कॉंग्रेस कथा कही न जाए
भारत औपचारिक लोकतंत्र बहुत पुराना नहीं है। यह अभी भी सीख रहा है। हर पार्टी की अपनी भूमिका होती है। सत्ता पक्ष शासन करता है। विपक्ष सवाल पूछता है। यह व्यवस्था का आधार है। लेकिन सवाल पूछने का एक तरीका होता है। तरीका बिगड़ जाए तो लोकतंत्र कमजोर होता है। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस की भाषा बदली है। राहुल गांधी के बयान अधिक तीखे हुए हैं। यह बदलाव कई लोगों को असहज करता है। राहुल गांधी की भाषा कहीं से भी लोक की भाषा नहीं लगती है और यह गलत भी है। पार्टियां औपचारिक लाभार्थी होती है, किसी भी लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया का। शासन, प्रशासन, अर्थ, विकास सहित भौगोलिक सामरिक समझ आदि की प्रकृति गंभीर होती है. नौटंकी नहीं।
कांग्रेस अक्सर कहती है कि मीडिया नियंत्रित है। यह आरोप बार बार दोहराया जाता है। परंतु भारत में सैकड़ों चैनल हैं। हजारों अखबार हैं। डिजिटल मंच असंख्य हैं। हर विचारधारा को जगह मिलती है। ऐसे में पूर्ण नियंत्रण का दावा कमजोर लगता है। यह दावा असल में एक बचाव जैसा लगता है। जब तर्क कमजोर पड़ते हैं तब व्यवस्था को दोष देना आसान होता है।
चुनाव आयोग हो या न्यायपालिका हो। हर संस्था पर सवाल उठाए जाते हैं। सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन हर हार के बाद संस्था को दोष देना अलग बात है। यह आदत लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है। जनता संस्थाओं पर भरोसा खोने लगती है। यह भरोसा बनाने में दशक लगते हैं। तोड़ने में कुछ बयान काफी होते हैं। नीतियों पर बहस होनी चाहिए। योजनाओं की समीक्षा होनी चाहिए। परंतु बहस अक्सर व्यक्ति पर केंद्रित हो जाती है। नेता की नीयत पर सवाल उठाए जाते हैं। उसकी छवि को निशाना बनाया जाता है। यह तरीका राजनीतिक चर्चा को कमजोर करता है। जनता नीति नहीं सुनती। जनता आरोप सुनती है। इससे लोकतांत्रिक संवाद का स्तर गिरता है।
राजनीतिक कार्यक्रमों में कई बार ऐसे वक्ताओं को बुलाया जाता है जो केवल विरोधी को अपमानित करने के लिए जाने जाते हैं। हास्य एक कला है। परंतु जब हास्य का उपयोग केवल अपमान के लिए हो तो वह कला नहीं रहता। वह प्रचार का हथियार बन जाता है। गंभीर राजनीतिक मंच पर ऐसे वक्ताओं की उपस्थिति सवाल खड़े करती है। यह दिखाता है कि गंभीर तर्क की जगह भावनात्मक अपील को प्राथमिकता दी जा रही है।
किसी भी नेता को अपने समर्थकों की आलोचना करने का अधिकार है। परंतु जब आम मतदाता को अपमानजनक शब्दों से पुकारा जाता है तो यह गंभीर बात है। मतदाता लोकतंत्र की आत्मा है। मतदाता का अपमान लोकतंत्र का अपमान है। यह प्रवृत्ति चिंताजनक है। इससे यह संदेश जाता है कि असहमति रखने वाले नागरिक को सम्मान नहीं मिलेगा।
असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है। विरोध लोकतंत्र का अधिकार है। परंतु हर विरोध को व्यवस्था के विनाश की भाषा में नहीं बदला जा सकता। जब विरोध की भाषा अत्यधिक आक्रामक हो जाती है तब यह लोकतंत्र की सेवा नहीं करती। यह अस्थिरता की भाषा बन जाती है। स्थिर लोकतंत्र के लिए संयमित विपक्ष आवश्यक है। संयम के बिना विपक्ष केवल शोर बन जाता है।
कुछ नेता ऐसे होते हैं जो संकट में स्थायित्व खोजते हैं। कुछ नेता संकट को स्थायी बना देते हैं। जब कोई नेता हर हार के बाद व्यवस्था को अवैध बताने लगे तो यह प्रवृत्ति खतरनाक होती है। यह प्रवृत्ति कुछ अन्य देशों में देखी गई है जहां नेतृत्व और संकट एक साथ जुड़ गए। यह केवल एक तुलना है। यह कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं है। पाठक इसे एक चेतावनी की तरह देख सकते हैं।
संभावित कारण जो इस भाषा के पीछे हो सकते हैंI
यहां जो लिखा जा रहा है वह अनुमान है। पहला कारण यह हो सकता है कि वर्तमान नेतृत्व को लगातार चौथी बार जनादेश मिलने की संभावना बढ़ रही है। यह संभावना विपक्ष के लिए चिंता का विषय बन सकती है। लंबे समय तक सत्ता से दूर रहना किसी भी दल के लिए कठिन होता है। यह कठिनाई भाषा में झलक सकती है।
दूसरा कारण क्षेत्रीय हो सकता है। पड़ोसी देश में जो राजनीतिक अस्थिरता देखी गई है उसने उस विचारधारा को कमजोर किया है जो दशकों तक एक विशेष कथानक का आधार रही थी। जब वह आधार कमजोर होता है तो पुराने कथानक पर निर्भर राजनीति भी कमजोर होती है। यह स्थिति असहजता पैदा कर सकती है।
तीसरा कारण आंतरिक हो सकता है। कई बार यह कहा जाता है कि किसी संगठन विशेष की सामाजिक शाखाएं ही समस्या हैं। परंतु ध्यान से देखें तो असली चुनौती नेतृत्व के अपने कथानक में है। जब कथानक जनता से नहीं जुड़ता तब दोष बाहर खोजा जाता है। यह एक सामान्य राजनीतिक प्रवृत्ति है। इसे केवल एक दल तक सीमित नहीं समझना चाहिए।
राजनीतिक भाषा समाज को प्रभावित करती है। जब नेता आक्रामक भाषा बोलते हैं तो समर्थक भी वैसी ही भाषा अपनाते हैं। यह चक्र सामाजिक तनाव बढ़ाता है। परिवारों में राजनीतिक बहस कड़वी होती जाती है। मित्रता राजनीतिक मतभेद की भेंट चढ़ जाती है। यह किसी भी समाज के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है।
यह सच है कि मीडिया में कुछ पक्षपात देखा जाता है। यह किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं है। हर विचारधारा के समर्थक अपने पसंदीदा चैनल चुनते हैं। यह चुनाव दर्शकों की प्रवृत्ति को दर्शाता है। इसे पूरी तरह नियंत्रण कहना अतिशयोक्ति हो सकती है। संतुलित दृष्टिकोण यही मांगता है कि आरोप के साथ प्रमाण भी दिए जाएं। मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष आवश्यक है। विपक्ष का काम सरकार को जवाबदेह बनाना है। यह काम तथ्यों से होना चाहिए। यह काम नीति विश्लेषण से होना चाहिए। जब विपक्ष केवल आरोप और अपमान पर निर्भर हो जाता है तब वह अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटता है। जनता एक विकल्प चाहती है। विकल्प का अर्थ केवल विरोध नहीं होता। विकल्प का अर्थ एक स्पष्ट दिशा होता है।
यह निष्पक्ष विश्लेषण तभी पूरा होगा जब सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी भी स्वीकार की जाए। किसी भी सरकार को आलोचना से परे नहीं समझा जा सकता। संस्थाओं की स्वतंत्रता बनाए रखना सत्ता पक्ष का भी दायित्व है। आलोचकों के साथ संवाद बनाए रखना परिपक्व शासन की निशानी है।
यह लेख एक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यह दृष्टिकोण उन नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है जो वर्तमान विपक्षी भाषा से असहमत हैं। यह दृष्टिकोण अंतिम सत्य नहीं है। लोकतंत्र में हर विचार को स्थान मिलना चाहिए। हर पाठक को अपना निर्णय स्वयं लेना चाहिए। निष्पक्षता के लिए दूसरा पक्ष भी संक्षेप में रखना जरूरी है। कांग्रेस और उसके समर्थक यह तर्क देते हैं कि तीखी भाषा वास्तविक चिंताओं से उपजी है। वे मानते हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव के मामले वास्तव में सामने आए हैं। वे यह भी कहते हैं कि आलोचना को राष्ट्रविरोधी बताना असहमति को दबाने का तरीका है।
कश्ती भी नहीं बदली दरिया भी नहीं बदला
और डूबने वालों का जज़्बा भी नहीं बदला
है शौक़-ए-सफ़र ऐसा इक उम्र से यारों ने
मंज़िल भी नहीं पाई रस्ता भी नहीं बदला
कांग्रेस का संकट: राहुल गांधी
कांग्रेस की हार पर बहस फिर तेज़ है। सोशल मीडिया पर 99 हार की एक सूची घूम रही है। मैं इस गिनती को पक्का नहीं मानता। पर सवाल असली है। कांग्रेस बार बार क्यों पिछड़ती है।
कार्यकर्ता किसी पार्टी की रीढ़ होते हैं। पर चुनाव सिर्फ़ उनके भरोसे नहीं जीता जाता। जनता को नेता पर यक़ीन चाहिए। जनता को साफ़ मुद्दे चाहिए। जनता को जीत की उम्मीद भी चाहिए। इनमें से कुछ भी कम हो तो मेहनत बेकार जाती है।
राहुल गांधी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला है। चुनाव आयोग इसे सूची की सफ़ाई कहता है। कांग्रेस और उसके सहयोगी कहते हैं कि इससे असली मतदाता छूट सकते हैं।
मेरी राय अलग है। मैंने मोहल्लों कॉलेजों दफ़्तरों और रेलवे स्टेशनों पर आम लोगों से बात की। लोग इस तथाकथित आंदोलन को पसंद करते नहीं दिखे। वे महँगाई रोज़गार और सड़क की बात करते हैं। सूची की तकनीकी बहस उन्हें नहीं छूती। इसके पक्ष में सिर्फ़ कांग्रेस कार्यकर्ता दिखे। यह कोई सर्वे नहीं है। यह मेरा निजी अनुभव है। यह अनुभव अकेला नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ बिहार में वोटर अधिकार यात्रा और चुनाव आयोग विरोधी मुहिम को जनता का साथ नहीं मिला। इसलिए मुझे डर है कि यह मुद्दा पार्टी को फ़ायदा नहीं देगा। यह मेरा आकलन है। कांग्रेस को कुछ बुनियादी काम करने होंगे। संगठन को गाँव और बूथ तक मज़बूत करना होगा। स्थानीय नेताओं को खुली छूट देनी होगी। वही मुद्दे उठाने होंगे जो जनता रोज़ महसूस करती है। गठबंधन में बराबरी का रवैया रखना होगा। राहुल गांधी पार्टी की सच्ची चुनौती है। उसे आत्ममंथन करना होगा। जनता से जुड़े बिना कोई आंदोलन टिकता नहीं।
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