भारत : ऐतिहासिक संदर्भ
भारत का वर्णन विष्णु पुराण (२.३.१)इस प्रकार करता है
उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।
अर्थात समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो देश है उसे भारत कहते हैं तथा उसकी संतानों (नागरिकों) को भारती कहते हैं। भारत नाम के संदर्भ भारत के प्राचीन ग्रंथों मे निर्विवाद रूप से मिलते है। इसका वर्णन भारत एक: नाम अनेक के रूप मे किया जा सकता है।
ऋग्वैदिक संदर्भ-
जन॑स्य गो॒पा अ॑जनिष्ट॒ जागृ॑विर॒ग्निः सु॒दक्ष॑: सुवि॒ताय॒ नव्य॑से ।
घृ॒तप्र॑तीको बृह॒ता दि॑वि॒स्पृशा॑ द्यु॒मद्वि भा॑ति भर॒तेभ्यः॒ शुचि॑: ऋग्वेद 5/11/1
वि॒श्वामि॑त्रस्य रक्षति॒ ब्रह्म॒दं भार॑तं॒ जन॑म् ऋग्वेद 3/53/12
व्यष्टिं व्यानशे येऽयं भरतानां शतपथ ब्राह्मण (13/5/4/11)
ऋग्वेद में हिमालय और मुजावंत पर्वत उत्तर में स्थित बताया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख है, जिनमें पूर्व में गंगा और पश्चिम में कुभा (काबुल) शामिल हैं, और यमुना, सरस्वती, सतलज, रावी, झेलम और सिंधु जैसी नदियाँ गंगा और काबुल के बीच स्थित हैं। परंतु ऋग्वेद मे सरस्वती नदीतिमा है अर्थात नदियों की माता। वैज्ञानिक साक्ष्य और उनके इर्द-गिर्द घूमते ऐतिहासिक, पुरातात्विक और भौगोलिक तथ्य सरस्वती की गवाही दे रहे हैं।
“आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शूर॑ इष॒व्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यां” (यजुर्वेद 22/22)
ब्रह्म ज्ञान से विज्ञ विद्वानों तथा शत्रुओं को परास्त करने मे कुशल शूरवीरों से सुसज्जित एक शक्ति सम्पन्न राष्ट्र के रूप मे प्रतिष्ठित होने के कारण ही ‘भा’ अर्थात ज्ञान मे ‘रत’ रहने वाले शौर्य, तेज से परिपूर्ण इस अद्वितीय देश मात्र के साथ ‘वर्ष’ अलंकारण लगा।
वायु पुराण (45/76) व मत्स्य पुराण (114/5,6) के अनुसार भी लोगों के भरण तथा पालन करने के कारण, इस देश के शासक (मनु) को भारत कहा जाता है। निरुक्त के अनुसार भी इस देश को भारत ही कहा गया है।
भरणाच्च प्रजानां वै मनुर्भरत उच्यते ।
निरुक्तवचनाच्चैव वर्षं तद् भारतं स्मृतम् ॥
कभी कभी भारत का अभिप्राय भाषा भी रहा है जो की इस भूभाग मे बोली जाती है। अमरकोश (6/1/1) में ब्राह्मी को “भारती भाषा” कहा गया है-
ब्राह्मी तु भारती भाषा
विष्णु पुराण स्पष्ट रूप से भारत की भौगोलिक स्थिति एवं यहाँ निवास करने वाली प्रजा का वर्णन करता है
उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः ॥
परंपरा से यह ज्ञात होता है कि भरतादि राजाओं के नाम पर इस देश के नामकरण हुआ है। परंतु महाभारत, आदि पर्व (74/2) का कथन इस संबंध उल्लेखनीय है। इसके अनुसार यद्यपि दुष्यंत भरत की कीर्ति के कारण भारतकुल विख्यात हुआ, किन्तु उसके वंश में पूर्ववर्ती व परवर्ती राजाओं को भी भारत के नाम से ही जाना जाता रहा।
भरताद् भारती कीर्तिर्येनेदं भारतं कुलम्, अपरे च ये च पूर्वे वै भारता इति विश्रुतः।
अन्न ते वर्णयिष्यामि वर्ष भारत भारतम्, प्रियमिन्द्रस्य देवस्य मनोर्वैवस्वतस्य च।
पृथोश्च राजन्वैन्यस्य तथेक्ष्वाकोर्महात्मनः, ययातेरम्बरीषस्य मान्धातातुर्नहुषस्य च।
अन्देषां च महाराज क्षत्रियाणां बलीयसाम्, सर्वेषामेव राजेन्द्र प्रियं भारत भारतम्
(भीष्म पर्व अध्याय 10)
वास्तव मे यह भारत के यशस्वी राजाओं की लंबी शृंखला का वर्णन है।
यूरोपीय संदर्भ
जहां तक यूरोपीय संदर्भों का प्रश्न है यूरोपीय देशों में “इन्दिया” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग हेरोडोट्स ने पाँचवी सदी ई.पू. मे किया है। इसी प्रकार हखामनी वंश (521-486 ई.पू.) के दौरान पर्सपोलिस, नक्सेरूस्तम और सुसा में उत्कीर्ण अभिलेखों में हखामनी शासन के अंतर्गत आने वाले देशों की गणना में “हिन्द” का उल्लेख सुग्ध, बाख्बी, गान्धार के साथ किया गया। जिससे यह स्पष्ट होता है कि यहाँ “हिन्द” शब्द सिंध प्रदेश का वाचक शब्द रहा था।
पारसीको से “हिन्दु” या “हिन्द” शब्द, अरबी लेखकों ने छठी या सातवीं सदी में लिया।अरबों का तत्कालीन भारत के विषय में पूर्व काल से ही अधिक परिचय रहा था। अत: उन्होंने “हिंद” शब्द को “सिंद” से पृथक् कर, इसे वृहत्तर भारत के लिए प्रयुक्त किया।
हान् वंश के काल के इतिहासकारों ने सिंध और हिन्द के लिए “शेन्-तु” व “हियेन्-तु” या फिर “यिन्-तु” क प्रयोग किया, किन्तु दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में भारत के लिए हिन्दु शब्द अथवा इसका रूपान्तर मिलता है।
कम्बुज में प्रचलित जनश्रुति है कि आर्यदेश के राजा कम्बु ने कम्बुज देश (कम्बोडिया) की प्रतिष्ठा की थी।
भारतवर्ष” का यह नाम, वस्तुतः भारतीयों ने अपने देश के लिए ही स्वीकृत किया था, जबकि इसका हेन्दवा – हिन्दु – हिन्दुस्तान या फिर इन्दिया-इण्डिया आदि नाम विदेशियों द्वारा दिए गए हैं। कालान्तर में विदेशी हुक्मरानों द्वारा इन नामों के निरंतर प्रयोग के प्रभाववश सदियों उपरान्त भारतीयों ने भी अंततः इसी नाम को अपनाना स्वीकार कर लिया।
पतञ्जलि ने भी पाणिनि अष्टाध्यायी के अपने महाभाष्य में आर्यावर्त की स्थिति को मिस्र के सिनाई पर्वत (आदर्श) के पूर्व तथा चीन के जिउहुआ पर्वत (कालकवन) के पश्चिम के मध्य तथा हिमालय से दक्षिण ही ठहराया है।
प्रागादर्शात् प्रत्यक् कालकवनात् दक्षिणेन हिमवन्तम्।
बोगाजकोई के उत्खनन में प्राप्त हिताइत व मितन्नी के सन्धि-पत्रों में उल्लेखित इन्-द-र (इंद्र), अ-रु-व-न (वरुण), दु-स-त्त (दस्त्र), म-र-उत्-श (मरुत) आदि का संदर्भ यह साबित करता है की इन क्षेत्रों मे भारतीयता का प्रभाव था। पश्चिम में मिस्त्र की सीमा से लेकर पूर्व में कोरिया तक की सम्पूर्ण भूमि “आर्यावर्त” के नाम से ही संबोधित होती थी।
मनुस्मृति (2/24) का संदर्भ आर्यावर्त की सीमाओं को पश्चिमी सागर (भूमध्य सागर या मेडेटिरियन सी) से लेकर पूर्व के पूर्वी सागर (पीत सागर या एलो-सी) तक मानता है -
आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात्, तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुर्बुधा।
प्राचीन संस्कृत साहित्य में आर्यावर्त नाम से उत्तर भारत के उस भाग को अभिहित किया जाता था जो पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र तक और हिमालय से विंध्याचल तक विस्तृत है।
आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्राच्च पश्चिमात्
तयोरेवान्तरंगिर्यो: हिमवतविन्ध्यों आर्यावर्त विदुर्बुधा:’ मनुस्मृति 2,22
वशिष्ठधर्मसूत्र (1.8-9) में आर्यावर्त की सीमा का निर्धारण है। यह विनशन; सरस्वती के लोप होने का स्थानके पूर्व, कालक वन (प्रयाग) के पश्चिम, पारियात्र तथा विंध्य के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में है। मनु की दृष्टि में आर्यावर्त मध्यदेश से बिलकुल मिलता है और उसके भीतर “ब्रह्मवर्त” नामक एक छोटा, परंतु पवित्रतम भूभाग है, जो सरस्वती और दृषद्वती नदियों द्वारा सीमित है। ऋग्वेद में आर्यों का निवासस्थल “सप्तसिंधु” प्रदेश के नाम से अभिहित किया जाता है।
ऋग्वेद के नदीसूक्त (10/75) में आर्यनिवास में प्रवाहित होनेवाली नदियों का एकत्र वर्णन है जिसमें मुख्य ये हैं – कुभा (काबुल नदी), क्रुगु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सिंधु, परुष्णी (रावी), शुतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), सरस्वती, यमुना तथा गंगा। यह वर्णन वैदिक आर्यों के निवासस्थल की सीमा का निर्देशक माना जा सकता है। ब्राह्मण ग्रंथों में कुरु पांचाल देश आर्य संस्कृति का केंद्र माना गया है जहाँ अनेक यज्ञयागों के विधान से यह भूभाग “प्रजापति की नाभि” कहा जाता था। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार कुरु पांचाल की भाषा ही सर्वोत्तम तथा प्रामाणिक है। उपनिषद्काल में आर्यसभ्यता की प्रगति काशी तथा विदेह जनपदों तक फैली। फलत: पंजाब से मिथिला तक का विस्तृत भूभाग आर्यों का पवित्र निवास उपनिषदों में माना गया। प्राचीन भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने पूरी पृथ्वी को सात प्रमुख द्वीपों में बाँटा था।
महर्षि पतंजलि ने अपने महाभाष्य में सप्तद्वीपा वसुमती कहकर इन सप्त द्वीपों को क्रमशः जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक व पुष्कर के नाम से वर्णित किया है। पुराणों यही नाम हैं। इन्हीं द्वीपों में से एक जम्बूद्वीप के अंतर्गत आर्यों द्वारा बसाये गए आर्यावर्त तथा भारतवर्ष नाम आते हैं। भास्कराचार्य द्वारा रचित सिद्धान्तशिरोमणि के भूगोलाध्याय में दो विशालकाय समुद्रों से घिरे हुए विशाल भू-भाग को द्वीप के रूप में परिभाषित किया गया है
द्वयोर्द्वयोरन्तरमेकमेकं समुद्रयोर्द्वीपमुदाहरन्ति।
यद्यपि भारतीय ग्रंथों में जम्बूद्वीप की स्पष्ट व्याख्या नहीं की गयी है तथापि इसमें सन्निहित नौ वर्षों यथा भारतवर्ष, किन्नरवर्ष, हरिवर्ष, कुरुवर्ष, हिरण्यवर्ष, रम्यवर्ष, इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष व केतुमालवर्ष का उल्लेख पुराणों में अवश्य मिलता हैं। पुराण-वर्णित आर्यावर्त की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप जम्बूद्वीप को सहजता से यूरेसिया के रूप में चिह्नित किया जा सकता है। वैदिक कर्मकाण्डों से पूर्व लिए जाने वाले संकल्प मंत्रों में भी हमें जम्बूद्वीप, आर्यावर्त तथा भारतवर्ष का प्रयोग सहजता से होता है।
ऋग्वेद (1/15/7 ) के अनुसार विद्या और बल में दक्ष तथा भौतिक समृद्धि से परिपूर्ण व्यक्ति के लिए द्रविण शब्द का प्रयोग किया गया। (द्ववि॒शो॒णो॒दा द्रवि॑णसो॒सो॒ ग्राव॑हस्तासो अध्व॒रे) । दक्षिण भारतवासी आर्य विद्या, बल और समृद्धि के अधिकारी होने के कारण वेदों की उपरोक्त परिभाषानुसार द्रविण कहे जाने लगे।
आचार्य शंकर ने स्वय को द्रविण शिशु कहा था। भारत का दक्षिणी प्रदेश तीन ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण व्यापार और व्यापार के कारण द्रव्य की प्रचुरता से समृद्ध होता गया। बाली के मारे जाने पर तारा ने कई बार विलाप करते हुए आर्यपुत्र कह कर ही को स्मरण किया है-
सुप्तेव पुनरुत्थाय आर्यपुत्रेति वादिनी। रुरोद सा पतिं दृष्ट्वा संवीत मृत्युदामभिः।
वा. रा. किष्किंधा. 19/27)।
सुग्रीव ने बाली की अन्त्येष्टि करने का निर्देश देते हुए कहा कि इस आर्य क अन्तिम संस्कार आर्योचित रीति से किया जाए-
आज्ञापयत् तदा राजा सुग्रीवः प्लवगेश्वरः। औवदेहिकमावस्य क्रियतामनुकूलतः
(वा. रा. किष्किंधा. 25.30)।
युद्ध में रावण के मूर्च्छित हो जाने पर सारथी द्वारा रथ को युद्धभूमि से बाहर ले जाए जाने पर सारथि को डांटते हुए उसने कहा कि अरे अनार्य तुमने आज मेरे चिरकाल से उपार्जित यश, पराक्रम, तेज और विश्वास को नष्ट कर दिया-
त्वयाद्य हि ममानार्य चिरकालमुपार्जितम्। यशो वीर्यं च तेजश्च प्रत्ययश्च विनाशितः
(वा. रा. युद्ध. 104/5)।
आर्य बनाम द्रविड़ का विवाद
यह मूलतः ‘बंटों और राज करो की नीति’ (Divide & rule) का एक विस्तार है । यह विभाजन एक आधुनिक परिघटना है इसका कोई ऐतिहासिक संदर्भ प्राप्त नहीं होता है। भारत मे जो भी मूल तत्व है, उत्तर और भारत मे समान रूप से प्राप्य है। जीनोम विशेषज्ञों के निर्देशन में तमिलनाडू की सभी जनजातियों, केरल, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश के सभी द्रविड नस्ल से प्रचारित जातियों के डी. एन. ए. गुणसूत्रों तथा उत्तर भारतीयों के डी. एन. ए. के उत्पति आधारित गुणसूत्रों के नमूनों का परीक्षण कर यह सिद्ध किया कि आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुण सूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है और यह दोनों एक ही पूर्वज की संताने ही हैं। सन् 2011 में प्रस्तुत किए गए इस अनुसंधान के निष्कर्षों ने इसके पूर्व हुए उन शोध कार्यों को भी गलत सिद्ध कर दिया जिनमें यह कहा गया है कि आर्य और द्रविण दो भिन्न मानव नस्लें हैं। हिन्दू शब्द स्वयं में ही एक भिन्न अर्थ लिए हुए है। यह वर्तमान मे हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिए प्रयुक्त होता है। इस्लामिक आक्रान्ताओं के द्वारा इस्लाम से भिन्नता दिखाने के लिए इसका प्रयोग खूब हुआ। फिर अंग्रेजों ने इस शब्द का का प्रयोग सांप्रदायिकता का पक्ष-पोषण करने की लिए किया। यह एक गलत अवधारणा है की हिन्दू की उत्पत्ति सिंधु से हुई है, क्योंकि फारस वाले अगर ‘स’ को ‘ह’ बोलते तो स्वयं अपने राष्ट्र के लिए फारस नही बल्कि फारह बोलते। स्वयं आज का ‘सिंध’ हिन्द होता।
मेरा यह मानना है की हिन्दू आज के ‘हिंदुकुश’ से उत्पन्न है- अर्थात जो जातियाँ हिंदुकुश से पूर्व थी हिन्दू मानी जाती थी। हिंदुकुश’ तब भारत वर्ष की स्वाभाविक सीमारेखा थी, हिंदुकुश के इलाके में ही भारत के इतिहास की सर्वाधिक लड़ाइयाँ लड़ी गई है। साथ ही हिंदुकुश उस पार के साम्राज्यों के लिए प्रतिरोध और उनके विस्तार का अंतिम बिन्दु रहा था. इसी कारण से वाशिंदे ‘हिन्दू’ कहलाये और वह प्रादेशिक क्षेत्र भारत वर्ष कहलाया।
राष्ट्र के प्रति निष्ठा
किसी भी कर्मकांड का यह अनिवार्य संकल्प मंत्र है -
श्रीब्राह्मणोऽह्न द्वितीय प्ररार्द्ध श्वेतवाराहकल्पे संप्रति वैवस्वतनाम सप्तममन्वंतरे अष्टाविंशतिचतुर्युगांतरे कलियुगे कलिप्रथमचरणे मार्त्तण्डाऽऽदि ग्रहमण्डले भूलोके ब्रह्मावर्तकक्षेत्रे जम्बूद्वीपान्तर्गते आर्यावर्त्ते भारतवर्षे पुण्यअमुक प्रदेशे अमुकग्रामे... ।
इस तरह इन तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि संपूर्ण विश्व अपने प्रारम्भिक काल में वैदिक संस्कृति संपन्न एक राष्ट्र ही रहा था (सा प्रथमा संस्कृति विश्वारा-यजुर्वेद-7/14) जिसका वर्णन यजुर्वेद (22-22) में किया गया है। कालक्रम में ये विखण्डित हुए और फिर विभिन्न समूहों (कबीलों) के क्षेत्र, राज्यों के व्यवस्थित स्वरुप में अस्तित्व में आते गए । भारत की आधुनिक भौगोलिक सीमा एक स्वाभाविक राष्ट्र का सिमटा हुआ स्वरूप है, जबकि मूल राष्ट्र से विलगित होकर अस्तित्व में आए क्षेत्र प्रकारान्तर से “राष्ट्र-राज्य” (NATION STATE) के रूप में अस्तित्व मे है। इस प्रकार वेद तथा प्राचीन ग्रंथों में भारत से संबंधित व्याख्या यह प्रमाणित करती है कि भारत मात्र प्राचीन ही नहीं अपितु एक अनादि व सनातन राष्ट्र है। रामायण और महाभारत जो इस की श्रेणी में आते है भारत के विचार को पुष्ट करते है।
रामायण दो शब्दों की संधि है अर्थात राम + आयन। यहाँ यह महत्वपूर्ण है के वामपंथी इतिहासकारों ने राम को (Roam) का अपभ्रंश रूप बताया है जबकि आयन को फारसी के आईन (जैसे के आईंन-ए-अकबरी) बताकर रामायण को राम का चरित्र चित्रण कहकर उसकी ऐतिहासिकता को मिथ्या बताया गया है। सच यह है की राम भारत के नायक है जिन्होंने भारत के भूगोल को निर्धारित किया है। यहाँ यह महत्वपूर्ण है की संस्कृत शब्द ‘आयन’ का अर्थ दिशा होता है जैसे की उत्तरायण या दक्षिणायन। अर्थात रामायण अपने स्वरूप मे राम की यात्राओं को वर्णित करता है और इस तरह से राम भारत उस भूगोल को सुनिश्चित करते है जिसे विष्णु पुराण ने भारत भूमि कहा है।
विचित्रंजं बुद्वीपम् मनोहरम जीवितं मनोहराम अर्थात भारत विचित्र है, यहाँ मनुष्यों का जीवन बाद मनोहारी है’ भारत की विविधता को बताने वाले ये शब्द गौतम बुद्ध के अंतिम शब्द है जिसमे उन्होंने भारत के लोगों की विविधताओं के बारे मे स्पष्ट बात कही है। ध्यातव्य हो की इस विविधता को उन्होंने मनोहारी कहा है।
राष्ट्रप्रेम
मद्रास की हिन्दी प्रचार प्रेस द्वारा जारी 1930 मे प्रकाशित रामायण के संस्करण में एक श्लोक मिलता है जो इस प्रकार है:
मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव।
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।
इस संस्करण के मुताबिक ऋषि भारद्वाज राम से कहते है की की राम इस संसार में मित्र, धन और अन्न की इस संसार में बड़ी प्रतिष्ठा है, लेकिन मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं. आरंभिक राष्ट्रवाद का श्लोक एक अन्य रूपों मे भी रामायण के कुछ संस्करणों मे मिलता है जो इस प्रकार है;
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।
इसका प्रसंग यह है लक्ष्मण लंका जो की स्वर्णमयी (जहां नितांत भौतिकवाद का प्रतीक) है को देखकर अचंभित हो जाते है। लेकिन राम इससे अछूते है। राम लक्ष्मण से कहते है की लक्ष्मण, यह लंका सोने की होने पर भी मेरी रुचि का विषय नहीं है क्योंकि मां और मातृभूमि ही स्वर्ग से बढ़कर हैं.'
राष्ट्रवाद की पश्चिमी अवधारणा
वर्तमान में समसामयिक वैश्विक व्यवस्थ यूरोपीय की राष्ट्र राज्य की प्रणाली से संचालित होती है जो मूलतः अब्राहमिक सांप्रदायिक चिंतन प्रणाली पर आधारित है जो नस्लीय सर्वश्रेष्ठता के उन्माद पर टिकी है जो एक तरह का “एक” को ही मानती है जैसे की एक रीलिजन, एक राष्ट्र-राज्य, एक संप्रदाय, एक विश्वास, एक किताब, एक राष्ट्र-राज्य, एक सीमा रेखा। और जो इस तथाकथित ‘एक’ से अलग है उसे तब तक बर्दाश्त (tolerate) किया जाता जब तब वह स्वयं इतना ताकतवर नहीं हो जाता की वह उस विभिन्नता को समाप्त न कर दे।
पश्चिम अपने इसी बुनियादी विश्वास और चिंतन की मूलभूत प्रणाली के कारण जहां भी गया वहाँ उन्होंने खूब हिंसा की। वर्तमान अमेरिका, लैटिन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों मे यूरोपियों ने वहाँ की स्वदेशी/देशी वासियों को समाप्त ही कर दिया। वहाँ का हर राष्ट्र-राज्य और उसका नेता कदाचित ‘हिटलर’ ही रहा है। हाँ भले ही सत्ता के दम पर कितना ही बढ़िया आख्यान (narrative) लिखवा लिया हो।
भारत की विशिष्टता
भारत का चिंतन पश्चिम से बिल्कुल अलग रहा है जो एकदम विशिष्ट है और यह किसी भी अर्थ मे पश्चिमी मूल्यों से मेल नहीं खाता है । भारत अपने विश्वास और चिंतन की मूलभूत प्रणाली मे विविधता को स्वीकार करता है या कहें तो विविधता को एक उत्सव की तरह मान्यता देता/देखता है और उसका जश्न मनाता है। भारत किसी को बर्दाश्त (tolerate) नहीं करता बल्कि यह उसे स्वीकार (accept) करता है। ऐसे कितने ही उदाहरण भरे पड़े है जहां हमने भिन्नता का ‘स्वागत’ किया है। भारत की विशिष्टता इस अर्थ में निहित है की यह अपने मूल स्वरूप मे एक ‘सांस्कृतिक इकाई’ है जिसकी एक स्पष्ट भौगोलिक पहचान है जो सम्पूर्ण दक्षिण और पूर्व एशिया को अपने मे समेटे हुए है। क्योंकि यह एक स्पष्ट सांस्कृतिक इकाई है, ‘यूरोपीय राष्ट्रवाद’ का कोई भी मान्य सिद्धांत इस पर लागू नहीं होता है। इतना ही नहीं इस दिशा (यूरोपीय राजनीतिक व्यवस्था) मे किया गया प्रयास भी निरर्थक ही सिद्ध हुआ है जिसके अवांछनीय परिणाम प्राप्त हुए है।
यह इसकी विडंबना रही की पिछले 1000 सालों से भारत अब्राहमिक वैचारिक प्रणाली से शासित करने का प्रयास करते रहे लेकिन कभी भी उत्साहवर्धक परिणाम नहीं मिला और अन्तः एक भारत वर्तमान मे खंड खंड हो गया। वैसे ही आजादी के बाद भी जो ‘गोविंद’ ‘जॉन’ के स्थान पर सत्ता की गद्दी पर बैठा, यूरोपीय प्रतिमानों को ही सार्वभौम मान लिया और परिणाम फिर से वही मिला। इसकी अपने प्रकृति (default consciousness) के विरोध में थोपे गए यूरोपीय प्रादर्श हमेश संघर्षरत रहे और भारत और इससे खंडित हुए भूभाग भी आज तक इस दिशा में जूझ रहे है।
’हिंदू’ शाब्दिक विमर्श
हिन्दू कौन है
क्या आप जानते हैं ?
यदि नहीं जानते हैं, तो जो मैंने पढा़, उसे आप भी पढ़ें और अगर, कोई त्रुटि हो तो अवगत अवश्य करवाएं।
हिन्दू शब्द की खोज
*हीनं दुष्यति इति हिन्दूः* से हुई है।
अर्थात: जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं ।
हिन्दू ' शब्द, करोड़ों वर्ष प्राचीन, संस्कृत शब्द से है !
यदि संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विच्छेदन करें तो पायेंगे ....
हीन + दू = हीन भावना + (से) दूर
अर्थात : जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे , मुक्त रहे , वो हिन्दू है !
हमें बार - बार, सदा झूठ ही बतलाया जाता है कि हिन्दु शब्द मुगलों ने हमें दिया , जो " सिंधु " से " हिन्दू " हुआ l हिन्दू को गुमराह किया जा रहा है।
*हिन्दू शब्द की वेद से ही उत्पत्ति है !*
जानिए , कहाँ से आया हिन्दू शब्द और कैसे हुई इसकी उत्पत्ति ?
कुछ लोग यह कहते हैं कि हिन्दू शब्द सिंधु से बना है औऱ यह फारसी शब्द है । परंतु ऐसा कुछ नहीं है ! ये केवल झुठ फ़ैलाया जाता है। *हमारे " वेदों " और " पुराणों " में हिन्दू शब्द का उल्लेख मिलता है ।* आज हम आपको बता रहे हैं कि हमें हिन्दू शब्द कहाँ से मिला है !
*"ऋग्वेद" के " ब्रहस्पति अग्यम " में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं* :-
*“ हिमालयं समारभ्य*
*यावद् इन्दुसरोवरं ।*
*तं देवनिर्मितं देशं*
*हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।"*
अर्थात : *हिमालय से इंदु सरोवर तक , देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं !*
*केवल " वेद " ही नहीं, बल्कि " शैव "ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं* :-
*हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये।*
अर्थात :- *जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं !*
इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक *" कल्पद्रुम "* में भी दोहराया गया है :
*हीनं दुष्यति इति हिन्दूः ।*
अर्थात : जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे,उसे
हिन्दू कहते हैं।
*" पारिजात हरण "* में हिन्दु को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-
*हिनस्ति तपसा पापां*
*दैहिकां दुष्टं ।*
*हेतिभिः श्त्रुवर्गं च*
*स हिन्दुर्भिधियते ।”*
अर्थात :- *जो अपने तप से शत्रुओं का , दुष्टों का , और पाप का नाश कर देता है , वही हिन्दू है !*
*" माधव दिग्विजय "* में भी *हिन्दू* शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-
*“ओंकारमन्त्रमूलाढ्य*
*पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य: ।*
*गौभक्तो भारत:*
*गरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः ।"*
अर्थात : *वो जो " ओमकार " को ईश्वरीय धुन माने , कर्मों पर विश्वास करे , गौ-पालक रहे , तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है !*
केवल इतना ही नहीं , हमारे *"ऋगवेद" (8:2:41) में हिन्दू* *नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है , जिन्होंने 46,000 गौमाता दान में दी थी !* और *"ऋग्वेद मंडल"* में भी उनका वर्णन मिलता है l
*बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयासरत रहने वाले , सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू हैं ।
साथ ही सामाजिक दृष्टिकोण से सावरकर जी ने भी व्याख्या की है
(सौजन्य- लिखने / भेजने वाले हिंदू)
साभार ट्विटर हैंडल ऑफ सुदर्शन टीवी
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