आजादी के तुरत बाद की राजनीति





विभाजन, शरणार्थी, उनका पुनर्वास और राष्ट्र का निर्माण

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act, 1947) के अनुसार 15 August 1947 को ब्रिटिश छोड़ने पर और पाकिस्तान के नाम से दो स्वतंत्र Dominion स्थापित किया जाना था। दोनों Dominion के बीच सीमांकन का कार्य सर सिरिल रैडक्लिफ को सौपा गया। इस कार्य हेतु वह 8.7.1947 को भारत आए और उन्हे सीमा आयोगों का अध्यक्ष बना दिया गया। आयोग जो दो हिंदू और दो मुस्लिम न्यायाधीशों से मिलकर बना था, ने 4 साल पुरानी जनगणना रिपोर्ट के आधार पर 13.8.1947 तक भूभागों के सीमांकन का कार्य सम्पन्न कर दिया गया और 17.8.1947 को जनता के बीच इसको की घोषणा कर दी गई। क्योंकि अब ऊपर और नीचे से पड़ने वाले दवाबों को ब्रिटेन झेल नहीं सकता था, ने विभाजन पक्ष लिया क्योंकि पश्चिम पाकिस्तान भौगोलिक रूप से उसके लिए उपयोगी था। वास्तव मे इस विभाजन की त्रासदी ने किसी को भी संतुष्ट नहीं किया।

सच तो यह था की जब पंडित नेहरू आधी रात को ‘Tryst with destiny’ पढ़ रहे थे हजारों लोग पंजाब और पूर्वी बंगाल के गांवों से पलायन कर रहे थे। यद्यपि पंजाब यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से काम दुखदायी रही। पंजाब की सरकार ने तात्कालिक राहत देने के लिए प्रयास अवश्य किए परंतु बंगाल मे ऐसा न हो सका। बंगाल में सरकार की उचित पुनर्वास सुनिश्चित करने में विफलता, शरणार्थियों द्वारा आत्म-निपटान के लिए प्रोत्साहित किया।

स्वतंत्रता के साथ भारत का 'दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन अपरिहार्य' का विभाजन आज के भारत के इतिहास एक प्रमुख विषय है। हाल के वर्षों मे इस पर काफी शोध पत्रों का प्रकाशन हुआ है जिसमे इसके दीर्घकालिक और अल्पकालिक कारकों का विश्लेषण करने के अलावा इस खूनी अनुभव के कई नए आयामों को भी ढूंढ गया है। इतिहास के आम पाठकों के लिए 1947 में भारत का विभाजन के कारण अलगाववाद के उद्भव, सांप्रदायिकता के उदय, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन का कमजोर हो जाना, स्वयं भारत मे ऊपर एवं नीचे से पड़ने वाले दवाबों के साथ साथ समकालीन वैश्विक भू-सामरिक परिस्थिति मे निहित है। आगे चलकर राजनीतिक नियंत्रण को लेकर हिंदू और मुस्लिम elites के बीच उत्पन्न संघर्ष का पता लगाया गया है जिसने 1940 के दशक से ही विभाजन का एक मंच तैयार किया। हाल के दिनों में हालांकि इतिहासकारों ने विभाजन के बाद लाखों लोगों के पलायन के तरीके और उनके अनुभवों मे अधिक रुचि लेना शुरू कर दिया है, जिसे दो नए राज्यों को हल करना पड़ा।

इस अर्थ मे अगर हम देंखे तो बंगाल और पंजाब दो प्रत्यक्षतः प्रांतों थे जिन्हे इस पलायन की समस्या का सामना करना पड़ा था। ऐतिहासिक अध्ययन विपरीत चित्र प्रस्तुत करते है। पंजाब के गाँव मे देहातों में हिंसा की तीव्रता के कारण जनसंख्या का आदान-प्रदान हुआ जो 1947-48 के थोड़े से समय सीमा के भीतर सम्पन्न हो गया जिसमे अल्पसंख्यकों को अपने गांव छोड़ने और लाहौर और रावलपिंडी में शरणार्थी शिविरों में शरण लेने के लिए मजबूर किया गया। ऐसे शरणार्थियों मे अपेक्षाकृत उच्च जातियों से संबंधित लोग थे जो पेशेवर समूह थे जिनके पूर्वी पंजाब में लिंक थे और रिश्तेदारों और परिचितों के घरों के लिए अपना रास्ता बना दिया । पेशेवर वर्गों के लिए स्थानांतरित करना अपेक्षाकृत आसान था, भले ही उन्हें जिस मानवीय दुख से गुजरना पड़ा। लेकिन बंगाल में यह 1950 और 1960 के दशकों और 1970 के दशक मे भी विभिन्न चरणों में सम्पन्न हुआ। बंगाल के अध्ययन से हम पाते है की पलायन के दौरान शरणार्थी पहले उन स्थानों पर गए जहां उनके रिश्तेदार या दोस्त थे। शिक्षित पेशेवरों ने कलकत्ता या बड़े शहरों को चुना जबकि किसान शरणार्थी नादिया के सीमावर्ती जिलों या दक्षिणी बंगाल में 24 परगना में बस गए। क्योंकि बंगाल में शरणार्थियों के पलायन बहुत लंबे समय तक और विभिन्न चरणों में हुआ, तत्कालीन भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस बात को लेकर आश्वस्त रहे कि पश्चिम बंगाल में हालात उतने खराब नहीं हैं, जितने पंजाब में थे। वह पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों के बीच विश्वास बहाली को लेकर आशावादी थे परंतु 1950 मे नेहरू स्थिति की गंभीरता को महसूस किया उन्होंने नेहरू-लियाकत संधि पर हस्ताक्षर किए जिसके द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री और उनके पाकिस्तानी समकक्ष लियाकत अली खान उचित उपाय अपनाने पर सहमत हुए परंतु समय के नेहरू-लियाकत संधि की विफलता स्पष्ट हो गई।

समस्या सिर्फ शरणार्थियों की ही नहीं थी विभाजन और अपजी त्रासदी के बीच आर्थिक समस्याएं भी मुंह बाये खड़ी थी। कांग्रेस नेतृत्व मे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और उनके आर्थिक सलाहकारों ने भारत के आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र के रूप में उभरने की संभावना को कृषि आय वृद्धि करके देखा लेकिन की समूह ऐसे भी थे जो ग्रामीण पुनर्निर्माण के गांधीवादी आदर्श के बारे मे जोर दे रहे थे स्वयं कांग्रेस का समाजवादी समूह एक व्यापक भूमि सुधार कार्यक्रम को अपनाने पर बाल दे रहा था। राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष नेहरू, अपने समाजवादी आदर्शों के वशीभूत सोवियत संघ का अनुकरण करने के लिए उत्सुक थे। जहां पहली पंचवर्षीय योजना में भारतीय कृषि की समस्याओं का काफी व्यापक समाधान कर लिया गया था।

भारतीय संघ का एकीकरण भी भारतीय राष्ट्रवादी नेतृत्व के सामने एक बड़ी समस्या थी जो काफी चुनौतीपूर्ण भी थी। परंतु जन आंदोलनों मे व्यापक राजनीतिक अनुभव रखने वाले वल्लभ भाई पटेल ने एक यात्री उत्साही एवं कर्मठ नौकरशाह वी पी मेनन की सहायता से एकीककरण की समस्या को सुलझा दिया। 1945-46 के दौरान कुछ रियासतों ने दावा करना शुरू कर दिया था कि एक बार अंग्रेजों ने यदि भारत छोड़ दिया तो उन्हे भारत संघ मे बने रहने की कोई बाध्यता नहीं थी।

रजवाड़ों का एकीकरण

शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के लिये विभिन्न उपायों एवं संभावनाओं को तलाशने के लिय एक तीन सदस्यीय शिष्टमंडल भेजने की घोषणा की थी। यह कैबिनेट मिशन 24.03.1946 को भारत आकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग सहित अन्य प्रतिनिधियों के बातचीत की। आरंभिक बातचीत के बाद मिशन ने 16 मई 1946 को नई सरकार के गठन का प्रस्ताव रखा परंतु काँग्रेस के अगस्त 1946 मे जाकर अंतरिम सरकार मे शामिल होने का निर्णय लिया ताकि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया को सरल बनाया जा सके। परंतु मुस्लिम लीग अभी भी अपनी जिद पर अड़ि हुई थी। तब बातचीत के बाद वेवल ने 1 अगस्त, 1946 को कांग्रेस अध्यक्षपं. जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम सरकार के गठन के लिए निमंत्रण दिया। पं. जवाहरलाल नेहरू 24 अगस्त, 1946 को भारत की पहली अंतरिम राष्ट्रीय सरकार की घोषणा की। इस अंतरिम सरकार मे भी मुस्लिम लीग की भागीदारी नहीं थी। आखिरकार 2 सप्टेंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू के साथ 11 अन्य सदस्यों के साथ अपने पद की शपथ ली जिसमे तीन गैर मुस्लिम लीग सदस्य थे। लीग अपने पांच मनोनीत सदस्यों के साथ सरकार में प्रवेश कर सके, इसके लिए द्वार खुला रखा गया। 26 अक्टूबर,1946 को अंतरिम सरकार में तीन मूल सदस्यों के स्थान पर लीग के पांच प्रतिनिधि शामिल हो गये।मुस्लिम लीग का अंतरिम सरकार में शामिल होना सरकार के साथ सहयोग का सूचक नहीं था। बल्कि अपनी पाकिस्तान की माँग की लङाई को आगे बढाने का स्वार्थ निहित प्रयास था। 20 नवंबर,1946 को वायसराय ने संविधान सभा की पहली बैठक हेतु निर्वाचित प्रतिनिधियों की बैठक में भाग लेने के लिए नियंत्रण पत्र भेजा। 9 दिसंबर,1946 को दिल्ली में संविधान सभा की पहली बैठक हुई, जिसका मुस्लिम लीग ने बहिष्कार किया। मुस्लिम लीग द्वारा संविधान सभा का लगातार बहिष्कार देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने यह निर्णय दिया, कि संविधान सभा के निर्णय मुस्लिम बहुल इलाके पर लागू नहीं होंगे।


अंतरिम सरकार के सदस्य

पंडित जवाहर लाल नेहरु: कार्यकारी परिषद् के उपाध्यक्ष,विदेश विभाग, राष्ट्रमंडल से सम्बंधित मामले

वल्लभभाई पटेल: गृह, सुचना एवं प्रसारण

बलदेव सिंह: रक्षा

डॉ.जॉन: उद्योग एवं आपूर्ति

सी.राजगोपालाचारी: शिक्षा

सी.एच.भाभा: कार्य, खनन एवं शक्ति

राजेंद्र प्रसाद: खाद्य एवं कृषि

आसफ अली: रेलवे

जगजीवन राम: श्रम

लियाकत अली: वित्त

टी.टी.चुंदरीगर: वाणिज्य

अब्दुल रब नश्तर: संचार

गजान्फर अली खान:स्वास्थ्य

जोगेंद्र नाथ मंडल: विधि


उधर ब्रिटेन की सरकार जल्द से जल्द बाहर निकलना था ताकि औपनिवेशिक विरोधी आंदोलन के साथ सांप्रदायिक हिंसा काही और खतरनाक स्तर पर न पहुँच पाये। भारत मे तब पूरे देशभर से किसानों, श्रमिकों और युवाओं की तरफ से अशांति की खबरें या रही थी। तेलंगाना और उत्तर बंगाल जैसे कुछ क्षेत्रों में गरीब किसान और बटाईदार विद्रोह कर उठे थे। जनवरी 1947 से ही पंजाब में सांप्रदायिक दंगों के कारण स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी। इसी बीच 20 फरवरी 1947 को क्लेमेंट एटली ने एक महत्वपूर्ण घोषणा कर दी और कहा कि अंग्रेज 30 जून 1948 तक भारत से हट जाएंगे। इसिस के साथ एक नए वायसराय माउंटबेटन जो की ब ब्रिटिश राजघराने से संबंधित थे और पंडित नेहरू से बनती भी थी को आखिरी वायसराय के रूप में भेजने का फैसला किया । 22 मार्च, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के अंतिम वायसराय के रूप में भारत आए। उनका एकमात्र मिशन था सत्ता का हस्तांतरण। एटली की इस घोषणा से भारत मे विभिन्न प्रतिद्वंद्वी समूहों मे खलबली मच गई। हिंदू महासभा ने मांग की थी कि पंजाब और बंगाल का बंटवारा होना जरूरी है। हिंदू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने लिखा-

“Hindus will resist with their life blood any scheme of the perpetuation of slavery which will be inevitable, if Bengal, as she is constituted and administered today, is allowed to become a separate independent unit cut off from the rest of India.”

काँग्रेस कार्यकारी दाल ने भी 8 मार्च 1 947 को मांग की थी कि पंजाब का विभाजन होना जरूरी है और जिसे आवश्यकता पड़ने पर बंगाल में भी लागू करना पड़ सकता है। नेहरू के 8 मार्च के इस बयान के बाद यह था कि पंजाब में हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो गए और हिंदुओं और मुसलमानों और सिखों के बीच भी काफी हिंसा शुरू हो गई। इससे क्षुब्ध हो नेताजी के बड़े भाई शरत बोस ने सरदार पटेल को लिखा “I consider it most unfortunate that the Congress working Committee conceded Pakistan and supported partition. I can say that it is not a fact that Bengali Hindus unanimously demand partition (मैं इसे सबसे दुर्भाग्यपूर्ण मानता हूं कि कांग्रेस कार्यसमिति ने पाकिस्तान को स्वीकार किया और विभाजन का समर्थन किया। मैं कह सकता हूं कि यह सच नहीं है कि बंगाली हिंदू सर्वसम्मति से विभाजन की मांग करते हैं)” इसी क्रम मे उन्होंने अबुल हाशिम और हुसैन शरीद सुहरअवार्डी के साथ मिलकर अप्रैल-मई 1947 मे एक अविभाजित और स्वतंत्र बंगाल की योजना तैयार कर बंगाल की एकता को बचाए रखने का प्रयास किया गया। प्रारंभ में संयुक्त बंगाल के इस विचार को स्वयं महात्मा गांधी ने समर्थन दिया था। ऐसा लग रहा था कि बंगाल के धार्मिक आधार पर विभाजन से बचा जा सकता था क्यूंकी जिन्ना ने भी अप्रैल 1947 में माउंटबेटन से साफ कहा था कि कलकत्ता के बिना पूर्व में पाकिस्तान होने का कोई मतलब नहीं है। उन्हें एकजुट और स्वतंत्र रहने दें। परंतु माउंटबेटन ने समर्थकों से विचार के लिए जनसमर्थन की मांग रख दी और यह इतिहास की विडंबना ही है की 1947 के तनावपूर्ण सांप्रदायिक माहौल में ये नेता अपना समर्थन का आधार प्रदर्शित नहीं कर पाये। शरत को अपील पर महात्मा गांधी ने विलाप करते हुए कहा था "There was a time when mine was a big voice. Then everyone obeyed what I said. Now neither the Congress, nor the Hindus nor the Muslims listen to me. I am crying in the wilderness (एक समय था जब मेरी एक बड़ी आवाज थी। तब सभी से जो कहा, उसकी आज्ञा का पालन किया गया। अब न तो कांग्रेस, न हिंदू और न ही मुसलमान मेरी बात सुनते हैं। मैं अंधेरे में रो रहा हूं)"

इस बीच माउंटबेटन मई 1947 के अंत में वहाँ की सरकार को संबंधित पक्षों से की गई वार्ताओं के बारे मे सूचित करने हेतु लंदन गए जहां से उन्होंने संदेश दिए। उन्मे से एक के अनुसार पंजाब और बंगाल दोनों का विभाजन होना था लेकिन दूसरे संदेश के अनुसार, माउंटबेटन ने कहा कि बंगाल के हिंदू और मुस्लिम नेता एक समझौते पर आए थे और इसलिए बंगाल एक स्वतंत्र राज्य के रूप में एकजुट रहेगा और उसके भविष्य का फैसला बाद मे लिया जा सकेगा परंतु माउंटबेटन के दिल्ली वापस आते ही नेहरू और पटेल ने जोरदार विरोध कर दिया। दोनों ही नेता मजबूत केंद्र वाली सरकार चाहते थे। 30 मई 1947 को माउंटबेटन भारत ये और आते ही उन्होंने 2 जून को राष्ट्रवादी नेताओं के साथ बैठक की और इसके ठीक अगले ही दिन 3 जून 1947 को अपनी एक योजना पेश की। इसे भारतीय इतिहास में ‘थर्ड जून प्लान’ या ‘माउंटबेटेन योजना’ या मनबाँटन योजना कहा गया। इस प्लान का पहला बिन्दु था कि भारत के बंटवारे के सिद्धांत को ब्रिटेन की संसद द्वारा स्वीकार किया जाएगा. दूसरा, बनने वाली सरकारों को डोमिनियन का दर्जा दिया जाएगा और तीसरा, उसे ब्रिटिश राष्ट्रमंडल से अलग होने या शामिल रहने का फैसला करने का अधिकार मिलेगा। माउंटबैटन योजना के विस्तृत प्रावधानों इस प्रकार थे

पंजाब और बंगाल में हिन्दू तथा मुसलमान बहुसंख्यक जिलों के प्रांतीय विधानसभा के सदस्यों की अलग बैठक बुलाई जाये और उसमें कोई भी पक्ष यदि प्रांत का विभाजन चाहेगा तो विभाजन कर दिया जायेगा।

विभाजन होने की दशा में दो डोमनियनों तथा दो संविधान सभाओं का निर्माण किया जायेगा।

सिंध इस संबंध में अपना निर्णय स्वयं लेगा।

उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत तथा असम के सिलहट जिले में जनमत संग्रह द्वारा यह पता लगाया जायेगा कि वे भारत के किस भाग के साथ रहना चाहते हैं।

योजना में कांग्रेस की भारत की एकता की मांग को अधिक से अधिक पूरा करने की कोशिश की गयी। जैसे-

· भारतीय रजवाड़ों को स्वतंत्र रहने का विकल्प नहीं दिया जा सकता उन्हें या तो भारत में या पाकिस्तान में सम्मिलित होना होगा।

· बंगाल को स्वतंत्रता देने से मना कर दिया गया।

· हैदराबाद की पाकिस्तान में सम्मिलित होने की मांग को अस्वीकार कर दी गयी। (इस मांग के संबंध में माउंटबैटन ने कांग्रेस का पूर्ण समर्थन किया)।

माउंटबैटन योजना को कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया। इस योजना से जहां मुस्लिम लीग की बहुप्रतीक्षित पाकिस्तान के निर्माण की मांग पूरी हो गयी, वहीं योजना में कांग्रेस को भी संतुष्ट करने की यथासंभव कोशिश की गई। इससे एक प्रकार की शांतिपूर्ण एवं त्वरित सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया सुनिश्चित हो गयी जो देश की तत्कालीन विस्फोटक परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिये आवश्यक भी था। आगे चलकर इसी योजना को भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के माध्यम से विधिक रूप दिया गया। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 जिसे ब्रिटेन की संसद ने जुलाई 1947 मे पास किया था के अनुसार भारत और पाकिस्तान के नाम से दो Dominion स्थापित किए गए और उनकी सीमाओं के निर्धारण के लिए सर रेड क्लिफ की अध्यक्षता मे एक सीमा आयोग की नियुक्ति कर दी गई।

अध्याय 31

शरणार्थी, उनका पुनर्वास और रजवाड़ों का एकीकरण



भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (Indian Independence Act, 1947) के अनुसार 15 August 1947 को ब्रिटिश छोड़ने पर और पाकिस्तान के नाम से दो स्वतंत्र Dominion स्थापित किया जाना था। दोनों Dominion के बीच सीमांकन का कार्य सर सिरिल रैडक्लिफ को सौपा गया। इस कार्य हेतु वह 8.7.1947 को भारत आए और उन्हे सीमा आयोगों का अध्यक्ष बना दिया गया। आयोग जो दो हिंदू और दो मुस्लिम न्यायाधीशों से मिलकर बना था, ने 4 साल पुरानी जनगणना रिपोर्ट के आधार पर 13.8.1947 तक भूभागों के सीमांकन का कार्य सम्पन्न कर दिया गया और 17.8.1947 को जनता के बीच इसको की घोषणा कर दी गई। क्योंकि अब ऊपर और नीचे से पड़ने वाले दवाबों को ब्रिटेन झेल नहीं सकता था, ने विभाजन पक्ष लिया क्योंकि पश्चिम पाकिस्तान भौगोलिक रूप से उसके लिए उपयोगी था। वास्तव मे इस विभाजन की त्रासदी ने किसी को भी संतुष्ट नहीं किया।

सच तो यह था की जब पंडित नेहरू आधी रात को ‘Tryst with destiny’ पढ़ रहे थे हजारों लोग पंजाब और पूर्वी बंगाल के गांवों से पलायन कर रहे थे। यद्यपि पंजाब यह प्रक्रिया राजनीतिक रूप से काम दुखदायी रही। पंजाब की सरकार ने तात्कालिक राहत देने के लिए प्रयास अवश्य किए परंतु बंगाल मे ऐसा न हो सका। बंगाल में सरकार की उचित पुनर्वास सुनिश्चित करने में विफलता, शरणार्थियों द्वारा आत्म-निपटान के लिए प्रोत्साहित किया।

स्वतंत्रता के साथ भारत का 'दुर्भाग्यपूर्ण लेकिन अपरिहार्य' का विभाजन आज के भारत के इतिहास एक प्रमुख विषय है। हाल के वर्षों मे इस पर काफी शोध पत्रों का प्रकाशन हुआ है जिसमे इसके दीर्घकालिक और अल्पकालिक कारकों का विश्लेषण करने के अलावा इस खूनी अनुभव के कई नए आयामों को भी ढूंढ गया है। इतिहास के आम पाठकों के लिए 1947 में भारत का विभाजन के कारण अलगाववाद के उद्भव, सांप्रदायिकता के उदय, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन का कमजोर हो जाना, स्वयं भारत मे ऊपर एवं नीचे से पड़ने वाले दवाबों के साथ साथ समकालीन वैश्विक भू-सामरिक परिस्थिति मे निहित है। आगे चलकर राजनीतिक नियंत्रण को लेकर हिंदू और मुस्लिम elites के बीच उत्पन्न संघर्ष का पता लगाया गया है जिसने 1940 के दशक से ही विभाजन का एक मंच तैयार किया। हाल के दिनों में हालांकि इतिहासकारों ने विभाजन के बाद लाखों लोगों के पलायन के तरीके और उनके अनुभवों मे अधिक रुचि लेना शुरू कर दिया है, जिसे दो नए राज्यों को हल करना पड़ा।

इस अर्थ मे अगर हम देंखे तो बंगाल और पंजाब दो प्रत्यक्षतः प्रांतों थे जिन्हे इस पलायन की समस्या का सामना करना पड़ा था। ऐतिहासिक अध्ययन विपरीत चित्र प्रस्तुत करते है। पंजाब के गाँव मे देहातों में हिंसा की तीव्रता के कारण जनसंख्या का आदान-प्रदान हुआ जो 1947-48 के थोड़े से समय सीमा के भीतर सम्पन्न हो गया जिसमे अल्पसंख्यकों को अपने गांव छोड़ने और लाहौर और रावलपिंडी में शरणार्थी शिविरों में शरण लेने के लिए मजबूर किया गया। ऐसे शरणार्थियों मे अपेक्षाकृत उच्च जातियों से संबंधित लोग थे जो पेशेवर समूह थे जिनके पूर्वी पंजाब में लिंक थे और रिश्तेदारों और परिचितों के घरों के लिए अपना रास्ता बना दिया । पेशेवर वर्गों के लिए स्थानांतरित करना अपेक्षाकृत आसान था, भले ही उन्हें जिस मानवीय दुख से गुजरना पड़ा। लेकिन बंगाल में यह 1950 और 1960 के दशकों और 1970 के दशक मे भी विभिन्न चरणों में सम्पन्न हुआ। बंगाल के अध्ययन से हम पाते है की पलायन के दौरान शरणार्थी पहले उन स्थानों पर गए जहां उनके रिश्तेदार या दोस्त थे। शिक्षित पेशेवरों ने कलकत्ता या बड़े शहरों को चुना जबकि किसान शरणार्थी नादिया के सीमावर्ती जिलों या दक्षिणी बंगाल में 24 परगना में बस गए। क्योंकि बंगाल में शरणार्थियों के पलायन बहुत लंबे समय तक और विभिन्न चरणों में हुआ, तत्कालीन भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस बात को लेकर आश्वस्त रहे कि पश्चिम बंगाल में हालात उतने खराब नहीं हैं, जितने पंजाब में थे। वह पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यकों के बीच विश्वास बहाली को लेकर आशावादी थे परंतु 1950 मे नेहरू स्थिति की गंभीरता को महसूस किया उन्होंने नेहरू-लियाकत संधि पर हस्ताक्षर किए जिसके द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री और उनके पाकिस्तानी समकक्ष लियाकत अली खान उचित उपाय अपनाने पर सहमत हुए परंतु समय के नेहरू-लियाकत संधि की विफलता स्पष्ट हो गई।

समस्या सिर्फ शरणार्थियों की ही नहीं थी विभाजन और अपजी त्रासदी के बीच आर्थिक समस्याएं भी मुंह बाये खड़ी थी। कांग्रेस नेतृत्व मे तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू और उनके आर्थिक सलाहकारों ने भारत के आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र के रूप में उभरने की संभावना को कृषि आय वृद्धि करके देखा लेकिन की समूह ऐसे भी थे जो ग्रामीण पुनर्निर्माण के गांधीवादी आदर्श के बारे मे जोर दे रहे थे स्वयं कांग्रेस का समाजवादी समूह एक व्यापक भूमि सुधार कार्यक्रम को अपनाने पर बाल दे रहा था। राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष नेहरू, अपने समाजवादी आदर्शों के वशीभूत सोवियत संघ का अनुकरण करने के लिए उत्सुक थे। जहां पहली पंचवर्षीय योजना में भारतीय कृषि की समस्याओं का काफी व्यापक समाधान कर लिया गया था।



भारतीय संघ का एकीकरण भी भारतीय राष्ट्रवादी नेतृत्व के सामने एक बड़ी समस्या थी जो काफी चुनौतीपूर्ण भी थी। परंतु जन आंदोलनों मे व्यापक राजनीतिक अनुभव रखने वाले वल्लभ भाई पटेल ने एक यात्री उत्साही एवं कर्मठ नौकरशाह वी पी मेनन की सहायता से एकीककरण की समस्या को सुलझा दिया। 1945-46 के दौरान कुछ रियासतों ने दावा करना शुरू कर दिया था कि एक बार अंग्रेजों ने यदि भारत छोड़ दिया तो उन्हे भारत संघ मे बने रहने की कोई बाध्यता नहीं थी।

आजादी की पूर्व संध्या पर भारतीय उप-महाद्वीप के लगभग एक तिहाई क्षेत्र पर देशी राज्यों (native states) का शासन था जिन्हें सत्ता और प्राधिकार विभिन्न समयों पर अंग्रेजों के साथ सम्पन्न हूई संधियों से मिली थी। अपने आकार और विस्तार मे ये रियासतें समरूप न होकर विभिन्न आकारों और महत्व के थे। बड़ौदा या हैदराबाद जैसे कुछ बड़े साधन संपन्न और शक्तिशाली राज्य भी थे तो वहीं दूसरी ओर उड़ीसा या गुजरात के काठियावाड़ मे कई छोटे छोटे राज्यों का समूह भी थे। इन राज्यों को भारतीय संघ में मिलन एक कठिन कार्य था जिसे वल्लभ भाई पटेल वी पी मेनन की मदद से अंतत 'दबाव के साथ अनुनय-विनय के संयोजन' की नीति से भारतीय संघ के भीतर समायोजित करने मे सफल रहे ।

भारत के विभाजन ने राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत को झकझोड़ दिया था और फिर इनमे से इनमें से कुछ राज्यों को भारतीय संघ से बाहर जाने का प्रयास एक बहुत बाद खतरा था। हम यह भी पाते है की 1930 के दशक से ही जब से कांग्रेस राज्यों के लोगों के आंदोलनों में शामिल होती गई थी, कई रियासतों ने राष्ट्रीय आंदोलन ने प्रति प्रतिगामी नीति अपनाई। जैसे जैसे 1940 के दशक मे यह दिखने लगा था की ब्रिटिश शक्तियां भारत को छोड़ देंगी, देशी रजवाड़े अपनी अपनी स्वतंत्रता और स्वाययता को लेकर बैचेन होते जा रहे थे। उदाहरण के तौर पर देखें तो हम पाते है की जैसे ही फरवरी 1947 एटली की एक घोषणा हुई त्रावणकोर और हैदराबाद के शासकों के नेतृत्व में चैंबर ऑफ प्रिंसेस (Chamber of Princess) ने आजादी का दावा कर दिया और कहा गया की वे दोनों dominion मे से किसी में भी शामिल नहीं होने के लिए स्वतंत्र होंगे। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या जिन्ना ने भी पर इसी तरह के विचार व्यक्त किए। हालांकि बाद मे एटली ने बाद में यह कहा कि भारत की आजादी के बाद बदलते संदर्भ में रियासतों के लिए दोनों प्रभुओं में से किसी एक में विलय करना अच्छा होगा। ऐसी परिस्थितियों मे खतरे को भांपते हुए नेहरू ने राज्यों का एक विभाग बनाने पर जोर दिया जब ब्रिटिश भारत में रियासतों के मामलों को विनियमित करने वाला राजनीतिक कार्यालय के रूप मे कार्य करता था। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली अंतरिम सरकार ने वल्लभ भाई पटेल को राज्य विभाग का प्रभारी बनाया। जब कैबिनेट मिशन ने 1945 और 1946 के दौरान उदयपुर और ग्वालियर में अखिल भारतीय राज्य पीपुल्स सम्मेलन में अपने प्रत्याशियों को संविधान सभा में भेजने के अधिकार को स्वीकार करते हुए राजकुमारों को शांत कर दिया तो नेहरू ने उन्हें इन राज्यों में लोकप्रिय आंदोलनों को उन्मुक्त करने की धमकी दी, जब तक कि उन्होंने संविधान सभा में शामिल होने का फैसला नहीं किया, -कुछ ऐसा जो राजकुमारों ने अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए अंतिम क्षण तक बचने की इच्छा जताई ।

संघीय योजना (Federation Scheme) को लेकर रियासतों की मिलीजुली भावनाएं थीं। कांग्रेस ने रियासतों पर दबाव बनाने के लिए रियासतों में प्रजामंडल आंदोलन के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने का फैसला किया। इस समय द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत ने फेडरेशन की योजना को स्थगित कर दिया गया । जब युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेज भारत में एक संवैधानिक समझौते पर पहुंचने के लिए प्रयासरत थे 1940 के दशक के मध्य इस स्कीम पर फिर से चर्चा शुरू हुई। इससे पहले 1942 में क्रिप्स मिशन ने भी प्रस्तावित संविधान सभा में इन रजवाड़ों को को जगह देने की की वकालत कर चुका था। परंतु क्रिप्स मिशन की की भाषा में अस्पष्टता ने उन्हे आशंकित कर दिया था। चुकी देशी रजवाड़ों के बीच समन्वय की कमी भी थी, आजादी की पूर्व संध्या पर लंबी बातचीत के दौरान उनकी स्थिति को कमतर कर दिया। यहाँ तक की कैबिनेट मिशन मे अपने भारत दौरा मे इस बात की पुष्टि कर दी की ब्रिटिश सत्ता को स्वतंत्र भारत सरकार को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा। इशर परिस्थितियाँ तेजी से बदल रही थी लेकिन अंत में इनके पास कोई विकल्प ही नहीं था। अंततः सोलह राज्य संविधान सभा में शामिल हो गए। संविधान सभा की स्थापना के साथ साथ सांप्रदायिककरण ने भी इस प्रक्रिया को प्रभावित किया। सांप्रदायिक कारणों से भोपाल के नवाब मुस्लिम लीग के साथ ही पटियाला के शासक सिखों के भी प्रवक्ता बने जबकि अलवर के राजपूत शासक हिंदू महासभा के संरक्षक बने गए। प्रजामंडल आंदोलनों ने भी इस बात को सुनिश्चित किया को देशी रजवाड़ों का संघ से बाहर रहना व्यावहारिक नहीं था।

इस पृष्ठभूमि में वल्लभ भाई पटेल और वीपी मेनन ने राज्यों के नवनिर्मित विभाग में अनुनय-विनय का काम शुरू किया और 2 से 14 अगस्त 1947 के बीच पटेल के अनुनय-विनय के तहत 114 राज्यों ने भारत को स्वीकार किया। एकान्त अपवाद भवालपुर था जिसने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया। जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद जैसे कुछ बड़े राज्यों ने भारत संघ मे विलय का विरोध जारी रखा। जूनागढ़ गुजरात के तट पर एक छोटा सा राज्य था, जिसका मुस्लिम शासक पाकिस्तान में शामिल होने का इच्छुक था, बावजूद इसके कि मुख्य रूप से हिंदू आबादी वाला राज्य चारों तरफ भारतीय क्षेत्र से घिरा हुआ था। नवाब की पाकिस्तान में शामिल होने की योजना के विरोध में भारत के साथ एकीकरण के हेतु लोकप्रिय संगठनों ने आंदोलन शुरू किया। लोकप्रिय दबावों ने शाह नवाज भुट्टो के प्रधानमंत्री ने भारत को हस्तक्षेप करने को कहा। जूनागढ़ में पुलिस कार्रवाई ने आदेश बहाल किया और अंततः फरवरी 1948 में एक जनमत संग्रह में राज्य के लोगों ने भारत में शामिल होने का फैसला किया ।

कश्मीर हकी कहानी कुछ अलग थी। आजादी से पहले वहाँ के हिंदू शासक हरि सिंह के अत्याचार के खिलाफ शेख अब्दुल्ला के National Conference पार्टी के द्वारा एक आंदोलन चल रहा था। नेहरू ने शेख अब्दुल्ला के आंदोलन का समर्थन किया जो बदले में कश्मीरियत के विचार से भावनात्मक रूप से जुड़े लोगों के लिए स्वायत्तता का पैमाना बनाए रखकर भारतीय संघ में शामिल होने को तैयार था। हालांकि यह आंदोलन जारी था, लेकिन सरदार पटेल भारतीय संघ के पक्ष में समझौते के लिए बातचीत कर रहे थे। परंतु इसी बीच पाकिस्तान के सैन्य हस्तक्षेप राजा हरी सिंह को भारत की सुरक्षा प्राप्त करने के लिए मजबूर कर दिया।

हैदराबाद को देश का सबसे बड़ा राजघराना होने का रुतबा हासिल था और उसका क्षेत्रफल इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी बड़ा था। हैदराबाद के निजाम ओसमान अली खान आसिफ ने फैसला किया कि उनका रजवाड़ा न तो पाकिस्तान और न ही भारत में शामिल होगा। यद्यपि भारत छोड़ने के समय अंग्रेजों ने हैदराबाद के निजाम को या तो पाकिस्तान या फिर भारत में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। अंग्रेजों ने हैदराबाद को स्वतंत्र राज्य बने रहने का भी प्रस्ताव दिया था। हैदराबाद में निजाम और सेना में वरिष्ठ पदों पर मुस्लिम थे लेकिन वहां की अधिसंख्य आबादी हिंदू (85%) थी। शुरू में निजाम ने ब्रिटिश सरकार से हैदराबाद को राष्ट्रमंडल देशों के अंर्तगत स्वतंत्र राजतंत्र का दर्जा देने का आग्रह किया जिसे ब्रिटिश सरकार से स्वीकृति नहीं मिल पाई। के एम मुंशी ने अपनी किताब 'ऐंड ऑफ एन एरा' में लिखा है कि निजाम ने मोहम्मद अली जिन्ना से संपर्क कर यह जानने की कोशिश की थी क्या वह भारत के खिलाफ उनके राज्य का समर्थन करेंगे। दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी आत्मकथा 'बियॉन्ड द लाइंस' में जिन्ना को निजाम के प्रस्ताव के आगे की कहानी लिखी है। नैयर ने अपनी किताब में लिखा है कि जिन्ना ने निजाम कासिम के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि वह मुट्ठीभर एलीट लोगों के लिए पाकिस्तान के अस्तित्व को खतरे में नहीं डालना चाहेंगे। मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (एमआईएम) के पास उस वक्त 20 हजार रजाकार थे जो निजाम के लिए काम करते थे और हैदराबाद का विलय पकिस्तान में करवाना चाहते थे या स्वतंत्र रहना। रजाकार एक निजी सेना थी जो निजाम के शासन को बनाए रखने के लिए थी। हैदराबाद के निजाम के ना-नुकुर करने के बाद भारत के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनसे सीधे भारत में विलय का आग्रह किया। लेकिन निजाम ने पटेल के आग्रह को खारिज करते हुए 15 अगस्त 1947 को हैदराबाद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया। निजाम के इस कदम से पटेल चौंक गए और उन्होंने उस समय के गर्वनर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन से संपर्क किया। माउंटबेटन ने पटेल को सलाह दी कि इस चुनौती को भारत बिना बल प्रयोग के निपटे। प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू माउंटबेटन की सलाह से सहमत थे और वह भी इस मसले का शांतिपूर्ण समाधान करना चाहते थे। हालांकि पटेल इससे बिल्कुल असहमत थे। उनका कहना था कि हैदराबाद की हिमाकत को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। इसके बाद हैदराबाद के निजाम हथियार खरीदने और पाकिस्तान के साथ सहयोग करने की कोशिश में लग गए। सरदार पटेल को जैसे ही इसकी भनक लगी तो उन्होंने हैदराबाद पर सैन्य कार्रवाई का फैसला किया गया। 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने हैदराबाद पर हमला कर दिया। भारतीय सेना की इस कार्रवाई को ऑपरेशन पोलो का नाम दिया गया क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज्यादा 17 पोलो के मैदान थे। भारतीय सेना का नेतृत्व मेजर जनरल जेएन चौधरी कर रहे थे। भारतीय सेना को पहले और दूसरे दिन कुछ परेशानी हुई और फिर विरोधी सेना ने हार मान ली। 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद की सेना ने हथियार डाल दिए। पांच दिनों तक चली कार्रवाई में 1373 रजाकार मारे गए थे। हैदराबाद के 807 जवान भी मारे गए। भारतीय सेना ने अपने 66 जवान खोए जबकि 97 जवान घायल हुए। यहाँ यह उल्लेखनीय है की हैदराबाद ने पहले ही आंध्र क्षेत्र के कांग्रेसियों द्वारा समर्थित एक शक्तिशाली प्रजामंडल आंदोलन का उद्भव देखा था यद्यपि वह अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के प्रयास उसने अपनी सैन्य कार्यवाहियों पर असफल भरोसा किया।

ऐसा नहीं था की हैदराबाद के पतन के बाद वर्तमान भारत का वर्तमान राजनीतिक मानचित्र तैयार हो गया। अभी भी पांडिचेरी या गोवा जैसे कुछ प्रदेश थे जिनपर क्रमशः फ़्रांस और पुर्तगाल का कब्जा था। पांडिचेरी को जहां 1950 के दशक के दौरान भारतीय संघ के भीतर शामिल किया गया था, गोवा के राज्यारोहण 1961 मे जाकर सम्पन्न हुआ और अंततः भारत राज्य वर्तमान सीमा राजनैतिक रूप से परिभाषित हो पाई ।

एकीकरण की इस प्रक्रिया मे सरदार पटेल ने रजवाड़ों को यह आश्वासन दिया था कि उनके विशेषाधिकार सुरक्षित रहेंगे, यदि वह राज्यारोहण के साधन (Instrument of annexexatio) पर हस्ताक्षर करते है। कुछ रियासतों के शासकों को महत्वपूर्ण पदों पर सरकारी नियुक्तियां की गई तो कुछ को बाद मे संसदीय राजनीति में शामिल कर लिया गए। बाद में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली भारत सरकार ने 1969 मे विशेषाधिकारों को भी समाप्त कर दिया गई जिसके गारंटी आजादी के समय दी गई थी। लेकिन जिन रजवाड़ों ने अनुनय विनय मो नहीं माना, उसके विरुद्ध सैन्य कार्यवाही भी की गई लेकिन हमे याद रखना होगा की ऐसे क्षेत्रों मे पहले से ही एक लोकप्रिय आंदोलन चल रहा था।

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