होली (उपनिवेशवाद के प्रभावों से एकदम मुक्त)

होली भारत की आत्मा अर्थात् गाँव का उत्सव है, विशुद्ध देशी, अपनी मिट्टी वाला। होली का आगमन बसंत ऋतु के साथ ही होता है, जब ऋतुराज वसंत प्रकृति को अपने रंगों से सराबोर कर देता है। खेतों में चने के पौधे फलकर लदकर झुक जाते हैं, आमों के पेड़ों पर मंजरियाँ लगी रहती हैं। महुआ का कहना ही क्या। इसके पेड़ों पर सफेद-लाल फूलों की माला लहराने लगती है। हवा में महुआ की मादक खुशबू गाँव की गली-गली तक पहुँचकर हर घर को मदमस्त कर देती है। पलाश के लाल फूल और टेसू के नारंगी फूल, धरा की शोभा को बढ़ा देते हैं। यह दृश्य केवल प्रकृति का नहीं, बल्कि ग्रामीण लोक जीवन की आत्मा का प्रतिबिंब है। किसान सुबह-सुबह खेतों में उतरते हैं और अपने लहराते खेतों की मुस्कान को देखकर उनके चेहरे पर प्रसन्नता की लाली छा जाती है।

गेहूँ के पौधे इतने लंबे हो जाते हैं कि वे हवा में लहराते हुए लगता है मानो नाच रहे हों। वातावरण की यह नई हरियाली, रंग और नई कोपलों की खुशबू इतनी प्रबल होती है कि यह सबको बाँध लेती है। वैसे वसंत पंचमी से ही होली की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं।

यह उत्सव ग्रामीण भारत की आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। यहाँ कोई विदेशी फूल या सजावट नहीं—सब कुछ अपनी मिट्टी से उपजा है। तालाबों के किनारे नीम के पेड़ों पर फूल लगते हैं, जिन्हें होली की अग्नि में डालकर बुराइयों का नाश किया जाता है। गुड़हल और तेंदू के फूल रंग का आधार बनते हैं। इस तरह होली ग्रामीण जीवन को प्रकृति से जोड़ती है, जहाँ हर पत्ता, हर फूल उत्सव का हिस्सा बन जाता है।

होली का असली रंग फाग लोक संगीत में झलकता है। ग्रामीण भारत में फाग की परंपरा सदियों पुरानी है, जो ठेठ देसी बोली में गाई जाती है। फागुन मास आते ही गाँव के चौपाल पर ढोलक, मंजीरा, और नागाड़े बजने लगते हैं। पुरुष फगवा गाते हैं—उन गीतों में राधा-कृष्ण की लीला, होरी के खेल, और जीवन की मस्ती भरी होती है। रंग डार दे माई रंग डार दे, बुरा न मानो होली रे जैसी पंक्तियाँ गूँजती हैं, जो गाँव भर को एक कर देती हैं।

महिलाएँ अलग-अलग फागुन गीत गाती हैं। बिहार-यूपी के बाँगर इलाकों में चैता नामक फाग प्रसिद्ध है, जो वसंत के वर्णन से भरपूर होता है। विरह और प्रेम के ये गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति का भंडार हैं। शाम ढलते ही ग्रामीण मंडप में इकट्ठा होते हैं, जहाँ वे गाते हैं, फागुन आया रे, रंग बरसे रे। यह गीत प्रकृति को समेटता है—महुआ की खुशबू, आम की मंजरियाँ, चने के खलिहानों की सरसराहट सब इसमें घुलमिल जाती हैं। ढोल की थाप पर नाचते हुए जाति, वर्ग का भेद मिट जाता है। एक ही चौपाल पर ब्राह्मण, यादव, कुर्मी सब साथ गाते हैं। फाग की यह धुन अल्हड़ता लाती है, जो ऊपर से रंगों की बौछार के साथ जीवंत हो उठती है

होली समूची प्रकृति को पूर्ण रूप से समेट लेती है। ग्रामीण भारत में यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि ऋतु चक्र का प्रतीक है। फाल्गुन की पूर्णिमा को होलिका दहन होता है, जहाँ भाई-बहन की जोड़ी अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करती है। यह होलिका दहन पुनर्जनन का प्रतीक है, जैसे वसंत पुरानी पत्तियों को गिराकर नई कोशिकाओं को जन्म देता है।

अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। गाँव की गलियाँ रंगों से सराबोर हो जाती हैं। युवा अबीर उड़ाते हैं, पानी की बौछारें चलाते हैं, और होली के गीत गाते हुए एक-दूसरे को रंगते हैं। यह ग्रामीण लोक जीवन की ऊर्जा है। खेतों में काम करने वाले मज़दूर साल भर की थकान भूल जाते हैं। महिलाएँ सखियों के साथ गाती-बजाती रंग खेलती हैं। बुज़ुर्ग मुस्कुराते हुए देखते हैं। रंग केवल शरीर पर नहीं, आत्मा पर भी चढ़ते हैं। प्रकृति जीवंत हो उठती है। होली यहाँ जीवन का उत्सव बन जाती है, जहाँ हर जीव—इंसान, पशु, पौधा—उत्सव में भागीदार होता है। गायों को रंग लगाते हैं, कुत्तों को रंग बरसाते हैं, और पक्षी स्वयं रंगीन लगते हैं।

इस भाव को  ररसखान ने बड़ी खूबसूरती से अपने शब्दों से सजाया है। ये कृष्ण-गोपियों के होली विनोद को भक्तिपूर्ण शृंगार रस में चित्रित करते हैं।

पंछी चकोर सरस सरोवर सरित संगिनि सोई।  मधुबन की बिहारी बरसै रंग सब नाहि कोय॥

(अर्थात पक्षी, चकोर, सरोवर और नदियाँ सब अपनी सहचरियों के साथ होली मना रहे हैं। मधुबन के बिहारी (कृष्ण) सभी पर रंग बरसा रहे हैं, कोई वंचित नहीं। यहाँ प्रकृति और कृष्ण के साथ होली का सामूहिक आनंद दिखाया गया है)

गूँजी गाँव की गली गली हँसी हुलासिनि होरी।  रसखानि प्रभु बरसै रंग, नाहि काहूँ की चोरी॥

(अर्थात गाँव की हर गली में हास्य और उल्लासपूर्ण होली की धूम मची हुई है। रसखान कहते हैं प्रभु (कृष्ण) स्वयं रंग बरसा रहे हैं, इसलिए कहीं चोरी जैसा कुछ नहीं हो रहा)

होली का मूल मंत्र है बुरा न मानो होली है! यह आदर्श वाक्य ग्रामीण भारत में जीवन के उत्सव को खुलकर मनाने का निमंत्रण है। साल भर की कठिनाइयों—सूखा, बाढ़, गरीबी—के बाद होली मुक्ति का क्षण लाती है। रंग खेलते हुए झगड़े सुलझ जाते हैं, दुश्मनी भूल जाती है। उपनिषदों का ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं जीवन में उतर आया लगता है। पूर्णमदः का अर्थ है—पूर्ण से पूर्ण निकलता है, फिर भी पूर्ण रहता है। होली में यही दिखता है। रंग बरसते हैं, लेकिन प्रकृति का कोष कभी खाली नहीं होता। जीवन की पीड़ाएँ जलती हैं होलिका में, लेकिन खुशियाँ बनी रहती हैं। ग्रामीण इसे व्यवहारिक रूप से जीते हैं।

होली के दिन कोई भेदभाव नहीं—सब बराबर। सभी के साथ घर में बना भोज्य बांटा जाता है। यह सामूहिक चेतना का उत्सव है, व्यक्तिगत नहीं। नव संवत का आरंभ भी यहीं होता है, जो चंद्र वर्ष की शुरुआत चिह्नित करता है। लोग नए वर्ष की कामनाएँ करते हैं—अच्छी फसल, स्वास्थ्य, समृद्धि।

होली की कथाएँ ग्रामीण भारत में मौखिक परंपरा से जीवित हैं। सबसे प्रसिद्ध है प्रह्लाद-हिरण्यकशिपु की। हिरण्यकशिपु अपनी बहन होलिका को भेजता है प्रह्लाद को जलाने, लेकिन भक्ति की ज्योति होलिका को भस्म कर देती है। यह कथा सिखाती है—अहंकार जल जाता है, सत्य अमर रहता है।

एक और कथा धुंडा की है, जो चमार जाति की विधवा थी। उसने होली खेली, रंग लगाए, और भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। कथा कहती है—होली भेदभाव मिटाती है। राधा-कृष्ण की लीला तो होली का हृदय है। कृष्ण ने गोपियों को रंग लगाकर प्रेम का संदेश दिया। ग्रामीण फाग में इन्हें जीवंत करते हैं। राम की कथा भी जुड़ती है—लंका विजय के बाद अहल्या उद्धार पर होली हुई। ये कथाएँ संदेश देती हैं—अपने धर्म के अनुकूल आचरण करते हुए खुलकर जियो। ईर्ष्या छोड़ो, प्रेम फैलाओ। बिहार के लोक कथाओं में होली को फगुआ कहते हैं। एक कथा है यहाँ बिरजू की, जो चोर था लेकिन होली पर रंग खेलकर सुधर गया। ये कथाएँ जीवन को उत्सव बनाती हैं।

होली ग्रामीण भारत में भोजन के बिना अधूरी है। चने की दाल, गुड़ के लड्डू, महुआ की भठहीरा—ये व्यंजन खेतों से सीधे आते हैं। महिलाएँ पूरन-पोली बनाती हैं, पुरुष भुजिया तलते हैं। ठंडाई में पिसता, काजू, और महुआ डाला जाता है। बच्चे चने चबाते घूमते हैं। भोज सामूहिक होता है सब मिलकर खाते हैं। कोई भेदभाव नहीं। यह भोजन ऊर्जा देता है रंग खेलने की।

होली व्यक्तिपरक नहीं, सामूहिक चेतना का उत्सव है। यह गरिमा के साथ भेदभाव मुक्त है। नव संवत पर लेन-देन चुकता किया जाता है, नए रिश्ते बनते हैं। होली भारत का अपना पर्व है, अपनी मिट्टी से जन्मा। उपनिवेशवाद के प्रतीकों से मुक्त—कोई विदेशी रिवाज नहीं। ब्रिटिश काल में भी गाँवों में यही होली खेली जाती थी। आज भी वही फाग, वही रंग। यह सांस्कृतिक स्वाभिमान है। होली के बाद ग्रामीण जीवन नया रूप लेता है। खेतों में गेहूँ कटाई शुरू होती है, विवाह तय होते हैं। यह उत्सव ऊर्जा का संचार करता है। हमेशा पर्यावरण के अनुकूल होली। आधुनिकता में भी ग्रामीण होली अटल है। होली ग्रामीण भारत का हृदय है—प्रकृति, संगीत, रंग, कथाओं से सजा। यह जीवन का पूर्ण उत्सव है, जहाँ प्रकृति हर जन के हृदय-मन के साथ विविध रंगों में जीवंत हो उठती है। 

अखिल भारतीय स्वरुप 

भारत के अलग‑अलग राज्यों में होली की अपनी‑अपनी रंगीली परंपराएँ हैं, जैसे उत्तर प्रदेश में मथुरा–वृंदावन में लठमार होली। रंगों से उल्लासपूर्ण वातावरण बनता है। बिहार में फागुआ तो है ही। झारखंड के उरांव समुदाय फगुआ पर्व को सोनो-रूपो की याद में मनाता है। उरांव समुदाय के लोग सेंबल वृक्ष की नई पत्तियों वाली डाली काटकर इसे पुआल से बांधते हैं और विधिपूर्वक स्थापित करते हैं। पाहन उस डाली की पूजा करते हैं। फिर उस डाली को जलाया और काटा जाता है। इस परंपरा को 'फगुआ काटना' या 'सवंत काटना' कहा जाता है। इसके अगले दिन, जंगलों के  पास बसे गाँव के लोग सेंदरा (शिकार) खेलने जाते हैं।  फगुआ पर्व मनाने के पीछे एक रोचक कथा है। गुमला जिले में सारूप पहाड़ है। कहा जाता है कि कभी उस पहाड़ पर एक विशाल सेंबल का वृक्ष हुआ करता था। उस पेड़ पर सोनो और रूपो नाम के दो गिद्ध रहते थे। ये गिद्ध काफी विशाल थे और लोगों को परेशान करते थे। वे कृषि में इस्तेमाल होने वाले हल और जुआठ को ले जाते थे तथा उनसे अपना घोंसला बनाते थे। वे गिद्ध इंसानों के बच्चों को भी उठा ले जाते थे। परेशान होकर लोग धर्मेस (ईश्वर) से प्रार्थना करते हैं और इस परेशानी से छुटकारा पाने की गुहार लगाते हैं। धर्मेस एक युवा के रूप में लोगों की मदद करने आते हैं। वे अपने तीर से उन दोनों गिद्धों को मार देते हैं और उस विशाल सेंबल वृक्ष को भी गिरा देते हैं (साभार प्रभात खबर 03.03.2026 रांची संस्करण पृष्ठ 8)। इस तरह हर राज्य अपनी संस्कृति, परंपराओं और भावनाओं के रंग में होली को रंगमंच बना देता है।

तमिलनाडु में होली को “कामन पंडिगई” या “काम‑दहन” के नाम से मनाया जाता है, जहाँ भगवान शिव और कामदेव की कथा को याद करते हुए लकड़ी जलाकर “कामा दहन” की परंपरा होती है और रंगों से खेलना ज़्यादा भक्ति‑आधारित होता है। केरल में होली को अक्सर “मनुष्य पूजा” या “मंजुल कुली/उकुली” के रूप में जाना जाता है, जहाँ मंदिरों में विशेष पूजा, भजन और विष्णु आराधना के रूप में इसे मनाया जाता है, रंगों का उत्सव यहाँ भी मौजूद है पर कम और मुख्य रूप से उत्तर भारतीय समुदायों तक सीमित। महाराष्ट्र में होली मुख्य रूप से रंगों, जल‑पानी और गाने‑बजाने के साथ मनाई जाती है, जहाँ लोग पड़ोस‑मित्रों के साथ होली खेलते हैं और कहीं‑कहीं परंपरागत भजन‑कीर्तन भी आयोजित किए जाते हैं। कर्नाटक में होली को “कामना हब्बा” कहा जाता है, जहाँ लोग शिव मंदिरों में पूजा‑अर्चना करते हैं, लकड़ी जलाकर “कामा दहन” करते हैं और फिर हल्के रंग या गुलाल लगाकर उत्सव को आगे बढ़ाते हैं, जिसमें रंगों का उत्साह उत्तर भारत जितना ज़ोरदार नहीं लेकिन सांस्कृतिक रूप से अपनी अलग पहचान रखता है।

बंगाल में होली को “दोल पूर्णिमा” या “दोल जात्रा / बसंत उत्सव” कहा जाता है, जहाँ राधा‑कृष्ण की मूर्तियों को सजी झूले या पालकी में रखकर प्रोसेसन निकाली जाती है, मंत्र‑कीर्तन होते हैं और फिर अबीर‑फूलों से हल्के रंग लगाकर उत्सव किया जाता है। रवींद्रनाथ टैगोर ने भी शांतिनिकेतन में होली को बसंत उत्सव के रूप में मनाया, जो वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। यह उत्सव रंगों, संगीत, नृत्य और रवींद्रसंगीत से सजा एक अनूठा सांस्कृतिक आयोजन था। असल में बसंत उत्सव की शुरुआतटैगोर के सबसे छोटे पुत्र समिंद्रनाथ (शोमी) ने 1907 में 'ऋतु उत्सव' की शुरुआत की, जो बाद में बसंत उत्सव बना। टैगोर ने इसे 1920 से आधिकारिक रूप दिया, जिसमें उनके आश्रम के छात्र पीले (बसंती) वस्त्र पहनकर भाग लेते।

असम में होली “फाखुवा / दोउल” के नाम से मनाई जाती है, जहाँ बरपेटा सत्र जैसे वैष्णव केंद्रों में भगवान कृष्ण की मूर्ति को सात बार पवित्र अग्नि के चारों ओर ले जाया जाता है और फिर रंग‑नृत्य के साथ उत्साह मनाया जाता है। अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और अन्य पूर्वी राज्यों में कुछ पर्व स्थानीय त्योहारों (जैसे योसांग) से जुड़े होते हैं, जहाँ धार्मिक झंडियाँ, नृत्य‑गान और थोड़ा रंगों का उपयोग होता है, लेकिन बड़े पैमाने पर उत्तर भारत जैसी “रंगों की होली” इतनी व्यापक नहीं है।  

गुजरात में होली को दो दिन तक मनाया जाता है: पहले दिन रात को अग्नि‑जलने और नारियल, भुट्टा आदि चढ़ाने की परंपरा होती है और दूसरे दिन रंगों और गुलाल से खेला जाता है, जबकि द्वारका जैसे शहरों में मंदिर‑आधारित उत्सव और गरबा‑संगीत का भी रंग दिखाई देता है। पंजाब में “होला मोहल्ला” बड़ा उत्सव है, जहाँ शेरखान, ग्वालियर, ताकड़‑डांड और नृत्य‑संगीत के साथ शौर्य और साधना का मिश्रण दिखता है, जबकि आम गाँव‑शहरों में भी रंग‑गुलाल और भजन के साथ जश्न होता है। हिमाचल प्रदेश में होली स्थानीय देवताओं की पूजा‑अर्चना के साथ‑साथ रंगों में खेली जाती है, जहाँ पहाड़ी गान‑बाजन और गाँव‑वारी गाथाओं का भरपूर उत्साह रहता है।  

राजस्थान में होली राजवैभव और लोक‑संस्कृति के मेल से भरी होती है, जहाँ जोधपुर, जयपुर, उदयपुर आदि के किलों‑महलों में शोभायात्राएँ, भजन‑ऊर्जा और रंगों का बड़ा संगम दिखता है, साथ ही गाँवों में दीवार‑चित्रकारी और लोक‑नृत्य भी होली की रौनक बढ़ाते हैं। जम्मू‑कश्मीर में अमूमन यह त्योहार शांत और शमिल ढंग से मनाया जाता है, जहाँ मुख्य रूप से शहरी श्रद्धालु रंगों‑भजन के साथ दोस्तों के साथ उत्सव करते हैं, जबकि लद्दाख में होली की जगह स्थानीय बौद्ध त्योहार (जैसे लोसर) होते हैं और रंगों की होली बहुत सीमित, ज्यादातर तिब्बती‑समुदाय या शहरी युवाओं के बीच दिखाई देती है।


1 comment:

Anonymous said...

Waah kya likha hai Sir

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