भारतीय मीडिया आज एक ऐसा बाजार बन चुका है जहाँ समाचार कम और मनोरंजन अधिक बिकता है। 'हूटर्स' नें माचार को एक सर्कस में बदल दिया है। समझदार व्यक्ति के लिए समाचार समझना अब एक चुनौती बन गया है। कॉलेज के दिनों में हमें लगा कि समाचार वही है जो 'Feel Good स्टोरीज़ और 'हो रहा भारत निर्माण' दिखा रहा हैं। लेकिन कोरोना काल की खबरों ने आँखें खोल दीं। एक हिंदी-इंग्लिश मास कम्युनिकेशन में पीजी डिप्लोमा वाला पत्रकार, जो खुद कोई परीक्षा क्रैक नहीं कर पाया, COVID का विज्ञान बता रहा था। Foreign Relations भी चैनल पर वही पत्रकार बता रहा था। आर्थिक खबरें भी उसी थाली में परोसी जा रही थीं। ऊपर से स्टूडियो के मेहमान – नूपुर शर्मा की गर्दन से लेकर ईश्वर के अस्तित्व तक की बहस! ये टीवी पत्रकारिता के प्रतिष्ठित पत्रकारों की पैदाइश हैं। चुनावी ब्रेकिंग न्यूज़ से शुरू हुआ यह hooter का सफर अमेरिकी-ईरानी युद्ध के कल में शिखर पर पहुँच गया। कौन सी एजेंसी इसके पीछे है, यह तो पता नहीं, लेकिन 2020 से मैंने टीवी छोड़ दिया। मेरे जैसे कई जानकार लोग भी दूरियाँ बना चुके हैं।
मेरा सफर कॉलेज से शुरू होता है। पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं किया, इसलिए शायद समाचार कैसे बनता है, कैसे बेचा जाता है, यह समझ ही नहीं आया। हमें सिखाया गया कि समाचार तथ्यपरक हो, निष्पक्ष हो। लेकिन लगता था'फील गुड' 'भारत निर्माण' ही समाचार था। चमचमाते मॉल, तेजी से बढ़ती जीडीपी, सरकार की उपलब्धियाँ – सब कुछ सकारात्मक। नकारात्मक खबरें दबा दी जातीं। यह TRP का खेल था। टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग पॉइंट) ही राजा है। चैनल वाले जानते हैं कि दर्शक सनसनी पसंद करते हैं, नीरस तथ्य नहीं।
कोरोना काल ने सब उजागर कर दिया। मार्च 2020 में लॉकडाउन लगा। चैनल्स ने डर फैलाना शुरू किया। एक एंकर, जिसका बैकग्राउंड मास कम्युनिकेशन का था लेकिन विज्ञान में डिग्री नहीं, वायरस के म्यूटेशन बता रहा था। 'चीनी वायरस', 'बायोलॉजिकल वेपन' – ये शब्द रोज सुनाई देने लगे। विदेशी चैनल जैसे सीएनएन, बीबीसी भी यही लाइन ले रहे थे। भारत में आयुष मंत्रालय के उपायों को नजरअंदाज कर वैक्सीन की होड़ दिखाई गई। आर्थिक खबरें? जीडीपी गिरावट को छिपाकर 'आत्मनिर्भर भारत' का जाप। लेकिन हकीकत में करोड़ों मजदूर सड़कों पर भटक रहे थे। स्टूडियो में एक्सपर्ट्स चिल्ला रहे थे – 'लॉकडाउन हटाओ, अर्थव्यवस्था बचाओ!' कोई डेटा नहीं, सिर्फ नारे।
यहाँ सवाल उठता है: समाचार कौन बनाता है? चैनल मालिक, जो कॉर्पोरेट हितों से बंधे हैं। उदाहरण लीजिए, रिलायंस या अडानी जैसे समूहों के चैनल। उनकी खबरें उनके फेवर में झुकती हैं। विपक्षी चैनल उल्टा करते हैं। निष्पक्षता नाम की चीज ही खत्म।
हूटर्स का उदय: चुनावी ब्रेकिंग से सनसनी तक
चुनावी ब्रेकिंग न्यूज़ ने हूटर्स को जन्म दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव से शुरू। एग्जिट पोल, ओपिनियन पोल – हर घंटे नई भविष्यवाणी। 'मोदी लहर', 'नीतीश का कमबैक'। लेकिन असलियत चुनाव परिणाम बताते। फिर 2019, 2024। हर सीट पर चीख-पुकार। एंकर चिल्लाते, 'ब्रेकिंग न्यूज़! फलां सीट पर लीड बदल गई!' मेहमान आपस में भिड़ते। एक बीजेपी समर्थक, एक कांग्रेसवादी, एक न्यूट्रल दिखने वाला – तीनों चिल्लाते। कोई सुनता ही नहीं।
यह सफर शिखर पर पहुँचा अमेरिकी-ईरानी तनाव के समय। जनवरी 2020, अमेरिका ने ईरान के जनरल सुलेमानी को मार गिराया। भारतीय चैनल्स ने इसे भारत से जोड़ दिया। 'तेल कीमतें बढ़ेंगी, भारत प्रभावित!' स्टूडियो में रक्षा विशेषज्ञ, अर्थशास्त्री, राजनीतिक पंडित – सब हंगामा। 'पाकिस्तान हमला करेगा!' 'चीन का हाथ!' कोई तथ्य नहीं, सिर्फ अटकलें। TRP 10-15% तक पहुँच गई। दर्शक चिपके रहे, क्योंकि डर और रोमांच बिकता है।
नूपुर शर्मा कांड इसका चरम। 2022 में उसके बयान पर हंगामा। चैनल्स ने इसे ईश्वर के अस्तित्व तक खींच दिया। 'इस्लाम खतरे में!' 'हिंदू भावनाएँ आहत!' स्टूडियो में मौलवी, पंडित, सेकुलरिस्ट – सबकी गर्दन लाल। एंकर बीच में चिल्लाते, 'आप क्या कहते हैं?' बहस घंटों चलती, लेकिन समाधान शून्य। यह पत्रकारिता नहीं, तमाशा है। प्रतिष्ठित पत्रकार जैसे अर्नब गोस्वामी, सुधीर चौधरी ने इसे फैशनेबल बना दिया। उनके शो में रेटिंग्स आसमान छूतीं।
स्टूडियो के मेहमान: विशेषज्ञ या पिट्ठू?
स्टूडियो के मेहमान hooter का ईंधन हैं। कौन हैं ये? रिटायर्ड नौकरशाह, बीजेपी-कांग्रेस के IT सेल वाले, स्वघोषित विशेषज्ञ। एक PG डिप्लोमा वाला विज्ञान बता रहा, तो आश्चर्य क्या? इनमें से कई परीक्षाएँ क्रैक नहीं कर पाए, लेकिन माइक मिला तो ज्ञान बरसाने लगे। नूपुर कांड में एक 'इतिहासकार' ईश्वर को सिद्ध करने लगा। दूसरे ने कुरान के आयत उद्धृत कर हिंदू धर्म को कोसा। एंकर ताली बजवाते।
ये मेहमान एजेंसी के इशारे पर आते हैं। कौन एजेंसी? CIA, RAW, या कॉर्पोरेट लॉबी? साफ नहीं। लेकिन पैटर्न दिखता है। 2020 से अमेरिकी चुनाव, यूक्रेन युद्ध – हर अंतरराष्ट्रीय घटना को भारत से जोड़ दिया जाता। 'बाइडेन का बयान, मोदी पर हमला!' दर्शक डरते, चैनल हँसते।
मैंने 2020 से टीवी छोड़ दिया। कोरोना की अफरा-तफरी में थक गया। मेरे जैसे लाखों। सर्वे बताते हैं – 2023 में टीवी न्यूज़ दर्शक 30% गिरे। लोग यूट्यूब, ट्विटर (अब X) पर चले। वहाँ भी फेक न्यूज़ है, लेकिन कम से कम चीख नहीं।
कोरोना काल: झकझोर देने वाली सच्चाई
कोरोना ने मीडिया की पोल खोल दी। फरवरी 2020 में तीसरी सबसे संक्रमित देश बनने की भविष्यवाणी। लेकिन भारत ने 2 बिलियन वैक्सीन डोज दिए। चैनल्स ने इसे इग्नोर कर 'ऑक्सीजन संकट' दिखाया। अस्पतालों में बेड न हों, यह सच था, लेकिन समाधान के बजाय हंगामा। एक चैनल ने 'डॉक्टर की पत्नी को बेड न मिला' पर घंटों बहस। दूसरे ने 'कोविशील्ड के साइड इफेक्ट्स'। विदेशी मीडिया की नकल।
आर्थिक खबरें? लॉकडाउन में 12 करोड़ नौकरियाँ गईं। लेकिन चैनल्स ने 'रिलायफ पैकेज' का गुणगान किया। स्टूडियो में अर्थशास्त्री चिल्लाते, 'विकास दर 8% होगी!' हकीकत में महंगाई आसमान छू रही। आज 2026 में भी वही हाल। बजट पर बहस – 'मोदी जी का मास्टरस्ट्रोक!' विपक्ष चिल्लाता, 'चुनावी जुमला!' कोई डेटा विश्लेषण नहीं। कोई डेटा नहीं, सिर्फ नारे। यहाँ यह सवाल उठता है: समाचार कौन बनाता है? चैनल के मालिक—जो कॉर्पोरेट हितों से जुड़े हैं। उदाहरण लीजिए, रिलायंस या अडानी जैसे समूहों की न्यूज़ चैनल; उनकी खबरें उनके फेवर में झुकती हैं। विपक्षी चैनल उल्टा करते हैं: जहाँ एक ओर ‘मोदी जी भाग रहे हैं’, वहीं दूसरी ओर ‘राहुल गाँधी देश बचाएँगे’। निष्पक्षता नाम की चीज़ ही ख़त्म हो गई।
विदेशी प्रभाव और एजेंसी का रहस्य
कौन सी एजेंसी hooter चला रही? विदेशी संबद्ध चैनल संदेहास्पद। BBC, CNN की लाइन भारतीय चैनल कॉपी करते। यूक्रेन युद्ध में 'पुतिन हिटलर!'। इरान पर 'परमाणु खतरा!' भारत को बीच में घसीटा। CIA का हाथ? संभव। वाशिंगटन पोस्ट के रिपोर्ट्स बताते हैं कि अमेरिका मीडिया को फंड करता है। भारत में फोर्ड फाउंडेशन जैसे NGO चैनलों को ग्रांट देते। परिणाम – एजेंडा सेट। हिंदू-मुस्लिम तनाव भड़काओ, भारत को अस्थिर दिखाओ।
चुनावी hooter इसी का हिस्सा। 2024 लोकसभा में 'एग्जिट पोल मैनिपुलेशन'। चैनल्स ने NDA को 400 बताया। असल में 293। दर्शकों का भरोसा टूटा।
प्रभाव: समाज पर hooter का जहर
Hooter समाज को बाँटता है। नूपुर कांड से दंगे भड़के। ईश्वर की बहस से सांप्रदायिकता। कोरोना फेक न्यूज़ से लोग वैक्सीन से डरे। आर्थिक hooter से निवेशक भटके। युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर चली गई, जहाँ और खतरनाक एजेंडा हैं। मेरे जैसे जानकार लोग टीवी छोड़ चुके। लेकिन समस्या बनी हुई। समाचार अब 'समझने' लायक नहीं। यह बिक्री का सामान है। मैं तो अब खुलेआम कहता हूं समाचार समझने के लिए टीवी छोड़ो। प्राइम सोर्स पढ़ो – RBI रिपोर्ट्स, WHO डेटा, सरकारी पोर्टल। यूट्यूब पर फैक्ट-चेक चैनल देखो। बहस से दूर रहो। खुद विश्लेषण करो। DD न्यूज़ आज भी सबसे ज्यादा अच्छा है। देखिए और आप ही बताइए 🙏
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