरने का काम किया जाता था। यह पत्थर के मोटे टुकड़ों को आकार देकर बनाया जाता था। स्क्रेपर (Scraper) का उपयोग खुरचने के लिए किया जाता था, जैसे कि मांस की त्वचा हटाने या अन्य सतहों को साफ करने में। विदारणी (Bifacial Tool) यह एक ऐसा औजार होता था जिसे दोनों तरफ से तराशा जाता था, जिससे इसकी धार अधिक प्रभावी हो जाती थी।

निर्माण प्रक्रिया

इन औजारों का निर्माण मुख्यतः क्वार्टजाइट जैसे कठोर पत्थरों से किया जाता था। प्रारंभिक मानव संभवतः चट्टानों को आग से गर्म करके और फिर उन पर पानी डालकर उन्हें तोड़ता था, जिससे वे अधिक आसानी से आकार में आते थे। पूर्व पुरापाषाणयुगीन स्थल कई किस्मों के हैं : आवास स्थल (शैलाश्रयों के नीचे अथवा खुले में); कच्ची सामग्रियों के स्रोतों से संबंधित कारखाना स्थल, ऐसे स्थल, जो इन दोनों कार्यों का सम्मिश्रण हैं। और बाद में इनमें से किसी एक श्रेणी के स्थल, खुले स्थान पर। पत्थरों के इन औजारों को बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कच्ची सामग्री में विभिन्न किस्मों के पत्थर; जैसे - बिल्लौर, चर्ट और कई बार स्फटिक और बेसाल्ट आदि शामिल हैं, जैसा कि नदियों और चबूतरों आदि में देखा गया है, ये औजार रेत, गाद आदि से ढके हुए पाए गए हैं। ये पूर्व पुरापाषाणयुगीन औजार सिंधु, सरस्वती, ब्रह्मपुत्र और गंगा के मैदानों को छोड़ कर, जहाँ पत्थरों के रूप में कच्ची सामग्री उपलब्ध नहीं थी, वास्तव में भारत भर में काफी बड़े क्षेत्र में पाए गए हैं।

पूर्व पुरापाषाणयुगीन संस्कृतियों के कुछ महत्त्वपूर्ण स्थल ये हैं कश्मीर में पहलगाम, इलाहाबाद जिले (उत्तर प्रदेश) में बेलन घाटी, होशंगाबाद जिले (मध्य प्रदेश) में भीमबेटका और आदमगढ़, नागौर जिले (राजस्थान) में 16 आर और सिंगी तालाब, अहमदनगर जिले (महाराष्ट्र) में नेवासा, गुलबर्गा जिले (कर्नाटक) में हुंसगी और अट्टिरामपक्कम (तमिलनाडु) का प्रसिद्ध स्थल। 1969 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) की टीम ने एच डी संकालिया के नेतृत्व में पहलगाम में खुदाई की, जिसमें द्वितीय ग्लेशियर और द्वितीय अंतर-ग्लेशियर काल से संबंधित बड़े पत्थर के टुकड़े और कच्चे हाथ के औजार पाए गए। यहाँ विभिन्न प्रकार के उपकरण मिले हैं, जैसे कि बुरिन, बोरर और हाथ के औजार, जो प्राचीन मानव द्वारा शिकार और दैनिक कार्यों के लिए उपयोग किए जाते थे। इसके अलावा, निओलिथिक काल के अवशेष भी पाए गए हैं, जिसमें मिट्टी के बर्तन और गड्ढे वाले निवास स्थान शामिल हैं। ये अवशेष कृषि आधारित जीवन शैली को दर्शाते हैं। बेलन घाटी बेलन नदी के किनारे स्थित है, जो तमसा नदी की उपनदी है। बेलन घाटी में किए गए उत्खननों में उच्च पाषाण युग के औजार मिले हैं, जिनमें पत्थर के औजार जैसे हस्त कुठार, विदारणी और गंडासा शामिल हैं। ये उपकरण मानव के शिकार और भोजन संग्रहण की गतिविधियों को दर्शाते हैं। यहाँ से प्राप्त मातृदेवी की मूर्ति प्रागैतिहासिक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है, जो मानव समाज में धार्मिक और सांस्कृतिक विश्वासों को दर्शाती है।

भीमबेटका (रायसेन जिले) जिसे 1957-58 में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा खोजा गया था, मानव विकास के प्रारंभिक चरणों का अध्ययन करने के लिए एक अद्भुत स्रोत हैं। यहाँ की चित्रकारी प्राचीन मानव की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को उजागर करती है। 12 हजार साल पुराना और लगभग 750 शैल चित्रों से सजी ये गुफ़ाएं पुरापाषाण काल से मध्यपाषाण काल तक के हैं। ये चित्र मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं, जैसे नृत्य, संगीत, शिकार और जानवरों के चित्रण को दर्शाते हैं। भीमबेटका को 1999 में राष्ट्रीय महत्व का स्थल और 2003 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। भीमबेटका से कुछ ही दूरी पर स्थित आदमगढ़ की गुफाओं में चित्रित शैल भी प्राचीन मानव जीवन को दर्शाते हैं। ये चित्र भी नृत्य, शिकार और अन्य सामाजिक गतिविधियों को प्रदर्शित करते हैं।

भीमबेटका और आदमगढ़ दोनों मिलकर हमारे पूर्वजों की जीवनशैली, संस्कृति, सौन्दर्य अभिरुचियों सहित उनके सामाजिक संरचना के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। इनकी खोजें वैश्विक स्तर पर भी मानव विकास के अध्ययन में योगदान देती हैं। इन चित्रों से यह भी स्पष्ट होता है कि प्राचीन मानव ने कला के माध्यम से अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने की क्षमता विकसित की थी। रंगों का उपयोग (जैसे लाल, सफेद, पीला) और चित्रण की तकनीक उस समय की कला कौशल को दर्शाती हैं।

नागौर जिले, राजस्थान में 16 आर और सिंगी तालाब महत्वपूर्ण जलाशय हैं, जिनके आसपास की खुदाइयों में प्रागैतिहासिक औजार और अन्य अवशेष मिले हैं। राजस्थान के नागौर जिले में 16 आर संस्कृति एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज है। 16 आर क्षेत्र में हुई खुदाई में विभिन्न प्रकार के प्रागैतिहासिक औजार जैसे कि कुल्हाड़ियाँ, काटने के उपकरण, और अन्य पत्थर के औजार पाए गए हैं। इनकी संख्या लगभग 1300 आर्टिफैक्ट्स तक पहुँचती है, जिनमें से कई औजार हाथ से बने हैं। ये औजार लगभग 7 लाख 97 हजार वर्ष पुराने माने जाते हैं, जो इस क्षेत्र में मानव निवास की प्राचीनता को दर्शाते हैं। 16 आर संस्कृति से यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में होमो इरेक्टस और होमो सेपियन्स जैसे आदिम मानवों का निवास था। यह संस्कृति मानव सभ्यता के विकास के प्रारंभिक चरणों का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है। उसी तरह से सिंगी तालाब के आसपास से प्राप्त औजार जैसे कि चाकू, कुल्हाड़ी और अन्य पत्थर के उपकरण एशूलियन काल के माने गए है जो लगभग 7 लाख वर्ष पुराने हैं। नेवासा महाराष्ट्र प्रवरा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहाँ पुरातात्त्विक उत्खनन में मध्य पाषाण युग के औजार मिले हैं। चेन्नई से लगभग 60 किलोमीटर दूर, अट्टिरामपक्कम, एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल है। यह स्थल कोर्तलैयार नदी के पास स्थित है और यहाँ के उत्खनन से प्राप्त अवशेषों ने मानव इतिहास और विकास की समझ में भी एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अट्टिरामपक्कम में भारत के सबसे पुराने पत्थर के औजार पाए गए हैं, जो मद्रासी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये औजार 1863 में रॉबर्ट ब्रूस फूट और उनके सहयोगी विलियम किंग के नेतृत्व में खोजे गए थे। यहाँ पाए गए औजारों की आयु का निर्धारण कॉस्मिक रे एक्सपोजर डेटिंग (26Al/10Be) द्वारा किया गया है। यह भारत में किसी पुरातात्त्विक स्थल की पहली बार की गई डेटिंग थी। शोधकर्ताओं ने लगभग 7,200 औजारों पर ल्यूमिनेसेंस डेटिंग विधि का उपयोग किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि ये औजार लगभग 200,000 वर्षों से अधिक पुराने हैं। अट्टिरामपक्कम में एक विस्तृत स्तरीकृत क्रम स्थापित किया गया है, जो मध्य पाषाण काल और आचुलियन काल के बीच की बस्तियों को दर्शाता है। पत्थर के औजारों के निर्माण की प्रक्रियाओं और उनके उपयोग के तरीकों ने मानवों के व्यवहार में बदलावों को समझने में मदद मिली है। छोटा नागपुर पठार, जो झारखंड के अधिकांश हिस्से और कुछ भागों में उड़ीसा, बिहार और छत्तीसगढ़ में फैला हुआ है, पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ की भूगर्भीय संरचना और प्राचीन मानव बस्तियों के अवशेष इस क्षेत्र के इतिहास को उजागर करते हैं। छोटा नागपुर पठार में विभिन्न पुरातात्त्विक उत्खनन से प्राचीन मानव बस्तियों के अवशेष मिले हैं, जो इस क्षेत्र में मानव सभ्यता के विकास की कहानी बताते हैं। यहाँ के कई स्थलों पर पत्थर के औजार और अन्य सांस्कृतिक अवशेष पाए गए हैं, जो मध्य पाषाण काल से संबंधित हैं। 1870 में राँची जिले में प्रागैतिहासिक औजारों की पहली खोज की गई थी। इसके बाद 1915 में अधिक औजारों की खोज हुई, जिसमें पत्थर के तीर, पॉलिश किए गए औजार और अन्य सामग्री शामिल थीं। यहाँ तांबे के औजार भी पाए गए हैं, जो चालीस से अधिक वर्षों तक चले ताम्र युग की संस्कृति का प्रमाण देते हैं। छोटा नागपुर पठार की भूगर्भीय संरचना में गोंडवाना महाद्वीप की चट्टानें शामिल हैं, जो इसे भूवैज्ञानिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती हैं। यह क्षेत्र लगभग 12 करोड़ वर्ष पहले अलग हुआ था, जिससे इसकी पुरानी उत्पत्ति का पता चलता है।

ऊपर जिन प्रारंभिक तिथियों का उल्लेख किया गया है, उनके अलावा पोतवार पठार, पश्चिमी राजस्थान, सौराष्ट्र, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के पुरापाषाणयुगीन स्थलों से उपलब्ध तिथियों से यह संकेत. मिलता है कि 6,00,000 और 60,000 ई.पू. के बीच के काल में पूर्व पुरापाषाणयुगीन संस्कृति काफी व्यापक रूप से फैली हुई थी।

मध्य पुरापाषाणयुगीन संस्कृति

मध्य पुरापाषाणयुगीन औजार प्रौद्योगिकी की बुनियादी विशेषता थी - शल्क-निर्मित औजार उद्योग। ये औजार शल्कों (पपड़ियों) पर बनाए गए थे, जो कंकरों अथवा बटिकाश्मों से प्राप्त की गई थीं। इन किस्मों के औजारों में छोटे और मध्यम आकार के हस्त-कुठार, विदारणियाँ और विभिन्न किस्मों की खुरचनियाँ, वेधनियों और छुरिकाएँ (चाकू) शामिल हैं। उपलब्ध कच्ची सामग्री, रूप और आकार दोनों दृष्टियों से इनमें क्षेत्रीय भेद भी पाए गए हैं। इन औजारों में वेधनियाँ और आरियों शामिल हैं, जो मोटी पपड़ियों को गहरा तराश कर बनाई गई हैं। खुरचनियाँ कई किस्मों की हैं, जैसे सीधी, अवतल और उत्तल पार्थों वाली। तक्षणियाँ भी इस उद्योग से संबद्ध पाई गई हैं, लेकिन वे औजार इस काल में इतने व्यापक रूप से फैले हुए नहीं थे, जितने कि इसके बाद के काल में।

मध्य पुरापाषाणयुगीन औजार अधिकांशतः मध्य भारत, दक्कन, राजस्थान, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और उड़ीसा में पाए गए हैं। मध्य पुरापाषाणयुगीन उद्योग जहाँ कहीं पूर्व पुरापाषाणयुगीन उद्योगों से विकसित हुए हैं, वहाँ उस स्थल पर निरंतर आवास कायम रहा था। मध्य पुरापाषाण युग के कुछ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थल ये हैं : भीमबेटका, नेवासा, पुष्कर, ऊपरी सिंध की रोहिरी पहाड़ियाँ और नर्मदा के किनारे स्थित समनापुर। वैज्ञानिक काल-निर्धारण के आधार पर, मध्य पुरापाषाण युग का काल 1,50,000 ई.पू. और 40,000 ई.पू. के बीच अथवा उसके कुछ समय बाद ठहराया जा संकता है।

उत्तर पुरापाषाणयुगीन संस्कृति

मध्य पुरापाषाणयुगीन संस्कृति धीरे-धीरे उत्तर पुरापाषाणयुगीन संस्कृति के रूप में विकसित हुई। उत्तर पुरापाषण युग का बुनियादी प्रौद्योगिकी नवाचार है, ध्यानपूर्वक तैयार की गई क्रोड से समांतर पक्षीय फलक (parallel sided blade) बनाने का तरीका। इस प्रकार की एक अच्छी क्रोड एक बार बना लिए जाने से, बहुत-से समांतर पक्षीय फलक बिना किसी और तैयारी के अथवा बिल्कुल थोड़ी-सी तैयारी से बनाए जा सकते हैं।

उत्तर पुरापाषाणयुगीन औजार राजस्थान, गंगा और बेलन घाटियों के. कुछ भागों, मध्य और पश्चिमी भारत, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में पाए गए हैं। मुख्य किस्मों के औजार हैं : खुरचनियाँ, बेधनियाँ, आरी, तक्षणियाँ, छेदनियाँ चाकू आदि। ऐसा प्रतीत होता है कि मिले-जुले औजारों की अवधारणा इस सांस्कृतिक अवधि में विकसित होने लगी थी। फलक वाले औजार अपेक्षाकृत लंबे, कई बार 8 सेंटीमीटर तक लंबे पाए गए हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के विभिन्न स्थलों से उपलब्ध वैज्ञानिक तिथियों के आधार पर हम विश्वासपूर्वक यह कह सकते हैं कि उत्तर पुरापाषाण युग की अवधि 45,000 से 10,000 ई.पू. तक थी।

उत्तर पुरापाषाण युग की एक सर्वाधिक उल्लेखनीय खोज थी - रोड़ी मलबे (ढोंका चिनाई) से बना, लगभग 85 सेंटीमीटर व्यास वाला, स्थूल रूप से गोलाकार चबूतरा। रोड़ी मलबे से निर्मित इस चबूतरे के केंद्र में, इलाहाबाद और बर्कले विश्वविद्यालयों के उत्खननकर्ताओं ने प्राकृतिक पत्थर का एक तिकोना टुकड़ा (15 सेंटीमीटर ऊँचा, 6.5 सेंटीमीटर चौड़ा और लगभग 6.5 सेंटीमीटर मोटा) रखा हुआ पाया। उत्खननकर्ताओं के कथनानुसार. "... इसमें कोई संदेह नहीं कि इस अनुपम पत्थर वाला और रोड़ी मलबे से बना चबूतरा और इस स्थल के शेष समूचे भाग में पाए गए चर्ट की कलात्मक वस्तुएँ समकालीन हैं और उत्तर पुरापाषाण युग के अंतिम आखेटक-संग्रहकर्ताओं के किसी समूह द्वारा निर्मित हैं।" चबूतरे के केंद्र में पाए गए प्राकृतिक पत्थर के टुकड़े के संबंध में बहुत अधिक दिलचस्पी उत्पन्न हुई। इस प्रकार के पत्थर निकटवर्ती कैमूर कगार पर पाए गए हैं और वे तिकोने अथवा दीर्घवृत्तीय पटलीकरण (एलिप्सोइडल लैमिनेशन) दर्शाते हैं, जिनका रंग कुछ पीलापन लिए हुए भूरा अथवा कुछ लालपन लिए हुए भूरा है। वे रोड़ी-मलबे मे निर्मित चबूतरों पर रखे हुए हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पूजा नारी अथवा मातृशक्ति के रूप में की जाती है और उन्हें देवी-माँ का एक अथवा दूसरा रूप माना जाता है। उत्तर पुरापाषाण युग के नमूने 9000-8000 ई.पू. काल के हैं, वे आकृक्ति, आकार और स्वरूप में लगभग एक जैसे ही हैं और आजकल गाँवों के देवालयों में रखी मूर्तियों के समान हैं। यह बात बड़ी महत्त्वपूर्ण है।

मध्यपाषाणयुगीन संस्कृति

समय बीतने के साथ-साथ पत्थर के औजारों का आकार उल्लेखनीय रूप से घटना शुरू हो गया, जो मध्यपाषाण युग में अपनी परिणति पर पहुँच गया। भारत में इस काल को मध्यपाषाण युग, सूक्ष्मपापाण युग अथवा परवर्ती प्रस्तर युग कहा जाता है। मूक्ष्मपाषाण युग के औजारों की विशेषता थी : चर्ट, कैलसिडोनी, स्फटिक, जैम्पर, कार्नेलियन, अगेट जैसी बढ़िया सामग्रियों की तैयार क्रोडों से निर्मित समांतरपक्षीय फलक। ये औजार आमतौर पर 1 से 5 सेंटीमीटर लंबे होते हैं और इनमें उत्तर पुरापाषाणयुगीन किस्मों के औजारों के अपेक्षाकृत छोटे रूप शामिल हैं, जैसे- वेधनी, खुरचनी, तक्षणी, आरी आदि, और इसके अलावा विभिन्न आकृक्तियों और आकारों के कुछ नई किस्मों के औजार, जैसे- अर्धचंद्राकार हँसिया (लुनेट), ममलंब, तिकोना बाणाग्र आदि। उनके आकार से स्पष्ट होता है कि उनका उपयोग जुड़े हुए औजारों के रूप में किया जाता था और उन पर लकड़ी और हड्डियों आदि की मूठ लगी होती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि सूक्ष्मपापाणयुगीन उद्योग मूलतः उत्तर पुरापाषाणयुगीन उद्योग से निकला है। यह अनुमान इन दो बातों से प्रमाणित होता है कि पुरातत्त्वीय स्तर विज्ञान (स्ट्रैटिग्राफी) का सातत्य उत्तर पुरापाषाण युग से मध्यपाषाण युग तक है और उत्तरोक्त श्रेणी का भौतिक विकास पूर्वोक्त से हुआ है।

गुजरात, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, केरल और आंध्र प्रदेश, के विभिन्न पुरास्थलों से मध्यपाषाण युग के बारे में जो सी-14 तारीखें उपलब्ध हुई हैं, उनसे पता चलता है कि यह उद्योग लगभग 12000 ई.पू. के आस-पास शुरू हुआ और 2000 ई.पू. तक जीवित रहा। राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश के पुरास्थलों से हमें पता चलता है कि ये समुदाय मूल रूप से आखेटक, खाद्य संग्राहक और मछुआरे थे, लेकिन वे किसी प्रकार की खेती भी करते थे। गंगा के मैदानों के महादहा और दमदमा जैसे कुछ पुरास्थलों से प्राप्त जानकारी से पता चलता है कि मौसम के अनुसार वे इनमें से कुछ स्थलों पर रहते थे। राजस्थान में बागोर के स्थल और गुजरात में लंघनाज स्थल से हमें पता चला है कि इन मध्यपाषाणयुगीन समुदायों का हड़प्पा और अन्य ताम्र पाषाणयुगीन संस्कृतियों के लोगों से संपर्क था और वे उनके साथ विभिन्न वस्तुओं का लेन-देन करते थे। बागोर से ताँबे के तीन वाणाग्र (तीर की नोक) मिले हैं, जो हड़प्पा की सभ्यता की किस्म के हैं। मध्यपाषाणयुगीन संस्कृति के कुछ सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थल, जिनका विस्तृत अध्ययन किया गया है, ये हैं: राजस्थान में बागोर, गुजरात में लंघनाज, उत्तर प्रदेश में सराय नाहर राय, चोपानी मांडो, महदहा, दमदमा तथा मध्य प्रदेश में भीमबेटका और आदमगढ़।

बागोर और आदमगढ़ से हमें छठी सहस्राब्दी ई.पू. के आस-पास मध्यपाषाणयुगीन लोगों द्वारा भेड़ें, बकरियाँ रखे जाने का साक्ष्य मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि उन्होंने संभवतः आंशिक रूप से स्थिर जीवन-पद्धति अपना ली थी। हमें इस बात से आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए कि मध्यपाषाणयुगीन संस्कृति और उन्नत हड़प्पा सभ्यता का अस्तित्व एक ही काल में रहा था। हमें याद रखना चाहिए कि भारत में सांस्कृतिक और प्रौद्योगिकीय विकास के विभिन्न स्तरों वाले विशिष्ट, स्वतःपूर्ण सामाजिक समूहों का अस्तित्व इस शताब्दी तक बना हुआ था। इनमें आखेटक और खाद्य संग्राहक जनजातियाँ, पशुचारक यायावर, अस्थिर कृषक (शिफ्टिंग कल्टीवेटर), पारंपरिक स्थापित कृक्षक, आधुनिक विकसित कृषक और शहरी औ‌द्योगिक समाज के अनेक स्तरों के लोग शामिल हैं. जो सह-अस्तित्वपूर्ण, आर्थिक रूप से स्वतंत्र और इसके साथ-साथ परस्पर-निर्भरतापूर्ण जीवन बिताते रहे हैं। इससे हमें अपनी अत्तीत की घटनाओं के बुनियादी स्वरूप की जानकारी मिलती है। आधुनिक भारत के संदर्भ में हमें पता है कि आज भी हर वर्ष कृषि के कम काम-काज वाले मौसम के लगभग 2-3 महीनों में भूमिहीन श्रमिक, जनजातीय लोग और गरीब लोग, कम से कम आशिक रूप से, खाद्य कंदमूल, पत्ते, बीज और फल इकट्ठा करके, जो देहाती इलाकों में प्राकृतिक रूप से उगते हैं, जीवन निर्वाह करते हैं। मध्यपाषाणयुगीन जीवन पद्धति का भारत में अभी भो हमारे लिए उससे कहीं अधिक महत्त्व है, जितना कि हम मानने के लिए तैयार हैं। इसके अतिरिक्त, हमारे कुछ आधुनिक पंथ और महत्त्वपूर्ण पंथ प्रतीकों की पृष्ठभूमि और कुल-परंपरा मध्यपाषाणयुगीन हो सकती है।

प्रागैतिहासिक शैल कला

भारत के लगभग सभी शैल-आश्रयों में, जिनमें उत्तर पुरापाषाणयुगीन और मध्यपाषाणयुगीन लोग रहते थे और बहुत-से अन्य लोग भी रहते थे, अनेक शैल-चित्र हैं, जिनमें विविध प्रकार के विषयों का, मुख्य रूप से पशुओं का और ऐसे दृश्यों का चित्रांकन किया गया है, जिनमें पशु और मनुष्य दोनों शामिल हैं। इन शैल चित्रों के स्थान बहुत व्यापक क्षेत्रों में फैले हुए हैं। ये पश्चिमोत्तर पाकिस्तान में चारगुल से लेकर पूर्व में उड़ीसा तक, और उत्तर में कुमाऊँ की पहाड़ियों से लेकर दक्षिण में केरल तक पाए जाते हैं। शैल-चित्रों के कुछ महत्त्वपूर्ण स्थल ये हैं : उत्तर प्रदेश में मुरहाना पहाड़, मध्य प्रदेश में भीमबेटका, आदमगढ़, लाखा जुआर और कर्नाटक में कुपागल्लू । उत्तर पुरापाषाणयुगीन और मध्यपाषाणयुगीन काल के आवासीय मलबे में पाए गए हेमाटाइट टुकड़ों से निर्णायक रूप से यह सिद्ध होता है कि ये चित्र इन गुफाओं और आश्रयों में रहने वाले लोगों द्वारा बनाए गए थे। सबसे अधिक चित्रांकन पशुओं का अकेले अथवा बड़े और छोटे समूहों में किया गया है और उन्हें विभिन्न मुद्राओं में दिखाया गया है। इसके अलावा, शिकार के भी कुछ दृश्य हैं, जिनमें आदमगढ़ की शैलाश्रय श्रृंखला के गैंडे के शिकार वाले चित्र से पता चलता है कि बड़े जानवरों का शिकार बहुत-से लोगों द्वारा मिलकर किया जाता था। पशुओं का चित्रांकन मोटी रेखाओं द्वारा किया गया है, और उनके शरीर को कई बार पूर्णतः अथवा अंशतः आड़ी रेखाओं से भरा गया है। इन तीनों तरीकों के उदाहरण उत्तर प्रदेश में मुरहाना पहाड़, मध्य प्रदेश में भीमबेटका, आदमगढ़ की गुफाओं और शैलाश्रयों में खींचे गए पशुओं के चित्रों में देखे जा सकते हैं। पशुओं के अलावा, पक्षियों, मछलियों, आदि के चित्र भी अंकित किए गए हैं।

शैल चित्रों में मानव आकृतियों का चित्रांकन एक आम बात है। ये सादी रूपरेखा के रूप में भी हैं और तिरुरेखित जाली चित्रों के रूप में भी मनुष्यों को विविध प्रकार के कार्य करते हुए जैसे - नृत्य करते, भागते, शिकार करते, खेलते और युद्ध करते हुए दिखाया गया है। चित्र बनाने में गहरे लाल, हरे, सफेद और पीले रंगों का उपयोग किया गया है।

नवपाषाण कल

प्लाइस्टोसीन यानी अत्यंत नूतन युग के अंत में, अब से लगभग 10,000 वर्ष पहले, पश्चिमी तथा दक्षिणी एशिया में जलवायु की स्थिति बहुत कुछ आज-जैसी ही हो गई थी। इससे मनुष्य को पर्यावरण पर नियंत्रण करने की दिशा में प्रगति करने का अवसर मिला और कुछ ऐसी घटनाएँ घटीं जिनके फलस्वरूप अंततः, कोई छः हजार वर्ष पहले उपर्युक्त दोनों क्षेत्रों में प्रथम मानव-समाज के दर्शन हुए हैं। इस प्रकार मानव-समाज की उत्पत्ति के बाद सबसे आधारभूत प्रगति, जिसने मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित किया, यह हुई कि मनुष्य ने अनेक प्रकार के पशुओं और पौधों को पालना-पोपना और उगाना शुरू कर दिया। वर्तमान साक्ष्यों से यह प्रतीत होता है कि पश्चिम एशिया में गेहूँ और जो उगाना 7000 ई.पू. में शुरू हो गया था। भारत में चावल/धान उगाना लगभग 7000 ई.पू. में शुरू हुआ जैसा कि बेलन घाटी में स्थित कोल्डिहवा पुरास्थल से प्राप्त साक्ष्य से पता चलता है। अनेक पुरास्थलों (विशेष रूप से अफगानिस्तान में अक कुप्रुक) से प्राप्त साक्ष्य से पता चलता है कि पालतू बनाई गई भेड़ों, बकरियों और अन्य पशुओं की जंगली नस्लों का उपयोग भी मनुष्य लगभग 16,000 वर्ष पहले किया करता था। उस' क्षेत्र में नवपाषाण संस्कृति की प्रारंभिक अवस्था (10,000 ई.पू. से 7,000 ई.पू. तक) में भेड़-बकरियों की हड्डियों का लगातार बड़ी मात्रा में पाया जाना इस बात का द्योतक माना जाता है कि उस समय तक भेड़-बकरियों को पालतू बनाया जा चुका था।

विभिन्न प्रकार के पशुओं को पालतू बनाए जाने के फलस्वरूप उनके पालन-पोषण के लिए विशेष प्रकार के पशुपालक समुदायों का जन्म हुआ, जो आधुनिक समय में भी अस्तित्व में रहे और अपने पशुओं के साथ यायावर (खानाबदोश) या अर्थ-यायावर जीवन जीते रहे। दूसरी ओर, अनेक किस्म के जंगली पौधों को मनुष्यों द्वारा स्वयं लगाने और उनका सफलतापूर्वक उपयोग करने की प्रक्रिया ने उन्हें एक स्थान पर टिककर रहने और बसने को मजबूर कर दिया, और इसी के साथ आर्थिक और सांस्कृतिक विकास का दौर प्रारंभ हो गया, जिसने आगे चलकर मनुष्य के जीवन में प्रमुखता प्राप्त कर ली। भारत के संदर्भ में नवपाषाणकालीन कृषि पर आधारित क्षेत्रों को मोटे तौर पर चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है: (i) सिंधु प्रणाली और उसका पश्चिमी सीमा क्षेत्र; (ii) गंगा की घाटी; (iii) पश्चिमी भारत तथा उत्तरी दक्कन; और (iv) दक्षिणी दक्कन ।

इन सभी प्रारंभिक नवपाषाणकालीन संस्कृतियों की अर्थव्यवस्था खेती और पशुपालन पर आधारित थी। खेती की अर्थव्यवस्था पर आधारित नवपाषाणकालीन संस्कृति का प्रारंभिक माक्ष्य भारत-पाक क्षेत्र के पश्चिमोत्तर भाग में बुनियादी तौर पर क्वेटा घाटी में, लोरालाई और जीव नदियों की घाटियों में प्राप्त होता है। किले गुलमोहम्मद. गुमला, राना घुंडई, अंजीरा, मुण्डीगाक और मेहरगढ़. जो कच्छी मैदान में स्थित हैं, के पुरातत्त्वीय स्थलों से 7000-5000 ई.पू. के समय का साक्ष्य मिलता है। इनमें से मेहरगढ़ की व्यापक रूप से जाँच की गई है। प्राप्त साक्ष्य से पता चलता है कि यहाँ लगभग 7000 ई.पू. में लोग बंसने शुरू हो गए थे. लेकिन प्रारंभिक काल में वहाँ मिट्टी के वर्तनों का उपयोग शुरू हुआ नहीं दिखाई देता, किंतु ऐसा लगता है कि वहाँ उसके लगभग 1000 वर्ष बाद, 6000 ई.पू. में मिट्टी के बर्तनों, तवों-कड़ाहियों का इस्तेमाल होता था। पहले तो ये मृद्भांड हाथ में ही बनाए जाते थे पर बाद में चाक पर बनाए जाने लगे। कई स्थानों पर की गई खुदाइयों में पूर्व-मृद्भाड काल के कुछ बिखरे हुए वर्गाकार या आयताकार घर मिले हैं, वे गारे की कच्ची ईटों के बने हुए हैं। इन घरों के बीच में उन्हें एक-दूसरे से अलग करने के लिए खाली जगह पर कूड़े के ढेर मिले हैं और उन घरों के बीच में रास्ते भी हैं। यही उस काल के गाँव का नमूनो है। उस समय के घर चार-पाँच कोठों यानी कमरों के होते थे, जिनमें मे शायद एक-दो भंडारघर के काम आते थे।

उस समय के लोग मुख्य रूप से शिकार और इधर-उधर से बटोरे गए भोजन पर निर्भर रहते थे। कुछ हद तक उदरपूर्ति खेती और पशुपालन से भी की जाती थी। उनकी बस्तियों के स्तर की खुदाई में मिले घरेलू अनाज में गेहूँ और जौ शामिल हैं। उन खुदाइयों में मिली पालतू जानवरों की हड्डियों में भड़, बकरी तथा गाय-बैल की हइडियाँ शामिल हैं। छठी महस्राब्दी प्रारंभ होते-होते, पहले हाथ के वने और बाद में (कुम्हार की) चाक पर बने मृद्भांड इस्तेमाल किए जाने लगे। हड्डी के अवशेषों से यह पता चलता है कि ककुदमान किम्म के (कूबड़ वाले) पशु भी पाले जाते थे। शवाधान अवशेषों से प्राप्त मनकों से यह स्पष्ट होता है कि लोग लाजवर्द मणि, कार्नेलियन, छापवाले गोमेद और सफेद कौड़ियों से बने मनकों का प्रयोग करते थे। एक अकेला ताँबे का मनका भी मिला है। सीपियों के कड़ों और लटबनों से ऐसा प्रतीत होता है कि दूरवर्ती स्थलों से व्यापार होता था।

संक्षेप में, मेहरगढ़ खुदाई स्थल से प्राप्त नवपाषाणयुगीन अवशेषों से पता चलता है कि प्रारंभिक खाद्य उत्पादक युग में सिंधु घाटी की अर्थव्यवस्था जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त थी और व्याधार तथा शिल्प का प्रारंभ हो रहा था। अगले 2,500 वर्षों में इन जन-समुदायों ने मृद्भांडों और मिट्टी की मूरतों, पत्थर तथा धातु के आभूषणों, औजारों तथा बर्तनों के उत्पादन के लिए नई प्रौद्योगिकी और वास्तु-शैली विकसित कर ली थी।

सिंधु घाटी के पूर्व में, गंगा की घाटी, असम और पूर्वोत्तर क्षेत्र में वड़ी संख्या में नवपाषाणकालीन स्थल मिले हैं। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थलों में से कुछ हैं : गुफकराल और बुर्जहोम कश्मीर में, महगड़ा, चोपानी मांडो और कोल्डिहवा उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी में और चिरांद बिहार में। कोल्डिहवा से रेडियो कार्बन विधि से प्राप्त तीन तारीखों से इस बात का प्राचीनतम साक्ष्य मिलता है कि लगभग 6500 ई.पू. में धान की खेती की जाती थी थी और यह विश्वभर में चावल/धान की खेती का' प्राचीनतम साक्ष्य है। इस प्रकार, इस बात की पूरी संभावना है कि बेलन घाटी में खेती लगभग 6500 ई.पू. के आसपाप प्रारंभ हो चुकी थी। धान के अलावा महगड़ा में जो की खेती का साक्ष्य भी, मिलता है। कोल्डिहवा और महगड़ा से प्राप्त हड्डियों के अवशेष यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में भेड़-बकरियाँ और मवेशी पाले जाते थे। महगड़ा में एक पशु-बाड़ा भी मिला है। पश्चिमोत्तर में बुर्जहोम के प्रारंभिक नव- पाषाणकालीन वाशिंदे जमीन खोदकर बनाए गए खाईनुमा घरों में रहते थे, न कि जमीन पर बनाए गए घरों में। बिहार में चिरांद में पाई गई बस्ती अपेक्षाकृत बाद की है। असम और उससे आगे के पूर्वोत्तर क्षेत्रों में छोटी पालिशदार नवपाषाणकालीन पत्थर की कुल्हाड़ियाँ कोचार पहाड़ियों, गारो पहाड़ियों और नागा पहाड़ियों से प्राप्त हुई हैं, लेकिन खेद का विषय है कि इन कुल्हाड़ियों के निर्माताओं के जीवन पर प्रकाश डालने वाली बहुत कम सामग्री मिली है और उनके काल-निर्धारण के बारे में साक्ष्य तो न के बराबर उपलब्ध है। गुवाहाटी के पास सारुतारु में की गई खुदाइयों से संबंधित आदिम कुल्हाड़ियों (सेल्ट) और गोलाकार मूठ वाले कुठारों के साथ अनगढ़ रज्जु-या-करंड अंकित मृद्भांड मिले हैं। दक्षिण भारत में हमें जीवन-निर्वाह की नई पद्धतियों के बारे में सर्वाधिक निर्णायक साक्ष्य मिले हैं, जो हड़प्पा की संस्कृति के समकालीन थे। दक्षिण भारत के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थलों में कुछ हैं : आंध्र प्रदेश में कोडेकल, उतनूर, नागार्जुनीकोंडा और पलावोय; कर्नाटक में तेक्कलकोटा, मास्की, टी. नरसीपुर, संगनकल्लू, हल्लूर और बह्मगिरि; और तमिलनाडु में पैयमपल्ली। दक्षिण के नवपाषाण काल का समय 2600 से 800 ई.पू. माना गया है। इसके तीन चरर्ण बताए गए हैं। प्रथम चरण में धातु के औजार बिलकुल नहीं थे और दूसरे चरण में ताँबे और काँसे के औजार सीमित मात्रा में इस्तेमाल किए जाते थे। साक्ष्य से पता चलता है कि लोग पशु, भेड़ और बकरियाँ पालते थे और कुछ खेती भी करते थे। हाथ से बने और चाक पर बनाए गए, दोनों प्रकार के मिट्टी के बर्तन इस्तेमाल किए जाते थे। वे नरकुल और मिट्टी से घर बनाते थे। उनके घरों के फर्श दुरमच या थापी से कूट-कूट कर बनाए जाते थे। वे गाय, बैल, भेड़, बकरी पालते थे और कुलथी (घुड़चना), ज्वार-बाजरा (मिलेट) और रागी उगाते थे। तीसरे चरण में लोहा भी मिला बताया गया है।

ऊपर चर्चित साक्ष्य से हम कुछ मोटे निष्कर्ष निकाल सकते हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में आद्य नवपाषाणकालीन बस्तियाँ सर्वप्रथम सिंधु नदी के पश्चिम में विकसित हुई थीं। यहाँ मेहरगढ़ में नवपाषाणकालीन संस्कृति 8000 ई.पू. के आसपास शुरू हुई थी और यह जल्दी ही फैल गई। लोम मिट्टी के घरों में रहते थे, गेहूँ और जौ की खेती की जाती थी, और पशु ढोर और भेड़-बकरियाँ पाली जाती थीं। कीमती माल के लिए लंबी दूरी से भी व्यापार किया जाता था। लगभग इसी समय बेलन घाटी में भी ऐसा ही विकास हुआ था। लगभग 3000 ई.पू. तक नवपाषाणकालीन संस्कृति का व्यापक रूप से प्रसार हो चुका था और यह भारतीय उप-महाद्वीप के बड़े भाग में फैल चुकी थी।

नवपाषाण काल की समाप्ति के बाद भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार का विकास हुआ। एक ओर जहाँ सिंधु और सरस्वती नदियों की घाटियों में धीरे-धीरे एक पूर्ण-विकसित सभ्यता का उद्भव एवं विकास हुआ, वहीं दूसरी ओर मध्य भारत और दक्कन में एक अत्यंत भिन्न प्रकार की संस्कृति विकसित हुई, जिसमें यद्यपि धातु का प्रयोग होता था, पर वह नगर-संस्कृति के स्तर तक कभी नहीं पहुँची। इस संस्कृति को ताम्रपाषाण संस्कृति कहा गया। इनमें से कुछ संस्कृतियाँ हड़प्पा की संस्कृति की समकालीन थीं और कुछ अन्य संस्कृतियाँ निश्चित रूप से हड़प्पा की संस्कृति के बाद की थीं। इन संस्कृतियों की कुछ एक-जैसी विशेषताएँ थीं। इन सभी संस्कृतियों के लोग आमतौर पर लाल रंग पर काले रंग से चित्रित मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे; सिक्थस्फटिक (केल्सेडोनी) और चकमक पत्थर (चर्ट) जैसी सिलिकामय सामग्री के फलक (ब्लेड) और शल्क (फ्लेक) बनाने के उद्योग में उन्हें विशेषज्ञता प्राप्त थी, और ताँबे तथा कांम के औजार भी बनाते थे, पर सीमित पैमाने पर। वे अपने जीवन-निर्वाह के लिए खेती और पशुपालन पर निर्भर थे और माथ ही शिकार और मछली पकड़ने का बंधा भी करते थे। कुछ महत्त्वपूर्ण ताम्रपाषाण संस्कृतियों हैं :

अहार संस्कृति : लगभग 2800-1500 ई.पू.

कायथा संस्कृति: लगभग 2450-1700 ई.पू.

मालवा संस्कृति :लगभग 1900-1400 ई.पू.

सावलदा संस्कृति: लगभग 2300-2000 ई.पू.

जोरये संस्कृति : लगभग 1500-900 ई.पू.

प्रभास संस्कृति : लगभग 2000-1400 ई.पू.

रंगपुर संस्कृति : लगभग 1700-1400 ई.पू.

इन ताम्रपाषाण संस्कृतियों की सबसे प्रमुख विशेपता है उनके विशिष्ट प्रकार के चित्रित मृद्भांड । कायथा संस्कृति अपने उन मजबूत लाल लेप वाले मृद्भांडों के लिए प्रसिद्ध है, जिन पर चाकलेटी रंग मे तरह-तरह के चित्र बने हुए हैं। इस संस्कृति की एक अन्य विशेषता है लाल रंग में चिंत्रित पांडुभांड और उत्कर्ण नमूनों वाले कंकतितभांड। अहार संस्कृति वाले लोग काले-लाल रंग के बर्तन बनाते थे, जो सफेद डिजाइनों में मज़े होते थे। मालवा के बर्तन बनावट में कुछ अनघड़ हैं, लेकिन उन पर मोटा लेप लगा है, जिसकी सतह पर लाल या काले रंग में डिजाइन बने होते हैं। प्रभास और रंगपुर के मिट्टी के बर्तन हड़प्पा संस्कृति में लिए हुए हैं, लेकिन उनको मतह चमकदार है, जिसकी वजह से उन्हें चमकीले लालभांड भी कहा जाता है। जोरवे के भांड लाल पर काले रंग से रंजित हैं, लेकिन उनकी सतह धुंधली या खुरदरी है, जिस पर पतला जलरंग किया गया है। ये मृद्भांड नाना रूप वाले हैं, जिनमें अधिक प्रसिद्ध हैं : साधार तश्तरियाँ, टोंटीदार कलश, डंडीदार चषक (प्याले), साधार कटोरे, बड़े संचय पात्र और टोंटीदार पात्र एवं कटोरे । इन ताम्रपाषाण संस्कृतियों में से अधिकांश संस्कृतियाँ राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के अर्ध-शुष्क इलाकों में फली-फूली थीं। कायथा संस्कृति की बस्तियाँ संख्या की दृष्टि से बहुत कम हैं और अधिकतर चंबल और उसकी सुहायक नदियों के क्षेत्र में पाई गई हैं। ये बस्तियाँ क्षेत्रफल में अपेक्षाकृत छोटी हैं और उनमें से बड़ी से बड़ी बस्ती भी शायद दो हेक्टेयर से अधिक बड़ी न हो। दूसरी ओर, अहार संस्कृति की बस्तियाँ, कायथा बस्तियों के विपरीत काफी बड़ी हैं। उनमें से कम से कम तीन यानी अहार, बालाथल और गिलुंद, कई हेक्टेयर में बसी हैं। घर और अन्य मकान बनाने के लिए पत्थरों, कच्ची ईंटों और गारे का प्रयोग किया जाता था। खुदाइयों से पता चला है कि बालाथल एक परकोटे से घिरी बस्ती थी। मालवा संस्कृति के लोग अधिकतर नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में बसे थे। नवदाटोली, एरन और नागदा तीनों मालवा संस्कृति की सुविदित बस्तियाँ हैं। नवदाटोली का क्षेत्रफल लगभग 10 हेक्टेयर है और यह देश की सबसे बड़ी ताम्रपाषाण बस्तियों में से एक है। यह देखा गया है कि इनमें से कुछ बस्तियाँ प्राचीरयुक्त थीं और नागदा में तो एक कच्ची ईंटों से' बना बुर्ज भी है। एरन के चारों ओर एक खाई के साथ-साथ परकोटा बना हुआ था। खेद का विषय है कि प्रभास संस्कृति की आधा दर्जन बस्तियों का ही पता चला है। रंगपुर संस्कृति के पुरास्थल अधिकतर गुजरात में घेलो और कालूभर नदियों के क्षेत्र में पाए गए हैं। जोरवे की बस्तियाँ संख्या की दृष्टि से अधिक हैं। महाराष्ट्र में 200 से अधिक बस्तियों का पता चला है। प्रकाश, दाइमाबाद और इनामगाँव इस संस्कृक्ति की सुप्रसिद्ध बस्तियाँ हैं। इनमें सबसे बड़ी दाइमाबाद है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 20 हेक्टेयर है।

ताम्रपाषाण संस्कृति के लोग नरकुल और मिट्टी के गारे से आयताकार और वृत्ताकार घर बनाते थे। वृत्ताकार घर अधिकतर एक साथ समूहों में बने होते थे। इन घरों और झोंपड़ियों की छतें घास-फूस की बनी होती थीं और बाँस तथा शहतीरों के सहारे खड़ी रहती थीं। फर्श कूट-कूटकर चिकनी मिट्टी से बनाए जाते थे और झोंपड़ियों को भंडारघर के रूप में भी काम में लिया जाता था। लोग पशु पालते थे और बारी-बारी से खरीफ और रबी दोनों फसलें उगाते थे। गेहूँ और जौ की खेती मालवा क्षेत्र में की जाती थी। चावल इनामगाँव और अहार के खुदाई-स्थलों में पाया गया बताया गया है। ये लोग ज्वार और बाजरा भी उगाते थे और कुल्थी, रागी, हरे मटर, मसूर और हरे व काले चनों की खेती करते थे।

लगभग ये सभी ताम्रपाषाण संस्कृक्तियाँ काली मिटटी वाले प्रदेश में पनपी और फली-फूली थी। ईसका तात्पर्य यह हुआ कि तत्कालीन लोगों ने उपलब्ध प्रौद्योगिकी ज्ञान और साधनों के संदर्भ में अपने आपको परिस्थितियों के अनुकूल ढाल लिया था। खेती के तरीकों के बारे में ऐसी ही समानता आज भी इन क्षेत्रों में पाई जाती है. जहाँ हम नमी बनाए रखने की क्षमता वाली मिट्टी को देखकर शुष्क खेती की प्रणाली अपना रहे हैं।

व्यापार और वाणिज्य

इस बात के प्रमाण मिले हैं कि ताम्रपाषाणयुगीन जनसमुदाय समकालीन अन्य समुदायों के साथ व्यापार करते थे और सामग्रियों का आदान-प्रदान करते थे। अहार, गिलुंद, नागदा, नवदाटोली, एरन, प्रभास, रंगपुर, प्रकाश, दाइमाबाद और इनामगाँव जैसी बड़ी-बड़ी बस्तियाँ व्यापार और वस्तु-विनिमय की प्रमुख मंडियाँ थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि अहार के. लोग तांबे के स्रोतों (खानों) के पास बसे हुए थे और मालवा तथा गुजरात के समकालीन समुदायों को तांबे के औजार तथा अन्य वस्तुएँ देते थे। यह अनुमान लगाया गया है कि मालवा, जोरवे और प्रभास संस्कृति क्षेत्रों में पाए गए अधिकांश तांबे के कुल्हाड़ों पर कुछ पहचान-चिह्न अंकित हैं, जो एक जैसे हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि वे उन शिल्पियों के व्यापार चिह्न (ट्रेडमार्क) थे, जिन्होंने उन औजारों का निर्माण किया था। कंगन-चूड़ियाँ बनाने के लिए सीपियाँ व कौड़ियाँ सौराष्ट्र के समुद्र- तट से व्यापार के जरिए अन्य ताम्रपाषाणीय क्षेत्रों को भेजी जाती थीं। इसी प्रकार, सोना और हाथी है दाँत भी टेक्कलकोट्टा (कनार्टक) से जोरवे संस्कृति वाले लोगों के पास आया होगा, जिन्होंने बदले में उपर्युक्त औजार अपनी समकालीन अन्य संस्कृति के लोगों को वेचे होंगे। इसी प्रकार, राजपिपला (गुजरात) से उपरत्नों का व्यापार भी विभिन्न क्षेत्रों के साथ होता था। यह जान लेना भी रुचिकर होगा कि जोरवे संस्कृति के लोग अपने मृद्भांडों का व्यापार भी दूर-दूर तक करते थे, क्योंकि इनासगाँव के मृद्भांड वहाँ से काफी दूरी पर स्थित अनेक पुरास्थलों पर पाए गए हैं। इसी संदर्भ में हमारा ध्यान एक बार फिर उत्तरी काली पालिश वाले मृद्भांडों की ओर जाता है जो प्रारंभिक ऐतिहासिक काल में, गंगा के मैदान से दूर-दूर के क्षेत्रों में निर्यात किए जाते थे। अनेक न मृद्भांडों पर पहियेदार वैलगाड़ियों के रेखाचित्र मिले र हैं, इससे पता चलता है कि लंबी दूरी वाले व्यापार के 1 लिए, नदी मार्ग से परिवहन के अलावा, इन गाड़ियों का भी इस्तेमाल किया जाता था।

धार्मिक विश्वास

धर्म एक ऐसा पक्ष था जिसने सभी ताम्रपाषाण र संस्कृतियों को आपस में जोड़ रखा था। उनमें मातृ-देवी को और वृषभ की पूजा प्रचलित थी। अहार काल में, ह मालवा में, संभवतः वृषभ पूजा का बोलबाला था। र ऐसे अनेक प्रकृतवादी और रीतिबद्ध लिंग के अधिकांश पुरास्थलों में पाए गए हैं। प्रकृतवादी लिंग 5 संभवतः मनौती के चढ़ावे के रूप में होंगे, लेकिन न छोटे रीतिबद्ध लिंग शायद गर्दन के चारों ओर ने लटकाए जाते होंगे, जैसा कि आज भी लिंगायत पंथ याँ के लोग लटकाते हैं।

मालवा संस्कृति के एक विशाल संचय पात्र पर नो मातृ-देवी की आकृति जड़ाऊ डिजाइन में अंकित यी है। उसके दाहिनी ओर एक स्त्री की और बाईं ओर ते एक मगरमच्छ की आकृति अंकित है तथा पास में में एक पूजास्थल चित्रित है। इसी प्रकार बेला (फिडिल) की आकृति वाली शायद श्रीवत्स जैसी है, जो कि धन की देवी लक्ष्मी का प्रतीक है; जिसकी, आगे चलकर ऐतिहासिक काल में मातृदेवी के रूप में पूजा की जाने लगी थी। एक पात्र पर चित्रित डिजाइन में एक देवता की उसके अस्त-व्यस्त बालों के साथ दिखाया गया है, जिससे परवर्ती काल के रुद्र का स्मरण हो आता है। दाइमाबाद से प्राप्त एक पात्र पर की गई चित्रकारी में एक देवता को बाघों जैसे जंतुओं और मोर जैसे पक्षियों से घिरा हुआ दिखाया गया है। कुछ विद्वान इसकी तुलना मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुद्रा पर अंकित शिव पशुपति के साथ करते हैं।

उत्तरकालीन जोरवे संस्कृति के स्थल इनामगाँव से प्राप्त दो छोटी मूर्तियों को गणेश का आद्यरूप माना गया है, जिसकी पूजा किसी भी उपक्रम को प्रारंभ करने से पहल सफलता के लिए की जाती है। इनामगाँव के पुरास्थल पर अनेक सिरकटी छोटी-छोटी मूर्तियाँ मिली हैं, उनकी तुलना महाभारत की देवी विशिरा से की गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि ताम्रपाषाणयुगीन लोगों में अग्नि पूजा का व्यापक रूप से प्रचार था। अनेक ताम्रपाषाण स्थलों की खुदाई के दौरान अग्निकुंड बड़ी संख्या में मिले हैं।

मालवा और जोरवें संस्कृति के लोगों के शवाधानों के साथ बर्तन एवं अन्य अंत्येष्टि वस्तुएँ पाई गई हैं, जिनसे पता चलता है कि वे लोग मरणोपरांत जीवन में भी विश्वास करते थे।

ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ ईसापूर्व तीसरी और दूसरी सहस्राब्दियों में फली फूलीं। बाद में कायथा, प्रभास, अहार, बालाथल, प्रकाश और नेवासा जैसी बहुत-सी बस्तियाँ उजड़ गई, लेकिन आगे चलकर चार-छः शताब्दियों के बाद फिर से बस गईं। ऐसा समझा 5 जाता है कि ये संस्कृतियाँ वर्षा की कमी या बार-बार सूखा पड़ने के कारण उजड़ गई थीं, क्योंकि बिना वर्षा के खेतिहर समुदायों का जीवन दूभर हो गया था।

प्रौद्योगिकी

ताम्रपाषाणयुगीन कृषकों ने मिट्टी और धातु की पौद्योगिकी (शिल्प) में पर्याप्त प्रगति कर ली थी। सके द्वारा चित्रित भांड बहुत अच्छे बनाए और जाग में पकाए जाते थे। उनके भट्ठे की आग का बापमान 500° से 700°C तक होता था। धातु के जोजारों में हम कुल्हाड़ियाँ, छेनियाँ, कड़े (वलय), मनके, कांटे (आंकुड़े) आदि पाते हैं, जो अधिकतर जांबे के बने होते थे। तांबा संभवतः राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र की खानों से निकाला जाता था। सोने के आभूषण बहुत ही दुर्लभ थे और केवल जोरवे संस्कृति में ही पाए गए हैं। एक काने का आभूषण प्रभास स्थल पर भी मिला है। इनामगाँव के पुरास्थल में ताँबे के चिमटों और कुठालियों (मूषा) का मिलना यह दर्शाता है कि वहाँ सोने के आभूषण बनाने का काम भी होता था। उपरत्नों के मनकों में छेद करने के लिए सिक्थस्फटिक (केल्सेडोनी) की बंधनियों (ड्रिल) का प्रयोग किया जाता था। कंकड़ मे चूना तैयार किया जाता था जो घरों की पुताई और अन्न की धानियों की लेपाई आदि के काम आता था।

ताम्र संचय संस्कृति

जब से 1822 में सर्वप्रथम कानपुर जिले के बिठूर म्थल से ताँबे के कांटेदार बरछे (हारपून) के पाए जाने की खबर मिली थी, तब से लेकर आज तक लगभग एक हजार ताँबे की वस्तुएँ भारत के विभिन्न भागों में लगभग 90 पुरास्थलों से प्राप्त हो चुकी हैं। चूँकि ये ताँबे की वस्तुएँ अधिकतर एक साथ कई वस्तुओं के समूह यानी संचय (होर्ड) के रूप में पाई गई हैं, इसलिए उन्हें ताम्र संचय (कॉपर होस) कहा जाता है। सबसे बड़ा संचय गुंगेरिया (मध्य प्रदेश) से प्राप्त हुआ है, जिसमें तांचे की 424 वस्तुएँ और चाँदी की 102 पतली चादरें हैं। ये चीजें कई किस्मों या रूपों की हैं; जैसे - विभिन्न प्रकार की आदिम कुल्हाड़ियाँ (केल्ट), कांटेदार बरछे (हारपून), दुसिंगी तलवारें, छल्ले (वलय) और मानवाकृतियाँ (एंथ्रोपोमोफ्स)। हमने यह देखा है कि ये कांटेदार बरछे, दुसिंगी तलवारें और मानवाकृक्तियाँ बुनियादी तौर पर उत्तर प्रदेश के स्थलों तक ही सीमित हैं, जबकि आदिम कुल्हाड़ियाँ, छल्ले और अन्य वस्तुएँ अलग-अलग भौगोलिक इलाकों; जैस- राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में भी पाई गई हैं। इन ताम्र वस्तुओं के वैज्ञानिक विश्लेपण से पता चला है कि वे खुले या बंद साँचों में ढालकर बनाई गई थीं। ये वस्तुएँ आमतौर पर शुद्ध ताँबे की बनी हुई हैं, हालांकि उनमें से कुछ में नगण्य मात्रा में अन्य धातुएँ भी मिली हुई पाई गई हैं। इन कांस्य संचयों का स्रोत संभवतः खेतड़ी क्षेत्र की तांबे की खानें और उत्तरांचल के अल्मोड़ा जिले के पहाड़ी क्षेत्र रहे होंगे।

इन ताम्र संचयों में हथियारों, और औजारों के साथ-साथ पूजा की वस्तुएँ भी पाई गई हैं। कांटेदार बरछियों और दुसिंगी तलवारों का प्रयोग तो हथियारों के रूप में किया जाता होगा, जबकि आदिम कुल्हाड़ियों तथा कुठारों का इस्तेमाल औजारों के रूप में होता होगा। ऐसा लगता है कि छड़दार कुल्हाड़ियाँ खानों से खनिज खोदकर निकालने के काम आती थीं। पाई गई मानवाकृतियों में से कुछ तो काफी भारी और बड़ी हैं। उनका भार कुछ किलो तक और लंबाई 45 सेमी. तक और चौड़ाई 43 सेमी. तक है। संभवतः इन आकृक्तियों की पूजा की जाती थी। आज भी समस्त उत्तर भारत में ऐसी ही शनि देवता की मूर्तियों की पूजा की जाती है, जिनका आकार 4-10 सेमी. होता है। यह बताना बहुत कठिन है कि इन ताम्र संचयों के निर्माता कौन थे। गंगा के मैदान में इन ताम्र संचयों की कुछ वस्तुएँ गैरिक मृद्भांडों (ओसीपी) के साथ पाई गई हैं, जिनके बारे में हम आगे चर्चा करेंगे ।

गैरिक मृद्भांड संस्कृति

हड़प्पा की परिपक्व सभ्यता के उत्तरकाल में, गंगा के मैदान के ऊपरी भागों में एक ऐसी संस्कृति फल-फूल रही थी, जो अपने चमकीले लाल लेप वाले और काले रंग से चित्रित मृद्भांडों के लिए पहचानी जाती है। ये मृद्भांड गंगा के मैदान के उत्तरी भागों में सर्वत्र पाए गए हैं। इस क्षेत्र में खुदाई के दौरान यह पाया गया है कि जिन पुरास्थलों से ये मृद्भांड मिले हैं, वहाँ कभी जोरदार बाढ़े आई थीं। कुछ विद्वानों का विचार है कि गंगा का समस्त ऊपरी मैदान काफी लंबे समय तक पानी में डूबा रहा था। गैरिक मृद्भांड संस्कृति के लोग ताँबे के औजारों का इस्तेमाल करते थे और चावल, जौ, चना और खेसरी की खेती करते थे। गैरिक मृद्भांडों और हड़प्पाई भांडों की आकृक्तियों में काफी समानता पाई जाती है। उत्खनन कार्यों के दौरान, एटा जिले के सैपई स्थल पर ताम्र संचय की वस्तुएँ, गैरिक मृद्भांडों के साथ पाई गई थीं। इसी प्रकार, गंगा-यमुना दोआब में जहाँ-जहाँ ताम्र संचय मिले हैं, वहाँ लगभग सभी स्थलों पर गैरिक मृद्भांड भी पाए गए हैं। इसे देखते हुए कुछ विद्वानों का विचार है कि दोआब में, ताम्र संचयों का संबंध गैरिक मृद्भांड संस्कृति के लोगों से रहा है। लेकिन बिहार, बंगाल और उड़ीसा में उनका सांस्कृतिक साहचर्य स्पष्ट नहीं है। जैसा कि ऊपर ताम्रपाषाणीय संस्कृतियों से संबंधित अनुभाग में कहा गया है, ताम्र संचयों की कुछ चीजें प्रमुख रूप से आदिम कुल्हाड़ियाँ, ताम्रपाषाणीय लोगों से संबद्ध भी पाई गई हैं।

इसके अतिरिक्त, ऊपरी गंगा घाटी के कुछ अन्य स्थलों; जैसे - बहदराबाद, नसीरपुर (हरिद्वार), राजपुर-परशु (मेरठ), बिसौली (बदायूं) और बहेड़िया (शाहजहाँपुर) में पहले की खुदाइयों में ताम्र संचय पाए गए थे, वहीं बाद वाली खुदाइयों में गैरिक मृदभांडों के ठीकरे मिले हैं।












हरियाणा के भिरड़ाना नामक जगह से करते है जिसे प्राचीनतम पुरातात्विक स्थल होने का भी दर्जा प्राप्त है। जहाँ से मिली पुरातात्विक सामग्री मानव विकास और सभ्यता के उद्भव के कई रहस्यों को उजागर करती है।

भिरड़ाना गाँव फतेहाबाद जिले में स्थित है और इसकी स्थापना लगभग 7570 ईसा पूर्व मानी जाती है। यह सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख नगर था। 2003-2004 में हुए उत्खनन में इस नगर की खोज हुई। यहाँ से मोहनजोदड़ो की नर्तकी की आकृति वाले बर्तन भी मिले हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति को दर्शाते हैं। यहाँ से मिले अवशेषों में 5 सेंटीमीटर मोटी और 31 सेंटीमीटर लंबी ईंटें शामिल हैं, जो इसके प्राचीन होने का संकेत देती हैं। भिरड़ाना को सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे प्राचीन नगर माना गया है, जिसकी स्थापना लगभग 7570 ईसा पूर्व में हुई थी। यहाँ की नगर योजना और वास्तुकला हड़प्पा सभ्यता के अन्य प्रमुख स्थलों के समान विकसित थी। उत्खनन के दौरान मोहनजोदड़ो की कास्य की नर्तकी की आकृति वाले बर्तन भी प्राप्त हुए, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि और उसकी निरन्तरता को दर्शाते हैं। खुदाई में गोलाकार मकान भी मिले हैं, जो प्राचीन मानव बस्तियों की जीवनशैली, वास्तुकला और सामाजिक ढांचे को समझने में मदद करती हैं। ये गोलाकार घर मिट्टी की ईंटों से बने थे, जो न केवल निवास के लिए उपयोग होते थे, बल्कि इनके निर्माण में स्थानीय संसाधनों का उपयोग भी दर्शाता है। यह छोटे परिवार या समूह की ओर भी इशारा करता है। संभवतः प्रत्येक घर में तीन से चार व्यक्ति रहते होगे जिसके कारण से सामूहिक जीवन की आवश्यकता होती होगी। संभव है इन घरों का उपयोग धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों के लिए भी किया जाता था। कईयों में बकरियों के अवशेष मिले हैं जो यह दर्शाता है हैं कि ये स्थान धार्मिक क्रियाकलापों के लिए भी इस्तेमाल होते होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में गोलाकार घरों का निर्माण आज भी देखा जा सकता है, जो पारंपरिक भारतीय वास्तुकला का हिस्सा हैं। ये घर जलवायु के अनुकूल होते हैं और गर्मी को कम करने में मदद करते हैं। जहां तक इनके ऐतिहासिकता का सवाल है, ये मकान हड़प्पाकालीन संस्कृति से पूर्व की सभ्यता के प्रमाण माने जाते हैं।

इसके साथ साथ भिरड़ाना में मिले मिट्टी के बर्तन सिंधु घाटी सभ्यता के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। ये बर्तन यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में एक विकसित समाज था जो दैनिक जीवन में इनका उपयोग करता था। मिट्टी के बर्तनों पर उकेरे गए जटिल डिज़ाइन और रंगीन चित्रण उस समय की कला और शिल्प कौशल को दर्शाते हैं। इनमें ज्यामितीय आकृतियाँ और प्राकृतिक रूपांकन शामिल हैं, जो उस समय की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को उजागर करते है। आज भी, कई ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता है, जो उनकी पारंपरिक संस्कृति को बनाए रखने में मदद करता है। ये बर्तन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी लाभकारी माने जाते हैं, क्योंकि मिट्टी से बने बर्तन भोजन को ताजगी प्रदान करते हैं। मिट्टी के बर्तनों का निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा किया जाता है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को समर्थन प्रदान करते हैं। यह पारंपरिक कारीगरी की एक निरंतरता भी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है। कहने की आवश्यकता नहीं की ये बर्तन प्राचीन भारत में रहने वाले लोगों की आदतों, रुचियों, सौन्दर्य के प्रति गहरी समझ के साथ साथ सांस्कृतिक विकास को समझने में मदद करते हैं। खुदाई से अन्य प्रकार के उपकरण, आभूषण और अन्य सामग्री भी मिलें हैं, जो उस समय की तकनीकी और कलात्मक क्षमताओं को दर्शाती हैं। खुदाई में मिले साक्ष्य यह भी दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन व्यापार मार्गों का हिस्सा था, जहाँ यमुना का प्रवाह भी हुआ करता था।



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सरस्वती नदी की सभ्यता

हड़प्पा की सभ्यता की खोज मोहनजोदड़ो में आर.डी. बैनर्जी और हड़प्पा में डी.आर. साहनी द्वारा किए गए उत्खननों (खुदाइयों) के फलस्वरूप 1920-21 में हुई थी। चूँकि उस समय इस सभ्यता के अवशेष सिंधु घाटी में ही मिले थे, इसलिए इस सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता कहा जाने लगा। संस्कृति का ए नामकरण उस पुरास्थल के आधार पर भी किया जा में सकता है, जहाँ से वह पहली बार जानी गई हो। चूँकि इस इस सभ्यता के पुरावशेष सर्वप्रथम हड़प्पा में पाए गए को थे, इसलिए इसे हड़प्पा की सभ्यता भी कहा जाता है। सन् 1947 में भारत के विभाजन के समय तक इस सभ्यता से जुड़ी केवल 40 बस्तियों का ही पता चल पाया था। पिछले 50 वर्षों में किए गए अनुसंधान कार्यों ने इस स्थिति को पूरी तरह बदल दिया है। अब इस संस्कृति के भिन्न-भिन्न चरणों से जुड़ी लगभग 1,400 बस्तियाँ भारत के भिन्न-भिन्न भागों में खोजी जा चुकी हैं। आज के विभाजित भारत की राजनीतिक सीमाओं के अनुसार, इन 1,400 बस्तियों में से लगभग 925 बस्तियाँ भारत में और 475 पाकिस्तान में हैं। भारत की इस प्राचीन सभ्यता का अध्ययन कुछ अन्य विषयों की तरह आज की राजनीतिक सीमाओं में बाँधकर करना उचित नहीं होगा। इसलिए भौगोलिक वितरण या प्रसार-क्षेत्र ही इसका आधार होना चाहिए।

अब तक खोजी गई 1,400 बस्तियाँ एक अत्यंत विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में फैली हुई हैं। पश्चिम में इस क्षेत्र की सीमा बलूचिस्तान स्थित सुतकागेंडोर तक, पूर्व में आलमगीरपुर (जिला मेरठ, उत्तर प्रदेश) तक, दक्षिण में दाइमाबाद (जिला अहमदनगर, महाराष्ट्र) तक और उत्तर में मांडा (जिला अखनूर, जम्मू-कश्मीर) तक बताई जाती है। यह क्षेत्र पूर्व से पश्चिम तक लगभग 1,600 किलोमीटर लंबा और उत्तर से दक्षिण तक लगभग 1,400 किलोमीटर चौड़ा है। इस सभ्यता का कुल भौगोलिक क्षेत्र, मिस्र की सभ्यता के क्षेत्र से 20 गुना और मिस्र तथा मेसोपोटामिया दोनों ही सभ्यताओं के कुल सम्मिश्रित क्षेत्र से 12 गुना बड़ा है। इसका क्षेत्रफल लगभग 12,50,000 वर्ग किलोमीटर है। ये बस्तियाँअधिकतर नदियों के किनारे स्थित थीं। यदि हम नदियों के अनुसार इन बस्तियों के वितरण/फैलाव पर विचार करें तो पाएंगे कि (i) केवल 40 बस्तियाँ ही सिंधु और उसकी सहायक नदियों के क्षेत्र में पाई गई हैं, (ii) 1,100 (80 प्रतिशत) बस्तियाँ सिंधु तथा गंगा के बीच के मैदान में स्थित हैं, जहाँ कभी सरस्वती नदी बहती थी जो आज कल लुप्त-सी हो गई है; और (iii) लगभग 250 तस्तियाँ भारत में सरस्वती नदी प्रणाली क्षेत्र से परे पाई गई हैं, जिनमें से कुछ गुजरात में और थोड़ी-सी महाराष्ट्र में हैं। 1

इन बस्तियों के फैलाव-क्षेत्र से स्पष्ट होता है कि हड़प्पा की सभ्यता का मुख्य क्षेत्र सिंधु घाटी नहीं बल्कि सरस्वती तथा उसकी सहायक नदियों का क्षेत्र था, जो सिंधु तथा गंगा के बीच में स्थित था। इसीलिए कुछ विद्वान इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता कहते हैं और कुछ लोग तो इसे सरस्वती सभ्यता के नाम से पुकारना अधिक पसंद करते हैं।

इस सभ्यता की 1,400 बस्तियों में से अधिकांश बस्तियों को छोटे गाँव (10 हेक्टेयर तक के) कहा जा सकता है, कुछ को बड़े नगर (कस्बे) और छोटे शहर (10 से 50 हेक्टेयर तक के) कह सकते हैं। कुछ बस्तियों; जैसे - मोहनजोदड़ो (+250 हेक्टेयर), हड़प्पा (+150 हेक्टेयर), गणवारीवाला (+80 हेक्टेयर) और राखीगढ़ी (+80 हेक्टेयर), कालिबंगन (+100 हेक्टेयर) और धौलावीरा (+100 हेक्टेयर) को आसानी से बड़े शहरों की गिनती में लाया जा सकता है। पहली पाँच बस्तियाँ अंतर्देशीय केंद्र कही जा सकती हैं, जो सिंधु तथा सरस्वती नदियों के मैदान में एक-दूसरे से लगभग समान दूरियों पर टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर स्थित हैं। अंतिम दो बस्तियाँ कच्छ के रण में स्थित हैं।

इसमें से प्रत्येक नगर ऐसी विस्तृत कृषि-भूमियों, नदियों और वनों से घिरा हुआ था, जहाँ कहीं-कहीं किसान और ग्वाल-समुदाय तथा कंहीं शिकारी खाद्य संग्राहक रहते थे।

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालिबंगन, लोथल, सुरकोतदा, धौलावीरा' आदि पुरास्थलों पर की गई व्यापक खुदाइयों से हमें इस सभ्यता के विभिन्न पहलुओं; जैसे - नगर-योजना, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, धर्म आदि के बारे में काफी कुछ पता चलता है।

नगर योजना

सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नगरों के समग्र अभिन्यास (नक्शे) की असली पहचान या विशेषता यह है कि इसकी सड़कें व गलियाँ और उनके किनारे बनी इमारतों की पंक्तियाँ, एक-दूसरे को, पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण की ओर, समकोण बनाते हुए काटती थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस अभिन्यास के अनुसार नगर बसाने का विचार अचानक पहली ई बार इन नगरों के संबंध में ही नहीं आया होगाः न संभवतः ऐसी योजना पहले से ही जानी-परखी हुई , होगी और पूर्व-काल में प्रचलित होगी, जैसा कि कोटदीजी, कालिबंगन, हड़प्पा, रहमान ढेरी, नौशारो आदि पुरास्थलों से पता चलता है। इन सभी बस्तियों के बुनियादी नक्शे की विशेषता यही है कि इनकी बड़ी सड़कें एक जाल (ग्रिड) बनाती हुई उत्तर मे ■ दक्षिण की ओर और पूर्व से पश्चिम की ओर - एक-दूसरे को काटती हुई बनी थीं और बस्ती चारों ■ ओर एक परकोटे (प्राचीर) से घिरी थी।

पहले यह सोचा जाता था कि ये सभी नगर समान रूप से दो भागों में बंटे थे; इनमें पश्चिम की न ओर ऊँचा दुर्ग था और पूर्व की ओर नगर का निचला हिस्सा था। इससे यह प्रतीत होता था कि इन नगरों में शासकों के लिए अलग ऊँचा दुर्ग और साधारण लोगों यानी शिल्पियों, श्रमिकों आदि के लिए निचला हिस्सा होता था, जिसमें शिल्प-शालाएँ, भी होती थीं, लेकिन ऐसा समझना सही नहीं है क्योंकि बड़े-बड़े सार्वजनिक भवन, बाजार, छोटे-बढ़े रिहायशी मकान और शिल्प-शालाएँ लगभग सभी इलाकों में पाई गई हैं।



प्रत्येक नगर में कई सेक्टर या टीले (माउंट) ऊँची दीवार से घिरे हुए थे जो अलग-अलग दिशाओं में बसे हुए थे। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और कालिबंगन में पश्चिम की ओर एक ऊँचा आयताकार टीला है और उत्तर, दक्षिण तथा पूर्व की ओर विस्तृत टीला है। लेकिन धौलावीरा और बनावली स्थलों पर दीवार से घिरा एक ही टीला है, जो कि आंतरिक रूप से तीन या चार, दीवार से घिरे सेक्टरों में विभाजित है।

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालिबंगन, सुरकोतदा जैसे हड़प्पाई नगर स्थलों की खुदाई से पता चला है कि नगर में प्रवेश करने के लिए बाहरी चार दीवारी यानी परकोटे में कई बड़े प्रवेश द्वार होते थे। आंतरिक चहारदीवारी या परकोटे में भी प्रवेश द्वार देखने को मिलते हैं। धौलावीरा में एक बड़ा उत्कीर्ण लेख संभवतः गिरा हुआ साइनबोर्ड, मुख्य प्रवेश दुवार के पास मिला था। इस लेख के वर्ण किसी भी हड़प्पाई नगर से अब तक प्राप्त लिखावट के सबसे बड़े नमूने हैं। यह लिखावट एक काठ की तख्ती पर खुदाई करके उसमें सफेद चूना (जिप्सम) भरकर तैयार की गई है। इसमें दस संकेताक्षर हैं, जिनमें से प्रत्येक की ऊँचाई 37 सेमी. और चौड़ाई 25 से 27 सेमी. है और उनके द्वारा कोई नाम या शीर्ष बताया गया है। जब यह नामपट्ट प्रवेश द्वार पर टँगा होता था, तो दूर से ही दिखाई देता होगा।

इमारतों में इस्तेमाल की गई सामग्री

लोगों द्वारा घर-मकान बनाने के लिए जिन सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता था, वे भिन्न-भिन्न प्रकार की होती थीं और निर्माण की शैली भी सर्वत्र एक-जैसी नहीं थी। जलोढ़ मिट्टी से बने इन मैदानों में, जहाँ अधिकांश बस्तियाँ पाई गई हैं, मकान आमतौर पर कच्ची ईंटों और भट्ठे में पकाई गई ईंटों, लकड़ी और सरकंडों से बनते थे, किंतु चट्टानों वाली तलहटियों में और कच्छ के द्वीपों तथा सौराष्ट्र में, जहाँ पत्थर आसानी से उपलब्ध था, ईंटों की जगह तराशा हुआ पत्थर काम में लिया जाता था। घरों को बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ईंटों का औसत आकार 7.5 × 15 × 30 सेमी. होता था, लेकिन परकोटे की दीवारों के निर्माण में प्रयुक्त ईंटों का आकार बड़ा यानी 10 × 20 × 40 सेमी. होता था। दोनों आकारों की ईंटों में मोटाई, चौड़ाई और लंबाई का अनुपात एक समान 1:2:4 होता था, अर्थात् चौड़ाई मोटाई से दोगुनी और लंबाई मोटाई से चार गुनी होती थी।



दरवाजे और खिड़कियाँ लकड़ी और चटाई (मैट) की बनी होती थीं। घरों के फर्श कड़ी मिट्टी को कूट-कूट कर बनाए जाते थे और आमतौर पर उन पर लेपाई भी की जाती थी। नहाने की जगह। और नालियाँ पकी हुई ईंटों से या पत्थर से बनाई जाती थीं। कुछ कमरे का फर्श पकी ईंटों से या मिट्टी की पकी हुई टिक्कियों (केक) से बनाया जाता था। मकानों की छतों के वास्तविक टुकड़े बहुत कम मिले हैं। छतें संभवतः लकड़ी की बीमों/ कड़ियों से बनाई जाती थीं और उन पर सरकंडे बिछाकर, चिकनी मिट्टी भरी जाती थी। कुछ ऐसे भी दुर्लभ उदाहरण मिले हैं, जहाँ इमारती लकड़ी टिंबर) का प्रयोग भी ढाँचा बनाने अथवा ईंटों के काम की मजबूती के लिए किया गया है।

इमारतों/भवनों के प्रकार

खुदाइयों से पता चला है कि अनेक प्रकार के मकान और सार्वजनिक भवन, सभी छोटी-बड़ी बस्तियों में बनाए जाते थे। इन इमारतों को मोटे तौर पर कुछ अंतर के साथ तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है :

(i) निजी मकान/घर;

(ii) बड़े मकान घर, जिनके चारों ओर छोटे-छोटे घर बने होतें थे; तथा

(iii) बड़ी सार्वजनिक संरचनाएँ।

रहने के घरों के आकार और डिजाइन में काफी अंतर पाया गया है। कुछ घर तो एक कमरे वाले ही होते थे, जबकि कइयों में 12 तक कमरे और विशाल आँगन होते थे। मकानों के दरवाजे और खिड़कियाँ मुख्य सड़क की बजाय गली में अधिक खुलती थीं। सामने के मुख्यद्वार से घर के भीतर नहीं झाँका जा सकता था। इस ताका-झाँकी को रोकने के लिए एक दीवार बनी होती थी अथवा सामने के दरवाजे के चारों ओर एक कमरा यानी पोल बना होता था। इस व्यवस्था से बाहर गली में आते-जाते लोग भीतरी आँगन में क्या-कुछ हो रहा है, देख नहीं पाते थे। आज भी सिंधु-गंगा के संपूर्ण मैदानी क्षेत्र के पारंपरिक घर-मकानों में यह पद्धति अपनाई जाती है।

बहुत-से मकान दो-मंजिलें होते थे और कुछ विद्वानों का विचार है कि कुछ मकान तीन मंजिले भी होते थे। कमरों में अंगीठी (हर्थ) आमतौर पर होती थी। प्रत्येक घर में एक स्नानघर होता था और कुछ घरों में तो पहली मंजिल पर स्नानघर होने का भी सबूत मिला है। काठ की चौखट वाले दरवाजे बनाए जाते थे और देहरी पर लगा हुआ ईंट का सॉकेट दरवाजे के चूल का काम देता था। कुछ दरवाजों पर रंगरोगन भी किया जाता था और संभवतः उन्हें साधारण नक्काशी से सुंदर भी बनाया जाता था। खिड़कियाँ पहली और दूसरी मंजिल पर छोटी होती थीं। पास-पास के घरों के बीच एक पतली-सी खाली जगह होती थी, जिस पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं होता था। लगभग सभी बड़े घरों में आँगन के भीतर एक कुआँ होता था। कुएँ के ऊपरी सिरे पर लगी ईंटों के ऊपर पाए गए गहरे रगड़ के निशानों से पता चलता है कि कुएँ से पानी रस्सियों के सहारे काठ या चमड़े के डोल से खींचा जाता था।

सार्वजनिक इमारतें

कुछ नगरों में बड़ी और अलग किस्म की संरचनाएँ (इमारतें) पाई गई हैं। उनके नक्शे और निर्माण में कुछ विशिष्टता देखी जा सकती हैं। यहाँ हम कुछ खास संरचनाओं पर ही चर्चा करेंगे।

मोहनजोदड़ो के दुर्ग टीले का संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल है, वहाँ का विशाल स्नानागार। बढ़िया ईंटों से बना हुआ यह सुंदर जलाशय 12 मीटर लंबा, 7 मीटर चौड़ा और लगभग 3 मीटर गहरा है। इसके दोनों सिरों पर तल तक सीढ़ियाँ बनी हुई हैं। स्नानागार का फर्श तराशी गई ईंटों से बना है, जिनको चूने के गारे से जोड़ा गया है और ईटों की भीतरी तथा बाहरी परतों के बीच में बिटुमिन (डोमर) की परत लगाई गई है। पास के कमरे में एक बड़ा कुआँ है। जाहिर है स्नानागार में पानी इसी कुएँ से निकालकर भरा जाता था। स्नानागार के एक कोने में पानी को बाहर निकालने का एक निर्गम-मुख है, जहाँ से पानी बहकर बड़े नाले से होता हुआ टीले के पश्चिम की ओर चला जाता था। स्नानागार के चारों ओर पोर्टिको एवं कमरे बने हुए हैं और पास ही एक जीना है, जिससे ऊपर की मंजिल पर चढ़ा जा सकता था। यह आमतौर पर स्वीकार किया जाता है कि यह विशाल स्नानागार किसी धर्मानुष्ठान संबंधी स्नान के लिए बना होगा, जो कि प्राचीन काल से आज तक भारतीयों के जीवन में एक आवश्यक कर्म रहा है।

मोहनजोदड़ो में विशाल स्नानागार के बिल्कुल पास ही पश्चिम की ओर ईटों से बने हुए 27 खंड (ब्लॉक) हैं, जिनके बीच में संकरी गलियाँ हैं। इसकी कुल लंबाई पूर्व से पश्चिम तक 50 मीटर और चौड़ाई उत्तर से दक्षिण तक 27 मीटर है। ऐसी ही कुछ संरचनाएँ हड़प्पा, कालिबंगन और लोथल में भी पाई गई हैं। इन संरचनाओं को अन्नागार या कोठार के रूप में पहचाना गया है। इनका उपयोग खाद्यान्न रखने के लिए किया जाता था। हड़प्पा में इन अन्नागारों के पास काम करने के लिए अनेक प्लेटफार्म/चबूतरे बने हुए हैं। इनमें ईटों के गोलाकार चबूतरों की कतारें हैं। खुदाई के दौरान इन गोलाकार चबूतरों में से एक चबूतरे के केंद्र भाग में काठ की एक बड़ी ओखली से बना निशान पाया गया था। काठ की ऐसी बड़ी ओखलियों का इस्तेमाल दुनिया के कई हिस्सों में धान छिलका हटाने के लिए किया जाता है।

से लोथल में पाई गई एक गोदी (डॉकयार्ड) एक अत्यत महत्त्वपूर्ण संरचना है। इस विशाल संरचना की लंबाई 223 मीटर, चौड़ाई 35 मीटर और गहराई 8 मीटर है और इसमें पानी भरने के लिए पूर्वी दीवार में एक सरणी नहर (12.3 मीटर चौड़ी) बनी है और अधिक पानी हो जाने पर पानी बाहर निकालने के लिए अधिप्लावन मार्ग बना है। पानी को भीतर लाने वाली सरणी एक नदी से जुड़ी है। इसके पास एक घाट बना है, जिसकी लंबाई 240 मीटर और चौड़ाई 21.6 मीटर है। अधिकांश विद्वानों की राय में यह संरचना एक गोदी है, जहाँ छोटे-बड़े जहाज माल उतारने और लादने के लिए आते थे। इस गोदी के पास ही एक भंडारघर में बहुत-सी मुाएँ (सीले) पाई गई हैं, जिन्हें देखकर विद्वान लोग ऐसा सोचते हैं कि लोथल हड़प्पा की सभ्यता का एक प्रमुख व्यापार केंद्र था।

सड़कें और नालियाँ

हड़प्पा की सभ्यता की कुछ अन्य उल्लेखनीय विशिष्टताएँ हैं : अत्यंत सुव्यवस्थित सड़कें और गलियाँ, जिनके साथ-साथ जल की निकासी के लिए नालियाँ भी बनाई गई हैं।

नगर एक सुव्यवस्थित योजनाबद्ध रीति से बसाए जाते थे। उनकी सड़कें परस्पर समकोण बनाती हुई एक-दूसरे को काटती थीं। यहाँ तक कि इन सड़कों की चौड़ाई भी एक विशप अनुपात में होती थी। जैसे, सबसे संकरी गली यदि एक निश्चित इकाई की चौड़ाई वाली हो तो अन्य गलियाँ, सड़कें उससे दोगुनी, तिगुनी आदि चौड़ाई की होंगी। इसके अलावा, इस सभ्यता के लोगों में नागरिक भावना इतनी गहरी थी कि इस सभ्यता की समृद्धि के दिनों में सड़कों पर कहीं भी अनधिकृत कब्जा नहीं दिखाई देता था। विद्वानों के मतानुसार ऐसी नगर-योजना तो उन्नीसवीं सदी के लंदन और पेरिस शहरों में भी नहीं थी।

छोटे कस्बों और गाँवों में भी मलजल निकासी की व्यवस्था बहुत अच्छी थी। इससे यह पता चलता है कि लोगों में उच्चकोटि की नागरिकता की भावना और स्वास्थ्य तथा सफाई के प्रति जागरूकता पाई जाती थी। पकी ईंटों से बनी छोटी नालियाँ स्नान मंचों तथा शौचालयों से जुड़ी होती थीं, जो घर का गंदा पानी पास की गली में बनी हुई मध्यम आकार की निकास नालियों तक ले जाती थीं और मध्यम आकार वाली नालियाँ बड़ी सड़कों के साथ-साथ बमे हुए बड़े नालों में मिलती थीं, और ये बड़े नाले ईंटों से या तराशे गए पत्थरों से वाकायदा दर्क हुए होते थे। टौडा मेहराबदार नाले भी पाए गए हैं। उनमें से एक तो लगभग 6 फुट गहरा है, जो नगर के गंदे पानी को बाहर ले जाने वाला मुख्य नाला था। मलजल निकासी के मुख्य नालों पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर आयताकार हौदियाँ बनी होती थीं, जिनमें गंदगी इकट्ठी होती रहती थी और फिर एक निश्चित समय पर नियमानुसार साफ कर दी जाती थी।

शिल्प और उद्योग

यद्यपि हड़प्पा की सभ्यता को कांस्य युग की सभ्यता कहा जाता है, फिर भी उस समय औजार, बर्तन, हथियार आदि बनाने के लिए अधिकतर अमिश्रित/ शुद्ध ताँबे का ही प्रयोंग किया जाता था और कभी-कभार ताँबे में ही टिन (बंग) मिलाकर कांसा बनाया जाता था। औजार और हथियार रूप की दृष्टि से सरल किस्म के थे। उनमें चपटी कुल्हाड़ियाँ, छेनियाँ, वाणाग्र (तीर के सिरे), भाले, चाकू, आरियाँ, उस्तरे और मछली फँसाने के काँटे शामिल थे। लोग ताँबे और कांसे के पात्र भी बनाते थे। वे सीसे के बाट और छोटी-छोटी तश्तरियाँ बनाते थे। इसके अलावा सोने तथा चाँदी के आभूषण भी काफी सफाई से बनाए जाते थे।

हड़प्पाई सभ्यता के लोगों ने चकमक के फलक (चर्ट ब्लेड) वाले चाकू-छुरियों का इस्तेमाल करना नहीं छोड़ा। इनमें से कुछ फलक तो किसी प्राचीन संस्कृति के फलकों की तुलना में सर्वोत्तम पाए गए हैं। रत्नों और उपरत्नों के मनके व बाट बनाने में उस समय के लोगों को प्रवीणता एवं विशेषज्ञता प्राप्त थी। लंबे (10 सेमी. तक) ढोलकाकार इंद्रगोप मनके (कॉर्नेलियन बीड) उनकी कारीगरी के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।

कई तरह की चीजें, जैसे- मोहरें, मनके, कंगन, बटन, पात्र आदि बनाने के लिए सेलखड़ी का इस्तेमाल कया जाता था लेकिन फायंस (एक तरह का कांच नाने में सेलखड़ी का प्रयोग विशेष रूप से ध्यातश थ्य है। इस सामग्री से मनके, ताबीज, मुद्रांक और शुओं की आकृक्तियाँ भी बनी मिली हैं।



हड़प्पा सभ्यता में सोने की वस्तुएँ लटकने वाले नाभूषण (पेंडेंट), ताबीज, ब्रोच और अन्य छोटे-छोटे हिनों के रूप में मिलती हैं। हड़प्पाई आभूषणों में इस्तेमाल किया गया सोना कुछ हलके रंग का है। जिसका अर्थ यह हुआ कि उसमें चाँदी की मात्रा अधिक मिली हुई है। मिश्रधातुओं के आधार पर यह। कहा गया है कि सोना कर्नाटक क्षेत्र से आया होगा। सोने की अपेक्षा चाँदी अधिक इस्तेमाल की जाती थ क्योंकि बड़े-बड़े पात्र और अन्य वस्तुएँ चाँदी से बन पाई गई हैं।

परिपक्व हड़प्पाई मृद्भांडों में सरस्वती क्षेत्र और सिंधु क्षेत्र के पश्चिमी भाग की प्राक्-हड़प्पा संस्कृति की मृत्तिका-परंपरा का सुंदर सम्मिश्रण पाय जाता है। मृद्भांड शिल्प काफी उन्नत था। अधिकांश बर्तन चाक (कुम्हार के) पर बनाए जाते थे। बड़े-बड़े संचय पात्र भी बनाए जाते थे। बर्तन चमकीली लाल सतह पर काले रंग से चित्रित किए जाते थे। इन पर ज्यामितीय आकृतियों, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं के अलावा कहीं-कहीं कुछ कथाओं के दृश्य भी चित्रित किए गए हैं।

2,500 से अधिक मुद्राएँ (मोहरें) पाई गई हैं। ये सेलखड़ी की बनी हैं। इन पर अधिकांशतः एक पशुचित्रित होता है, जैसे एक श्रृंगी, साँड, हाथी, गैंडा आदि, लेकिन कुछ मुद्राओं पर पेड़, अर्ध-मानवीय और मानवीय आकृतियाँ भी चित्रित की गई हैं और कहीं-कहीं मनुष्यों को किसी अनुष्ठान में शामिल होते हुए दिखाया गया है।

शुक्ति-शिल्प भी एक अन्य फलता-फूलता उद्योग था। समुद्र के किनारे बसे हुए शिल्पी शुक्तियों, सीपियों, कौड़ियों आदि से तरह-तरह के आभूषण बनाते थे; जैसे- पेंडेंट, अंगूठियाँ, कंगन, जड़ाऊ गहने, मनके-मालाएँ आदि। इसके अलावा समुद्री चीजों से कटोरे, कलछियाँ और खेल की गोटियाँ तो बनाई ही जाती थीं।

व्यापार और वाणिज्य

हड़प्पाई सभ्यता में समाज का ढाँचा अत्यंत सुव्यवस्थित और जीवन का स्तर अवश्य ही ऊँचा रहा होगा, क्योंकि उस समय की संचार-प्रणाली अत्यंत विकसित थी और अर्थव्यवस्था सुदृढ़ थी। अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में कृषि उत्पादन तथा बड़े पैमाने के व्यापार ने अवश्य ही महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की होगी। प्रारंभ में तो व्यापार अंदरूनी यानी देश के आंतरिक अंचलों के बीच ही रहा होगा, लेकिन बाद में बाहरी व्यापार भी विकसित हो गया होगा। खेती की उपज और औद्योगिक कच्ची सामग्री; जैसे- ताम्रखनिंज, रत्न, उपरत्न आदि का व्यापार किया जाता था। कच्ची सामग्रियों के अलावा, धातु की निर्मित वस्तुओं (पात्र, तवे-कड़ाहियाँ, हथियार आदि), रत्नों और उपरत्नों (मनके, पेंडेंट, ताबीज आदि), सोने तथा चाँदी के आभूषणों का भी विभिन्न क्षेत्रो के साथ व्यापार किया जाता था। ताँबा संभवतः राजस्थान में स्थित खेतड़ी की खानों से प्राप्त किया जाता था। चक्रमुक के फलक सिंघ की रोहड़ी की पहाड़ियों से, कार्नेलियन मनके गुजरात तथा सिंघ से, सीसा दक्षिण भारत से, लाजवर्द मणियाँ कश्मीर और अफगानिस्तान से, फिरोजा ॐ हरिताश्म (जेड) मध्य एशिया या ईरान से, अंबुमणि महाराष्ट्र से और गोमेद, सिक्थस्फटिक (केल्सेडोनी) और इंद्रगोप (कार्नेलियन) सौराष्ट्र से आता था।

परिपक्व हड़प्पाई सभ्यता की मुद्राओं (मोहरें) और अन्य मानवनिर्मित वस्तुओं का समकालीन मेसोपोटामियाई सभ्यता में पाया जाना और कुछ मेसोपोटामियाई तथा मिस्री वस्तुओं का हड़प्पाई सभ्यता में पाया जाना और मेसोपोटामियाई प्रलेखात्मक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि हड़प्पाई लोगों का उन देशों के साथ व्यापारिक संबंध था।

माप - तौल

छोटी दूरी और लंबी दूरी के व्यापार का निहितार्थ यह है कि वस्तुओं के आदान-प्रदान तथा माप-तौल के संबंध में बाकायदा नियम-विनियम मौजूद थे। हड़प्पाई माप-तौल के बट्टे व अन्य साधन आकार में गोलाकार या घनाकार होते थे और वे चर्ट, जैस्पर या अगेट के बने होते थे। बाट एक श्रृंखला में क्रमशः बढ़ते जाते थे, पहले वे 1, 2, 4, 8 से 64 तक दोगुने होते जाते थे और उसके बाद 160 से आगे सोलह के दशमिक गुणजों में, 320, 640, 1,600, 6,400 (1,600 × 4), 8,000 (1,600 × 5) और 1,28,000 (यानी 1,6000 * 8) होते जाते थे। मजेदार बात तो यह है कि 16 या उसके गुणजों की परंपरा भारत में 1950 के दशक तक चलती रही है। सोलह छटांक का एक सेर होता था और 16 आने का एक रुपया। लंबाई का माप 37.6 सेमी. के एक फुट और 51.8 सेमी. से 53.6 सेमी. के हाथ (क्यूबिट) पर आधारित था।

परिवहन और यात्रा

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से प्राप्त मृद्भांडों पर और कुछ मुद्राओं पर जहाजों तथा नौकाओं के चित्र पाए गए हैं। एक जलयान या नौका का एक मिट्टी का मॉडल लोथल से मिला है, जिसमें मस्तूल और पतवार लगाने के लिए छेद मौजूद हैं। मुद्राओं तथा मृद्भांडों पर चित्रित नौकाएँ वैसी ही हैं, जैसी कि आज सिंध और पंजाब के इलाकों में इस्तेमाल की जाती हैं। यात्रा और परिवहन जहाजों और नौकाओं के जरिए किया जाता था। जमीन पर परिवहन के लिए बैलगाड़ियों तथा भारवाही पशुओं; जैसे- बैल, ऊँट, गधे आदि का इस्तेमाल किया जाता था। विभिन्न पुरास्थलों से प्राप्त बैलगाड़ियों की मिट्टी की आकृतियों

तथा कई स्थलों पर सड़कों पर पाई गई गाड़ियों को लीकों से यह पता चलता है कि उन दिनों में इस्तेमात्र की जाने वाली गाड़ियों का आकार और शक्ल लगभग वैसी ही थी जैसी कि आज की गाड़ियों की है।

कृषि

कुछ हड़प्पाई नगरों में मिले अन्नागारों (कोठारों) से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि खाद्यान्न इतर्न अधिक मात्रा में पैदा किए जाते थे कि उनसे लोगों की तात्कालिक आवश्यकता तो पूरी हो ही जाती थी लेकिन बचे हुए अनाज को किसी भावी आपात स्थिति के लिए सुरक्षित भी रख लिया जाता था।

ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्य अनाज गेहूँ और जौ थे। चावल की भी जानकारी थी पर उसे बढ़िया अन्न माना जाता था। मोठे अनाजों (मिलेट्स) की वे छः किस्में उगाई जाती थीं : रागी, कोदों, सांवा, और ज्वार, मटर तथा फलियों की भी खेती की जाती थी। चावल के अवशेष मुख्य रूप से गुजरात तथा हरियाणा के पुरास्थलों से पाए गए हैं। अन्य फसलों में खजूर तरह-तरह की फलियों, तिल और सरसों शामिल हैं। मोहनजोदड़ो और अन्य स्थलों पर पाए गए सूती कपड़े के टुकड़ों से इस बात का पता चलता है कि कपास की खेती भी की जाती थी। इस सभ्यता की परिपक्वता के चरण से कम से कम 2,000 वर्ष पहले के मेहरगढ़ पुरास्थल पर कपास पाई गई है। यह संसार भर में कपास के अस्तित्व का प्राचीनतम साक्ष्य है।

खेती आमतौर पर नदियों के किनारे की जाती थी, जहाँ गरमियों तथा वर्षा के दिनों में बाढ़ का पानी वह आता था। पानी के इस बहाव से हर वर्ष नई उपजाऊ मिट्टी आकर जमा हो जाती थी और उसमें ऊपर से हल चलाने और खाद-पानी देने की जरूरत नहीं होती थी। कालिबंगन (प्रथम काल) की खुदाई में मिले बोए हुए खेत में हल से बनी आड़ी-तिरछी खुरों (कुंडों) के निशानों से पता चलता है कि एक साथ दो फसलें उगाई जाती थीं। राजस्थान, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज भी यह तरीका अपनाया जाता है।

खेतों की जोताई के लिए, लकड़ी के हल का प्रयोग किया जाता था जिसके निचले सिरे पर ताँबे या लकड़ी की फाल लगी होती थी। मोहनजोदड़ो और बनावली में हल के मिट्टी के मॉडल पाए गए हैं। फसल की कटाई ताँबे के हँसिए से और लकड़ी के हत्थे पर लगी पत्थर के फलकों (ब्लेड) गंड़ासों से की जाती थी।

हड़प्पाई लोग कई किस्म के पशु पालते थे। खुदाइयों में बहुत-से जानवरों की हड्डियाँ पाई गई हैं। अनेक पालतू जानवरों; जैसे- भेड़, बकरी, बैल, भैंस, हाथी, ऊँट, सूअर, कुत्ता और बिल्ली के कंकाल 'पाए गए हैं। मोहरों (मुद्राओं) पर अनेक जानवरों के चित्र अंकित किए हुए मिले हैं। इन जानवरों में भेड़ें, बकरियाँ, कूबड़वाले साँड, भैंस, हाथी आदि शामिल हैं। अनेक जंगली जानवरों; जैसे चित्तीदार हिरन, साँभर, पाड़ा (होगडियर), जंगली सूअर आदि की हड्डियाँ मिली हैं, जिनका भोजन के लिए शिकार किया गया था। खाने के लिए अनेक प्रकार की मछलियाँ और चिड़ियाँ पकड़ी जाती थीं।

ऊँटों की हड्डियाँ भी अनेक पुरास्थलों से बड़ी संख्या में पाई गई हैं लेकिन किसी भी मुद्रा पर ऊँट का चित्र नहीं मिला है। घोड़े की हड्डियाँ लोथल, सुरकोतदा, कालिबंगन और अनेक अन्य स्थलों से मिली बताते हैं। घोड़े की मिट्टी की आक्तियाँ नौशारो और लोथल में पाई गई हैं, लेकिन घोड़े का कोई स्पष्ट चित्र किसी मुद्रा पर अभी तक नहीं मिला है।

कलाएँ

कई किस्मों की वस्तुएँ, जैसे मुद्राएँ, पत्थर की मूर्तियाँ, मिट्टी की कलाकृतियाँ आदि कला-संबंधी कार्यकलापों के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इनमें से जो कलाकृतियाँ सर्वश्रेष्ठ समझी गई हैं, उनमें एक है मोहनजोदड़ो से प्राप्त योगी की आवक्ष मूर्ति और हड़प्पा से प्राप्त दो छोटी मूर्तियाँ। कांस्य मूर्तियाँ अपेक्षाकृत बहुत कम पाई गई हैं। उनमें से एक सबसे प्रसिद्ध है मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक नर्तकी की छोटी मूर्ति, जिसकी ऊँचाई लगभग 11.5 सेमी. है। निश्चित रूप से, यह मूर्ति ढलाई की लुप्त सिक्थ विधि से बनाई गई है। दाइमाबाद से प्राप्त जानवरों की कांस्य मूर्तियों की कारीगरी संभवतः हड़प्पा काल की है। हड़प्पा में पाई गई लाल बलुई पत्थर की कबंध मूर्ति (धड़) अलग किए जा सकने वाले सिर और अंगों से बनी है, और धूसर पत्थर की कबंध मूर्ति शायद किसी नृत्यरत आकृति की है। ये दोनों मूर्तियाँ इतनी अधिक वास्तविकता से परिपूर्ण हैं कि यदि वे म पुरातात्त्विक खुदाइयों में न मिली होतीं तो कोई भी यह विश्वास नहीं करता कि वे हड़प्पा काल की हैं।

हड़प्पा के लोग मिट्टी की मूरतें भी बड़ी संख्या में बनाते थे; ये मूरतें हाथ से बनाई जाती थीं। इनमें है आदमियों, जानवरों, पक्षियों, बंदरों, कुत्तों, भेड़ों और मवेशियों की मूरतें शामिल हैं। कूबड़ वाले और बिना कूबड़ वाले, दोनों प्रकार के साँडों/बैलों की मूरतें पाई गई हैं।

मुद्राओं में सबसे अधिक संख्या ऐसी मुद्राओं की हैं जिन पर एक श्रृंगी (पशु) चित्रित है। लेकिन कला की दृष्टि से सबसे बढ़िया मूरतें कूबड़ वाले साँडों की हैं। अन्य जानवर हैं : हाथी, बाघ, गैंडा, मेढ़ा आदि । कुछ मूरतें आदमियों की भी हैं।

जहाँ तक चित्रकला के साक्ष्य का प्रश्न है. हमें केवल मृद्भांडों पर ही चित्रकारियों मिली हैं। दुर्भाग्य से कोई भी भित्ति चित्र यदि था भी तो बचा नहीं है।

लिपि

हड़प्पाई लोगों की भाषा का अभी तक पता नहीं चला है और यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक कि हड़प्पाई लिपि पढ़ी नहीं जाती। यद्यपि इस लिपि को पढ़ने के लिए अनेक प्रयास किए जा चुके हैं लेकिन कोई 'भी प्रयास सबके लिए विश्वासोत्पादक और स्वीकार्य नहीं है। कुछ विद्वान इसका संबंध द्रविड़ भाषाओं से जोड़ते हैं और कुछ अन्य भारतीय आर्य भाषा और संस्कृत से।

मुद्राओं और अन्य सामग्रियों; जैसे - ताम्रपट्टियों, कुल्हाड़ियों और मृद्भांडों पर हड़प्पाई लिपि के लगभग 400 नमूने पाए गए हैं। मुद्राओं पर पाए गए लेख अधिकतर बहुत छोटे, कुछ अक्षरों के ही हैं। कुछ में तो केवल एक ही संकेत-चिह्न हैं। हड़प्पाई लिपि में 400 से 500 तक संकेत-चिह्न हैं और आमतौर पर यह माना जाता है कि यह वर्णमाला वाली लिपि नहीं है.। कुछ विद्वानों की राय है कि हड़प्पाई अभिलेख शब्दाक्षरित लेखन-प्रणाली प्रस्तुत करते हैं, जहाँ दो या अधिक संकेत-चिह्नों का अनुक्रम या तो एक पूर्णशब्द, अक्षर अथवा ध्वनि और कभी-कभी तो कई शब्दों और व्याकरण-सूचक चिह्न का द्योतक होता है। यह लिपि दाईं से बाईं, ओर लिखी जाती थी। जब अभिलेख एक से अधिक पंक्तियों का होता था तो पहली पंक्ति दाई से बाई, और दूसरी बाईं से दाईं ओर लिखी जा सकती थी।

धर्म

आमतौर पर धर्म के दो पहलू होते हैं : पहला संकल्पनात्मक या दार्शनिक, और दूसरा व्यावहारिक अथवा कर्मकांडीय। पहला रूप आध्यात्मिक अथवा तत्त्वमीमांसात्मक ग्रंथों में पाया जाता है, और दूसरा भौतिक अवशेषों के रूप में मिलता है। चूँकि हम हड़प्पाई लिपि को पढ़ नहीं पाए हैं, इसलिए उनके धर्म के आध्यात्मिक पहलू के बारे में कुछ भी बताना कठिन है, लेकिन भौतिक अवशेषों की प्रचुरता के कारण, हम हड़प्पा के लोगों के धर्म के दूसरे यानी कर्मकांडीय पक्ष के बारे में कुछ जान सकते हैं।

उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर हम कह सकते हैं कि सिंधु सभ्यता के लोगों के धर्म के तत्त्व ये थे : (1) मातृ-देवी की पूजा; (2) एक पुरुष देव, संभवतः शिव की पूजा; (3) पशुओं, प्राकृतिक, अर्ध-मानवीय अथवा काल्पनिक प्राणियों की पूजा; (4) पेड़ों की उनकी प्राकृतिक दशा में अथवा उनके भीतर रहने वाली आत्माओं के रूप में पूजा; (5) पत्थरों या अन्य वस्तुओं; जैसे- लिंग और योनि के प्रतीकों की पूजा; (6) क्रीमेथीइज्म, जिसका एक उदाहरण धूपदानों की पूजा है; (7) ताबीजों और तंत्र-मंत्र में विश्वास, उनकी प्रेत-भीति का सूचक है, और (8) योगाभ्यास। इन विशेषताओं से यह प्रतीत होता है कि यह धर्म मुख्य रूप से यहीं देश में ही पनपा, बढ़ा था और यह "हिंदू धर्म का ही एक पूर्व-प्रजनक है", क्योंकि हिंदूधर्म में भी इनमें से अधिकांश विशेषताएँ पाई जाती हैं।

हड़प्पा में मिट्टी की नारी-मूरतें बड़ी संख्या में मिली हैं। इनके विषय में यह मत स्वीकार किया गया है कि ये महामातृ-देवी की मूरतें हैं। हड़प्पा में मिली एक मूर्तिका में स्त्री के गर्भ से निकलता हुआ ए पौधा दिखाया गया है, यह संभवतः पृथ्वी माता के प्रतिमा है। एक मूर्तिका में एक पुरुष को हाथ में चा लिए हुए और स्त्री को हाथ उठाए हुए दिखाया गया है।

एक मुहर पर एक पुरुष देवता को तीन मुखों के साथ चित्रित किया गया है; वह एक योगी की मुद्रा में नीचे सिंहासन पर बैठा है और उसके दोनों ओर दो पशु दिखलाए गए - दाहिनी ओर हाथी तथा बाघ हैं और बाईं ओर गैंडा और भैंसा है, दो हिरन सिंहासन के नीचे खड़े हैं। "यह देव ऐतिहासिक शिव का आद्यरूप है।" इस मुहर में शिव का पशुपति रूप चित्रित किया गया है। इस मुहर में ऐतिहासिक शि की अंतिम विशेषता भी दिखाई गई है, यानी उसके सिर पर दो सींग लगे हैं और बीच में एक उभाड़ है. जो शैवों के त्रिशूल जैसा प्रतीत होता है। एक अन्य मुहर में एक देवता को योग के उसी आसन में दिखाया गया है और एक नाग दोनों ओर हाथ उठाकर उसके सामने घटने टेककर प्रार्थना कर रहा है।



कुछ लिंग और योनि जैसी वस्तुएँ भी मिली हैं। कुछ विद्वानों की राय है कि ये लिंग या योनि नहीं * बल्कि खेलने की गोटियाँ/मोहरे हैं। किंतु, कालिबंगन में एक ऐसी मिट्टी की पट्टिका मिली है, जिसमें एक माथ लिंग और योनि के प्रतीक बने हुए हैं, जैसे कि ऐतिहासिक युग में पाए जाते हैं। इससे यही प्रतीत होता है कि ये पूजा के लिए बनाए गए लिंग और योनि के प्रतीक थे, लेकिन यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि वे स्वतंत्र रूप से पूजे जाते थे या शिव तथा शक्ति के प्रतीक के रूप में।

हड़प्पा संस्कृति में वृक्ष को दो रूपों में पूजे जाने का साक्ष्य भी मिलता है। एक रूप में वृक्ष को उसके अपने प्राकृतिक रूप में पूजा जाता था, और दूसरे रूप में वृक्ष की नहीं बल्कि वृक्ष में निवास करने वाली आत्मा की पूजा की जाती थी। मोहनजोदड़ो में पाई गई एक विशिष्ट मुहर में एक देवता को पीपल के वृक्ष की दो शाखाओं के बीच में खड़ा हुआ दिखाया गया है। सात मानव आकृतियाँ एक पंक्ति में खड़े होकर उसकी पूजा कर रही हैं और एक लंबे बालों वाली आकृति भक्ति-भाव से आधे घुटने टेककर नतमस्तक है, उसके पीछे एक बकरा/बकरी है, जिसका मुँह आदमी जैसा है। इस धार्मिक परंपरा का सातत्य भरहुत और साँचो की प्रतिमाओं में पाया जाता है, जिनमें यक्षियों को वनदेवी के रूप में दिखाया गया है।

पशु-पूजा प्रचलित होने का साक्ष्य मुद्राओं, मुद्रांकों, मिट्टी की प्रकाचित वस्तुओं और पत्थर की छोटी-छोटी मूर्तियों में भी पाया जाता है। प्रथमतः, अनेक प्रकार के मिथकीय और मिश्रित प्राणी चित्रित किए गए हैं; जैसे - मानव मुखवाला बकरा अथवा ऐसे प्राणी जिनका आधा शरीर मेढ़े का अथवा बकरे का हो, या साँड या हाथी का हो, तीन-सिरों वाला काल्पनिक प्राणी, आधे मनुष्य और आधे गाय के शरीर वाले प्राणी; दूसरे, बहुत-सी मुहरों पर एक-श्रृंगी पशु का चित्रण मिलता है, यह जानवर संभवतः मिथक कथाओं में पाया जाता है; तीसरे, प्राकृतिक जानवर हैं; जैसे- (i) पानी का भैंसा (जल महिष); (ii) गौर; (iii) भारतीय कूबड़वाला साँड या जेबू; (iv) गैंडा; (v) एक छोटे सींगों वाला बिना कूबड़ वाला साँड; (vi) बाघ; और (vii) भारतीय हाथी। उत्तरवर्ती काल में इन जानवरों ने भिन्न-भिन्न हिंदू देवताओं के वाहन का रूप ले लिया; जैसे- शिव का वाहन नंदि (साँड), दुर्गा का वाहन सिंह, यम का वाहन भैंसा और इंद्र का वाहन हाथी।



गुजरात, राजस्थान और हरियाणा के पुरास्थलों से बहुत-सी अग्नि वैदियाँ अथवा अग्निकुंड पाए गए हैं। कालिबंगन, लोथल और बनावली में, अनेक ऐसी अग्नि-वेदिकाएँ पाई गई हैं, जिनका सभवतः यज्ञ-वेदिकाओं के रूप में प्रयोग किया जाता था। इसके अलावा स्वस्तिक जो हिंदुओं, बौद्धों और जैनों के लिए एक पवित्र प्रतीक है, मुहरों, चित्रकारियों तथा मृद्भांडों आदि पर चित्रित किया गया है।

हड़प्पाई लोगों का एक पक्ष और है, उस पर भी विचार कर लेना आवश्यक है। मिट्टी की बहुत-सी मूरतों के द्वारा भिन्न-भिन्न योगासन प्रस्तुत किए गए हैं, जिससे यह प्रकट होता है कि हड़प्पाई लोग योगासन किया करते थे।

सामाजिक स्तरीकरण एवं राजनीतिक ढांचा

हड़प्पाई समाज तीन वर्गों में बँटा हुआ प्रतीत होता है: पहला, विशिष्ट वर्ग, जो नगर-दुर्ग से जुड़ा था; दूसरा, खुशहाल मध्यम वर्ग, और तीसरा, अपेक्षाकृत कुछ कमजोर वर्ग; जो नगर के निचले हिस्से में रहता था। आमतौर पर ये तीनों हिस्से परकोटे से घिरे होते थे। कुछ शिल्पी और श्रमिक नगर के परकोटे से बाहर की बस्तियों में भी रहते थे। यह विभाजन केवल आर्थिक घटकों पर आधारित था अथवा इसका कोई सामाजिक-धार्मिक आधार भी था, यह आसानी से नहीं कहा जा सकता। कालिबंगन में ऐसा प्रतीत होता है कि पुरोहित लोग दुर्ग के ऊपरी भाग में रहते थे और निचले भाग में स्थित अग्नि- वेदिकाओं पर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराते थे।

हड़प्पा की सभ्यता के समय राजनीतिक ढाँचा कैसा था, यह निश्चित रूप से कह पाना कठिन है। अकसर सिंधु साम्राज्य की चर्चा की जाती है, जिसका निहितार्थ यह हुआ कि संपूर्ण क्षेत्र एक राजधानी से प्रशासित होता था और उसके कुछ प्रादेशिक प्रशासन-केंद्र थे अथवा उसके प्रांतों की राजधानियों थीं। किंतु यह भी संभव है कि संपूर्ण क्षेत्र कई स्वतंत्र राज्यों, रजवाड़ों में बँटा हुआ था और उनमें से प्रत्येक की एक अलग राजधानी थी; जैसे- सिंध में मोहनजोदड़ो, पंजाब में हड़प्पा, राजस्थान में कालिबंगन, गुजरात में लोथल। स्मरण रहे कि ईसापूर्व प्रथम सहस्राब्दी में, यद्यपि संपूर्ण उत्तर भारत में पुरातत्त्वीय संस्कृति लगभग एक समान थी, फिर भी संपूर्ण क्षेत्र सोलह स्वतंत्र महाजनपदों में विभाजित था, जिनकी अपनी-अपनी राजधानी थी।

मृतकों का संस्कार

कई बड़े पुरास्थलों पर छितरी हुई शव-समाधियाँ और सुनियोजित शवाधान भूमियार कब्रिस्तान मिले हैं। बस्तियों के आकार और उनकी अनुमानित जनसंख्या की तुलना में कंकाल-अवशेष बहुत कम मिले हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शवदाह की पद्धति भी साथ-साथ चल रही थी। यह बात वहाँ अस्थि-कलशों अथवा मनुष्य की दग्ध ह‌ड्डियों के अन्य पात्रों की उपस्थिति से साबित होती है, जिनके पास मृतक के आगामी जीवन में प्रयोग के लिए भेंट किए हुए पात्र भी मिले हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि कुछ समुदाय ही शवों को दफनाते थे। आम प्रथा यह थी कि नर कंकाल (शव) को, खोपड़ी को उत्तर की तरफ रखते हुए सीधी, विस्तारित-स्थिति में समाधि के फर्श पर रखा जाता था। अन्न आदि से भरे हुए मिट्टी के पात्र कब्र में रखे जाते थे और कुछ मामलों में तो शव को आभूषणों के साथ ही दफना दिया जाता था।

कालानुक्रम

जब 1920 के दशक में सर्वप्रथम हड़प्पाई सभ्यता को पहचाना गया, तब उसका काल-निर्धारण प्रमुख रूप से मेसोपोटामिया में उर और किश स्थलों पर प्राप्त हड़प्पाई मुद्राओं के आधार पर किया गया। उस आधार पर मार्शल के विचार से हड़प्पाई सभ्यता ई.पू. 3250 से 2750 ई.पू. तक फलती-फूलती रही थी। व्हीलर ने इसका काल 2500-1500 ई.पू. माना। उसके बाद काल-निर्धारण की रेडियो कार्बन विधि का आविष्कार हो गया और इस विधि से इस सभ्यता का काल-निर्धारण इस प्रकार किया गया :

पूर्व हड़प्पाई चरण : लगभग 3500-2600 ई.पू.

परिपक्व हड़प्पाई चरण : लगभग 2600-1900 ई.पू.

उत्तर हड़प्पाई चरण : लगभग 1900-1300 ई.पू.

परिपक्व हड़प्पाई चरण को 700 वर्ष काल माना जाए तो यह बहुत अधिक लंबा समय होगा, जिसमें लगभग 30 पीढ़ियाँ गुजर जाएँगी। इतनी लंबी अवधि के दौरान तो सामाजिक संगठन, राजनीति, भाषा और यहाँ तक कि धर्म में भी बहुत-से परिवर्तन हो गए होंगे। हम जानते हैं कि समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया में तो 100 वर्षों की अवधि में ही बहुत-से राज्यों का उत्थान-पतन हो गया।

लगभग 1900 ई.पू. के बाद, हड़प्पाई सभ्यता की एकरूपता कमजोर हो गई और प्रादेशिक रूपांतर उत्पन्न होने लगे।

पतन



जॉन मार्शल और अन्य अनेक विद्वानों ने सिंधु नदी क्षेत्र के पुरास्थलों से प्राप्त साक्ष्य के आधार पर, यह महसूस किया कि इस सभ्यता का पतन पर्यावरण की खराबी के कारण हुआ। कृषि भूमि के लिए वनों की कटाई और ईंधन के लिए इमारती लकड़ी के इस्तेमाल और संसाधनों के अनाप-शनाप दुरूपयोग आदि के परिणामस्वरूप जमीन बंजर हो गई और नदियों में गाद भर गई। इन सब बातों के कारण, बाढ़, सूखे और अकाल की स्थितियाँ बार-बार उत्पन्न होने लगीं, जिससे अंततः इस सभ्यता का पतन हो गया। व्हीलर, जिसने इस सभ्यप्ता का कालू 2500 से 1500 ई.पू. माना था, के मतानुसार यह सभ्यता बर्बर आर्यों द्वारा नष्ट कर दी गई, जो भारत में 1500 ई.पू. के आस-पास आए थे। परवर्ती अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया कि व्हीलर की यह स्थापना/धारणा कि आर्य लोग हड़प्पाई सभ्यता का नाश करने वाले थे, मात्र एक मिथक थी। तथ्य यह है कि 5000 ई. पू. से 800 ई.पू. तक के समय में पश्चिमी या मध्य एशिया से सिंधु या सरस्वती की घाटियों में किसी आक्रमण अथवा सामूहिक आप्रवास का कोई पुरातात्त्विक जैविक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। इस अवधि में पाए गए सभी नर कंकाल एक ही समूह के लोगों के थे।

हड़प्पाई सभ्यता एक बड़े क्षेत्र में फैली हुई थी और सभी प्रदेशों में उसके पतन के कारण एक-जैसे नहीं हो सकते। सारस्वत प्रदेश में तो इसका पतन मुख्य रूप से नदी धाराओं के बदलने 'अथवा स्थानांतरण के कारण हुआ, लेकिन सिंधु नदी के तटीय क्षेत्रों में बार-बार आने वाली बाढ़ों की वजह से अधिकतर इस सभ्यता का पतन हुआ। आमतौर पर सर्वत्र वर्षा की कमी होती गई, जिससे खेती जो कि वहाँ का मुख्य आर्थिक संसाधन थी, प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुई। आर्थिक स्थिति में गिरावट आ जाने से शेष सभी संस्थाओं; जैसे - व्यापार एवं वाणिज्य, प्रशासनिक एवं राजनीतिक ढाँचा, नागरिक सुख- सुविधाओं आदि में धीरे-धीरे गिरावट आ गई।

फिर भी यह बता देना जरूरी होगा कि हड़प्पाई सभ्यता अचानक लुप्त नहीं हुई। पुरातात्त्विक साक्ष्य से पता चलता है कि पतन क्रमिक रूप से और 'धीरे-धीरे हुआ, जिससे अधःस्थिति को प्राप्त होने में लगभग 1900 से 1300 ई.पू. तक का 600 वर्षों का समय लग गया।



उत्तर हड़प्पाई संस्कृतियाँ

जब एक बार हड़प्पाई सभ्यता का पतन शुरू हो गया तो इस सभ्यता के शहरी चरण की सभी विशेषताएँ एक-एक कर लुप्त होती चली गईं। नगर योजना, सड़कों का जाल (ग्रिड), मलजल निकासी की व्यवस्था, मानक माप-तौल की प्रणाली जैसी खूबियाँ धीरे-धीरे लुप्त हो गईं और विशिष्ट प्रादेशिक रूपांतरों के साथ एक प्रकार की ग्रामीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। हड़प्पाई सभ्यता के संपूर्ण क्षेत्र को मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है : (i) उत्तर भारतीय उत्तर-हड़प्पाई संस्कृति का क्षेत्र; जिसमें पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के पाकिस्तानी हिस्से शामिल हैं; (ii) गुजरात तथा महाराष्ट्र; और (iii) बलूचिस्तान। ये संस्कृतियाँ भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की तत्कालीन ताम्रपाषाण संस्कृतियों के साथ परस्पर संपर्क एवं आदान-प्रदान करती रहीं।

इन तीनों क्षेत्रों में कुछ अवशिष्ट विशेषताएँ, जैसे - मृद्भांडों के कुछ रूप, कांस्य उपकरण, मनके और अन्य छोटी वस्तुएँ हड़प्पाई सभ्यता के साथ अपना संपर्क-संबंध दर्शाती हैं। यद्यपि हड़प्पाई सभ्यता 1300 ई.पू. के आसपास लुप्त हो चुकी थी, फिर भी इस सभ्यता में विकसित अनेक सांस्कृतिक विशेषताएँ हमारे दैनिक सांस्कृतिक और भौतिक जीवन में देखी जा सकती हैं।

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