भारतीय इतिहास के पन्नों में जवाहरलाल नेहरू का नाम एक प्रमुख स्थान रखता है। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में उनकी भूमिका को लेकर बहसें आज भी जारी हैं। मीडिया और विभिन्न विचारधाराओं के प्रभाव से इतिहास की व्याख्या प्रभावित होती है, लेकिन सच्चाई को परखने के लिए हमें निष्पक्ष मापदंड अपनाने चाहिए। अफ्रीकी कहावत की तरह, इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा जाता है, जब तक कि हारने वालों के पास अपनी कहानी कहने वाले न हों। नेहरू की विरासत का मूल्यांकन करने के लिए हम कुछ स्पष्ट पैरामीटर स्थापित कर सकते हैं: संसाधन प्रबंधन, निर्णयों का दीर्घकालिक प्रभाव, संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता, अतीत की समझ, वर्तमान मुद्दों से निपटने का तरीका, व्यावहारिक या सैद्धांतिक दृष्टिकोण, तथा व्यक्तिगत पृष्ठभूमि। इन मापदंडों पर नेहरू के कार्यों की पड़ताल करने से उनकी विरासत का वास्तविक चेहरा उजागर होता है।
संसाधन प्रबंधन के मापदंड पर नेहरू की परीक्षा सबसे पहले आती है। स्वतंत्रता के समय भारत के पास सीमित संसाधन थे – खाद्यान्न की कमी, विभाजन की हिंसा, और आर्थिक संकट। फिर भी नेहरू ने राष्ट्रीय एकता और नेतृत्व निर्माण पर ध्यान नहीं दिया। 15 अगस्त 1947 को लाल किले से उनका प्रसिद्ध भाषण 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' था, जो काव्यात्मक और अंग्रेजी में था। यह भाषण आम जनता के लिए नहीं, बल्कि चुनिंदा श्रोताओं – जैसे एडविना माउंटबेटन और अन्य एलीट वर्ग – के लिए प्रतीत होता है। हिंसा और शरणार्थी संकट के बीच कविता लिखना संसाधनों का अपव्यय था। देश को एक मजबूत टीम की जरूरत थी, जिसमें राजगोपालाचारी, अंबेडकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और जयपाल सिंह जैसे प्रतिभावान नेता शामिल हो सकते थे। लेकिन नेहरू ने इन्हें जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया। अंबेडकर को कानून मंत्री बनाया, लेकिन उनकी सलाह को अनदेखा किया। मुखर्जी को संगठन से बाहर किया। यह टीम भावना की कमी संसाधनों के अपर्याप्त उपयोग का प्रतीक है। एक बेहतर प्रबंधक सीमित संसाधनों में अधिकतम उत्पादकता निकालता, लेकिन नेहरू ने व्यक्तिगत छवि निर्माण को प्राथमिकता दी।
नेहरू के निर्णयों का दीर्घकालिक प्रभाव दूसरा महत्वपूर्ण मापदंड है। उनकी आर्थिक नीतियां समाजवादी मॉडल पर आधारित थीं, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों पर जोर था। भारी उद्योगों की स्थापना ने कुछ आधारभूत ढांचे दिए, लेकिन ये नीतियां मात्र 30 वर्ष टिक पाईं। 1991 में आर्थिक संकट के समय मनमोहन सिंह ने उदारीकरण की नीति अपनाई, जो नेहरूवादी मॉडल को पूरी तरह खारिज कर रही थी। लाइसेंस परमिट राज, बंद अर्थव्यवस्था और आयात प्रतिस्थापन ने देश को गरीबी के जाल में फंसा दिया। नेहरू का पंचवर्षीय योजना आयोग एक केंद्रीकृत मॉडल था, जो सोवियत संघ से प्रेरित था, लेकिन भारतीय वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता था। परिणामस्वरूप, 1991 तक विदेशी मुद्रा भंडार शून्य हो गया। यदि निर्णय दीर्घसूत्री होते, तो आज भारत को आर्थिक सुधारों की आवश्यकता न पड़ती। नेहरू की दृष्टि सैद्धांतिक थी, व्यावहारिक नहीं, जिसने राष्ट्र की तकदीर को प्रभावित किया।
संवैधानिक मूल्यों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति प्रतिबद्धता तीसरा पैरामीटर है। नेहरू ने संविधान निर्माण में योगदान दिया, लेकिन जल्द ही इसे अपने हितों के लिए तोड़ा। पहला संशोधन 1951 में प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया, जो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध था। यह संशोधन बाबरी मस्जिद विवाद और अन्य मामलों से प्रेरित था, जहां न्यायपालिका के फैसलों को उलटने का प्रयास हुआ। सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनकी उदासीनता स्पष्ट थी। भारतीय कला, परंपराओं और हिंदू धरोहर को वे आधुनिकता के नाम पर नजरअंदाज करते थे। संविधान में धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित करते हुए उन्होंने पाश्चात्य मॉडल अपनाया, जो भारतीय संदर्भ से कटा था। पारंपरिक त्योहारों या सांस्कृतिक उत्सवों को प्रोत्साहन देने के बजाय, वे पश्चिमीकरण पर तुले रहे। यह प्रतिबद्धता की कमी राष्ट्र की आत्मा को कमजोर करने वाली थी।
अतीत की समझ चौथा मापदंड है। नेहरू इतिहासकार होने का दावा करते थे, उनकी पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' प्रसिद्ध है। लेकिन यह पुस्तक पक्षपाती थी। वे भारतीय अतीत को अपने वैचारिक चश्मे से देखते थे। अशोक और मौर्य साम्राज्य को राष्ट्रीय प्रतीक बनाने का प्रयास किया, क्योंकि वे स्वयं को अशोक की तरह देखते थे – एक धर्मपरिवर्तित शासक जो साम्राज्य विस्तार के बाद शांति का प्रचारक बना। लेकिन अशोक का चक्र हिंसा और कर नीतियों से जुड़ा था, जो नेहरू की छवि निर्माण के लिए उपयुक्त था। वास्तविक भारतीय इतिहास – वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत – को वे उपेक्षित रखा। मुगल काल को महिमामंडित किया, जबकि प्राचीन वैभव को कमतर आंका। यह इतिहास का पुनर्लेखन था, जो नेहरू की मानसिकता को दर्शाता है। एक नेता को अतीत को निष्पक्ष देखना चाहिए, न कि अपनी छवि गढ़ने के लिए।
वर्तमान मुद्दों से निपटने का तरीका पांचवां पैरामीटर है। नेहरू के शासनकाल में कश्मीर, भाषाई दंगे, चीन युद्ध जैसे मुद्दे थे। कश्मीर पर अनुच्छेद 370 लागू करना एक तात्कालिक निर्णय था, जो आज भी समस्या का कारण है। 1962 का चीन युद्ध उनकी कूटनीतिक भूल थी – 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का नारा व्यावहारिक नहीं था। भाषाई राज्यों के पुनर्गठन में हिंसा हुई, लेकिन समाधान अधोखंडी था। नेहरू ने मुद्दों को समन्वयवादी ढंग से हल करने के बजाय न्यायपूर्ण निर्णय लेने से परहेज किया। तत्कालीन मुद्दों में वे वैचारिक पूर्वाग्रहों से बंधे रहे, जिससे दीर्घकालिक समस्याएं खड़ी हुईं। एक परिपक्व नेता मुद्दों को पेशेवर ढंग से सुलझाता, लेकिन नेहरू का दृष्टिकोण भावुक और अल्पदृष्टि वाला था।
व्यावहारिक बनाम सैद्धांतिक दृष्टिकोण छठा मापदंड है। नेहरू वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात करते थे, लेकिन यह उनका अपना विश्वास था। वे समाजवाद, गुटनिरपेक्षता और पंचशील पर अड़े रहे, जो भारतीय वास्तविकता से मेल नहीं खाते थे। वैज्ञानिक स्वभाव का अपील लोगों को उनके विचारों के आगे समर्पण के लिए था। विदेश नीति में अमेरिका-रूस संतुलन की कोशिश विफल रही। आंतरिक नीतियों में भी सिद्धांत प्राथमिक थे – जैसे भूमि सुधार, जो लागू न हो सके। व्यावहारिक नेता परिस्थितियों के अनुरूप बदलता है, लेकिन नेहरू कट्टर थे। उनकी पुस्तकें सैद्धांतिक हैं, कार्यान्वयन कमजोर। यह दृष्टिकोण राष्ट्र को अलग-थलग कर गया।
व्यक्तिगत पृष्ठभूमि सातवां पैरामीटर है। नेहरू एक कुलीन परिवार से थे – मोतीलाल नेहरू के पुत्र। जेल उनके लिए सुख-सुविधाओं वाला स्थान था, आम कैदी की पीड़ा से उनका कोई लेना-देना नहीं। गरीबी, भुखमरी और ग्रामीण भारत की वास्तविकता से वे कटे हुए थे। कैम्ब्रिज शिक्षा ने उन्हें पश्चिमी उदारवाद दिया, लेकिन भारतीय मिट्टी की समझ नहीं। एलीट सर्कल – माउंटबेटन, एडविना – उनके निकट थे। यह पृष्ठभूमि उनकी नीतियों में झलकती है – शहरी पूर्वाग्रह, ग्रामीण उपेक्षा। एक नेता को जनता के दर्द की समझ होनी चाहिए, लेकिन नेहरू विदेशी जैसे लगते थे।
इन पैरामीटर्स पर नेहरू की आलोचना से उनकी विरासत का चेहरा स्पष्ट होता है। वे एक रोमांटिक विचारक थे, लेकिन प्रशासक के रूप में कमजोर। उनकी नीतियों ने भारत को आर्थिक गुलामी में रखा, सांस्कृतिक रूप से अलग किया, और राजनीतिक रूप से विभाजित। फिर भी, कुछ उपलब्धियां हैं जो जबरन उनपर थोपी जा सकती है – जैसे आईआईटी स्थापना, जो उनकी दृष्टि का सकारात्मक पक्ष है।
नेहरू की विरासत को संतुलित रूप से याद करने के लिए शिक्षा प्रणाली में निष्पक्ष इतिहास पढ़ाया जाए। स्कूलों में उनके भाषणों के साथ उनकी भूलों पर भी चर्चा हो। सांस्कृतिक पुनरुत्थान से नेहरूवादी एकतरफा दृष्टि को चुनौती दी जाए। आर्थिक नीतियों में उनकी गलतियों से सीख लें। राजनीतिक नेतृत्व टीम भावना सीखे। नेहरू एक अध्याय हैं, पूर्ण इतिहास नहीं। राष्ट्र को उनकी कमजोरियों से ऊपर उठना होगा। उनकी तरह 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' न बोलें, बल्कि कर्म से भविष्य गढ़ें।
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