लोकतंत्र को अक्सर चुनावों के रूप में देखा जाता है। हर पांच साल में मतदान होता है, विजेता सरकार बनाता है, और यही लोकतंत्र का परिचायक माना जाता है। लेकिन क्या हर चुनाव लोकतंत्र का सच्चा परिचय देता है? नहीं। पश्चिमी शक्तियां अक्सर मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्षता को हथियार बनाकर तानाशाहों को वैधता प्रदान कर देती है। परवेज मुशर्रफ जैसा तानाशाह जनमत संग्रह के माध्यम से सत्ता हासिल कर लेता है।
भारत का लोकतंत्र किसी क्रांति या तथाकथित स्वतंत्रता संग्राम का परिणाम नहीं है। स्वतंत्रता के समय यहां के सभी नेता लोकतांत्रिक विचारों वाले नहीं थे। नेहरू, गांधी, पटेल जैसे कांग्रेसी नेता तो लोकतंत्र के पक्षधर थे, लेकिन कम्युनिस्टों, समाजवादियों और कुछ क्षेत्रीय नेताओं में तानाशाही प्रवृत्ति साफ झलकती थी। फिर भी, आजादी के बाद का अनुभव लोकतंत्र की परीक्षा का स्पष्ट प्रमाण है। लोकतंत्र को मापने का पैमाना केवल चुनाव नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग के समय जनता और संस्थाओं का रवैया है।
आपातकाल: संस्थाओं की परीक्षा और जनता का संघर्ष
1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल ने भारत के लोकतंत्र की असली ताकत दिखाई। संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल घोषित कर दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया, और संविधान के अभिभावक—सुप्रीम कोर्ट—घुटने टेक चुका था। केशवानंद भारती मामले में 'बेसिक स्ट्रक्चर' सिद्धांत देने वाले न्यायालय ने इस बार चुप्पी साध ली। चुनाव आयोग, चुनाव रद्द कर दिए गए। कोई संस्था सामने नहीं आई।
लेकिन भारत के लोग लोकतांत्रिक थे। जेपी नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति का आंदोलन चला। लाखों लोग सड़कों पर उतरे। मजदूर, किसान, छात्र, महिलाएं—सभी ने एकजुट होकर संघर्ष किया। 1977 के चुनाव में इंदिरा को करारी हार मिली। यह साबित करता है कि भारत का लोकतंत्र सत्ता पर निर्भर नहीं, जनता पर टिका है। जनता ने जीत हासिल की, न कि कोई संस्था।
आज उसी हालात की वापसी दिख रही है। वर्तमान मोदी सरकार का UGC आंदोलन के खिलाफ रवैया सत्ता के अलोकतांत्रिक चरित्र का असली चेहरा है। संविधान के अभिभावक को देखिए—होली के बाद भांग का नशा अभी उतरा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट, जो कभी आपातकाल में चुप था, आज भी सत्ता के आगे नतमस्तक लगता है।
अन्ना हजारे के आंदोलन की बुनियादी समझ
मनमोहन सिंह के काल में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआ। अन्ना को गिरफ्तार किया गया इस उम्मीद में की इससे सरकार के खिलाफ माहौल नहीं बन पाएगा। लेकिन जनता सड़कों पर उतर आई। दिल्ली के रामलीला मैदान में लाखों लोग जुटे। मनमोहन सरकार को जनाक्रोश का सामना करना पड़ा। विपक्ष, खासकर भाजपा ने इसका खुलकर समर्थन कर मोदी की जीत के रूप में सौभाग्य बनाया। कुलदीप नैय्यर ने सही लिखा था कि सत्ता की थाली मनमोहन ने खुद मोदी को सौंप दी।
आज वही भाजपा सत्ता में है। UGC के नए दिशानिर्देशों के खिलाफ छात्र आंदोलन हो रहा है। यह आंदोलन संवैधानिक आजादी के दायरे में है—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन। लेकिन सरकार ने इसे कुचलने की कोशिश की। पुलिस बल प्रयोग कर नजरबंदी। यह ठीक वैसा ही है जैसे अंग्रेजों ने सुभाष चंद्र बोस को नजरबंद कर दिया था।
UGC के दिशानिर्देश सामान्य वर्ग को अल्पसंख्यक बना देते हैं। आरक्षण के नाम पर सामान्य वर्ग के साथ भेदभाव। सच यह है की भारत में जातियां बहुत हैं और जातिवार गिनें तो हर जाति अल्पसंख्यक है। फिर भी, भाजपा ने सामान्य वर्ग को पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों जैसी स्थिति में धकेल दिया।
सामान्य वर्ग का दर्द: स्थायी भेदभाव
सामान्य वर्ग कोई स्वर्ण जाति नहीं है। यह कोई वर्ग नहीं, बल्कि मेहनत करने वाले लोग हैं चपरासी से लेकर प्रोफेसर तक। भारत में कोई 'स्वर्ण जाति' नहीं है। सभी जातियां संघर्ष कर रही हैं। लेकिन भाजपा का रवैया सामान्य वर्ग को minority class बना रहा है। UGC गाइडलाइंस के नाम पर यह भेदभाव सामान्य वर्ग को असहनीय दर्द दे रहा है। मध्य प्रदेश के IAS अधिकारी संतोष वर्मा ने नवंबर 2025 में भोपाल के एक AJAKS कार्यक्रम में ऊपरी जाति (ब्राह्मण) की बेटियों के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिसमें उन्होंने कहा कि आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए जब तक कोई ब्राह्मण अपनी बेटी को वर्मा के बेटे से शादी (या रिश्ता) न कर दे।
माना की अभी वर्तमान में भाजपा सत्ता में है और रामलीला में इन स्वर्ण जातियों को जगह न दें, लेकिन भाजपा के प्रति यह विद्रोह हमारे दिलों में रहेगा। सदा रहेगा। घोषित तौर पर यह भेदभाव लोकतंत्र का अपमान है। संविधान कहता है समानता। लेकिन आरक्षण के नाम पर सामान्य वर्ग को पिछड़ा बना दिया जा रहा है।
मतलब यह मान लिया जाय की BNS, अन्य कानून और पुलिस, निम्न न्यायालय, उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय सहित विभिन्न आयोग सहित CBI जैसी संस्थाएं बेकार हो गयी है। अगर बात किसी भी तरह की जातीय हिंसा और विभेद के उन्मूलन की है तो क्या ऐसा है कि ये सारी संस्थाएं बेकार की है और समानता तभी सुनिश्चित होगी जब UGC guidelines लागू किया जाय।
भारत का लोकतंत्र जनता का है, सत्ता का नहीं
भारत का लोकतंत्र प्राचीन है लेकिन यह पार्टियां ही है जो चुनावी प्रक्रिया में विजेता होती है और लोकतंत्र का स्वाद चखती है। लेकिन अब मोदी सरकार सर्वसत्ताधारी बन रही। संसद में बहुमत, राज्यसभा में बढ़त, न्यायपालिका पर दबाव। मीडिया गोदी मीडिया। लेकिन हम भारत के लोग लोकतांत्रिक हैं। हम किसी सर्वसत्ताधारी सरकार से नहीं डरते।
भाजपा के खिलाफ प्रतिरोध अब दिलों में रहेगा। सदा। रामलीला में जगह न मिले। यह देश हम सबका है। संविधान में 'हम भारत के लोग' हैं ना की 'भाजपा की सरकार' का।
चिंता का कारण
वैसे चिंता का एक कारण भी है। वर्तमान की कांग्रेस पार्टी जिस तरह से अमर्यादित व्यवहार कर रही है, उसे देखकर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि वह इसमें भी अराजक तत्वों का प्रवेश जरूर करवा देगी। लोकसभा में भी प्रधानमंत्री की न बोलने देना, AI समिट में नंगा नाच, यह सब हाल फिलहाल की कहानियाँ हैं। वैसे मैं इतना जरूर कह सकता हूँ कि, जितना आरोप प्रधानमंत्री पर लगाए गए हैं, उतना किसी पर भी नहीं लगाए गए। संभव है कि सुरक्षा संबंधी चिंताए हो जिसके कारण, ऐसा करना पड़ा हो। लेकिन जो भी अगर ऐसी आशंका थी भी तो सरकार को ऐसे अराजक तत्वों से बलपूर्वक निपटना चाहिए। अनुशासन सबसे अच्छा विकल्प होता है कई अवसरों पर।
सरकार के पास समर्पित नौकरशाही का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। वर्तमान टीम में वफादार अधिकारी ही नहीं हैं। ऐसे में यह संदेहास्पद है कि कौन अधिकारी किस मकसद से अपनी सक्रियता निभा रहा है। विनीत जोशी, संभवतः ऐसे ही अधिकारी हैं। ऐसे संकटों से बचने के लिए सरकार को नौकरशाही के निचले स्तरों से संवाद स्थापित करना चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि मूल ड्राफ्ट कैसा था और किस स्तर पर उसे अंतिम रूप दिया गया था। तभी ऐसे विवादों से बचा जा सकेगा। वैसे अब नौकरशाही में असमंजस की स्थिति दिखाई देने लगी है, जो शायद इस बात का परिचायक है कि सरकार जन विश्वास खो रही है, और उसकी वापसी पर संदेह है।
अनंत उवाच
भारत का लोकतंत्र जनता के भरोसे टिका है, न कि सत्ता और संस्थाओं के भरोसे। यहाँ की सत्ता व न्यायिक संस्थाएँ और मीडिया भले ही कितनी भी निरंकुश क्यों न रहें, फिर भी लोगों की गहरी आस्था लोकतंत्र के मूल्यों में बनी रही है। यही तो हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत है—जनता का अटूट विश्वास और 'हम भारत के लोग' इसी आस्था के साथ संवैधानिक सीमाओं के अंदर ही इसका शांतिपूर्वक समाधान निकाल लेंगे।
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