मूल्य को लेकर भारतीय मानसिकता
भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण देश है। यहाँ की सभ्यता, संस्कृति और परंपराएँ विश्व में अनूठी हैं। परंतु आर्थिक व्यवहार के मामले में हमारे समाज में एक विचित्र और विरोधाभासी प्रवृत्ति देखी जाती है। हम महँगी विदेशी वस्तुओं को खरीदते समय तो मुँह नहीं खोलते, किंतु जब देश के अपने पेशेवरों — शिक्षकों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और वास्तुकारों — की बात आती है, तो हम उनकी फीस पर सवाल उठाने लगते हैं। यह मानसिकता न केवल अनुचित है, बल्कि यह हमारे राष्ट्रीय विकास में एक बड़ी बाधा है। शिक्षा — सस्ती फीस का महँगा परिणाम शिक्षा को हमेशा से एक पवित्र कार्य माना गया है। गुरु-शिष्य की परंपरा में ज्ञान का आदान-प्रदान निःस्वार्थ भाव से होता था। परंतु आधुनिक युग में, जब शिक्षण एक पूर्णकालिक पेशा बन चुका है और शिक्षकों को भी परिवार का भरण-पोषण करना है, तब 'शिक्षा मुफ्त होनी चाहिए' की माँग एक अव्यावहारिक आदर्श बन जाती है। सोचिए — एक योग्य व्यक्ति जिसने वर्षों की मेहनत से अपनी विशेषज्ञता अर्जित की है, क्या वह किसी ऐसे संस्थान में पढ़ाएगा जो उसे उचित वेतन नहीं दे सकता? उत्तर स्पष्ट है — नहीं। परिणामस्वरूप, कम फ...