महाभारत : धर्म और अधर्म का महाआख्यान
प्रस्तावना — महाभारत का परिचय एवं महत्त्व महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं है — यह मानव-जीवन का विशालतम दर्पण है। इसमें सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म, प्रेम और घृणा, त्याग और लोभ — जीवन के समस्त द्वन्द्वों का अभूतपूर्व चित्रण है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह ग्रन्थ न केवल भारत की, अपितु सम्पूर्ण मानवता की अमूल्य धरोहर है। धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥ अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों के विषय में जो इस ग्रन्थ में है, वह अन्यत्र भी मिल सकता है, किन्तु जो इसमें नहीं है, वह कहीं भी नहीं मिलेगा। (महाभारत, आदिपर्व १.५६) महाभारत का मूल प्रतिपाद्य विषय धर्म है। यह ग्रन्थ हमें सिखाता है कि धर्म क्या है, अधर्म क्या है, और इन दोनों के बीच संघर्ष में मनुष्य को किस मार्ग पर चलना चाहिए। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो परिवारों का संघर्ष नहीं था — यह धर्म और अधर्म के बीच का शाश्वत संग्राम था। इस लेख में हम महाभारत के धर्म-आख्यान को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। संस्कृत श्लोकों के माध्यम से मूल...