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Showing posts from December, 2023

लोकतंत्र, मीडिया और काँग्रेस

लोकतंत्र में दावे करने वाले अनेक तत्व होते है खासकर भारत में। यहाँ की न्यायपालिका भी लोकतंत्र का खूब उपदेश देती है भले ही उसका चरित्र और चिंतन कितना ही तानाशाही न हो। नानी पालकीवाला ने आज से लगभग 40 वर्ष ही कहा था ‘हम लोग न्यायिक तानाशाही की ओर बढ़ रहे है’। तब से आज तक की 40 वर्षों की यात्रा मे हमने तानाशाही की तरफ की यात्रा काफी हद तक पूरी कर ली है। अब शायद यह सिर्फ समय की बात है की कब यह कहा जाएगा की अमुक पार्टी की सरकार लोकतान्त्रिक नहीं अतः हम उसे चुनावी दौड़ से बाहर करते है। वैसे यहाँ एक राज्य की अपदस्थ सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सत्तासीन करवाया जा चुका है। कोर्ट ही क्यों हमारे यहाँ मीडिया स्वयं खुद को यह कहते नहीं थकता की ‘मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है’ जबकी आपातकाल के दिनों में भी आज का यह मीडिया एक को छोडकर पीठ के बल रेंग रहा था। 1960-70 के दशक से चली शिक्षा व्यवयस्था जिसने काँग्रेस और उसके सहयोगी तंत्र के अनुरूप लोगों के मौलिक और स्वतंत्र चिंतन को समाप्त कर दिया है , समसामयिक मीडिया खबरों को अपने इन्ही वैचारिक पूर्वाग्रहों की चाशनी में छान का परोस रहा है और एक अतिअ...

उपनिवेशवाद का प्रादेशिक विस्तार : सांस्कृतिक पहचानों की समाप्ति

भारत में औपनिवेशिकता की शुरुआत मोटे तौर पर 18 सदी के आरंभ से ही शुरू हुई थी और 19 वी सदी के आरंभ तक जब अंततः मराठों को शिकस्त दे दी गई, उसकी राजनीतिक नियंत्रण की प्रक्रिया सम्पूर्ण कर दी गई। इस औपनिवेशिक व्यवस्था की शुरुआत भले ही राजनीतिक नियंत्रण की स्थापना करने से प्रारंभ होता है। तत्पश्चात उस देश के राजनीतिक (प्रशासनिक सहित), आर्थिक एवं सामाजिक संबंधों के साथ साथ सभ्यागत और सांस्कृतिक आदर्शों (Civilisation & Cultural capital) को बदला जाता है। इस प्रक्रिया मे एक ऐसा नैरेटिव (narrative) तैयार किया जाता है जिसके माध्यम से औपनिवेशिक देशों में स्थापित परंपराओं के प्रति एक दुराग्रही भाव वाली विचारों का पक्ष-पोषण किया जाता है जबकि इसके माध्यम (tool) बनते हैं ‘राज द्वारा समर्थित एक छोटा स जन समूह जो अंततः राज के प्रति निष्ठावान होता है। यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं की औपनिवेशिक राज की स्थापना से पूर्व भारतीय भूभाग का दक्षिणी भाग मे स्थापित विजयनगर साम्राज्य ने अपनी शाही भव्यता और उपलब्धियों से समकालीन संसार को चमत्कृत कर चुका था तो वही उत्तरी भूभाग मे स्थापित मुग़लों ने भी अपनी ख्याति ख...

आजादी के तुरत बाद की राजनीति

विभाजन, शरणार्थी, उनका पुनर्वास और राष्ट्र का निर्माण भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act, 1947) के अनुसार 15 August 1947 को ब्रिटिश छोड़ने पर और पाकिस्तान के नाम से दो स्वतंत्र Dominion स्थापित किया जाना था। दोनों Dominion के बीच सीमांकन का कार्य सर सिरिल रैडक्लिफ को सौपा गया। इस कार्य हेतु वह 8.7.1947 को भारत आए और उन्हे सीमा आयोगों का अध्यक्ष बना दिया गया। आयोग जो दो हिंदू और दो मुस्लिम न्यायाधीशों से मिलकर बना था, ने 4 साल पुरानी जनगणना रिपोर्ट के आधार पर 13.8.1947 तक भूभागों के सीमांकन का कार्य सम्पन्न कर दिया गया और 17.8.1947 को जनता के बीच इसको की घोषणा कर दी गई। क्योंकि अब ऊपर और नीचे से पड़ने वाले दवाबों को ब्रिटेन झेल नहीं सकता था, ने विभाजन पक्ष लिया क्योंकि पश्चिम पाकिस्तान भौगोलिक रूप से उसके लिए उपयोगी था। वास्तव मे इस विभाजन की त्रासदी ने किसी को भी संतुष्ट नहीं किया। सच तो यह था की जब पंडित नेहरू आधी रात को ‘Tryst with destiny’ पढ़ रहे थे हजारों लोग पंजाब और पूर्वी बंगाल के गांवों से पलायन कर रहे थे। यद्यपि पंजाब यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से काम द...

Trade, Revolt, Consolidation & Colonisation

Even before the establishment of the Mughal Empire, traders from the Western world had begun arriving in South India, making the coastal regions fully aware of these new changes. European ships were frequently seen navigating the Indian Ocean, carrying trade goods, while European merchants purchased Indian commodities in exchange for gold, silver, or other precious items in coastal cities. This trade was not entirely new; commercial exchanges between India and the Western world had existed in ancient and medieval times, though Arab groups dominated medieval trade. A significant change occurred when the Turks conquered Asia Minor in 1453, capturing Constantinople. This placed the traditional trade routes between East and West under Turkish control, excluding emerging Western European nation-states, particularly Spain and Portugal, from sharing in the trade. This exclusion spurred the search for alternative routes to India. Portuguese explorer Vasco da Gama (1460-1524) departed from Lisb...