महाभारत : धर्म और अधर्म का महाआख्यान
प्रस्तावना — महाभारत का परिचय एवं महत्त्व
महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं है — यह मानव-जीवन का विशालतम दर्पण है। इसमें सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म, प्रेम और घृणा, त्याग और लोभ — जीवन के समस्त द्वन्द्वों का अभूतपूर्व चित्रण है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह ग्रन्थ न केवल भारत की, अपितु सम्पूर्ण मानवता की अमूल्य धरोहर है।
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥
अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों के विषय में जो इस ग्रन्थ में है, वह अन्यत्र भी मिल सकता है, किन्तु जो इसमें नहीं है, वह कहीं भी नहीं मिलेगा। (महाभारत, आदिपर्व १.५६)
महाभारत का मूल प्रतिपाद्य विषय धर्म है। यह ग्रन्थ हमें सिखाता है कि धर्म क्या है, अधर्म क्या है, और इन दोनों के बीच संघर्ष में मनुष्य को किस मार्ग पर चलना चाहिए। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो परिवारों का संघर्ष नहीं था — यह धर्म और अधर्म के बीच का शाश्वत संग्राम था।
इस लेख में हम महाभारत के धर्म-आख्यान को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। संस्कृत श्लोकों के माध्यम से मूल ग्रन्थ की वाणी को जीवित रखते हुए, हम धर्म के विविध आयामों — राजधर्म, पितृधर्म, पत्नीधर्म, मित्रधर्म, शत्रुधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म — का विस्तृत विवेचन करेंगे।
एष धर्मः सनातनः। धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः॥
अर्थ: यही सनातन धर्म है — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; और जो धर्म को नष्ट करता है, धर्म उसे नष्ट कर देता है।
२. महाभारत में धर्म का स्वरूप — परिभाषा, प्रकार एवं महत्त्व
२.१ धर्म की व्युत्पत्ति और परिभाषा
'धर्म' शब्द संस्कृत की 'धृ' धातु से बना है, जिसका अर्थ है धारण करना। जो सृष्टि को, समाज को, व्यक्ति को, और स्वयं को धारण करे — वही धर्म है। महाभारत में धर्म की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं, जो उसके विराट स्वरूप को इंगित करती हैं।
धारणाद् धर्मम् इत्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः। यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥
अर्थ: धारण करने के कारण इसे धर्म कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है। जो धारण शक्ति से युक्त हो, वही धर्म है — यह निश्चित है। (महाभारत, कर्णपर्व ६९.५८)
युधिष्ठिर जब यक्ष से प्रश्नोत्तर करते हैं, तब धर्म की व्यापक परिभाषा सामने आती है। यक्ष पूछता है — 'धर्म का लक्षण क्या है?' और युधिष्ठिर उत्तर देते हैं — 'आनृशंस्य' अर्थात् अहिंसा और निर्दयता का अभाव ही परम धर्म है।
आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा शक्तिः परा स्मृता। ज्ञानमद्भुतमाहुस्ते शमस्त्वर्जव उच्यते॥
अर्थ: निर्दोष होना (अहिंसा) परम धर्म है, क्षमा परम शक्ति है, ज्ञान आश्चर्यजनक माना गया है, और शम (मन की शान्ति) को सरलता कहा जाता है। (महाभारत, वनपर्व २.७)
२.२ धर्म के सोलह लक्षण
महाभारत में विदुर, भीष्म, व्यास और अनेक महर्षियों ने धर्म के विविध लक्षण बताए हैं। इन सभी को संकलित करें तो धर्म के सोलह प्रमुख लक्षण उभरकर आते हैं:
१. सत्य — सदा सत्य बोलना और सत्य का आचरण करना। २. अहिंसा — किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से पीड़ा न पहुँचाना। ३. ब्रह्मचर्य — इन्द्रियों पर संयम रखना। ४. दान — पात्र को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना। ५. क्षमा — अपराध करने वाले को क्षमा कर देना। ६. धृति — धैर्य रखना। ७. शम — मन को वश में रखना। ८. दम — इन्द्रियों को वश में रखना। ९. शौच — बाहरी और आन्तरिक पवित्रता। १०. अक्रोध — क्रोध न करना। ११. मार्दव — कोमलता। १२. आर्जव — सरलता। १३. स्वाध्याय — वेदाध्ययन। १४. गुरुसेवा — गुरु की सेवा। १५. तितिक्षा — सुख-दुख सहने की शक्ति। १६. अभय — निर्भयता।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, किन्तु अप्रिय सत्य मत बोलो; और प्रिय होने पर भी असत्य मत बोलो — यही सनातन धर्म है। (महाभारत, शान्तिपर्व)
२.३ धर्म का सूक्ष्म स्वरूप
महाभारत में कहा गया है कि धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है। उसे तर्क से नहीं, अनुभव से जाना जाता है। यही कारण है कि युधिष्ठिर जैसे धर्मराज को भी कभी-कभी धर्म का निर्णय करना कठिन लगता था।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य। तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
अर्थ: धर्म की गति अत्यन्त सूक्ष्म है। तर्क अनिश्चित है, शास्त्र भिन्न-भिन्न हैं, कोई एक मुनि भी ऐसा नहीं जिसका मत प्रमाण हो। (महाभारत, वनपर्व)
इसीलिए महाभारत में 'महाजनो येन गतः स पन्थाः' — महापुरुषों ने जिस मार्ग पर चले, वही मार्ग धर्म है — इस सिद्धान्त को स्वीकार किया गया। भीष्म, द्रोण, कृष्ण, व्यास — ये सभी धर्म के प्रतीक हैं और उनका आचरण ही धर्म की कसौटी है।
३. कुरुवंश और धर्म का क्रमिक ह्रास
३.१ हस्तिनापुर — धर्म का केन्द्र
हस्तिनापुर — भरतवंशियों की राजधानी — कभी धर्म और न्याय का प्रतीक था। भरत महाराज ने इस राज्य की स्थापना उन नियमों पर की थी जो धर्मशास्त्र के अनुसार थे। शान्तनु, देवव्रत (भीष्म), विचित्रवीर्य — इन सभी ने इस राजवंश को आगे बढ़ाया, किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया, धर्म का स्तम्भ डोलने लगा।
कालः पचति भूतानि कालः संहरति प्रजाः। कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥
अर्थ: काल (समय) प्राणियों को पकाता है, काल प्रजा को संहार करता है, जब सब सोते हैं तब काल जागता है — काल को पार करना अत्यन्त कठिन है। (महाभारत, वनपर्व)
३.२ धृतराष्ट्र और पुत्रमोह — अधर्म का बीज
महाभारत के अधर्म-वृक्ष की जड़ें धृतराष्ट्र के पुत्रमोह में हैं। जन्म से अन्धे धृतराष्ट्र अपनी अन्धता को स्वीकार नहीं कर सके। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को राज्य देने की इच्छा में समस्त धर्म-नियमों की उपेक्षा की। विदुर बार-बार उन्हें सावधान करते रहे, किन्तु पुत्रमोह ने उनकी बुद्धि को आवृत कर लिया था।
पुत्रस्नेहाद् धृतराष्ट्रो न दुर्योधनमुत्सृजेत्। एष वैरस्य सम्भारः प्रवृत्तो भरतर्षभ॥
अर्थ: पुत्रस्नेह के कारण धृतराष्ट्र दुर्योधन का त्याग नहीं करते — यही वैर का संग्रह है जो प्रारम्भ हो चुका है, हे भरतश्रेष्ठ! (महाभारत, उद्योगपर्व)
विदुर ने धृतराष्ट्र को समझाया था — 'एक दुर्जन पुत्र के लिए कुल का नाश उचित नहीं है।' किन्तु धृतराष्ट्र मोहवश अपने पुत्र के अधर्म को भी धर्म मानते रहे। यहीं से महाभारत की दुखद कथा का प्रारम्भ होता है।
एकस्य पुत्रस्य कृते भरतस्य महाकुलम्। न नाशयेत् स धर्मज्ञो विदुरेणैव भाषितम्॥
अर्थ: एक पुत्र के कारण भरतवंश के महान कुल को नष्ट नहीं करना चाहिए — यही विदुर ने कहा था। (महाभारत, उद्योगपर्व)
३.३ दुर्योधन और अधर्म की साधना
दुर्योधन महाभारत में अधर्म का प्रतीक-पुरुष है। वह केवल क्रूर नहीं था — वह स्वयं को धर्मी समझता था। उसकी यह भ्रान्ति ही सबसे बड़ा अधर्म था। दुर्योधन का मत था कि 'राजनीति में बल ही धर्म है, और जो सिंहासन पर बैठे, वही राजा है।'
जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि॥
अर्थ: मैं धर्म को जानता हूँ, किन्तु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है; मैं अधर्म को भी जानता हूँ, किन्तु उससे मेरी निवृत्ति नहीं है। किसी देव ने मेरे हृदय में बैठकर जैसा नियुक्त किया है, वैसा ही मैं करता हूँ। (महाभारत — दुर्योधन के ये शब्द उसकी मनोदशा को व्यक्त करते हैं)
दुर्योधन का यह कथन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वह जानता था कि वह अधर्म कर रहा है, फिर भी कर रहा था। यह 'जानबूझकर किया गया अधर्म' सबसे बड़ा पाप है। यही कारण है कि महाभारत में दुर्योधन को नरकगामी बताया गया है, जबकि उसका विरोधी पाण्डव युधिष्ठिर — जो कभी-कभी एक झूठ बोलता है — अन्ततः स्वर्ग जाता है।
३.४ शकुनि — छल और अधर्म का अवतार
शकुनि महाभारत में अधर्म का सबसे कुशल साधक है। गान्धारी के भाई, गान्धार के राजकुमार शकुनि का एकमात्र उद्देश्य था — कुरुवंश का विनाश, और इसके लिए उन्होंने द्यूत (जुए) का अस्त्र चुना। शकुनि के पासे सत्य को झूठ में बदल देते थे।
अक्षद्यूतं समाश्रित्य मायाविद्यां च शत्रुहन्। शकुनिर्वरयामास पाण्डवानाम् पराभवम्॥
अर्थ: शत्रुओं का नाश करने वाले शकुनि ने पासों के जुए और माया-विद्या का आश्रय लेकर पाण्डवों का पराभव चाहा। (महाभारत, सभापर्व)
द्यूतसभा की घटना महाभारत की सबसे अधिक पीड़ादायक घटना है। युधिष्ठिर — धर्मराज — जुए में अपना सर्वस्व हार जाते हैं। पहले राज्य, फिर भाई, फिर स्वयं को, और अन्त में द्रौपदी को दाँव पर लगाते हैं। यह क्षण महाभारत का सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न है — क्या एक पत्नी को दाँव पर लगाया जा सकता है?
४. द्रौपदी का चीरहरण — धर्म का सबसे बड़ा संकट
४.१ सभा में अन्याय
द्रौपदी-अपमान का प्रसंग महाभारत का सर्वाधिक हृदयविदारक प्रसंग है। दुःशासन द्रौपदी के केश पकड़कर राजसभा में खींच लाया। वहाँ भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर जैसे धर्मज्ञ बैठे थे। कर्ण और दुर्योधन हँस रहे थे। पाण्डव मूक थे। और द्रौपदी अकेली धर्म की शरण माँग रही थी।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद् धर्मं न त्यजेम भयाद् वा लोभतोऽपि वा॥
अर्थ: धर्म ही, नष्ट होने पर विनाश करता है, और रक्षित होने पर रक्षा करता है। इसलिए भय से या लोभ से भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। (महाभारत, वनपर्व)
द्रौपदी ने सभा से पूछा — 'पहले पति ने स्वयं को हारा, फिर मुझे दाँव पर लगाया — तो क्या मैं वास्तव में दास हूँ?' यह प्रश्न पूरी सभा को निरुत्तर कर देता है। भीष्म जैसे महाज्ञानी भी कहते हैं — 'यह प्रश्न अत्यन्त सूक्ष्म है, मैं उत्तर देने में असमर्थ हूँ।'
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः। युक्तिहीनं न प्रमाणमस्ति सर्वोपायैः सम्परीक्ष्य साधु॥
अर्थ: धर्म का तत्त्व गुहा में छुपा है; महापुरुष जिस मार्ग पर चले, वही पथ है। बिना युक्ति के कोई प्रमाण नहीं; सब उपायों से परीक्षा करके जो उचित हो, वह करो।
४.२ कृष्ण का धर्मरक्षण
जब सब मौन थे, जब धर्म स्वयं संकट में था — तब कृष्ण आये। उन्होंने अलौकिक रूप से वस्त्र प्रदान किए। यह कोई चमत्कार नहीं था — यह धर्म की शक्ति थी। द्रौपदी ने जब 'गोविन्द' पुकारा, तब उसकी शरण स्वीकार की गई। यहाँ महाभारत का सन्देश है — 'जो धर्म की शरण लेता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।'
कृष्ण कृष्ण महाबाहो द्वारके द्वारकावासिन्। द्रौपद्यास्तव भक्तायाः परित्राणं विधीयताम्॥
अर्थ: हे कृष्ण, हे महाबाहो, हे द्वारका में निवास करने वाले! आपकी भक्ता द्रौपदी की रक्षा करें। (महाभारत, सभापर्व — द्रौपदी की पुकार)
इस प्रसंग में महाभारत एक महत्त्वपूर्ण बात कहता है — जब समाज के सभी स्तम्भ मौन हो जाएँ, जब न्याय-व्यवस्था विफल हो जाए, जब शक्तिशाली लोग अन्याय को देखते रहें — तब केवल परमात्मा की शरण ही बचती है। और परमात्मा वहाँ अवश्य आते हैं जहाँ सच्ची भक्ति हो।
४.३ द्रौपदी का शाप और प्रतिशोध-धर्म
द्रौपदी ने उस दिन प्रतिज्ञा की — 'जब तक दुःशासन के रक्त से मैं अपने केश न धोऊँ, तब तक मैं अपने केश न बाँधूँगी।' यह केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था — यह धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प था। भीम ने यह प्रतिज्ञा सुनकर अपने गदा से दुःशासन का वध करने और उसका रक्त पीने की प्रतिज्ञा की।
यस्मिन् काले तु भीमेन रुधिरं पातुमीप्सितम्। तस्मिन् काले महेष्वासो निश्चयं कारयेत् स्वयम्॥
अर्थ: जिस समय भीम दुःशासन का रक्त पीना चाहते थे, उस समय उस महान धनुर्धर ने स्वयं अपना निश्चय किया। (महाभारत, भीम-प्रतिज्ञा प्रसंग)
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है — क्या प्रतिशोध धर्म है? महाभारत इस प्रश्न का उत्तर देता है — जब अन्याय का जवाब न्यायिक मार्ग से नहीं मिलता, तब क्षत्रिय का प्रतिशोध लेना धर्म ही है। भीम का दुःशासन-वध न केवल प्रतिशोध था, वह धर्म की पुनर्स्थापना का कार्य था।
५. भगवद्गीता — धर्म का सर्वोच्च दर्शन
५.१ अर्जुन का धर्म-संकट
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं, तब अर्जुन के हाथ से गाण्डीव छूट गया। उन्होंने कृष्ण से कहा — 'मैं युद्ध नहीं करूँगा। ये मेरे गुरु हैं, ये मेरे पितामह हैं, ये मेरे भाई हैं। इन्हें मारकर राज्य पाने में क्या सुख होगा?' यह अर्जुन का धर्म-संकट था।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥
अर्थ: हे कृष्ण! मुझे विजय, राज्य और सुखों की कोई इच्छा नहीं है। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या काम, भोगों से या जीवन से भी क्या काम? (गीता १.३२)
अर्जुन का यह प्रश्न केवल युद्ध से सम्बन्धित नहीं था — यह जीवन के सबसे मूलभूत प्रश्न से सम्बन्धित था: जब दो धर्म आपस में टकराते हों — परिवार का प्रेम और क्षत्रिय का कर्तव्य — तो क्या करें?
५.२ कृष्ण का धर्म-उपदेश — कर्मयोग
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। कर्म के फल का कारण मत बनो, और अकर्म में भी आसक्ति मत रखो। (गीता २.४७)
यह श्लोक सम्पूर्ण गीता का सार है। कृष्ण कहते हैं — धर्म का अर्थ है अपने कर्तव्य का पालन करना, फल की चिन्ता किये बिना। अर्जुन एक क्षत्रिय है। युद्ध करना उसका धर्म है। अन्याय के सामने झुक जाना अधर्म है। इसलिए उसे युद्ध करना ही होगा।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। स्वधर्मं च प्रसंख्याय नालं कर्तुं विरोचते॥
अर्थ: अपने धर्म में मरना श्रेयस्कर है; दूसरे का धर्म भयावह है। अपने धर्म के अनुसार कर्म करना ही उचित है। (गीता ३.३५)
५.३ आत्मा की अमरता — धर्म का दार्शनिक आधार
अर्जुन के 'भाइयों को मारने से पाप होगा' तर्क का खण्डन करते हुए कृष्ण आत्मा की अमरता का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं। वे कहते हैं — 'ये आत्माएँ अमर हैं। तुम शरीर को मारते हो, आत्मा को नहीं।'
न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थ: यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है, न यह पहले थी और भविष्य में नहीं होगी। यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है — शरीर के मारे जाने पर यह नहीं मरती। (गीता २.२०)
यह धर्म का सर्वोच्च दार्शनिक आधार है — यदि आत्मा अमर है, तो हिंसा का भय व्यर्थ है। यदि शरीर ही सब कुछ है, तो हाँ, हिंसा पाप है। किन्तु यदि आत्मा अमर और शरीर नश्वर है, तो एक क्षत्रिय का धर्म-युद्ध में शरीर का नाश करना पाप नहीं, कर्तव्य है।
५.४ ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग
गीता में कृष्ण तीन मार्ग बताते हैं — ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग। ये तीनों मार्ग अलग-अलग नहीं हैं — ये एक ही लक्ष्य के तीन पथ हैं। कर्मयोग में कर्तव्य का पालन निस्स्वार्थ भाव से करना है। ज्ञानयोग में आत्म-साक्षात्कार करना है। और भक्तियोग में ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है।
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थ: सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत करो। (गीता १८.६६)
यह गीता का चरम उपदेश है — 'मामेकं शरणं व्रज।' यहाँ 'सर्वधर्मान् परित्यज्य' का अर्थ यह नहीं कि धर्म त्याग दो, बल्कि यह है कि सभी धर्मों का अहंकार त्याग दो — 'मैं धर्म का पालन कर रहा हूँ' — इस भाव को भी त्याग दो और ईश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाओ।
५.५ विश्वरूप दर्शन और धर्म का विराट स्वरूप
गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को कृष्ण का विश्वरूप दर्शन होता है। इस दर्शन में अर्जुन देखता है कि ये सभी योद्धा — दुर्योधन, कर्ण, भीष्म — पहले से ही कृष्ण के मुख में प्रविष्ट हो रहे हैं। काल उन्हें नष्ट कर रहा है। अर्जुन केवल निमित्त है।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
अर्थ: मैं महाकाल हूँ, संसार का विनाश करने वाला। मैं यहाँ सबको समेटने के लिए प्रवृत्त हूँ। तुम्हारे बिना भी सामने खड़े ये सभी योद्धा नहीं रहेंगे। (गीता ११.३२)
यह दर्शन महाभारत के धर्म-दर्शन की पराकाष्ठा है। धर्म केवल नियम-पालन नहीं है — धर्म ईश्वर के संकल्प का माध्यम बनना है। जो ईश्वर की इच्छा के अनुसार चलता है, वही धर्म का पालन करता है।
६. भीष्म — धर्म की विडम्बना और प्रतिज्ञा की सीमाएँ
६.१ भीष्म-प्रतिज्ञा — महानतम त्याग या धर्म-संकट?
देवव्रत — जो भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए — ने अपने पिता शान्तनु की प्रसन्नता के लिए दो प्रतिज्ञाएँ कीं: आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे, और हस्तिनापुर के सिंहासन पर कभी अधिकार नहीं जमाएँगे। इस प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम 'भीष्म' पड़ा — 'भीष्म' अर्थात् जिसने भीषण प्रतिज्ञा की हो।
पिता मे राजशार्दूल सत्यवत्यां कृतादरः। तत्कृते चाहमेवाद्य प्रतिज्ञाद्वयमाचरम्॥
अर्थ: हे राजश्रेष्ठ! मेरे पिता सत्यवती में आसक्त थे, इसीलिए मैंने आज दो प्रतिज्ञाएँ कीं। (महाभारत, आदिपर्व — भीष्म की प्रतिज्ञा प्रसंग)
किन्तु यही प्रतिज्ञा आगे चलकर अधर्म का कारण बनी। भीष्म अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का अपहरण कर विचित्रवीर्य के लिए लाये — यह अधर्म था। अम्बा को अपने प्रेमी शाल्व के पास भेजने पर उसने भीष्म से प्रतिशोध माँगा। भीष्म ने उसे स्वीकार नहीं किया — यह भी अधर्म था।
६.२ द्रौपदी-अपमान में मौन — धर्म या कर्तव्यहीनता?
भीष्म का सबसे बड़ा धर्म-संकट द्रौपदी-अपमान के समय आया। वे सभा में उपस्थित थे। वे कौरवों को रोक सकते थे — वे हस्तिनापुर के सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति थे। किन्तु वे मौन रहे। उनका तर्क था — 'मैंने धृतराष्ट्र का अन्न खाया है, उनके विरुद्ध नहीं बोल सकता।'
अन्नदोषाद् बलं नष्टं पाण्डवानां महात्मनाम्। प्रतिज्ञा-बद्धताद् देवी नोचे वाचं विमोचये॥
अर्थ: अन्न के दोष से महात्मा पाण्डवों की शक्ति नष्ट हुई। प्रतिज्ञा से बँधे होने के कारण हे देवी, मैं वाणी नहीं खोल सका। (भीष्म का आत्म-स्वीकरण)
महाभारत यहाँ एक अत्यन्त गहरा प्रश्न उठाता है — क्या अन्न-दोष से बुद्धि मलिन हो जाती है? क्या स्वामी-भक्ति का धर्म इतना बड़ा है कि उसके सामने निर्दोष स्त्री की रक्षा का धर्म छोटा पड़ जाए? भीष्म पितामह ने स्वयं माना कि उनसे अधर्म हुआ। कुरुक्षेत्र में शरशय्या पर पड़े हुए उन्होंने युधिष्ठिर से कहा — 'मेरे मौन का प्रायश्चित्त मुझे यहाँ शरों पर लेटकर करना पड़ रहा है।'
६.३ शरशय्या पर भीष्म का धर्मोपदेश
कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद जब भीष्म शरशय्या पर लेटे थे, तब कृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर उनसे धर्म का ज्ञान लेने आए। यह प्रसंग महाभारत के शान्तिपर्व में है और इसमें राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म आदि का विस्तृत वर्णन है।
न हि धर्मः सुखासीनः फलतीह मनीषिणाम्। कृच्छ्रेण प्राप्यते धर्मो धर्माद् अर्थो विसर्जितः॥
अर्थ: धर्म सुख से बैठे-बैठे फल नहीं देता — बुद्धिमानों के लिए धर्म कठिनाई से प्राप्त होता है; और धर्म की प्राप्ति के लिए अर्थ का त्याग करना पड़ता है। (महाभारत, शान्तिपर्व)
शरशय्या पर लेटे भीष्म ने ५८ दिनों तक युधिष्ठिर को धर्म का उपदेश दिया। यह उपदेश महाभारत का सर्वाधिक विस्तृत और गहन धर्म-शास्त्र है। इसमें राजनीति, समाजनीति, गृहस्थ-धर्म, संन्यास-धर्म, ईश्वर-भक्ति — सभी विषयों का विस्तार से विवेचन है।
७. कर्ण — त्रासद नायक, दानवीरता और धर्म-अधर्म का संघर्ष
७.१ कर्ण का जन्म और अपमान
कर्ण महाभारत का सर्वाधिक त्रासद पात्र है। वह पाण्डु-पुत्र नहीं, किन्तु कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र था — सूर्यपुत्र, जो माँ के द्वारा त्यागा गया था। राधा और अधिरथ ने उसे पाला। किन्तु समाज ने उसे 'सूत-पुत्र' कहकर अपमानित किया। द्रोणाचार्य ने उसे शिक्षा देने से इनकार किया। द्रौपदी-स्वयंवर में उसे अपमानित किया गया।
सूतपुत्र इति ख्यातं कर्णं सञ्जय चोदय। यदि शूरो यदि वीरो युध्यताम् अर्जुनेन सः॥
अर्थ: संजय! 'सूत-पुत्र' के नाम से प्रसिद्ध कर्ण को प्रेरित करो — यदि वह शूर और वीर है, तो अर्जुन से लड़े। (महाभारत — कर्ण के अपमान का प्रसंग)
कर्ण ने अपने अपमान का प्रतिशोध दुर्योधन की मित्रता में लिया। दुर्योधन ने उसे अंग देश का राजा बनाया। इसलिए कर्ण ने अपना सर्वस्व दुर्योधन को अर्पित कर दिया — यह उसका मित्र-धर्म था। यही उसकी त्रासदी भी थी — सही व्यक्ति के प्रति गलत पक्ष का साथ।
७.२ कर्ण की दानवीरता — अधर्म-पक्ष में भी धर्म
कर्ण की महानता उसकी दानवीरता में है। वह प्रतिदिन हजारों याचकों को दान देता था। यहाँ तक कि जब इन्द्र ब्राह्मण के वेश में आये और उसके कवच-कुण्डल माँगे — जो उसके जन्म-जात थे और उसकी रक्षा करते थे — तब भी कर्ण ने मना नहीं किया।
कर्णो दानेन शूरत्वे सत्ये च विदितः क्षितौ। सूतपुत्र इति ख्यातो धर्मे चापि प्रतिष्ठितः॥
अर्थ: कर्ण दान, शूरता और सत्य के लिए पृथ्वी पर विख्यात थे। 'सूत-पुत्र' के नाम से प्रसिद्ध होने पर भी वे धर्म में प्रतिष्ठित थे।
इन्द्र ने जब कवच-कुण्डल माँगे, तब कर्ण ने कहा — 'दे दूँगा। परन्तु आप कुछ बदले में दें।' इन्द्र ने 'अमोघ शक्ति' — एक अजेय अस्त्र — दिया। किन्तु यह केवल एक बार ही काम करती थी। कर्ण ने इसे अर्जुन के लिए सुरक्षित रखा था, किन्तु घटोत्कच के संकट में उसे उपयोग करना पड़ा। इस प्रकार कर्ण की दानवीरता ने उसकी मृत्यु सुनिश्चित की।
७.३ कर्ण और कुन्ती का मिलन — धर्म-संकट
कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व कुन्ती कर्ण के पास गईं और उसे बताया कि वह उनका पुत्र है। उन्होंने उससे पाण्डवों का पक्ष लेने का अनुरोध किया। कर्ण के सामने भीषण धर्म-संकट था — माँ का आदेश और मित्र-धर्म।
न त्वाहमनृतं वक्ष्ये यदि राज्यं प्रदास्यसि। मित्रस्य धर्म आस्थातुं न शक्यो धर्मवित् तव॥
अर्थ: मैं असत्य नहीं बोलूँगा यदि तुम राज्य भी दो। धर्मज्ञ के लिए मित्र-धर्म का आस्था लेना उचित नहीं है। (कर्ण का कुन्ती को उत्तर)
कर्ण ने कुन्ती से कहा — 'माँ, आपने मुझे तब त्यागा जब मुझे आपकी सबसे अधिक आवश्यकता थी। आज जब आप आई हैं, तो केवल इसलिए कि आपके और पुत्रों की रक्षा हो। मैं दुर्योधन को नहीं छोड़ सकता। परन्तु आपसे यह वचन देता हूँ — अर्जुन को छोड़कर अन्य किसी पाण्डव का वध नहीं करूँगा। आपके पाँच पुत्र रहेंगे।'
यह कर्ण का महानतम धर्म-निर्णय था। वह जानता था कि दुर्योधन का पक्ष अधर्म का पक्ष है। किन्तु मित्र-धर्म उसे बाँधता था। इसीलिए कर्ण महाभारत का सबसे जटिल और आकर्षक पात्र है।
७.४ कर्ण की मृत्यु — अधर्म का अन्त या अन्याय?
कर्ण की मृत्यु अत्यन्त विवादास्पद है। उसकी मृत्यु तब हुई जब उसका रथ कीचड़ में धँस गया था, वह निहत्था था, और परशुराम के शाप के कारण उसे अपना अस्त्र-ज्ञान भूल गया था। ऐसे में कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण पर बाण चलाने को कहा।
कृत्स्नं क्षत्रं विनाशाय समाहर्तुं तु वासवः। कर्णो वध्यः समागम्य तव हस्तेन फाल्गुन॥
अर्थ: समस्त क्षत्रियों का विनाश करने को देवराज इन्द्र ने कर्ण को तुम्हारे हाथों मारे जाने योग्य बनाया है, हे फाल्गुन! (महाभारत, कर्णपर्व)
अर्जुन ने झिझका — 'यह अनुचित है।' किन्तु कृष्ण ने कहा — 'जिस कर्ण ने अभिमन्यु के वध में भाग लिया, जिसने निहत्थे बालक को मारा — उसके साथ यही न्याय है।' यहाँ महाभारत का एक महत्त्वपूर्ण धर्म-सिद्धान्त उभरता है — 'जो जैसा करता है, वैसा भोगता है।'
८. युधिष्ठिर — धर्मराज की परीक्षाएँ और संघर्ष
८.१ युधिष्ठिर — धर्म का प्रतीक पुरुष
युधिष्ठिर को 'धर्मराज' कहा जाता है। वे धर्म के अवतार थे — उनके पिता स्वयं धर्मराज (यम) थे। किन्तु महाभारत में उनकी जो परीक्षाएँ हुईं, वे यह बताती हैं कि धर्म का पालन करना कितना कठिन है।
सत्यं एव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥
अर्थ: सत्य की जय होती है, असत्य की नहीं। देवयान मार्ग सत्य से ही विस्तृत है, जिस पर इच्छापूर्ण ऋषि चलते हैं — वहाँ सत्य का परम निवास है। (मुण्डकोपनिषद् — महाभारत में उद्धृत)
युधिष्ठिर का सबसे बड़ा धर्म-संकट अश्वत्थामा प्रसंग में आया। जब कृष्ण ने योजना बनाई कि द्रोणाचार्य को भ्रमित करने के लिए युधिष्ठिर कहें — 'अश्वत्थामा मारा गया' — तब युधिष्ठिर के सामने धर्म-युद्ध की विजय और अपने सत्य-धर्म में से एक को चुनना था।
८.२ अश्वत्थामा-प्रसंग — आधा सत्य, आधा असत्य
द्रोणाचार्य अपराजेय थे। जब तक वे जीवित थे, पाण्डव-सेना का विनाश अनिवार्य था। कृष्ण ने युक्ति निकाली — भीम ने 'अश्वत्थामा' नाम के एक हाथी को मार दिया, और युधिष्ठिर से कहलवाया — 'अश्वत्थामा मारा गया।' साथ में धीरे से कहा — 'हाथी।'
अश्वत्थामा हतः इति नरो वा कुञ्जरोऽपि वा। इति ब्रुवन् युधिष्ठिरः शब्दं मन्दं व्यसर्जयत्॥
अर्थ: 'अश्वत्थामा मारा गया — मनुष्य हो या हाथी' — ऐसा कहते हुए युधिष्ठिर ने धीमे स्वर में 'हाथी' शब्द कहा।
इस आधे-सत्य के कारण द्रोणाचार्य ने अस्त्र त्याग दिया और ध्यान में बैठ गए। तब धृष्टद्युम्न ने उनका वध किया। युधिष्ठिर को इस झूठ के कारण उनका रथ — जो पहले धरती से चार अंगुल ऊपर चलता था — धरती पर आ गया। महाभारत का यह प्रतीक अत्यन्त सार्थक है — एक भी झूठ व्यक्ति को धरती पर ले आता है।
८.३ यक्ष-युधिष्ठिर संवाद — धर्म की परम परीक्षा
वनवास काल में एक अद्भुत घटना हुई। एक सरोवर के पास यक्ष (जो वास्तव में धर्मराज/यम थे) ने पाण्डव-भाइयों को एक-एक करके रोका। जब वे उत्तर दिए बिना जल पीने लगे, तो मर गए। अन्त में युधिष्ठिर आये। यक्ष ने उनसे धर्म के विषय में अनेक प्रश्न पूछे।
किं स्विद् गुरुतरं भूमेः किं स्विदुच्चतरं च खात्। किं स्विच्छीघ्रतरं वायोः किं स्विद् बहुतरं तृणात्॥
अर्थ: पृथ्वी से क्या भारी है? आकाश से क्या ऊँचा है? वायु से क्या तेज़ है? तृण से क्या अधिक है? (यक्ष के प्रश्न, महाभारत, वनपर्व)
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया — 'माँ पृथ्वी से भारी है। पिता आकाश से ऊँचे हैं। मन वायु से तेज है। और चिन्ता तृण से भी अधिक है।' फिर यक्ष ने पूछा — 'मनुष्य का परम सुख क्या है?' उत्तर था — 'सत्कर्म।' 'परम धर्म क्या है?' — 'अहिंसा।' 'परम ज्ञान क्या है?' — 'आत्म-ज्ञान।'
किं नु हित्वा प्रियो भवति किं नु हित्वा न शोचति। किं नु हित्वार्थवान् भवति किं नु हित्वा सुखी भवेत्॥
अर्थ: क्या छोड़कर मनुष्य प्रिय होता है? क्या छोड़कर शोक नहीं होता? क्या छोड़कर धनवान बनता है? क्या छोड़कर सुखी होता है? (यक्ष के प्रश्न)
युधिष्ठिर के उत्तर: 'मान' छोड़ने से प्रिय होता है। 'क्रोध' छोड़ने से शोक नहीं होता। 'काम' छोड़ने से धनवान बनता है। 'लोभ' छोड़ने से सुखी होता है। यक्ष ने प्रसन्न होकर भाइयों को जीवित किया। यह प्रसंग महाभारत का सर्वश्रेष्ठ धर्म-शिक्षा प्रसंग है।
९. अभिमन्यु और चक्रव्यूह — अधर्म का सामूहिक पाप
९.१ अभिमन्यु का चरित्र — वीरता और धर्म
अभिमन्यु — अर्जुन का पुत्र, सुभद्रा का लाल — महाभारत के सर्वाधिक वीर और त्रासद पात्रों में से एक है। वह केवल सोलह वर्ष का था जब उसने चक्रव्यूह में प्रवेश किया। उसने माँ के गर्भ में ही चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि सुनी थी, किन्तु बाहर निकलने की विधि नहीं — क्योंकि सुभद्रा सो गई थीं।
पुत्र मे प्राण मे वीर सम्प्रति त्वं प्रवेक्ष्यसि। चक्रव्यूहं महाघोरं शत्रूणां भयवर्धनम्॥
अर्थ: हे पुत्र, हे मेरे प्राण, हे वीर! तुम अभी इस महाघोर चक्रव्यूह में प्रवेश करोगे जो शत्रुओं का भय बढ़ाने वाला है।
अभिमन्यु ने कहा — 'पिताजी ने जो सिखाया है, उतने से मैं प्रवेश कर सकता हूँ। बाहर निकलना नहीं आता। किन्तु फिर भी मैं जाऊँगा। क्योंकि क्षत्रिय का धर्म है — युद्ध में पीठ नहीं दिखाना।' यह वाक्य महाभारत का अमर सन्देश है।
९.२ अभिमन्यु-वध — सप्त-महारथियों का अधर्म
चक्रव्यूह के भीतर अभिमन्यु अकेला लड़ रहा था। द्रोणाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शल्य — सात महारथी एक बालक को घेरकर मार रहे थे। यह महाभारत का सबसे बड़ा अधर्म था।
एकं बहवः शूरा समाहत्य निजघ्निरे। न युक्तमिति भावज्ञाः कथयन्ति महर्षयः॥
अर्थ: एक वीर को अनेक शूरों ने मिलकर मारा — यह उचित नहीं था — ऐसा भावज्ञ महर्षि कहते हैं। (महाभारत, द्रोणपर्व)
जब कर्ण ने पीछे से अभिमन्यु के धनुष की प्रत्यंचा काट दी, जब सात महारथियों ने एक साथ उस पर प्रहार किया — यह युद्ध-धर्म का सर्वथा उल्लंघन था। महाभारत में इसे 'महापाप' कहा गया है।
अभिमन्यु के वध के बाद अर्जुन ने जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा की। यह प्रतिज्ञा धर्म-युद्ध के भीतर एक व्यक्तिगत प्रतिशोध की प्रतिज्ञा थी। कृष्ण ने इसे धर्म-सम्मत माना — क्योंकि अभिमन्यु का वध भी अधर्म था।
१०. विदुर-नीति — राजधर्म और नीतिशास्त्र
१०.१ विदुर — धर्म का प्रतिनिधि
विदुर महाभारत का सबसे निष्पक्ष और धर्मज्ञ पात्र है। धृतराष्ट्र के सौतेले भाई, दासीपुत्र होने के कारण राजा बनने के अयोग्य, किन्तु ज्ञान में किसी से कम नहीं। विदुर ने बार-बार धृतराष्ट्र और दुर्योधन को चेताया — 'यह मार्ग अधर्म का है। लौट जाओ।' किन्तु किसी ने नहीं सुना।
अनागतं यः कुरुते स शोभते समागतं यश्च करोति कर्म। यश्चापदं नश्यति नैव मुह्यत् त्रीणि प्रजानाति नरः प्रजानन्॥
अर्थ: जो भविष्य का विचार करता है, जो वर्तमान का कार्य करता है, जो आपदा में घबराता नहीं — इन तीन बातों को जानने वाला मनुष्य ही वास्तव में ज्ञानी है। (विदुर-नीति, महाभारत, उद्योगपर्व)
विदुर-नीति महाभारत का एक स्वतन्त्र नीति-शास्त्र है। इसमें राजा के कर्तव्य, मन्त्री के धर्म, मित्र की पहचान, शत्रु से व्यवहार — सभी विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
१०.२ राजधर्म के सूत्र
राजा प्रकृतिरञ्जनात्। चतुर्वर्णस्य वर्णानां क्षत्रियो धर्ममाचरेत्। स्वधर्ममनुपालन् हि लोकद्वयफलं लभेत्॥
अर्थ: राजा वह है जो प्रजा को अनुरञ्जित करे। चारों वर्णों में क्षत्रिय अपने धर्म का आचरण करे, अपने धर्म का पालन करने से वह दोनों लोकों में फल प्राप्त करता है।
विदुर ने राजधर्म के पाँच प्रमुख सूत्र दिए: पहला — प्रजा की रक्षा सर्वोपरि है। दूसरा — राजा स्वयं नियमों से ऊपर नहीं है। तीसरा — दुर्जन का संग त्याज्य है, चाहे वह पुत्र ही क्यों न हो। चौथा — दूरदर्शिता राजनीति का प्राण है। पाँचवाँ — अहंकार राज्य का नाश करता है।
मन्त्रिणो मन्त्रगुप्तौ स्यात् तेज्यः सर्वत्र सर्वदा। दुर्बलस्य बलं राजा बालानां च पिता यथा॥
अर्थ: मन्त्री सदा सर्वत्र मन्त्र की गुप्तता रखे। राजा दुर्बल का बल हो, जैसे पिता बच्चों का होता है। (विदुर-नीति)
१०.३ सत्य की राजनीति
विदुर का मानना था कि जो राजा झूठ पर अपना राज्य बनाता है, उसका राज्य चिरस्थायी नहीं होता। दुर्योधन का राज्य छल पर आधारित था — इसीलिए वह नष्ट हुआ। युधिष्ठिर का राज्य सत्य पर आधारित था — इसीलिए वह चिरस्थायी हुआ।
सत्यं ब्रह्म तपो ब्रह्म सत्यं स्वर्गस्य साधनम्। सत्यं धर्मस्य मूलं च न किंचित् सत्यतः परम्॥
अर्थ: सत्य ब्रह्म है, तप ब्रह्म है, सत्य स्वर्ग का साधन है। सत्य धर्म का मूल है — सत्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। (विदुर-नीति)
११. कुरुक्षेत्र — धर्म-अधर्म का महासंग्राम
११.१ युद्ध-धर्म के नियम
महाभारत में युद्ध के लिए विशेष धर्म-नियम थे। इन नियमों को 'युद्ध-धर्म' कहते थे। इनके अनुसार: रथी से रथी लड़े, पैदल से पैदल; रात को युद्ध बंद हो; शरण माँगने वाले को न मारें; पीठ दिखाने वाले को न मारें; बिना कवच के योद्धा पर प्रहार न करें; स्त्री, बालक, वृद्ध और निहत्थे पर हमला न करें।
रथिनं रथिनानेव पादातं पादिनैव च। हस्त्यारोहं च हस्त्यारोहैर्युध्येद् धर्मयुद्धे नरः॥
अर्थ: धर्म-युद्ध में रथी रथी से, पैदल-सैनिक पैदल से, और हाथी-सवार हाथी-सवार से लड़े। (महाभारत, कर्णपर्व — युद्ध-धर्म के नियम)
इन नियमों का उल्लंघन ही महाभारत के युद्ध को 'धर्म-युद्ध से अधर्म-युद्ध' में बदल देता है। दुर्योधन पक्ष ने इन नियमों का उल्लंघन पहले किया — अभिमन्यु के वध में, जयद्रथ-वध के पूर्व, घटोत्कच के प्रसंग में।
११.२ भीष्म का पतन — अधर्म का पहला फल
भीष्म पितामह कौरवों के सेनापति थे। उन्होंने कहा था — 'मैं पाण्डवों को नहीं मारूँगा, किन्तु उनकी सेना को नष्ट करूँगा।' यह एक प्रकार का धर्म-अधर्म का मिश्रण था। अन्ततः शिखण्डी के सामने भीष्म ने अस्त्र रख दिए — क्योंकि शिखण्डी पहले स्त्री था और स्त्री पर प्रहार करना भीष्म के धर्म के विरुद्ध था।
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य तव पित्रा धनञ्जयः। प्राहरद् विशिखैस्तीक्ष्णैर्भीष्मं शान्तनवं तदा॥
अर्थ: शिखण्डी को आगे रखकर तुम्हारे पिता अर्जुन ने उस समय शान्तनुपुत्र भीष्म पर तीखे बाणों से प्रहार किया। (महाभारत, भीष्मपर्व)
११.३ द्रोणाचार्य का वध — गुरु-वध का पाप
द्रोणाचार्य का वध महाभारत के सर्वाधिक विवादास्पद प्रसंगों में से एक है। धृष्टद्युम्न ने ध्यानस्थ, निहत्थे द्रोणाचार्य का सिर काट दिया। यह युद्ध-धर्म का उल्लंघन था। यही कारण है कि महाभारत में धृष्टद्युम्न को भी दोषी माना गया।
निश्शस्त्रं ब्राह्मणं हत्वा यत् पापं फाल्गुनेन वा। न तावतां पापमस्ति यत् गुरोः शिरः पाते॥
अर्थ: निहत्थे ब्राह्मण को मारने का जो पाप अर्जुन को भी होता, उससे भी अधिक पाप है गुरु का सिर काटना।
११.४ कृष्ण का धर्म-व्यवहार — 'छलेन वध' की नीति
कृष्ण ने महाभारत-युद्ध में कई बार ऐसे कार्य किए जो युद्ध-धर्म के विपरीत प्रतीत होते हैं। उन्होंने जयद्रथ-वध के लिए सूर्यास्त की माया रची। उन्होंने भीष्म-पतन के लिए शिखण्डी का उपयोग किया। उन्होंने दुर्योधन की जाँघ पर प्रहार करने के लिए भीम को इशारा किया।
नाधर्मेण जयो युक्तः स विजयो विजयो यथा। धर्मेणैव जयस्ते स्याद् धर्मः सर्वस्य साधनम्॥
अर्थ: अधर्म से जीत प्राप्त करना उचित नहीं है — वह विजय, विजय नहीं कहलाती। केवल धर्म से ही विजय होती है — धर्म सबका साधन है।
किन्तु कृष्ण का तर्क था — जब दुर्योधन पक्ष ने पहले धर्म का उल्लंघन किया (अभिमन्यु-वध, द्रौपदी-अपमान), तब उसके साथ पूर्ण धर्म-नियमों से लड़ना स्वयं अधर्म होगा। 'छल से छल' — यह आपद्धर्म है।
१२. आपद्धर्म — संकट में धर्म की विशेष व्यवस्था
१२.१ आपद्धर्म का सिद्धान्त
महाभारत में 'आपद्धर्म' की एक विशेष अवधारणा है। साधारण परिस्थितियों में जो नियम लागू होते हैं, वे आपातकाल में शिथिल हो जाते हैं। यह वही सिद्धान्त है जिसे आज हम 'force majeure' कहते हैं।
आपदि कर्म कुर्वाणो धर्मं नाभिहिनस्ति हि। आपत्काले तु धर्म स्याद् यत् कुर्यान्नित्यमेव सः॥
अर्थ: आपत्ति में कर्म करते हुए धर्म का नाश नहीं होता। आपत्काल में जो किया जाए, वही धर्म है — यदि वह नित्य-कर्म की भावना से हो।
भीष्म ने शान्तिपर्व में विस्तार से बताया है — भूख से मरते समय अखाद्य खाना भी धर्म है। शत्रु द्वारा घिरे जाने पर कूटनीति भी धर्म है। प्राण-रक्षा के लिए असत्य बोलना भी धर्म है। यह 'आपद्धर्म' की व्यापक अवधारणा है।
प्राणान् परित्यजेद् धर्मे धर्मं च परमार्थतः। परमार्थे परे धर्मे प्राणांस्त्यजति पण्डितः॥
अर्थ: धर्म की रक्षा के लिए प्राण त्याग दें; परन्तु परम सत्य के लिए, परम धर्म के लिए, ज्ञानी व्यक्ति प्राण त्याग देता है। (महाभारत, शान्तिपर्व)
१२.२ विश्वामित्र और चाण्डाल-गृह का प्रसंग
महाभारत में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रसंग है — विश्वामित्र का भूख से मरते समय चाण्डाल के घर से श्वानमाँस चुराकर खाना। यह घटना 'आपद्धर्म' का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। कोई भी धर्म प्राण से बड़ा नहीं है — क्योंकि प्राण है तो धर्म का पालन सम्भव है।
प्राणानां परिरक्षार्थं सर्वधर्मान् परित्यजेत्। प्राणे हि धर्म आधारः सर्वधर्माः फलप्रदाः॥
अर्थ: प्राणों की रक्षा के लिए सब धर्मों को त्याग दो। प्राण में ही धर्म का आधार है — सभी धर्म प्राण से ही फलदायी होते हैं।
१३. स्त्री-धर्म — गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी की धर्म-यात्रा
१३.१ गान्धारी — पतिव्रता का चरम
गान्धारी — गान्धार-राजकुमारी, धृतराष्ट्र की पत्नी — ने पति की अन्धता जानकर स्वयं भी अपनी आँखें बाँध लीं। यह पतिव्रत-धर्म का चरम उदाहरण था। गान्धारी का यह निर्णय केवल प्रेम नहीं था — यह उस युग के स्त्री-धर्म की सीमाओं का भी परिचायक था।
पतिव्रता यथा नारी पतिमेव हि दैवतम्। मन्यते नात्र सन्देहो धर्मोऽयं सनातनः॥
अर्थ: पतिव्रता स्त्री पति को ही देव मानती है — इसमें संशय नहीं, यही सनातन धर्म है।
गान्धारी ने पुत्र-मोह में भी धर्म का साथ नहीं छोड़ा। जब कृष्ण उनके पास दूत बनकर आए, तब उन्होंने दुर्योधन को धर्म-मार्ग पर चलने का उपदेश दिया। युद्ध के बाद जब कृष्ण उनसे मिलने आए, तब गान्धारी ने कृष्ण को शाप दिया — 'जैसे मेरे कुल का नाश हुआ, वैसे ही यादव कुल का नाश हो।' यह शाप 'मातृशोक' का प्राकृतिक विस्फोट था।
१३.२ कुन्ती — त्याग और धर्म
कुन्ती महाभारत की सबसे जटिल नारी-पात्र है। उन्होंने कर्ण को जन्म दिया, किन्तु लोक-लाज के भय से उसे त्याग दिया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा पाप और सबसे बड़ी पीड़ा थी। पाण्डु की मृत्यु के बाद उन्होंने पाँच पुत्रों को पाला और उन्हें धर्म-मार्ग पर चलाया।
माता ज्येष्ठा गुरुः पुत्रैः सेव्या प्रयत्नतः। देवः प्रत्यक्षदृश्योऽसौ न देवो विद्यते परः॥
अर्थ: माता ज्येष्ठ गुरु है, पुत्रों को प्रयत्नपूर्वक उनकी सेवा करनी चाहिए। वह साक्षात् दृश्यमान देव है — उससे बड़ा कोई देव नहीं है।
कुन्ती ने कर्ण के साथ किया गया अन्याय जीवन भर झेला। कुरुक्षेत्र के बाद जब युधिष्ठिर को पता चला कि कर्ण उनका ज्येष्ठ भाई था, तब उन्होंने माँ से कहा — 'आपने यह रहस्य छुपाकर सबसे बड़ा अधर्म किया।'
१३.३ द्रौपदी — क्षमा और प्रतिशोध का धर्म
द्रौपदी महाभारत की सर्वाधिक सशक्त नारी-पात्र है। वह पुरुष-प्रधान समाज में भी अपने अधिकारों के लिए लड़ती है। द्यूत-सभा में उसके प्रश्न — 'क्या मैं दास हूँ?' — पूरी सभा को निरुत्तर कर देते हैं।
न सा स्त्री विद्यते लोके या न मे सम्मतिं करेत्। यन्मामानीतवान् राजन् दुःशासनो दुराचरः॥
अर्थ: इस लोक में ऐसी कोई स्त्री नहीं जो मेरे जैसा व्यवहार सहन कर सके। हे राजन्! दुराचारी दुःशासन मुझे यहाँ लाया है। (द्रौपदी की सभा में पुकार, महाभारत, सभापर्व)
द्रौपदी ने कभी अपमान को भुलाया नहीं। उसकी प्रतिज्ञा — 'केश खुले रहेंगे' — महाभारत का सबसे लम्बे समय तक चलने वाला संकल्प था। यह केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था — यह उस समाज के अन्याय के विरुद्ध एक स्त्री का प्रतिरोध था।
१४. संजय और दिव्य-दृष्टि — निष्पक्ष साक्षी का धर्म
१४.१ संजय — धर्म का निष्पक्ष आख्याता
महाभारत की कथा का आख्यान संजय करते हैं — धृतराष्ट्र के सारथी, जिन्हें व्यास ने दिव्य-दृष्टि दी थी। संजय घर बैठे कुरुक्षेत्र का समस्त युद्ध देख और सुन सकते थे। वे धृतराष्ट्र को सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाते हैं।
व्यास-प्रसादाद् अहमेतद् विदित्वा योगमैश्वरं परमं गुह्यमेतत्। दृष्टवानस्मि युद्धं च तेषां सञ्जयः कुरुराज ब्रवीमि॥
अर्थ: व्यास की कृपा से मैंने यह परम रहस्यमय ऐश्वर्य-योग जाना। हे कुरुराज! मैंने उनका युद्ध देखा है — संजय बोल रहा हूँ। (महाभारत, भीष्मपर्व)
संजय का पात्र महाभारत में 'साक्षी' का पात्र है। वह न कौरवों के पक्ष में है, न पाण्डवों के। वह निष्पक्ष होकर सत्य कहता है। यह 'साक्षी-धर्म' — बिना पक्षपात के सत्य बोलना — महाभारत का महत्त्वपूर्ण शिक्षण है।
१५. श्रीकृष्ण — धर्म-संस्थापना का दिव्य संकल्प
१५.१ कृष्ण का अवतरण — 'यदा यदा हि धर्मस्य'
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। (गीता ४.७)
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
अर्थ: सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। (गीता ४.८)
महाभारत के केन्द्र में कृष्ण हैं। वे केवल एक पात्र नहीं — वे धर्म के अवतार हैं, समय के प्रवाह हैं, और ब्रह्म के प्रतिनिधि हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन — बचपन से लेकर कुरुक्षेत्र तक — धर्म की स्थापना के लिए ही था।
१५.२ कृष्ण की राजनीति — 'साम, दाम, दण्ड, भेद'
कृष्ण ने महाभारत में राजनीति के चारों सूत्रों का उपयोग किया। दुर्योधन को समझाने गए (साम), शान्तिदूत बनकर पाँच गाँव माँगे (साम+दाम), युद्ध में अनेक नीतियाँ अपनाईं (भेद+दण्ड)। उनकी राजनीति 'धर्म की विजय' के लिए थी, व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं।
न युक्तमेतत् कथमप्यसाम्प्रतं यदिच्छसि त्वं पुरुषार्थसाधनम्। शक्यं च सर्वैः सुखदं च भारत कर्तुं न शक्यं विपरीतमीहसे॥
अर्थ: हे भारत! तुम जो पुरुषार्थ साधन चाहते हो वह किसी भी प्रकार से उचित नहीं। जो सबके लिए शक्य और सुखदायी है वह तुम कर सकते हो, किन्तु तुम उसके विपरीत चाहते हो। (कृष्ण का दुर्योधन से कथन)
१५.३ कृष्ण का विश्वरूप — 'अहं सर्वस्य प्रभवः'
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
अर्थ: मैं सब कुछ का उद्गम हूँ, मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है — ऐसा जानकर बुद्धिमान लोग श्रद्धा से मेरी भक्ति करते हैं। (गीता १०.८)
कृष्ण का यह कथन महाभारत के धर्म-दर्शन का सर्वोच्च बिन्दु है। वे कहते हैं — 'जो कुछ है, मैं हूँ। धर्म भी मैं हूँ, अधर्म भी मैं हूँ। सृष्टि भी मैं हूँ, संहार भी मैं हूँ।' यह अद्वैत-दर्शन है — जहाँ धर्म और अधर्म का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म शेष रहता है।
१६. धर्मराज्य की स्थापना — युधिष्ठिर का राज्याभिषेक
१६.१ युद्ध के बाद का शोक
कुरुक्षेत्र युद्ध समाप्त हुआ। पाण्डवों की विजय हुई। किन्तु यह विजय आँसुओं में डूबी थी। लाखों वीरों के शव पड़े थे। गान्धारी अपने सौ पुत्रों के शवों के बीच बैठी थीं। युधिष्ठिर को विजय में सुख नहीं था।
जयाय इत्येव जातोऽसि जयतोऽपि शुभं मनः। न विजेता भवेच्छ्रेष्ठो यद्यात्मा न जितः स्वयम्॥
अर्थ: केवल विजय के लिए जन्म नहीं हुआ है। विजेता का मन भी शुभ हो। जो व्यक्ति स्वयं अपने आत्म को नहीं जीत सका, वह श्रेष्ठ विजेता नहीं है।
युधिष्ठिर ने कहा — 'मैं राज्य नहीं चाहता। इस विजय के लिए इतने वीरों की बलि दी गई — यह धर्म नहीं हो सकता।' तब कृष्ण ने उन्हें समझाया — 'धर्म-राज्य की स्थापना करना आपका कर्तव्य है। राज्य का त्याग पलायन है, कर्तव्य नहीं।'
१६.२ अश्वमेध यज्ञ और राजधर्म
युधिष्ठिर ने राजसिंहासन ग्रहण किया और अश्वमेध यज्ञ किया। यह युद्ध के पाप से मुक्ति का प्रयास था। अश्वमेध यज्ञ का अर्थ था — 'मेरा राज्य अब धर्म-राज्य है। मैं सब दिशाओं में शान्ति और न्याय स्थापित करता हूँ।'
राजा कुर्यात् सदा धर्मं यज्ञैश्च विविधैः सदा। प्रजाः पालयते धर्मेण शिश्यं पालयते यथा॥
अर्थ: राजा सदा विविध यज्ञों से धर्म का आचरण करे। जैसे शिष्य को पालता है, वैसे ही धर्म से प्रजा का पालन करे।
युधिष्ठिर का राज्य 'धर्मराज्य' का आदर्श उदाहरण बना। उन्होंने अपने राज्य में न्याय, समता, और करुणा को सर्वोच्च स्थान दिया। उनके समय में 'हस्तिनापुर' वास्तव में धर्म का केन्द्र बन गया।
१७. अधर्म के परिणाम — महाभारत का न्याय-दर्शन
१७.१ दुर्योधन का अन्त — अहंकार की पराजय
दुर्योधन महाभारत का मुख्य खलनायक है, किन्तु उसका अन्त भी अत्यन्त वीरतापूर्ण था। गदा-युद्ध में वह भीम से लड़ा। उसने कहा — 'मैं कोई पश्चाताप नहीं करता। मैंने अपने तरीके से जिया।' यह अहंकार का चरम था।
आजानेयाः प्रहरणाः समरे नोचितो जयः। स्वयं विनाशमानीतो यः स तिष्ठेन्न शोभते॥
अर्थ: युद्ध में श्रेष्ठ शस्त्रधारियों के बीच जो अनुचित जय हो, वह शोभनीय नहीं; जो स्वयं विनाश लाया हो, वह शोभित नहीं होता।
दुर्योधन के जाँघ पर भीम के गदा-प्रहार को अनेक लोग अधर्म मानते हैं। किन्तु कृष्ण का तर्क था — द्रौपदी को जिस जाँघ पर बैठने के लिए दुर्योधन ने आमन्त्रित किया था, उसी जाँघ से उसका अन्त होना धर्म का न्याय है।
१७.२ अश्वत्थामा का शाप — अधर्म की दीर्घ सजा
अश्वत्थामा ने द्रोण-पुत्र होने के कारण स्वयं को विशेष समझा। उसने युद्ध के अन्तिम क्षणों में रात को सोती हुई पाण्डव-सेना पर हमला किया, पाण्डवों के पुत्रों को मार डाला। यह कायरता और अधर्म का चरम था। उसने ब्रह्मास्त्र भी उत्तरा के गर्भ पर चलाया।
यो हत्वा निशि शेते तत्र शस्त्रमुपाश्रितः। स पापात्मा विनश्यत्वस्मादेव विनाशयेत्॥
अर्थ: जो रात में सोतों को मारे, वह शस्त्र का आश्रय लेने वाला पापात्मा इसी से विनष्ट हो जाए।
कृष्ण ने अश्वत्थामा को शाप दिया — 'तू हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकेगा। तेरे मस्तक का मणि निकाल लिया जाएगा, और उसके स्थान पर सदा घाव रहेगा। कोई तुझे आश्रय नहीं देगा।' यह अधर्म की अनन्त सजा थी।
१७.३ कर्म और फल — महाभारत का केन्द्रीय सन्देश
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। अवश्यं अनुभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥
अर्थ: करोड़ों कल्पों में भी बिना भोगे कर्म नष्ट नहीं होता। किए हुए शुभ-अशुभ कर्म को अवश्य भोगना पड़ता है।
महाभारत का सबसे बड़ा सन्देश यही है — 'जो बोते हो, वही काटते हो।' दुर्योधन ने अधर्म बोया, अधर्म काटा। कर्ण ने दानवीरता बोई — उसे अन्त में वीर-गति मिली। युधिष्ठिर ने धर्म बोया — उसे स्वर्ग मिला। यही 'कर्म-फल न्याय' महाभारत का हृदय है।
१८. मोक्षधर्म — जीवन का परम लक्ष्य और संन्यास
१८.१ महाप्रस्थान — युधिष्ठिर की अन्तिम यात्रा
युधिष्ठिर ने अन्त में अपना राज्य अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को सौंप दिया और पाँच भाइयों सहित द्रौपदी के साथ 'महाप्रस्थान' (हिमालय की ओर यात्रा) पर निकले। यह यात्रा मोक्ष-मार्ग की यात्रा थी।
धर्मो रक्षति रक्षितः। प्रकृत्या सर्वभूतानां धर्मो नित्यं व्यवस्थितः। तेनैव च विनाशः स्याद् धर्मे हीने तु देहिनाम्॥
अर्थ: धर्म रक्षित होने पर रक्षा करता है। सभी प्राणियों की प्रकृति में धर्म नित्य स्थित है। धर्म की कमी से ही प्राणियों का विनाश होता है।
महाप्रस्थान की यात्रा में एक-एक करके सब गिरते गए। द्रौपदी, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव — सब समय आने पर गिर गए। अन्त में युधिष्ठिर और एक कुत्ता (जो धर्मराज का प्रतीक था) बचे। इन्द्र ने देवरथ भेजा और युधिष्ठिर को ले जाने लगे। किन्तु युधिष्ठिर ने कहा — 'यह कुत्ता भी आएगा।'
१८.२ युधिष्ठिर और स्वर्ग का प्रसंग
इन्द्र ने कहा — 'कुत्ते को स्वर्ग में जगह नहीं।' युधिष्ठिर ने कहा — 'तब मैं भी नहीं जाऊँगा। यह कुत्ता मेरे साथ सदा रहा, इसे छोड़ना धर्म के विरुद्ध है।' यही सुनकर कुत्ता परिवर्तित हो गया — वह स्वयं धर्मराज (यम) थे। यह युधिष्ठिर की अन्तिम परीक्षा थी।
एतस्मिन् कथयते धर्मे सर्वेषां पितरो गतिः। मित्रं च मित्रभावेन यो भजेत् स नरः शुचिः॥
अर्थ: इस धर्म में सभी पितरों की गति है। जो मित्र-भाव से मित्र का भजन करे, वह मनुष्य पवित्र है।
यह प्रसंग महाभारत का अन्तिम धर्म-शिक्षण है — 'जो कठिन परिस्थिति में भी अपने साथी, मित्र और भक्त को नहीं छोड़ता — वही सच्चा धर्मी है।' युधिष्ठिर ने स्वर्ग का प्रलोभन छोड़कर एक कुत्ते की रक्षा का धर्म चुना — यही महाभारत का परम सन्देश है।
१८.३ संन्यास-धर्म और मोक्ष
महाभारत का शान्तिपर्व और अनुशासनपर्व मोक्षधर्म का विस्तृत विवेचन करते हैं। मोक्ष — संसार के बन्धन से मुक्ति — ही मनुष्य-जीवन का परम लक्ष्य है। इसके लिए चार आश्रमों की व्यवस्था है: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत। इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराजमाहरत्॥
अर्थ: ब्रह्मचर्य और तप से देवताओं ने मृत्यु को जीता। इन्द्र ने ब्रह्मचर्य से ही देवताओं के लिए स्वर्ग-राज्य प्राप्त किया।
महाभारत में मोक्ष का मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म — तीनों से जाता है। किन्तु तीनों का साझा सूत्र है — अहंकार का त्याग। जब तक 'मैं हूँ' का भाव है, तब तक मोक्ष नहीं। जब 'मैं नहीं, केवल ब्रह्म है' — यह अनुभव होता है, तब मोक्ष है।
१९. महाभारत में समाज-धर्म, वर्ण-व्यवस्था और जाति-प्रश्न
१९.१ वर्ण-धर्म का मूल स्वरूप
महाभारत में वर्ण-व्यवस्था का मूल आधार जन्म नहीं, गुण और कर्म है। यह बात महाभारत के अनेक प्रसंगों में स्पष्ट होती है। भीष्म ने शान्तिपर्व में कहा — 'जो ब्राह्मण के गुण रखे, वह ब्राह्मण है; जो क्षत्रिय के गुण रखे, वह क्षत्रिय है।'
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥
अर्थ: मैंने गुण और कर्म के विभाग से चारों वर्णों की सृष्टि की है। उसका कर्ता होते हुए भी मुझे अकर्ता और अव्यय जानो। (गीता ४.१३)
यह श्लोक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कृष्ण कहते हैं — 'वर्ण-विभाजन गुण और कर्म के आधार पर है।' यदि किसी शूद्र-कुल में जन्मा व्यक्ति ब्राह्मण के गुण और कर्म अपनाए, तो वह ब्राह्मण है। यही महाभारत का समाज-दर्शन है।
१९.२ विदुर — दासीपुत्र किन्तु परम धर्मज्ञ
विदुर का उदाहरण महाभारत में वर्ण के जन्म-आधार को खण्डित करता है। विदुर एक दासी के पुत्र थे — इसलिए वे राजा नहीं बन सके। किन्तु धर्म-ज्ञान में वे सबसे श्रेष्ठ थे। व्यास ने उन्हें 'धर्मराज का अंश' बताया।
विदुरो धर्मराजोऽसौ नीतिमांश्च महामतिः। सत्यवादी च शुचिश्च धर्मज्ञश्च कृती स्मृतः॥
अर्थ: विदुर धर्मराज हैं, नीतिमान हैं, महाबुद्धि हैं। वे सत्यवादी, पवित्र, धर्मज्ञ और कृती स्मृत हैं।
१९.३ कर्ण — जाति-भेद का शिकार
कर्ण सूर्य-पुत्र था — देवपुत्र, किन्तु 'सूत-पुत्र' कहलाया। उसे बार-बार जाति के नाम पर अपमानित किया गया। महाभारत यहाँ जाति-व्यवस्था की क्रूरता को उजागर करता है। कर्ण जीवन भर इस अन्याय से लड़ता रहा।
कर्ण का उदाहरण बताता है कि जब जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था किसी श्रेष्ठ व्यक्ति को उसके योग्य स्थान से वंचित करती है, तो वह अधर्म है। महाभारत इस अधर्म को रेखांकित करता है।
२०. धर्म के दार्शनिक आयाम — एक व्यापक विश्लेषण
२०.१ धर्म का सापेक्षिक और निरपेक्ष स्वरूप
महाभारत में धर्म दो स्तरों पर काम करता है — सापेक्षिक और निरपेक्ष। सापेक्षिक धर्म देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलता है। निरपेक्ष धर्म — सत्य, अहिंसा, करुणा — कभी नहीं बदलता।
देशधर्मान् जातिधर्मान् कुलधर्मांश्च शाश्वतान्। समयाचारधर्मांश्च पापोऽयं हन्तुमिच्छति॥
अर्थ: देश-धर्म, जाति-धर्म, कुल के शाश्वत धर्म और समयाचार धर्म — यह पाप इन सबको नष्ट करना चाहता है। (महाभारत)
महाभारत का दर्शन यह है — सापेक्षिक धर्मों में जब टकराव हो, तब निरपेक्ष धर्म को प्राथमिकता दो। यदि राज्य-धर्म और सत्य-धर्म में टकराव हो, तो सत्य को चुनो। यदि कुल-धर्म और न्याय-धर्म में टकराव हो, तो न्याय को चुनो।
२०.२ धर्म और नैतिकता — अन्तर और सम्बन्ध
महाभारत में धर्म केवल 'नैतिकता' नहीं है — वह उससे बड़ा है। नैतिकता समाज-निर्मित नियम है जो बदलती रहती है। धर्म ब्रह्मांड-निर्मित नियम है जो शाश्वत है। कृष्ण जब अर्जुन को युद्ध के लिए कहते हैं, तो वे यही बताते हैं — 'तुम्हारी नैतिकता (युद्ध न करना) गलत नहीं है, किन्तु धर्म (क्षत्रिय-कर्तव्य) उससे बड़ा है।'
धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्। धर्मं धर्मेण संयुज्य सर्वान् धर्मान् विधाय च॥
अर्थ: धर्म इस विश्व की प्रतिष्ठा है, सब कुछ धर्म में ही प्रतिष्ठित है। धर्म से धर्म को जोड़कर सभी धर्मों का विधान करके...
२०.३ पञ्चमहायज्ञ और व्यक्ति-धर्म
महाभारत में व्यक्ति के लिए पाँच महायज्ञों का विधान है: देवयज्ञ (देवताओं की पूजा), पितृयज्ञ (पितरों का तर्पण), ऋषियज्ञ (वेद-पाठ), मनुष्ययज्ञ (अतिथि-सेवा) और भूतयज्ञ (अन्य प्राणियों को आहार देना)। ये पाँच यज्ञ व्यक्ति के धर्म की आधारशिला हैं।
देवपितृमनुष्याणां भूतानाञ्च महर्षिभिः। पञ्च यज्ञाः समाम्नाताः प्रतिदिनमनुष्ठिताः॥
अर्थ: देवता, पितर, मनुष्य, भूत और महर्षि — इन पाँचों के लिए महर्षियों ने पाँच यज्ञ बताए हैं जो प्रतिदिन करने चाहिए।
२०.४ महाभारत और आधुनिक जीवन
महाभारत का धर्म-दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तीन हजार वर्ष पहले था। आज भी राजनीति में दुर्योधन जैसे लोग हैं जो जानते हुए भी अधर्म करते हैं। आज भी भीष्म जैसे लोग हैं जो अन्याय देखते हुए भी मौन रहते हैं। आज भी कर्ण जैसे लोग हैं जो समाज के अन्यायपूर्ण व्यवहार के शिकार होते हैं।
महाभारत का सन्देश स्पष्ट है: अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली लगे, अन्ततः नष्ट होता है। धर्म चाहे कितना भी कमजोर दिखे, अन्ततः विजयी होता है। 'धर्मो रक्षति रक्षितः' — यह महाभारत का अटल सत्य है।
यतो धर्मस्ततो जयः। यतो कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः॥
अर्थ: जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है। जहाँ कृष्ण हैं वहाँ धर्म है, और जहाँ धर्म है वहाँ विजय है। (महाभारत का अन्तिम श्लोक, भीष्मपर्व)
२१. महाभारत के प्रमुख धर्म-प्रसंगों का समेकित विवेचन
२१.१ धर्म के दस स्तम्भ — महाभारत के अनुसार
महाभारत में विभिन्न पात्रों के माध्यम से धर्म के दस प्रमुख स्तम्भ उभरकर आते हैं:
प्रथम स्तम्भ — सत्य (Truth): युधिष्ठिर का सत्य-प्रेम उन्हें 'धर्मराज' बनाता है। महाभारत कहता है — एक सत्यवादी व्यक्ति हजार यज्ञ करने वाले से श्रेष्ठ है।
द्वितीय स्तम्भ — अहिंसा (Non-violence): यद्यपि महाभारत युद्ध-काव्य है, फिर भी यह अहिंसा को परम धर्म मानता है। 'आनृशंस्यं परो धर्मः' — किसी को व्यर्थ कष्ट न देना ही परम धर्म है।
तृतीय स्तम्भ — दान (Charity): कर्ण की दानवीरता और महाभारत के अनेक प्रसंग बताते हैं कि दान श्रेष्ठतम धर्म है। 'दानेन तुल्यो धर्मो नास्ति।'
चतुर्थ स्तम्भ — क्षमा (Forgiveness): 'क्षमा वीरस्य भूषणम्' — क्षमा वीर का आभूषण है। युधिष्ठिर की क्षमाशीलता उन्हें महान बनाती है।
पञ्चम स्तम्भ — कर्तव्य-पालन (Duty): 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः' — अपने कर्तव्य में मरना श्रेयस्कर है। अर्जुन का युद्ध यही सिखाता है।
षष्ठ स्तम्भ — न्याय (Justice): द्रौपदी का प्रश्न — 'क्या यह न्याय है?' — पूरे महाभारत में गूँजता है।
सप्तम स्तम्भ — करुणा (Compassion): कृष्ण का समग्र जीवन करुणा से भरा है। वे दुर्योधन से भी अन्त में मिलते हैं।
अष्टम स्तम्भ — मैत्री (Friendship): दुर्योधन-कर्ण की मित्रता, कृष्ण-अर्जुन की मित्रता — दोनों मित्र-धर्म के दो रूप हैं।
नवम स्तम्भ — वैराग्य (Detachment): युधिष्ठिर का महाप्रस्थान, कृष्ण का गीतोपदेश — सब वैराग्य का महत्त्व बताते हैं।
दशम स्तम्भ — ईश्वर-भक्ति (Devotion): द्रौपदी की भक्ति ने उसे चीरहरण से बचाया। यह महाभारत का परम सन्देश है।
अहिंसा सत्यवचनं क्षमा च शौचं दयाऽऽर्जवमनाभिमानः। एते धर्मस्य बहवः पदार्थाः सर्वेऽपि धर्मः परमोऽयमेव॥
अर्थ: अहिंसा, सत्यवचन, क्षमा, पवित्रता, दया, सरलता, और अनहंकार — ये धर्म के अनेक पदार्थ हैं, परन्तु यही परम धर्म है।
२२. गीता का व्यापक धर्म-दर्शन
२२.१ गीता की अठारह अध्यायों में धर्म
भगवद्गीता के अठारह अध्याय अठारह प्रकार के धर्म-दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रथम अध्याय 'अर्जुन-विषाद' — यह मनुष्य के धर्म-संकट का चित्रण है। द्वितीय अध्याय 'सांख्य-योग' — यह आत्म-तत्त्व का ज्ञान है। तृतीय अध्याय 'कर्मयोग' — यह कर्तव्य-धर्म का विवेचन है।
चतुर्थ अध्याय 'ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग' — यह ज्ञान और कर्म के समन्वय का धर्म है। पञ्चम 'कर्म-संन्यास-योग' — सन्यास और कर्म का समन्वय। षष्ठ 'ध्यान-योग' — ध्यान और एकाग्रता का धर्म। सप्तम 'ज्ञान-विज्ञान-योग' — ईश्वर-ज्ञान का धर्म।
अष्टम 'अक्षरब्रह्म-योग' — परब्रह्म का ज्ञान। नवम 'राजविद्या-राजगुह्य-योग' — सर्वोच्च विद्या और रहस्य। दशम 'विभूति-योग' — ईश्वर की विभूतियों का ज्ञान। एकादश 'विश्वरूप-दर्शन-योग' — ईश्वर के विराट स्वरूप का दर्शन।
द्वादश 'भक्ति-योग' — भक्ति का धर्म, जो सबसे सरल मार्ग है। त्रयोदश 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग' — शरीर और आत्मा का ज्ञान। चतुर्दश 'गुणत्रय-विभाग-योग' — तीन गुणों का ज्ञान। पञ्चदश 'पुरुषोत्तम-योग' — परमात्मा का ज्ञान।
षोडश 'दैवासुर-सम्पद्-विभाग-योग' — दैवी और आसुरी सम्पत्ति का विवेचन। सप्तदश 'श्रद्धात्रय-विभाग-योग' — श्रद्धा के तीन भेद। और अष्टादश 'मोक्ष-संन्यास-योग' — मोक्ष और संन्यास का परम धर्म।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥
अर्थ: फिर से सुनो मेरा सर्वगुह्यतम परम वचन। तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए तुम्हारे हित की बात कहता हूँ। (गीता १८.६४)
२२.२ त्रिगुण और धर्म-अधर्म
गीता में कहा गया है कि सृष्टि तीन गुणों — सत्त्व, रज, और तम — से बनी है। सत्त्वगुण धर्म का मार्ग है; रजोगुण कर्म और इच्छाओं का मार्ग है; तमोगुण अज्ञान और अधर्म का मार्ग है।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥
अर्थ: हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम — ये प्रकृति से उत्पन्न गुण देहधारी जीव को शरीर में बाँधते हैं। (गीता १४.५)
दुर्योधन तमोगुण-प्रधान था — क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार से भरा। कर्ण रजोगुण-प्रधान था — कर्मठ, महत्त्वाकांक्षी, किन्तु कभी-कभी धर्म-सम्मत। युधिष्ठिर सत्त्वगुण-प्रधान था — शान्त, सत्यनिष्ठ और क्षमाशील।
२२.३ श्रद्धा और धर्म
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
अर्थ: श्रद्धावान, तत्पर और जितेन्द्रिय व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है; और ज्ञान पाकर शीघ्र ही परम शान्ति को पाता है। (गीता ४.३९)
महाभारत में श्रद्धा को धर्म का प्राण कहा गया है। बिना श्रद्धा के धर्म केवल एक कर्म-काण्ड बन जाता है। द्रौपदी की कृष्ण में श्रद्धा, अर्जुन की कृष्ण में श्रद्धा, युधिष्ठिर की धर्म में श्रद्धा — यही श्रद्धा महाभारत का प्रेरक तत्त्व है।
२३. महाभारत के अन्य महत्त्वपूर्ण धर्म-प्रसंग
२३.१ शिशुपाल-वध — धर्म का न्याय
शिशुपाल — चेदिराज — ने कृष्ण की बार-बार निन्दा की थी। एक बार युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में जब शिशुपाल ने सभा के समक्ष कृष्ण की अपमानजनक निन्दा की, तब कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़ा। शिशुपाल का वध हो गया।
एकशतं शिशुपाल अपराधानाम् पराक्रमन्। सहामि चेति प्रतिज्ञातं तस्मान्नाहं हनिष्यामि॥
अर्थ: मैंने प्रतिज्ञा की थी कि शिशुपाल के सौ अपराध सह लूँगा, इसलिए अब तक नहीं मारा। (कृष्ण का कथन — महाभारत, सभापर्व)
यह प्रसंग बताता है कि धर्म धैर्यशील है। कृष्ण ने शिशुपाल को बार-बार क्षमा किया। किन्तु जब क्षमा का दुरुपयोग होने लगा, तब दण्ड दिया गया। यह 'दण्ड-नीति' भी धर्म का ही एक अंग है।
२३.२ भगीरथ की तपस्या और धर्म
महाभारत में भगीरथ की कथा है जिन्होंने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने की तपस्या की। यह 'पितृ-धर्म' का सर्वोच्च उदाहरण है। भगीरथ ने केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए तप किया — यही धर्म है।
पितृणां च गतिं दत्त्वा भगीरथोऽभवन्महान्। एष सत्यस्य धर्मस्य पराक्रमस्य च सारः॥
अर्थ: पितरों को सद्गति देकर भगीरथ महान हुए। यही सत्य, धर्म और पराक्रम का सार है।
२३.३ एकलव्य — गुरु-दक्षिणा और धर्म-संकट
एकलव्य का प्रसंग महाभारत के सर्वाधिक हृदयस्पर्शी प्रसंगों में से एक है। उसने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर मानसिक रूप से उन्हें गुरु स्वीकार किया और धनुर्विद्या सीखी। जब द्रोण ने गुरु-दक्षिणा में उसका अँगूठा माँगा — एकलव्य ने निःसंकोच दे दिया।
एकलव्येन दत्तं तद् गुरुदक्षिणया अङ्गुष्ठम्। शिष्यस्य धर्ममाचार्यः नानृशंसं च वेद यः॥
अर्थ: एकलव्य ने गुरु-दक्षिणा में अँगूठा दिया। जो आचार्य शिष्य-धर्म जानता हो, वह इस अनृशंसता को नहीं करेगा।
यह प्रसंग 'गुरु-शिष्य धर्म' का चरम उदाहरण है। एकलव्य का समर्पण अद्भुत था। किन्तु द्रोण का माँगना विवादास्पद — कई विद्वान इसे धर्म-उल्लंघन मानते हैं। महाभारत यहाँ प्रश्न छोड़ता है — क्या गुरु-भक्ति की कोई सीमा है?
२३.४ नल-दमयन्ती — धर्म-प्रेम की कथा
महाभारत के अरण्यपर्व में नल-दमयन्ती की कथा है। यह कथा 'पतिव्रत-धर्म' और 'पत्नी-धर्म' का सुन्दर चित्रण है। नल ने जुए में अपना सर्वस्व खोया, दमयन्ती को त्यागा — फिर भी दमयन्ती ने उनका साथ नहीं छोड़ा। अन्ततः धर्म की विजय हुई और नल को अपना राज्य वापस मिला।
धर्मो रक्षति रक्षितः। यत्र सत्यं तत्र धर्मः। यत्र धर्मस्तत्र कृष्णः। यत्र कृष्णस्ततो जयः॥
अर्थ: धर्म रक्षित होने पर रक्षा करता है। जहाँ सत्य है वहाँ धर्म है। जहाँ धर्म है वहाँ कृष्ण हैं। जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है।
२४. महाभारत का आधुनिक सन्दर्भ — आज का धर्म-संकट
२४.१ आधुनिक समाज में धर्म-अधर्म
आज के समाज में भी महाभारत के प्रश्न उतने ही जीवन्त हैं। राजनेता दुर्योधन की भूमिका में हैं — जानते हुए भी अधर्म करते हैं। न्यायपालिका भीष्म की भूमिका में है — देखती है किन्तु कभी-कभी मौन रहती है। जनता युधिष्ठिर की भूमिका में है — धर्म जानती है, किन्तु परिस्थितियों के वशीभूत हो जाती है।
कर्ण जैसे लोग आज भी हैं — प्रतिभाशाली, किन्तु जन्म के कारण वंचित। द्रौपदी जैसी स्त्रियाँ आज भी हैं — अपमानित, किन्तु लड़ने का साहस रखने वाली। और विदुर जैसे लोग आज भी हैं — सत्य बोलने वाले, किन्तु अनसुने।
इदं महाभारतमुत्तमं मखः सर्वेषु लोकेषु सदा च पूज्यते। यो धर्मराज्ये विचरन् पठेत् संसारस्थितिं वेद स पण्डितः॥
अर्थ: यह उत्तम महाभारत महायज्ञ है जो सभी लोकों में सदा पूजित है। जो इसे पढ़कर धर्म-राज्य में विचरण करता है, वह संसार की स्थिति को जानने वाला ज्ञानी है।
२४.२ गीता का आधुनिक प्रासंगिकता
गीता का सन्देश — 'कर्म करो, फल की चिन्ता मत करो' — आज के तनावग्रस्त जीवन में सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक उपचार है। 'अनासक्ति' का सिद्धान्त आज के 'burnout' और 'depression' की समस्या का समाधान है। 'स्वधर्म में निधन श्रेयस्कर है' — यह आज के career counselling का सर्वश्रेष्ठ सूत्र है।
महात्मा गाँधी ने गीता को अपना 'माँ' कहा था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 'गीता-रहस्य' लिखा। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गीता पर टीका लिखी। इन महान आत्माओं ने महाभारत और गीता से जीवन-मार्ग लिया — यही इस ग्रन्थ की आधुनिक प्रासंगिकता का प्रमाण है।
२४.३ विश्व-शान्ति और महाभारत का सन्देश
महाभारत का अन्तिम सन्देश विश्व-शान्ति का है। युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं — यह स्वयं एक नई समस्या है। कुरुक्षेत्र युद्ध में सभी पक्षों को हानि हुई। विजेता पाण्डव भी शोकाकुल रहे। महाभारत कहता है — युद्ध अन्तिम उपाय है, प्रथम उपाय नहीं।
ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
अर्थ: हे जनार्दन! यदि आप बुद्धि को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे इस घोर कर्म (युद्ध) में क्यों लगा रहे हैं? (गीता ३.१ — अर्जुन का प्रश्न)
यह प्रश्न आज के सन्दर्भ में और भी महत्त्वपूर्ण है। परमाणु-युग में युद्ध का अर्थ है — सम्पूर्ण विनाश। महाभारत का सन्देश है — वार्ता से, सत्य से, न्याय से, और विनम्रता से समस्याओं का समाधान करो। युद्ध केवल तब करो जब अन्य सभी उपाय विफल हो जाएँ।
२५. उपसंहार — महाभारत का शाश्वत सन्देश
महाभारत का यह विशाल आख्यान समाप्त होते-होते एक महान सत्य की ओर संकेत करता है — 'धर्म शाश्वत है। मनुष्य आते-जाते हैं, युग बदलते हैं, किन्तु धर्म का नियम नहीं बदलता। जो धर्म का पालन करता है, वह अमर हो जाता है।'
महाभारत ने हमें दुर्योधन का उदाहरण देकर दिखाया — अहंकार, लोभ और ईर्ष्या का अन्त क्या होता है। भीष्म का उदाहरण देकर दिखाया — प्रतिज्ञा-पालन की अति भी अधर्म बन जाती है। कर्ण का उदाहरण देकर दिखाया — समाज का अन्याय व्यक्ति को गलत मार्ग पर ले जाता है। और युधिष्ठिर का उदाहरण देकर दिखाया — धर्म का मार्ग कठिन है, किन्तु अन्ततः वही श्रेयस्कर है।
न जातु कामान्न भयान्न लोभात् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः। नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः॥
अर्थ: कभी भी काम, भय या लोभ के कारण जीवन के लिए भी धर्म का त्याग मत करो। धर्म नित्य है, सुख-दुख अनित्य हैं; जीव नित्य है, उसका कारण (शरीर) अनित्य है। (महाभारत, उद्योगपर्व)
यह श्लोक महाभारत का हृदय है। 'धर्म नित्य है' — यह सन्देश तीन हजार वर्षों से भारत की आत्मा को जीवित रखे हुए है। जब-जब भारत ने संकट देखा, जब-जब अन्याय का सामना किया — इस देश ने महाभारत की ओर देखा और शक्ति पाई।
महाभारत केवल एक ग्रन्थ नहीं है — यह एक जीवन-दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में सदा धर्म-अधर्म के बीच संघर्ष होता रहेगा। इस संघर्ष में हार-जीत नहीं — केवल मार्ग का चुनाव महत्त्वपूर्ण है। धर्म का मार्ग चुनने वाला — चाहे जीते या हारे — विजेता ही है।
नमो नमस्ते व्यासाय विष्णुरूपाय वेधसे। व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे॥
अर्थ: व्यास को नमस्कार है जो विष्णु के रूप हैं, विधाता हैं। व्यास के रूप में विष्णु को, और विष्णु के रूप में व्यास को नमस्कार है।
।। इति महाभारतस्य धर्माख्यानं सम्पूर्णम् ।।
यतो धर्मस्ततो जयः
— जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है —
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महाभारत केवल एक महाकाव्य नहीं है — यह मानव-जीवन का विशालतम दर्पण है। इसमें सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म, प्रेम और घृणा, त्याग और लोभ — जीवन के समस्त द्वन्द्वों का अभूतपूर्व चित्रण है। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित यह ग्रन्थ न केवल भारत की, अपितु सम्पूर्ण मानवता की अमूल्य धरोहर है।
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ। यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥
अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों के विषय में जो इस ग्रन्थ में है, वह अन्यत्र भी मिल सकता है, किन्तु जो इसमें नहीं है, वह कहीं भी नहीं मिलेगा। (महाभारत, आदिपर्व १.५६)
महाभारत का मूल प्रतिपाद्य विषय धर्म है। यह ग्रन्थ हमें सिखाता है कि धर्म क्या है, अधर्म क्या है, और इन दोनों के बीच संघर्ष में मनुष्य को किस मार्ग पर चलना चाहिए। कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल दो परिवारों का संघर्ष नहीं था — यह धर्म और अधर्म के बीच का शाश्वत संग्राम था।
इस लेख में हम महाभारत के धर्म-आख्यान को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। संस्कृत श्लोकों के माध्यम से मूल ग्रन्थ की वाणी को जीवित रखते हुए, हम धर्म के विविध आयामों — राजधर्म, पितृधर्म, पत्नीधर्म, मित्रधर्म, शत्रुधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म — का विस्तृत विवेचन करेंगे।
एष धर्मः सनातनः। धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः॥
अर्थ: यही सनातन धर्म है — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; और जो धर्म को नष्ट करता है, धर्म उसे नष्ट कर देता है।
२. महाभारत में धर्म का स्वरूप — परिभाषा, प्रकार एवं महत्त्व
२.१ धर्म की व्युत्पत्ति और परिभाषा
'धर्म' शब्द संस्कृत की 'धृ' धातु से बना है, जिसका अर्थ है धारण करना। जो सृष्टि को, समाज को, व्यक्ति को, और स्वयं को धारण करे — वही धर्म है। महाभारत में धर्म की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं, जो उसके विराट स्वरूप को इंगित करती हैं।
धारणाद् धर्मम् इत्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः। यत् स्याद् धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥
अर्थ: धारण करने के कारण इसे धर्म कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है। जो धारण शक्ति से युक्त हो, वही धर्म है — यह निश्चित है। (महाभारत, कर्णपर्व ६९.५८)
युधिष्ठिर जब यक्ष से प्रश्नोत्तर करते हैं, तब धर्म की व्यापक परिभाषा सामने आती है। यक्ष पूछता है — 'धर्म का लक्षण क्या है?' और युधिष्ठिर उत्तर देते हैं — 'आनृशंस्य' अर्थात् अहिंसा और निर्दयता का अभाव ही परम धर्म है।
आनृशंस्यं परो धर्मः क्षमा शक्तिः परा स्मृता। ज्ञानमद्भुतमाहुस्ते शमस्त्वर्जव उच्यते॥
अर्थ: निर्दोष होना (अहिंसा) परम धर्म है, क्षमा परम शक्ति है, ज्ञान आश्चर्यजनक माना गया है, और शम (मन की शान्ति) को सरलता कहा जाता है। (महाभारत, वनपर्व २.७)
२.२ धर्म के सोलह लक्षण
महाभारत में विदुर, भीष्म, व्यास और अनेक महर्षियों ने धर्म के विविध लक्षण बताए हैं। इन सभी को संकलित करें तो धर्म के सोलह प्रमुख लक्षण उभरकर आते हैं:
१. सत्य — सदा सत्य बोलना और सत्य का आचरण करना। २. अहिंसा — किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से पीड़ा न पहुँचाना। ३. ब्रह्मचर्य — इन्द्रियों पर संयम रखना। ४. दान — पात्र को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देना। ५. क्षमा — अपराध करने वाले को क्षमा कर देना। ६. धृति — धैर्य रखना। ७. शम — मन को वश में रखना। ८. दम — इन्द्रियों को वश में रखना। ९. शौच — बाहरी और आन्तरिक पवित्रता। १०. अक्रोध — क्रोध न करना। ११. मार्दव — कोमलता। १२. आर्जव — सरलता। १३. स्वाध्याय — वेदाध्ययन। १४. गुरुसेवा — गुरु की सेवा। १५. तितिक्षा — सुख-दुख सहने की शक्ति। १६. अभय — निर्भयता।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, किन्तु अप्रिय सत्य मत बोलो; और प्रिय होने पर भी असत्य मत बोलो — यही सनातन धर्म है। (महाभारत, शान्तिपर्व)
२.३ धर्म का सूक्ष्म स्वरूप
महाभारत में कहा गया है कि धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है। उसे तर्क से नहीं, अनुभव से जाना जाता है। यही कारण है कि युधिष्ठिर जैसे धर्मराज को भी कभी-कभी धर्म का निर्णय करना कठिन लगता था।
सूक्ष्मा गतिर्हि धर्मस्य। तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्।
अर्थ: धर्म की गति अत्यन्त सूक्ष्म है। तर्क अनिश्चित है, शास्त्र भिन्न-भिन्न हैं, कोई एक मुनि भी ऐसा नहीं जिसका मत प्रमाण हो। (महाभारत, वनपर्व)
इसीलिए महाभारत में 'महाजनो येन गतः स पन्थाः' — महापुरुषों ने जिस मार्ग पर चले, वही मार्ग धर्म है — इस सिद्धान्त को स्वीकार किया गया। भीष्म, द्रोण, कृष्ण, व्यास — ये सभी धर्म के प्रतीक हैं और उनका आचरण ही धर्म की कसौटी है।
३. कुरुवंश और धर्म का क्रमिक ह्रास
३.१ हस्तिनापुर — धर्म का केन्द्र
हस्तिनापुर — भरतवंशियों की राजधानी — कभी धर्म और न्याय का प्रतीक था। भरत महाराज ने इस राज्य की स्थापना उन नियमों पर की थी जो धर्मशास्त्र के अनुसार थे। शान्तनु, देवव्रत (भीष्म), विचित्रवीर्य — इन सभी ने इस राजवंश को आगे बढ़ाया, किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता गया, धर्म का स्तम्भ डोलने लगा।
कालः पचति भूतानि कालः संहरति प्रजाः। कालः सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रमः॥
अर्थ: काल (समय) प्राणियों को पकाता है, काल प्रजा को संहार करता है, जब सब सोते हैं तब काल जागता है — काल को पार करना अत्यन्त कठिन है। (महाभारत, वनपर्व)
३.२ धृतराष्ट्र और पुत्रमोह — अधर्म का बीज
महाभारत के अधर्म-वृक्ष की जड़ें धृतराष्ट्र के पुत्रमोह में हैं। जन्म से अन्धे धृतराष्ट्र अपनी अन्धता को स्वीकार नहीं कर सके। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को राज्य देने की इच्छा में समस्त धर्म-नियमों की उपेक्षा की। विदुर बार-बार उन्हें सावधान करते रहे, किन्तु पुत्रमोह ने उनकी बुद्धि को आवृत कर लिया था।
पुत्रस्नेहाद् धृतराष्ट्रो न दुर्योधनमुत्सृजेत्। एष वैरस्य सम्भारः प्रवृत्तो भरतर्षभ॥
अर्थ: पुत्रस्नेह के कारण धृतराष्ट्र दुर्योधन का त्याग नहीं करते — यही वैर का संग्रह है जो प्रारम्भ हो चुका है, हे भरतश्रेष्ठ! (महाभारत, उद्योगपर्व)
विदुर ने धृतराष्ट्र को समझाया था — 'एक दुर्जन पुत्र के लिए कुल का नाश उचित नहीं है।' किन्तु धृतराष्ट्र मोहवश अपने पुत्र के अधर्म को भी धर्म मानते रहे। यहीं से महाभारत की दुखद कथा का प्रारम्भ होता है।
एकस्य पुत्रस्य कृते भरतस्य महाकुलम्। न नाशयेत् स धर्मज्ञो विदुरेणैव भाषितम्॥
अर्थ: एक पुत्र के कारण भरतवंश के महान कुल को नष्ट नहीं करना चाहिए — यही विदुर ने कहा था। (महाभारत, उद्योगपर्व)
३.३ दुर्योधन और अधर्म की साधना
दुर्योधन महाभारत में अधर्म का प्रतीक-पुरुष है। वह केवल क्रूर नहीं था — वह स्वयं को धर्मी समझता था। उसकी यह भ्रान्ति ही सबसे बड़ा अधर्म था। दुर्योधन का मत था कि 'राजनीति में बल ही धर्म है, और जो सिंहासन पर बैठे, वही राजा है।'
जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः। केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि॥
अर्थ: मैं धर्म को जानता हूँ, किन्तु उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है; मैं अधर्म को भी जानता हूँ, किन्तु उससे मेरी निवृत्ति नहीं है। किसी देव ने मेरे हृदय में बैठकर जैसा नियुक्त किया है, वैसा ही मैं करता हूँ। (महाभारत — दुर्योधन के ये शब्द उसकी मनोदशा को व्यक्त करते हैं)
दुर्योधन का यह कथन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वह जानता था कि वह अधर्म कर रहा है, फिर भी कर रहा था। यह 'जानबूझकर किया गया अधर्म' सबसे बड़ा पाप है। यही कारण है कि महाभारत में दुर्योधन को नरकगामी बताया गया है, जबकि उसका विरोधी पाण्डव युधिष्ठिर — जो कभी-कभी एक झूठ बोलता है — अन्ततः स्वर्ग जाता है।
३.४ शकुनि — छल और अधर्म का अवतार
शकुनि महाभारत में अधर्म का सबसे कुशल साधक है। गान्धारी के भाई, गान्धार के राजकुमार शकुनि का एकमात्र उद्देश्य था — कुरुवंश का विनाश, और इसके लिए उन्होंने द्यूत (जुए) का अस्त्र चुना। शकुनि के पासे सत्य को झूठ में बदल देते थे।
अक्षद्यूतं समाश्रित्य मायाविद्यां च शत्रुहन्। शकुनिर्वरयामास पाण्डवानाम् पराभवम्॥
अर्थ: शत्रुओं का नाश करने वाले शकुनि ने पासों के जुए और माया-विद्या का आश्रय लेकर पाण्डवों का पराभव चाहा। (महाभारत, सभापर्व)
द्यूतसभा की घटना महाभारत की सबसे अधिक पीड़ादायक घटना है। युधिष्ठिर — धर्मराज — जुए में अपना सर्वस्व हार जाते हैं। पहले राज्य, फिर भाई, फिर स्वयं को, और अन्त में द्रौपदी को दाँव पर लगाते हैं। यह क्षण महाभारत का सबसे बड़ा नैतिक प्रश्न है — क्या एक पत्नी को दाँव पर लगाया जा सकता है?
४. द्रौपदी का चीरहरण — धर्म का सबसे बड़ा संकट
४.१ सभा में अन्याय
द्रौपदी-अपमान का प्रसंग महाभारत का सर्वाधिक हृदयविदारक प्रसंग है। दुःशासन द्रौपदी के केश पकड़कर राजसभा में खींच लाया। वहाँ भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर जैसे धर्मज्ञ बैठे थे। कर्ण और दुर्योधन हँस रहे थे। पाण्डव मूक थे। और द्रौपदी अकेली धर्म की शरण माँग रही थी।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद् धर्मं न त्यजेम भयाद् वा लोभतोऽपि वा॥
अर्थ: धर्म ही, नष्ट होने पर विनाश करता है, और रक्षित होने पर रक्षा करता है। इसलिए भय से या लोभ से भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। (महाभारत, वनपर्व)
द्रौपदी ने सभा से पूछा — 'पहले पति ने स्वयं को हारा, फिर मुझे दाँव पर लगाया — तो क्या मैं वास्तव में दास हूँ?' यह प्रश्न पूरी सभा को निरुत्तर कर देता है। भीष्म जैसे महाज्ञानी भी कहते हैं — 'यह प्रश्न अत्यन्त सूक्ष्म है, मैं उत्तर देने में असमर्थ हूँ।'
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पन्थाः। युक्तिहीनं न प्रमाणमस्ति सर्वोपायैः सम्परीक्ष्य साधु॥
अर्थ: धर्म का तत्त्व गुहा में छुपा है; महापुरुष जिस मार्ग पर चले, वही पथ है। बिना युक्ति के कोई प्रमाण नहीं; सब उपायों से परीक्षा करके जो उचित हो, वह करो।
४.२ कृष्ण का धर्मरक्षण
जब सब मौन थे, जब धर्म स्वयं संकट में था — तब कृष्ण आये। उन्होंने अलौकिक रूप से वस्त्र प्रदान किए। यह कोई चमत्कार नहीं था — यह धर्म की शक्ति थी। द्रौपदी ने जब 'गोविन्द' पुकारा, तब उसकी शरण स्वीकार की गई। यहाँ महाभारत का सन्देश है — 'जो धर्म की शरण लेता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।'
कृष्ण कृष्ण महाबाहो द्वारके द्वारकावासिन्। द्रौपद्यास्तव भक्तायाः परित्राणं विधीयताम्॥
अर्थ: हे कृष्ण, हे महाबाहो, हे द्वारका में निवास करने वाले! आपकी भक्ता द्रौपदी की रक्षा करें। (महाभारत, सभापर्व — द्रौपदी की पुकार)
इस प्रसंग में महाभारत एक महत्त्वपूर्ण बात कहता है — जब समाज के सभी स्तम्भ मौन हो जाएँ, जब न्याय-व्यवस्था विफल हो जाए, जब शक्तिशाली लोग अन्याय को देखते रहें — तब केवल परमात्मा की शरण ही बचती है। और परमात्मा वहाँ अवश्य आते हैं जहाँ सच्ची भक्ति हो।
४.३ द्रौपदी का शाप और प्रतिशोध-धर्म
द्रौपदी ने उस दिन प्रतिज्ञा की — 'जब तक दुःशासन के रक्त से मैं अपने केश न धोऊँ, तब तक मैं अपने केश न बाँधूँगी।' यह केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था — यह धर्म की पुनर्स्थापना का संकल्प था। भीम ने यह प्रतिज्ञा सुनकर अपने गदा से दुःशासन का वध करने और उसका रक्त पीने की प्रतिज्ञा की।
यस्मिन् काले तु भीमेन रुधिरं पातुमीप्सितम्। तस्मिन् काले महेष्वासो निश्चयं कारयेत् स्वयम्॥
अर्थ: जिस समय भीम दुःशासन का रक्त पीना चाहते थे, उस समय उस महान धनुर्धर ने स्वयं अपना निश्चय किया। (महाभारत, भीम-प्रतिज्ञा प्रसंग)
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है — क्या प्रतिशोध धर्म है? महाभारत इस प्रश्न का उत्तर देता है — जब अन्याय का जवाब न्यायिक मार्ग से नहीं मिलता, तब क्षत्रिय का प्रतिशोध लेना धर्म ही है। भीम का दुःशासन-वध न केवल प्रतिशोध था, वह धर्म की पुनर्स्थापना का कार्य था।
५. भगवद्गीता — धर्म का सर्वोच्च दर्शन
५.१ अर्जुन का धर्म-संकट
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं, तब अर्जुन के हाथ से गाण्डीव छूट गया। उन्होंने कृष्ण से कहा — 'मैं युद्ध नहीं करूँगा। ये मेरे गुरु हैं, ये मेरे पितामह हैं, ये मेरे भाई हैं। इन्हें मारकर राज्य पाने में क्या सुख होगा?' यह अर्जुन का धर्म-संकट था।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥
अर्थ: हे कृष्ण! मुझे विजय, राज्य और सुखों की कोई इच्छा नहीं है। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या काम, भोगों से या जीवन से भी क्या काम? (गीता १.३२)
अर्जुन का यह प्रश्न केवल युद्ध से सम्बन्धित नहीं था — यह जीवन के सबसे मूलभूत प्रश्न से सम्बन्धित था: जब दो धर्म आपस में टकराते हों — परिवार का प्रेम और क्षत्रिय का कर्तव्य — तो क्या करें?
५.२ कृष्ण का धर्म-उपदेश — कर्मयोग
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। कर्म के फल का कारण मत बनो, और अकर्म में भी आसक्ति मत रखो। (गीता २.४७)
यह श्लोक सम्पूर्ण गीता का सार है। कृष्ण कहते हैं — धर्म का अर्थ है अपने कर्तव्य का पालन करना, फल की चिन्ता किये बिना। अर्जुन एक क्षत्रिय है। युद्ध करना उसका धर्म है। अन्याय के सामने झुक जाना अधर्म है। इसलिए उसे युद्ध करना ही होगा।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। स्वधर्मं च प्रसंख्याय नालं कर्तुं विरोचते॥
अर्थ: अपने धर्म में मरना श्रेयस्कर है; दूसरे का धर्म भयावह है। अपने धर्म के अनुसार कर्म करना ही उचित है। (गीता ३.३५)
५.३ आत्मा की अमरता — धर्म का दार्शनिक आधार
अर्जुन के 'भाइयों को मारने से पाप होगा' तर्क का खण्डन करते हुए कृष्ण आत्मा की अमरता का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं। वे कहते हैं — 'ये आत्माएँ अमर हैं। तुम शरीर को मारते हो, आत्मा को नहीं।'
न जायते म्रियते वा कदाचिन् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
अर्थ: यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है, न यह पहले थी और भविष्य में नहीं होगी। यह अज, नित्य, शाश्वत और पुरातन है — शरीर के मारे जाने पर यह नहीं मरती। (गीता २.२०)
यह धर्म का सर्वोच्च दार्शनिक आधार है — यदि आत्मा अमर है, तो हिंसा का भय व्यर्थ है। यदि शरीर ही सब कुछ है, तो हाँ, हिंसा पाप है। किन्तु यदि आत्मा अमर और शरीर नश्वर है, तो एक क्षत्रिय का धर्म-युद्ध में शरीर का नाश करना पाप नहीं, कर्तव्य है।
५.४ ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग
गीता में कृष्ण तीन मार्ग बताते हैं — ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग। ये तीनों मार्ग अलग-अलग नहीं हैं — ये एक ही लक्ष्य के तीन पथ हैं। कर्मयोग में कर्तव्य का पालन निस्स्वार्थ भाव से करना है। ज्ञानयोग में आत्म-साक्षात्कार करना है। और भक्तियोग में ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण है।
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
अर्थ: सभी धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत करो। (गीता १८.६६)
यह गीता का चरम उपदेश है — 'मामेकं शरणं व्रज।' यहाँ 'सर्वधर्मान् परित्यज्य' का अर्थ यह नहीं कि धर्म त्याग दो, बल्कि यह है कि सभी धर्मों का अहंकार त्याग दो — 'मैं धर्म का पालन कर रहा हूँ' — इस भाव को भी त्याग दो और ईश्वर के प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाओ।
५.५ विश्वरूप दर्शन और धर्म का विराट स्वरूप
गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को कृष्ण का विश्वरूप दर्शन होता है। इस दर्शन में अर्जुन देखता है कि ये सभी योद्धा — दुर्योधन, कर्ण, भीष्म — पहले से ही कृष्ण के मुख में प्रविष्ट हो रहे हैं। काल उन्हें नष्ट कर रहा है। अर्जुन केवल निमित्त है।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥
अर्थ: मैं महाकाल हूँ, संसार का विनाश करने वाला। मैं यहाँ सबको समेटने के लिए प्रवृत्त हूँ। तुम्हारे बिना भी सामने खड़े ये सभी योद्धा नहीं रहेंगे। (गीता ११.३२)
यह दर्शन महाभारत के धर्म-दर्शन की पराकाष्ठा है। धर्म केवल नियम-पालन नहीं है — धर्म ईश्वर के संकल्प का माध्यम बनना है। जो ईश्वर की इच्छा के अनुसार चलता है, वही धर्म का पालन करता है।
६. भीष्म — धर्म की विडम्बना और प्रतिज्ञा की सीमाएँ
६.१ भीष्म-प्रतिज्ञा — महानतम त्याग या धर्म-संकट?
देवव्रत — जो भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए — ने अपने पिता शान्तनु की प्रसन्नता के लिए दो प्रतिज्ञाएँ कीं: आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे, और हस्तिनापुर के सिंहासन पर कभी अधिकार नहीं जमाएँगे। इस प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम 'भीष्म' पड़ा — 'भीष्म' अर्थात् जिसने भीषण प्रतिज्ञा की हो।
पिता मे राजशार्दूल सत्यवत्यां कृतादरः। तत्कृते चाहमेवाद्य प्रतिज्ञाद्वयमाचरम्॥
अर्थ: हे राजश्रेष्ठ! मेरे पिता सत्यवती में आसक्त थे, इसीलिए मैंने आज दो प्रतिज्ञाएँ कीं। (महाभारत, आदिपर्व — भीष्म की प्रतिज्ञा प्रसंग)
किन्तु यही प्रतिज्ञा आगे चलकर अधर्म का कारण बनी। भीष्म अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का अपहरण कर विचित्रवीर्य के लिए लाये — यह अधर्म था। अम्बा को अपने प्रेमी शाल्व के पास भेजने पर उसने भीष्म से प्रतिशोध माँगा। भीष्म ने उसे स्वीकार नहीं किया — यह भी अधर्म था।
६.२ द्रौपदी-अपमान में मौन — धर्म या कर्तव्यहीनता?
भीष्म का सबसे बड़ा धर्म-संकट द्रौपदी-अपमान के समय आया। वे सभा में उपस्थित थे। वे कौरवों को रोक सकते थे — वे हस्तिनापुर के सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति थे। किन्तु वे मौन रहे। उनका तर्क था — 'मैंने धृतराष्ट्र का अन्न खाया है, उनके विरुद्ध नहीं बोल सकता।'
अन्नदोषाद् बलं नष्टं पाण्डवानां महात्मनाम्। प्रतिज्ञा-बद्धताद् देवी नोचे वाचं विमोचये॥
अर्थ: अन्न के दोष से महात्मा पाण्डवों की शक्ति नष्ट हुई। प्रतिज्ञा से बँधे होने के कारण हे देवी, मैं वाणी नहीं खोल सका। (भीष्म का आत्म-स्वीकरण)
महाभारत यहाँ एक अत्यन्त गहरा प्रश्न उठाता है — क्या अन्न-दोष से बुद्धि मलिन हो जाती है? क्या स्वामी-भक्ति का धर्म इतना बड़ा है कि उसके सामने निर्दोष स्त्री की रक्षा का धर्म छोटा पड़ जाए? भीष्म पितामह ने स्वयं माना कि उनसे अधर्म हुआ। कुरुक्षेत्र में शरशय्या पर पड़े हुए उन्होंने युधिष्ठिर से कहा — 'मेरे मौन का प्रायश्चित्त मुझे यहाँ शरों पर लेटकर करना पड़ रहा है।'
६.३ शरशय्या पर भीष्म का धर्मोपदेश
कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद जब भीष्म शरशय्या पर लेटे थे, तब कृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर उनसे धर्म का ज्ञान लेने आए। यह प्रसंग महाभारत के शान्तिपर्व में है और इसमें राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म आदि का विस्तृत वर्णन है।
न हि धर्मः सुखासीनः फलतीह मनीषिणाम्। कृच्छ्रेण प्राप्यते धर्मो धर्माद् अर्थो विसर्जितः॥
अर्थ: धर्म सुख से बैठे-बैठे फल नहीं देता — बुद्धिमानों के लिए धर्म कठिनाई से प्राप्त होता है; और धर्म की प्राप्ति के लिए अर्थ का त्याग करना पड़ता है। (महाभारत, शान्तिपर्व)
शरशय्या पर लेटे भीष्म ने ५८ दिनों तक युधिष्ठिर को धर्म का उपदेश दिया। यह उपदेश महाभारत का सर्वाधिक विस्तृत और गहन धर्म-शास्त्र है। इसमें राजनीति, समाजनीति, गृहस्थ-धर्म, संन्यास-धर्म, ईश्वर-भक्ति — सभी विषयों का विस्तार से विवेचन है।
७. कर्ण — त्रासद नायक, दानवीरता और धर्म-अधर्म का संघर्ष
७.१ कर्ण का जन्म और अपमान
कर्ण महाभारत का सर्वाधिक त्रासद पात्र है। वह पाण्डु-पुत्र नहीं, किन्तु कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र था — सूर्यपुत्र, जो माँ के द्वारा त्यागा गया था। राधा और अधिरथ ने उसे पाला। किन्तु समाज ने उसे 'सूत-पुत्र' कहकर अपमानित किया। द्रोणाचार्य ने उसे शिक्षा देने से इनकार किया। द्रौपदी-स्वयंवर में उसे अपमानित किया गया।
सूतपुत्र इति ख्यातं कर्णं सञ्जय चोदय। यदि शूरो यदि वीरो युध्यताम् अर्जुनेन सः॥
अर्थ: संजय! 'सूत-पुत्र' के नाम से प्रसिद्ध कर्ण को प्रेरित करो — यदि वह शूर और वीर है, तो अर्जुन से लड़े। (महाभारत — कर्ण के अपमान का प्रसंग)
कर्ण ने अपने अपमान का प्रतिशोध दुर्योधन की मित्रता में लिया। दुर्योधन ने उसे अंग देश का राजा बनाया। इसलिए कर्ण ने अपना सर्वस्व दुर्योधन को अर्पित कर दिया — यह उसका मित्र-धर्म था। यही उसकी त्रासदी भी थी — सही व्यक्ति के प्रति गलत पक्ष का साथ।
७.२ कर्ण की दानवीरता — अधर्म-पक्ष में भी धर्म
कर्ण की महानता उसकी दानवीरता में है। वह प्रतिदिन हजारों याचकों को दान देता था। यहाँ तक कि जब इन्द्र ब्राह्मण के वेश में आये और उसके कवच-कुण्डल माँगे — जो उसके जन्म-जात थे और उसकी रक्षा करते थे — तब भी कर्ण ने मना नहीं किया।
कर्णो दानेन शूरत्वे सत्ये च विदितः क्षितौ। सूतपुत्र इति ख्यातो धर्मे चापि प्रतिष्ठितः॥
अर्थ: कर्ण दान, शूरता और सत्य के लिए पृथ्वी पर विख्यात थे। 'सूत-पुत्र' के नाम से प्रसिद्ध होने पर भी वे धर्म में प्रतिष्ठित थे।
इन्द्र ने जब कवच-कुण्डल माँगे, तब कर्ण ने कहा — 'दे दूँगा। परन्तु आप कुछ बदले में दें।' इन्द्र ने 'अमोघ शक्ति' — एक अजेय अस्त्र — दिया। किन्तु यह केवल एक बार ही काम करती थी। कर्ण ने इसे अर्जुन के लिए सुरक्षित रखा था, किन्तु घटोत्कच के संकट में उसे उपयोग करना पड़ा। इस प्रकार कर्ण की दानवीरता ने उसकी मृत्यु सुनिश्चित की।
७.३ कर्ण और कुन्ती का मिलन — धर्म-संकट
कुरुक्षेत्र युद्ध से पूर्व कुन्ती कर्ण के पास गईं और उसे बताया कि वह उनका पुत्र है। उन्होंने उससे पाण्डवों का पक्ष लेने का अनुरोध किया। कर्ण के सामने भीषण धर्म-संकट था — माँ का आदेश और मित्र-धर्म।
न त्वाहमनृतं वक्ष्ये यदि राज्यं प्रदास्यसि। मित्रस्य धर्म आस्थातुं न शक्यो धर्मवित् तव॥
अर्थ: मैं असत्य नहीं बोलूँगा यदि तुम राज्य भी दो। धर्मज्ञ के लिए मित्र-धर्म का आस्था लेना उचित नहीं है। (कर्ण का कुन्ती को उत्तर)
कर्ण ने कुन्ती से कहा — 'माँ, आपने मुझे तब त्यागा जब मुझे आपकी सबसे अधिक आवश्यकता थी। आज जब आप आई हैं, तो केवल इसलिए कि आपके और पुत्रों की रक्षा हो। मैं दुर्योधन को नहीं छोड़ सकता। परन्तु आपसे यह वचन देता हूँ — अर्जुन को छोड़कर अन्य किसी पाण्डव का वध नहीं करूँगा। आपके पाँच पुत्र रहेंगे।'
यह कर्ण का महानतम धर्म-निर्णय था। वह जानता था कि दुर्योधन का पक्ष अधर्म का पक्ष है। किन्तु मित्र-धर्म उसे बाँधता था। इसीलिए कर्ण महाभारत का सबसे जटिल और आकर्षक पात्र है।
७.४ कर्ण की मृत्यु — अधर्म का अन्त या अन्याय?
कर्ण की मृत्यु अत्यन्त विवादास्पद है। उसकी मृत्यु तब हुई जब उसका रथ कीचड़ में धँस गया था, वह निहत्था था, और परशुराम के शाप के कारण उसे अपना अस्त्र-ज्ञान भूल गया था। ऐसे में कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण पर बाण चलाने को कहा।
कृत्स्नं क्षत्रं विनाशाय समाहर्तुं तु वासवः। कर्णो वध्यः समागम्य तव हस्तेन फाल्गुन॥
अर्थ: समस्त क्षत्रियों का विनाश करने को देवराज इन्द्र ने कर्ण को तुम्हारे हाथों मारे जाने योग्य बनाया है, हे फाल्गुन! (महाभारत, कर्णपर्व)
अर्जुन ने झिझका — 'यह अनुचित है।' किन्तु कृष्ण ने कहा — 'जिस कर्ण ने अभिमन्यु के वध में भाग लिया, जिसने निहत्थे बालक को मारा — उसके साथ यही न्याय है।' यहाँ महाभारत का एक महत्त्वपूर्ण धर्म-सिद्धान्त उभरता है — 'जो जैसा करता है, वैसा भोगता है।'
८. युधिष्ठिर — धर्मराज की परीक्षाएँ और संघर्ष
८.१ युधिष्ठिर — धर्म का प्रतीक पुरुष
युधिष्ठिर को 'धर्मराज' कहा जाता है। वे धर्म के अवतार थे — उनके पिता स्वयं धर्मराज (यम) थे। किन्तु महाभारत में उनकी जो परीक्षाएँ हुईं, वे यह बताती हैं कि धर्म का पालन करना कितना कठिन है।
सत्यं एव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम्॥
अर्थ: सत्य की जय होती है, असत्य की नहीं। देवयान मार्ग सत्य से ही विस्तृत है, जिस पर इच्छापूर्ण ऋषि चलते हैं — वहाँ सत्य का परम निवास है। (मुण्डकोपनिषद् — महाभारत में उद्धृत)
युधिष्ठिर का सबसे बड़ा धर्म-संकट अश्वत्थामा प्रसंग में आया। जब कृष्ण ने योजना बनाई कि द्रोणाचार्य को भ्रमित करने के लिए युधिष्ठिर कहें — 'अश्वत्थामा मारा गया' — तब युधिष्ठिर के सामने धर्म-युद्ध की विजय और अपने सत्य-धर्म में से एक को चुनना था।
८.२ अश्वत्थामा-प्रसंग — आधा सत्य, आधा असत्य
द्रोणाचार्य अपराजेय थे। जब तक वे जीवित थे, पाण्डव-सेना का विनाश अनिवार्य था। कृष्ण ने युक्ति निकाली — भीम ने 'अश्वत्थामा' नाम के एक हाथी को मार दिया, और युधिष्ठिर से कहलवाया — 'अश्वत्थामा मारा गया।' साथ में धीरे से कहा — 'हाथी।'
अश्वत्थामा हतः इति नरो वा कुञ्जरोऽपि वा। इति ब्रुवन् युधिष्ठिरः शब्दं मन्दं व्यसर्जयत्॥
अर्थ: 'अश्वत्थामा मारा गया — मनुष्य हो या हाथी' — ऐसा कहते हुए युधिष्ठिर ने धीमे स्वर में 'हाथी' शब्द कहा।
इस आधे-सत्य के कारण द्रोणाचार्य ने अस्त्र त्याग दिया और ध्यान में बैठ गए। तब धृष्टद्युम्न ने उनका वध किया। युधिष्ठिर को इस झूठ के कारण उनका रथ — जो पहले धरती से चार अंगुल ऊपर चलता था — धरती पर आ गया। महाभारत का यह प्रतीक अत्यन्त सार्थक है — एक भी झूठ व्यक्ति को धरती पर ले आता है।
८.३ यक्ष-युधिष्ठिर संवाद — धर्म की परम परीक्षा
वनवास काल में एक अद्भुत घटना हुई। एक सरोवर के पास यक्ष (जो वास्तव में धर्मराज/यम थे) ने पाण्डव-भाइयों को एक-एक करके रोका। जब वे उत्तर दिए बिना जल पीने लगे, तो मर गए। अन्त में युधिष्ठिर आये। यक्ष ने उनसे धर्म के विषय में अनेक प्रश्न पूछे।
किं स्विद् गुरुतरं भूमेः किं स्विदुच्चतरं च खात्। किं स्विच्छीघ्रतरं वायोः किं स्विद् बहुतरं तृणात्॥
अर्थ: पृथ्वी से क्या भारी है? आकाश से क्या ऊँचा है? वायु से क्या तेज़ है? तृण से क्या अधिक है? (यक्ष के प्रश्न, महाभारत, वनपर्व)
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया — 'माँ पृथ्वी से भारी है। पिता आकाश से ऊँचे हैं। मन वायु से तेज है। और चिन्ता तृण से भी अधिक है।' फिर यक्ष ने पूछा — 'मनुष्य का परम सुख क्या है?' उत्तर था — 'सत्कर्म।' 'परम धर्म क्या है?' — 'अहिंसा।' 'परम ज्ञान क्या है?' — 'आत्म-ज्ञान।'
किं नु हित्वा प्रियो भवति किं नु हित्वा न शोचति। किं नु हित्वार्थवान् भवति किं नु हित्वा सुखी भवेत्॥
अर्थ: क्या छोड़कर मनुष्य प्रिय होता है? क्या छोड़कर शोक नहीं होता? क्या छोड़कर धनवान बनता है? क्या छोड़कर सुखी होता है? (यक्ष के प्रश्न)
युधिष्ठिर के उत्तर: 'मान' छोड़ने से प्रिय होता है। 'क्रोध' छोड़ने से शोक नहीं होता। 'काम' छोड़ने से धनवान बनता है। 'लोभ' छोड़ने से सुखी होता है। यक्ष ने प्रसन्न होकर भाइयों को जीवित किया। यह प्रसंग महाभारत का सर्वश्रेष्ठ धर्म-शिक्षा प्रसंग है।
९. अभिमन्यु और चक्रव्यूह — अधर्म का सामूहिक पाप
९.१ अभिमन्यु का चरित्र — वीरता और धर्म
अभिमन्यु — अर्जुन का पुत्र, सुभद्रा का लाल — महाभारत के सर्वाधिक वीर और त्रासद पात्रों में से एक है। वह केवल सोलह वर्ष का था जब उसने चक्रव्यूह में प्रवेश किया। उसने माँ के गर्भ में ही चक्रव्यूह में प्रवेश करने की विधि सुनी थी, किन्तु बाहर निकलने की विधि नहीं — क्योंकि सुभद्रा सो गई थीं।
पुत्र मे प्राण मे वीर सम्प्रति त्वं प्रवेक्ष्यसि। चक्रव्यूहं महाघोरं शत्रूणां भयवर्धनम्॥
अर्थ: हे पुत्र, हे मेरे प्राण, हे वीर! तुम अभी इस महाघोर चक्रव्यूह में प्रवेश करोगे जो शत्रुओं का भय बढ़ाने वाला है।
अभिमन्यु ने कहा — 'पिताजी ने जो सिखाया है, उतने से मैं प्रवेश कर सकता हूँ। बाहर निकलना नहीं आता। किन्तु फिर भी मैं जाऊँगा। क्योंकि क्षत्रिय का धर्म है — युद्ध में पीठ नहीं दिखाना।' यह वाक्य महाभारत का अमर सन्देश है।
९.२ अभिमन्यु-वध — सप्त-महारथियों का अधर्म
चक्रव्यूह के भीतर अभिमन्यु अकेला लड़ रहा था। द्रोणाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शल्य — सात महारथी एक बालक को घेरकर मार रहे थे। यह महाभारत का सबसे बड़ा अधर्म था।
एकं बहवः शूरा समाहत्य निजघ्निरे। न युक्तमिति भावज्ञाः कथयन्ति महर्षयः॥
अर्थ: एक वीर को अनेक शूरों ने मिलकर मारा — यह उचित नहीं था — ऐसा भावज्ञ महर्षि कहते हैं। (महाभारत, द्रोणपर्व)
जब कर्ण ने पीछे से अभिमन्यु के धनुष की प्रत्यंचा काट दी, जब सात महारथियों ने एक साथ उस पर प्रहार किया — यह युद्ध-धर्म का सर्वथा उल्लंघन था। महाभारत में इसे 'महापाप' कहा गया है।
अभिमन्यु के वध के बाद अर्जुन ने जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा की। यह प्रतिज्ञा धर्म-युद्ध के भीतर एक व्यक्तिगत प्रतिशोध की प्रतिज्ञा थी। कृष्ण ने इसे धर्म-सम्मत माना — क्योंकि अभिमन्यु का वध भी अधर्म था।
१०. विदुर-नीति — राजधर्म और नीतिशास्त्र
१०.१ विदुर — धर्म का प्रतिनिधि
विदुर महाभारत का सबसे निष्पक्ष और धर्मज्ञ पात्र है। धृतराष्ट्र के सौतेले भाई, दासीपुत्र होने के कारण राजा बनने के अयोग्य, किन्तु ज्ञान में किसी से कम नहीं। विदुर ने बार-बार धृतराष्ट्र और दुर्योधन को चेताया — 'यह मार्ग अधर्म का है। लौट जाओ।' किन्तु किसी ने नहीं सुना।
अनागतं यः कुरुते स शोभते समागतं यश्च करोति कर्म। यश्चापदं नश्यति नैव मुह्यत् त्रीणि प्रजानाति नरः प्रजानन्॥
अर्थ: जो भविष्य का विचार करता है, जो वर्तमान का कार्य करता है, जो आपदा में घबराता नहीं — इन तीन बातों को जानने वाला मनुष्य ही वास्तव में ज्ञानी है। (विदुर-नीति, महाभारत, उद्योगपर्व)
विदुर-नीति महाभारत का एक स्वतन्त्र नीति-शास्त्र है। इसमें राजा के कर्तव्य, मन्त्री के धर्म, मित्र की पहचान, शत्रु से व्यवहार — सभी विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
१०.२ राजधर्म के सूत्र
राजा प्रकृतिरञ्जनात्। चतुर्वर्णस्य वर्णानां क्षत्रियो धर्ममाचरेत्। स्वधर्ममनुपालन् हि लोकद्वयफलं लभेत्॥
अर्थ: राजा वह है जो प्रजा को अनुरञ्जित करे। चारों वर्णों में क्षत्रिय अपने धर्म का आचरण करे, अपने धर्म का पालन करने से वह दोनों लोकों में फल प्राप्त करता है।
विदुर ने राजधर्म के पाँच प्रमुख सूत्र दिए: पहला — प्रजा की रक्षा सर्वोपरि है। दूसरा — राजा स्वयं नियमों से ऊपर नहीं है। तीसरा — दुर्जन का संग त्याज्य है, चाहे वह पुत्र ही क्यों न हो। चौथा — दूरदर्शिता राजनीति का प्राण है। पाँचवाँ — अहंकार राज्य का नाश करता है।
मन्त्रिणो मन्त्रगुप्तौ स्यात् तेज्यः सर्वत्र सर्वदा। दुर्बलस्य बलं राजा बालानां च पिता यथा॥
अर्थ: मन्त्री सदा सर्वत्र मन्त्र की गुप्तता रखे। राजा दुर्बल का बल हो, जैसे पिता बच्चों का होता है। (विदुर-नीति)
१०.३ सत्य की राजनीति
विदुर का मानना था कि जो राजा झूठ पर अपना राज्य बनाता है, उसका राज्य चिरस्थायी नहीं होता। दुर्योधन का राज्य छल पर आधारित था — इसीलिए वह नष्ट हुआ। युधिष्ठिर का राज्य सत्य पर आधारित था — इसीलिए वह चिरस्थायी हुआ।
सत्यं ब्रह्म तपो ब्रह्म सत्यं स्वर्गस्य साधनम्। सत्यं धर्मस्य मूलं च न किंचित् सत्यतः परम्॥
अर्थ: सत्य ब्रह्म है, तप ब्रह्म है, सत्य स्वर्ग का साधन है। सत्य धर्म का मूल है — सत्य से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। (विदुर-नीति)
११. कुरुक्षेत्र — धर्म-अधर्म का महासंग्राम
११.१ युद्ध-धर्म के नियम
महाभारत में युद्ध के लिए विशेष धर्म-नियम थे। इन नियमों को 'युद्ध-धर्म' कहते थे। इनके अनुसार: रथी से रथी लड़े, पैदल से पैदल; रात को युद्ध बंद हो; शरण माँगने वाले को न मारें; पीठ दिखाने वाले को न मारें; बिना कवच के योद्धा पर प्रहार न करें; स्त्री, बालक, वृद्ध और निहत्थे पर हमला न करें।
रथिनं रथिनानेव पादातं पादिनैव च। हस्त्यारोहं च हस्त्यारोहैर्युध्येद् धर्मयुद्धे नरः॥
अर्थ: धर्म-युद्ध में रथी रथी से, पैदल-सैनिक पैदल से, और हाथी-सवार हाथी-सवार से लड़े। (महाभारत, कर्णपर्व — युद्ध-धर्म के नियम)
इन नियमों का उल्लंघन ही महाभारत के युद्ध को 'धर्म-युद्ध से अधर्म-युद्ध' में बदल देता है। दुर्योधन पक्ष ने इन नियमों का उल्लंघन पहले किया — अभिमन्यु के वध में, जयद्रथ-वध के पूर्व, घटोत्कच के प्रसंग में।
११.२ भीष्म का पतन — अधर्म का पहला फल
भीष्म पितामह कौरवों के सेनापति थे। उन्होंने कहा था — 'मैं पाण्डवों को नहीं मारूँगा, किन्तु उनकी सेना को नष्ट करूँगा।' यह एक प्रकार का धर्म-अधर्म का मिश्रण था। अन्ततः शिखण्डी के सामने भीष्म ने अस्त्र रख दिए — क्योंकि शिखण्डी पहले स्त्री था और स्त्री पर प्रहार करना भीष्म के धर्म के विरुद्ध था।
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य तव पित्रा धनञ्जयः। प्राहरद् विशिखैस्तीक्ष्णैर्भीष्मं शान्तनवं तदा॥
अर्थ: शिखण्डी को आगे रखकर तुम्हारे पिता अर्जुन ने उस समय शान्तनुपुत्र भीष्म पर तीखे बाणों से प्रहार किया। (महाभारत, भीष्मपर्व)
११.३ द्रोणाचार्य का वध — गुरु-वध का पाप
द्रोणाचार्य का वध महाभारत के सर्वाधिक विवादास्पद प्रसंगों में से एक है। धृष्टद्युम्न ने ध्यानस्थ, निहत्थे द्रोणाचार्य का सिर काट दिया। यह युद्ध-धर्म का उल्लंघन था। यही कारण है कि महाभारत में धृष्टद्युम्न को भी दोषी माना गया।
निश्शस्त्रं ब्राह्मणं हत्वा यत् पापं फाल्गुनेन वा। न तावतां पापमस्ति यत् गुरोः शिरः पाते॥
अर्थ: निहत्थे ब्राह्मण को मारने का जो पाप अर्जुन को भी होता, उससे भी अधिक पाप है गुरु का सिर काटना।
११.४ कृष्ण का धर्म-व्यवहार — 'छलेन वध' की नीति
कृष्ण ने महाभारत-युद्ध में कई बार ऐसे कार्य किए जो युद्ध-धर्म के विपरीत प्रतीत होते हैं। उन्होंने जयद्रथ-वध के लिए सूर्यास्त की माया रची। उन्होंने भीष्म-पतन के लिए शिखण्डी का उपयोग किया। उन्होंने दुर्योधन की जाँघ पर प्रहार करने के लिए भीम को इशारा किया।
नाधर्मेण जयो युक्तः स विजयो विजयो यथा। धर्मेणैव जयस्ते स्याद् धर्मः सर्वस्य साधनम्॥
अर्थ: अधर्म से जीत प्राप्त करना उचित नहीं है — वह विजय, विजय नहीं कहलाती। केवल धर्म से ही विजय होती है — धर्म सबका साधन है।
किन्तु कृष्ण का तर्क था — जब दुर्योधन पक्ष ने पहले धर्म का उल्लंघन किया (अभिमन्यु-वध, द्रौपदी-अपमान), तब उसके साथ पूर्ण धर्म-नियमों से लड़ना स्वयं अधर्म होगा। 'छल से छल' — यह आपद्धर्म है।
१२. आपद्धर्म — संकट में धर्म की विशेष व्यवस्था
१२.१ आपद्धर्म का सिद्धान्त
महाभारत में 'आपद्धर्म' की एक विशेष अवधारणा है। साधारण परिस्थितियों में जो नियम लागू होते हैं, वे आपातकाल में शिथिल हो जाते हैं। यह वही सिद्धान्त है जिसे आज हम 'force majeure' कहते हैं।
आपदि कर्म कुर्वाणो धर्मं नाभिहिनस्ति हि। आपत्काले तु धर्म स्याद् यत् कुर्यान्नित्यमेव सः॥
अर्थ: आपत्ति में कर्म करते हुए धर्म का नाश नहीं होता। आपत्काल में जो किया जाए, वही धर्म है — यदि वह नित्य-कर्म की भावना से हो।
भीष्म ने शान्तिपर्व में विस्तार से बताया है — भूख से मरते समय अखाद्य खाना भी धर्म है। शत्रु द्वारा घिरे जाने पर कूटनीति भी धर्म है। प्राण-रक्षा के लिए असत्य बोलना भी धर्म है। यह 'आपद्धर्म' की व्यापक अवधारणा है।
प्राणान् परित्यजेद् धर्मे धर्मं च परमार्थतः। परमार्थे परे धर्मे प्राणांस्त्यजति पण्डितः॥
अर्थ: धर्म की रक्षा के लिए प्राण त्याग दें; परन्तु परम सत्य के लिए, परम धर्म के लिए, ज्ञानी व्यक्ति प्राण त्याग देता है। (महाभारत, शान्तिपर्व)
१२.२ विश्वामित्र और चाण्डाल-गृह का प्रसंग
महाभारत में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रसंग है — विश्वामित्र का भूख से मरते समय चाण्डाल के घर से श्वानमाँस चुराकर खाना। यह घटना 'आपद्धर्म' का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। कोई भी धर्म प्राण से बड़ा नहीं है — क्योंकि प्राण है तो धर्म का पालन सम्भव है।
प्राणानां परिरक्षार्थं सर्वधर्मान् परित्यजेत्। प्राणे हि धर्म आधारः सर्वधर्माः फलप्रदाः॥
अर्थ: प्राणों की रक्षा के लिए सब धर्मों को त्याग दो। प्राण में ही धर्म का आधार है — सभी धर्म प्राण से ही फलदायी होते हैं।
१३. स्त्री-धर्म — गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी की धर्म-यात्रा
१३.१ गान्धारी — पतिव्रता का चरम
गान्धारी — गान्धार-राजकुमारी, धृतराष्ट्र की पत्नी — ने पति की अन्धता जानकर स्वयं भी अपनी आँखें बाँध लीं। यह पतिव्रत-धर्म का चरम उदाहरण था। गान्धारी का यह निर्णय केवल प्रेम नहीं था — यह उस युग के स्त्री-धर्म की सीमाओं का भी परिचायक था।
पतिव्रता यथा नारी पतिमेव हि दैवतम्। मन्यते नात्र सन्देहो धर्मोऽयं सनातनः॥
अर्थ: पतिव्रता स्त्री पति को ही देव मानती है — इसमें संशय नहीं, यही सनातन धर्म है।
गान्धारी ने पुत्र-मोह में भी धर्म का साथ नहीं छोड़ा। जब कृष्ण उनके पास दूत बनकर आए, तब उन्होंने दुर्योधन को धर्म-मार्ग पर चलने का उपदेश दिया। युद्ध के बाद जब कृष्ण उनसे मिलने आए, तब गान्धारी ने कृष्ण को शाप दिया — 'जैसे मेरे कुल का नाश हुआ, वैसे ही यादव कुल का नाश हो।' यह शाप 'मातृशोक' का प्राकृतिक विस्फोट था।
१३.२ कुन्ती — त्याग और धर्म
कुन्ती महाभारत की सबसे जटिल नारी-पात्र है। उन्होंने कर्ण को जन्म दिया, किन्तु लोक-लाज के भय से उसे त्याग दिया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा पाप और सबसे बड़ी पीड़ा थी। पाण्डु की मृत्यु के बाद उन्होंने पाँच पुत्रों को पाला और उन्हें धर्म-मार्ग पर चलाया।
माता ज्येष्ठा गुरुः पुत्रैः सेव्या प्रयत्नतः। देवः प्रत्यक्षदृश्योऽसौ न देवो विद्यते परः॥
अर्थ: माता ज्येष्ठ गुरु है, पुत्रों को प्रयत्नपूर्वक उनकी सेवा करनी चाहिए। वह साक्षात् दृश्यमान देव है — उससे बड़ा कोई देव नहीं है।
कुन्ती ने कर्ण के साथ किया गया अन्याय जीवन भर झेला। कुरुक्षेत्र के बाद जब युधिष्ठिर को पता चला कि कर्ण उनका ज्येष्ठ भाई था, तब उन्होंने माँ से कहा — 'आपने यह रहस्य छुपाकर सबसे बड़ा अधर्म किया।'
१३.३ द्रौपदी — क्षमा और प्रतिशोध का धर्म
द्रौपदी महाभारत की सर्वाधिक सशक्त नारी-पात्र है। वह पुरुष-प्रधान समाज में भी अपने अधिकारों के लिए लड़ती है। द्यूत-सभा में उसके प्रश्न — 'क्या मैं दास हूँ?' — पूरी सभा को निरुत्तर कर देते हैं।
न सा स्त्री विद्यते लोके या न मे सम्मतिं करेत्। यन्मामानीतवान् राजन् दुःशासनो दुराचरः॥
अर्थ: इस लोक में ऐसी कोई स्त्री नहीं जो मेरे जैसा व्यवहार सहन कर सके। हे राजन्! दुराचारी दुःशासन मुझे यहाँ लाया है। (द्रौपदी की सभा में पुकार, महाभारत, सभापर्व)
द्रौपदी ने कभी अपमान को भुलाया नहीं। उसकी प्रतिज्ञा — 'केश खुले रहेंगे' — महाभारत का सबसे लम्बे समय तक चलने वाला संकल्प था। यह केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं था — यह उस समाज के अन्याय के विरुद्ध एक स्त्री का प्रतिरोध था।
१४. संजय और दिव्य-दृष्टि — निष्पक्ष साक्षी का धर्म
१४.१ संजय — धर्म का निष्पक्ष आख्याता
महाभारत की कथा का आख्यान संजय करते हैं — धृतराष्ट्र के सारथी, जिन्हें व्यास ने दिव्य-दृष्टि दी थी। संजय घर बैठे कुरुक्षेत्र का समस्त युद्ध देख और सुन सकते थे। वे धृतराष्ट्र को सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाते हैं।
व्यास-प्रसादाद् अहमेतद् विदित्वा योगमैश्वरं परमं गुह्यमेतत्। दृष्टवानस्मि युद्धं च तेषां सञ्जयः कुरुराज ब्रवीमि॥
अर्थ: व्यास की कृपा से मैंने यह परम रहस्यमय ऐश्वर्य-योग जाना। हे कुरुराज! मैंने उनका युद्ध देखा है — संजय बोल रहा हूँ। (महाभारत, भीष्मपर्व)
संजय का पात्र महाभारत में 'साक्षी' का पात्र है। वह न कौरवों के पक्ष में है, न पाण्डवों के। वह निष्पक्ष होकर सत्य कहता है। यह 'साक्षी-धर्म' — बिना पक्षपात के सत्य बोलना — महाभारत का महत्त्वपूर्ण शिक्षण है।
१५. श्रीकृष्ण — धर्म-संस्थापना का दिव्य संकल्प
१५.१ कृष्ण का अवतरण — 'यदा यदा हि धर्मस्य'
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। (गीता ४.७)
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
अर्थ: सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। (गीता ४.८)
महाभारत के केन्द्र में कृष्ण हैं। वे केवल एक पात्र नहीं — वे धर्म के अवतार हैं, समय के प्रवाह हैं, और ब्रह्म के प्रतिनिधि हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन — बचपन से लेकर कुरुक्षेत्र तक — धर्म की स्थापना के लिए ही था।
१५.२ कृष्ण की राजनीति — 'साम, दाम, दण्ड, भेद'
कृष्ण ने महाभारत में राजनीति के चारों सूत्रों का उपयोग किया। दुर्योधन को समझाने गए (साम), शान्तिदूत बनकर पाँच गाँव माँगे (साम+दाम), युद्ध में अनेक नीतियाँ अपनाईं (भेद+दण्ड)। उनकी राजनीति 'धर्म की विजय' के लिए थी, व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं।
न युक्तमेतत् कथमप्यसाम्प्रतं यदिच्छसि त्वं पुरुषार्थसाधनम्। शक्यं च सर्वैः सुखदं च भारत कर्तुं न शक्यं विपरीतमीहसे॥
अर्थ: हे भारत! तुम जो पुरुषार्थ साधन चाहते हो वह किसी भी प्रकार से उचित नहीं। जो सबके लिए शक्य और सुखदायी है वह तुम कर सकते हो, किन्तु तुम उसके विपरीत चाहते हो। (कृष्ण का दुर्योधन से कथन)
१५.३ कृष्ण का विश्वरूप — 'अहं सर्वस्य प्रभवः'
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥
अर्थ: मैं सब कुछ का उद्गम हूँ, मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है — ऐसा जानकर बुद्धिमान लोग श्रद्धा से मेरी भक्ति करते हैं। (गीता १०.८)
कृष्ण का यह कथन महाभारत के धर्म-दर्शन का सर्वोच्च बिन्दु है। वे कहते हैं — 'जो कुछ है, मैं हूँ। धर्म भी मैं हूँ, अधर्म भी मैं हूँ। सृष्टि भी मैं हूँ, संहार भी मैं हूँ।' यह अद्वैत-दर्शन है — जहाँ धर्म और अधर्म का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म शेष रहता है।
१६. धर्मराज्य की स्थापना — युधिष्ठिर का राज्याभिषेक
१६.१ युद्ध के बाद का शोक
कुरुक्षेत्र युद्ध समाप्त हुआ। पाण्डवों की विजय हुई। किन्तु यह विजय आँसुओं में डूबी थी। लाखों वीरों के शव पड़े थे। गान्धारी अपने सौ पुत्रों के शवों के बीच बैठी थीं। युधिष्ठिर को विजय में सुख नहीं था।
जयाय इत्येव जातोऽसि जयतोऽपि शुभं मनः। न विजेता भवेच्छ्रेष्ठो यद्यात्मा न जितः स्वयम्॥
अर्थ: केवल विजय के लिए जन्म नहीं हुआ है। विजेता का मन भी शुभ हो। जो व्यक्ति स्वयं अपने आत्म को नहीं जीत सका, वह श्रेष्ठ विजेता नहीं है।
युधिष्ठिर ने कहा — 'मैं राज्य नहीं चाहता। इस विजय के लिए इतने वीरों की बलि दी गई — यह धर्म नहीं हो सकता।' तब कृष्ण ने उन्हें समझाया — 'धर्म-राज्य की स्थापना करना आपका कर्तव्य है। राज्य का त्याग पलायन है, कर्तव्य नहीं।'
१६.२ अश्वमेध यज्ञ और राजधर्म
युधिष्ठिर ने राजसिंहासन ग्रहण किया और अश्वमेध यज्ञ किया। यह युद्ध के पाप से मुक्ति का प्रयास था। अश्वमेध यज्ञ का अर्थ था — 'मेरा राज्य अब धर्म-राज्य है। मैं सब दिशाओं में शान्ति और न्याय स्थापित करता हूँ।'
राजा कुर्यात् सदा धर्मं यज्ञैश्च विविधैः सदा। प्रजाः पालयते धर्मेण शिश्यं पालयते यथा॥
अर्थ: राजा सदा विविध यज्ञों से धर्म का आचरण करे। जैसे शिष्य को पालता है, वैसे ही धर्म से प्रजा का पालन करे।
युधिष्ठिर का राज्य 'धर्मराज्य' का आदर्श उदाहरण बना। उन्होंने अपने राज्य में न्याय, समता, और करुणा को सर्वोच्च स्थान दिया। उनके समय में 'हस्तिनापुर' वास्तव में धर्म का केन्द्र बन गया।
१७. अधर्म के परिणाम — महाभारत का न्याय-दर्शन
१७.१ दुर्योधन का अन्त — अहंकार की पराजय
दुर्योधन महाभारत का मुख्य खलनायक है, किन्तु उसका अन्त भी अत्यन्त वीरतापूर्ण था। गदा-युद्ध में वह भीम से लड़ा। उसने कहा — 'मैं कोई पश्चाताप नहीं करता। मैंने अपने तरीके से जिया।' यह अहंकार का चरम था।
आजानेयाः प्रहरणाः समरे नोचितो जयः। स्वयं विनाशमानीतो यः स तिष्ठेन्न शोभते॥
अर्थ: युद्ध में श्रेष्ठ शस्त्रधारियों के बीच जो अनुचित जय हो, वह शोभनीय नहीं; जो स्वयं विनाश लाया हो, वह शोभित नहीं होता।
दुर्योधन के जाँघ पर भीम के गदा-प्रहार को अनेक लोग अधर्म मानते हैं। किन्तु कृष्ण का तर्क था — द्रौपदी को जिस जाँघ पर बैठने के लिए दुर्योधन ने आमन्त्रित किया था, उसी जाँघ से उसका अन्त होना धर्म का न्याय है।
१७.२ अश्वत्थामा का शाप — अधर्म की दीर्घ सजा
अश्वत्थामा ने द्रोण-पुत्र होने के कारण स्वयं को विशेष समझा। उसने युद्ध के अन्तिम क्षणों में रात को सोती हुई पाण्डव-सेना पर हमला किया, पाण्डवों के पुत्रों को मार डाला। यह कायरता और अधर्म का चरम था। उसने ब्रह्मास्त्र भी उत्तरा के गर्भ पर चलाया।
यो हत्वा निशि शेते तत्र शस्त्रमुपाश्रितः। स पापात्मा विनश्यत्वस्मादेव विनाशयेत्॥
अर्थ: जो रात में सोतों को मारे, वह शस्त्र का आश्रय लेने वाला पापात्मा इसी से विनष्ट हो जाए।
कृष्ण ने अश्वत्थामा को शाप दिया — 'तू हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकेगा। तेरे मस्तक का मणि निकाल लिया जाएगा, और उसके स्थान पर सदा घाव रहेगा। कोई तुझे आश्रय नहीं देगा।' यह अधर्म की अनन्त सजा थी।
१७.३ कर्म और फल — महाभारत का केन्द्रीय सन्देश
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। अवश्यं अनुभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥
अर्थ: करोड़ों कल्पों में भी बिना भोगे कर्म नष्ट नहीं होता। किए हुए शुभ-अशुभ कर्म को अवश्य भोगना पड़ता है।
महाभारत का सबसे बड़ा सन्देश यही है — 'जो बोते हो, वही काटते हो।' दुर्योधन ने अधर्म बोया, अधर्म काटा। कर्ण ने दानवीरता बोई — उसे अन्त में वीर-गति मिली। युधिष्ठिर ने धर्म बोया — उसे स्वर्ग मिला। यही 'कर्म-फल न्याय' महाभारत का हृदय है।
१८. मोक्षधर्म — जीवन का परम लक्ष्य और संन्यास
१८.१ महाप्रस्थान — युधिष्ठिर की अन्तिम यात्रा
युधिष्ठिर ने अन्त में अपना राज्य अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को सौंप दिया और पाँच भाइयों सहित द्रौपदी के साथ 'महाप्रस्थान' (हिमालय की ओर यात्रा) पर निकले। यह यात्रा मोक्ष-मार्ग की यात्रा थी।
धर्मो रक्षति रक्षितः। प्रकृत्या सर्वभूतानां धर्मो नित्यं व्यवस्थितः। तेनैव च विनाशः स्याद् धर्मे हीने तु देहिनाम्॥
अर्थ: धर्म रक्षित होने पर रक्षा करता है। सभी प्राणियों की प्रकृति में धर्म नित्य स्थित है। धर्म की कमी से ही प्राणियों का विनाश होता है।
महाप्रस्थान की यात्रा में एक-एक करके सब गिरते गए। द्रौपदी, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव — सब समय आने पर गिर गए। अन्त में युधिष्ठिर और एक कुत्ता (जो धर्मराज का प्रतीक था) बचे। इन्द्र ने देवरथ भेजा और युधिष्ठिर को ले जाने लगे। किन्तु युधिष्ठिर ने कहा — 'यह कुत्ता भी आएगा।'
१८.२ युधिष्ठिर और स्वर्ग का प्रसंग
इन्द्र ने कहा — 'कुत्ते को स्वर्ग में जगह नहीं।' युधिष्ठिर ने कहा — 'तब मैं भी नहीं जाऊँगा। यह कुत्ता मेरे साथ सदा रहा, इसे छोड़ना धर्म के विरुद्ध है।' यही सुनकर कुत्ता परिवर्तित हो गया — वह स्वयं धर्मराज (यम) थे। यह युधिष्ठिर की अन्तिम परीक्षा थी।
एतस्मिन् कथयते धर्मे सर्वेषां पितरो गतिः। मित्रं च मित्रभावेन यो भजेत् स नरः शुचिः॥
अर्थ: इस धर्म में सभी पितरों की गति है। जो मित्र-भाव से मित्र का भजन करे, वह मनुष्य पवित्र है।
यह प्रसंग महाभारत का अन्तिम धर्म-शिक्षण है — 'जो कठिन परिस्थिति में भी अपने साथी, मित्र और भक्त को नहीं छोड़ता — वही सच्चा धर्मी है।' युधिष्ठिर ने स्वर्ग का प्रलोभन छोड़कर एक कुत्ते की रक्षा का धर्म चुना — यही महाभारत का परम सन्देश है।
१८.३ संन्यास-धर्म और मोक्ष
महाभारत का शान्तिपर्व और अनुशासनपर्व मोक्षधर्म का विस्तृत विवेचन करते हैं। मोक्ष — संसार के बन्धन से मुक्ति — ही मनुष्य-जीवन का परम लक्ष्य है। इसके लिए चार आश्रमों की व्यवस्था है: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत। इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराजमाहरत्॥
अर्थ: ब्रह्मचर्य और तप से देवताओं ने मृत्यु को जीता। इन्द्र ने ब्रह्मचर्य से ही देवताओं के लिए स्वर्ग-राज्य प्राप्त किया।
महाभारत में मोक्ष का मार्ग ज्ञान, भक्ति और कर्म — तीनों से जाता है। किन्तु तीनों का साझा सूत्र है — अहंकार का त्याग। जब तक 'मैं हूँ' का भाव है, तब तक मोक्ष नहीं। जब 'मैं नहीं, केवल ब्रह्म है' — यह अनुभव होता है, तब मोक्ष है।
१९. महाभारत में समाज-धर्म, वर्ण-व्यवस्था और जाति-प्रश्न
१९.१ वर्ण-धर्म का मूल स्वरूप
महाभारत में वर्ण-व्यवस्था का मूल आधार जन्म नहीं, गुण और कर्म है। यह बात महाभारत के अनेक प्रसंगों में स्पष्ट होती है। भीष्म ने शान्तिपर्व में कहा — 'जो ब्राह्मण के गुण रखे, वह ब्राह्मण है; जो क्षत्रिय के गुण रखे, वह क्षत्रिय है।'
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥
अर्थ: मैंने गुण और कर्म के विभाग से चारों वर्णों की सृष्टि की है। उसका कर्ता होते हुए भी मुझे अकर्ता और अव्यय जानो। (गीता ४.१३)
यह श्लोक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कृष्ण कहते हैं — 'वर्ण-विभाजन गुण और कर्म के आधार पर है।' यदि किसी शूद्र-कुल में जन्मा व्यक्ति ब्राह्मण के गुण और कर्म अपनाए, तो वह ब्राह्मण है। यही महाभारत का समाज-दर्शन है।
१९.२ विदुर — दासीपुत्र किन्तु परम धर्मज्ञ
विदुर का उदाहरण महाभारत में वर्ण के जन्म-आधार को खण्डित करता है। विदुर एक दासी के पुत्र थे — इसलिए वे राजा नहीं बन सके। किन्तु धर्म-ज्ञान में वे सबसे श्रेष्ठ थे। व्यास ने उन्हें 'धर्मराज का अंश' बताया।
विदुरो धर्मराजोऽसौ नीतिमांश्च महामतिः। सत्यवादी च शुचिश्च धर्मज्ञश्च कृती स्मृतः॥
अर्थ: विदुर धर्मराज हैं, नीतिमान हैं, महाबुद्धि हैं। वे सत्यवादी, पवित्र, धर्मज्ञ और कृती स्मृत हैं।
१९.३ कर्ण — जाति-भेद का शिकार
कर्ण सूर्य-पुत्र था — देवपुत्र, किन्तु 'सूत-पुत्र' कहलाया। उसे बार-बार जाति के नाम पर अपमानित किया गया। महाभारत यहाँ जाति-व्यवस्था की क्रूरता को उजागर करता है। कर्ण जीवन भर इस अन्याय से लड़ता रहा।
कर्ण का उदाहरण बताता है कि जब जन्म-आधारित जाति-व्यवस्था किसी श्रेष्ठ व्यक्ति को उसके योग्य स्थान से वंचित करती है, तो वह अधर्म है। महाभारत इस अधर्म को रेखांकित करता है।
२०. धर्म के दार्शनिक आयाम — एक व्यापक विश्लेषण
२०.१ धर्म का सापेक्षिक और निरपेक्ष स्वरूप
महाभारत में धर्म दो स्तरों पर काम करता है — सापेक्षिक और निरपेक्ष। सापेक्षिक धर्म देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बदलता है। निरपेक्ष धर्म — सत्य, अहिंसा, करुणा — कभी नहीं बदलता।
देशधर्मान् जातिधर्मान् कुलधर्मांश्च शाश्वतान्। समयाचारधर्मांश्च पापोऽयं हन्तुमिच्छति॥
अर्थ: देश-धर्म, जाति-धर्म, कुल के शाश्वत धर्म और समयाचार धर्म — यह पाप इन सबको नष्ट करना चाहता है। (महाभारत)
महाभारत का दर्शन यह है — सापेक्षिक धर्मों में जब टकराव हो, तब निरपेक्ष धर्म को प्राथमिकता दो। यदि राज्य-धर्म और सत्य-धर्म में टकराव हो, तो सत्य को चुनो। यदि कुल-धर्म और न्याय-धर्म में टकराव हो, तो न्याय को चुनो।
२०.२ धर्म और नैतिकता — अन्तर और सम्बन्ध
महाभारत में धर्म केवल 'नैतिकता' नहीं है — वह उससे बड़ा है। नैतिकता समाज-निर्मित नियम है जो बदलती रहती है। धर्म ब्रह्मांड-निर्मित नियम है जो शाश्वत है। कृष्ण जब अर्जुन को युद्ध के लिए कहते हैं, तो वे यही बताते हैं — 'तुम्हारी नैतिकता (युद्ध न करना) गलत नहीं है, किन्तु धर्म (क्षत्रिय-कर्तव्य) उससे बड़ा है।'
धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्। धर्मं धर्मेण संयुज्य सर्वान् धर्मान् विधाय च॥
अर्थ: धर्म इस विश्व की प्रतिष्ठा है, सब कुछ धर्म में ही प्रतिष्ठित है। धर्म से धर्म को जोड़कर सभी धर्मों का विधान करके...
२०.३ पञ्चमहायज्ञ और व्यक्ति-धर्म
महाभारत में व्यक्ति के लिए पाँच महायज्ञों का विधान है: देवयज्ञ (देवताओं की पूजा), पितृयज्ञ (पितरों का तर्पण), ऋषियज्ञ (वेद-पाठ), मनुष्ययज्ञ (अतिथि-सेवा) और भूतयज्ञ (अन्य प्राणियों को आहार देना)। ये पाँच यज्ञ व्यक्ति के धर्म की आधारशिला हैं।
देवपितृमनुष्याणां भूतानाञ्च महर्षिभिः। पञ्च यज्ञाः समाम्नाताः प्रतिदिनमनुष्ठिताः॥
अर्थ: देवता, पितर, मनुष्य, भूत और महर्षि — इन पाँचों के लिए महर्षियों ने पाँच यज्ञ बताए हैं जो प्रतिदिन करने चाहिए।
२०.४ महाभारत और आधुनिक जीवन
महाभारत का धर्म-दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तीन हजार वर्ष पहले था। आज भी राजनीति में दुर्योधन जैसे लोग हैं जो जानते हुए भी अधर्म करते हैं। आज भी भीष्म जैसे लोग हैं जो अन्याय देखते हुए भी मौन रहते हैं। आज भी कर्ण जैसे लोग हैं जो समाज के अन्यायपूर्ण व्यवहार के शिकार होते हैं।
महाभारत का सन्देश स्पष्ट है: अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली लगे, अन्ततः नष्ट होता है। धर्म चाहे कितना भी कमजोर दिखे, अन्ततः विजयी होता है। 'धर्मो रक्षति रक्षितः' — यह महाभारत का अटल सत्य है।
यतो धर्मस्ततो जयः। यतो कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः॥
अर्थ: जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है। जहाँ कृष्ण हैं वहाँ धर्म है, और जहाँ धर्म है वहाँ विजय है। (महाभारत का अन्तिम श्लोक, भीष्मपर्व)
२१. महाभारत के प्रमुख धर्म-प्रसंगों का समेकित विवेचन
२१.१ धर्म के दस स्तम्भ — महाभारत के अनुसार
महाभारत में विभिन्न पात्रों के माध्यम से धर्म के दस प्रमुख स्तम्भ उभरकर आते हैं:
प्रथम स्तम्भ — सत्य (Truth): युधिष्ठिर का सत्य-प्रेम उन्हें 'धर्मराज' बनाता है। महाभारत कहता है — एक सत्यवादी व्यक्ति हजार यज्ञ करने वाले से श्रेष्ठ है।
द्वितीय स्तम्भ — अहिंसा (Non-violence): यद्यपि महाभारत युद्ध-काव्य है, फिर भी यह अहिंसा को परम धर्म मानता है। 'आनृशंस्यं परो धर्मः' — किसी को व्यर्थ कष्ट न देना ही परम धर्म है।
तृतीय स्तम्भ — दान (Charity): कर्ण की दानवीरता और महाभारत के अनेक प्रसंग बताते हैं कि दान श्रेष्ठतम धर्म है। 'दानेन तुल्यो धर्मो नास्ति।'
चतुर्थ स्तम्भ — क्षमा (Forgiveness): 'क्षमा वीरस्य भूषणम्' — क्षमा वीर का आभूषण है। युधिष्ठिर की क्षमाशीलता उन्हें महान बनाती है।
पञ्चम स्तम्भ — कर्तव्य-पालन (Duty): 'स्वधर्मे निधनं श्रेयः' — अपने कर्तव्य में मरना श्रेयस्कर है। अर्जुन का युद्ध यही सिखाता है।
षष्ठ स्तम्भ — न्याय (Justice): द्रौपदी का प्रश्न — 'क्या यह न्याय है?' — पूरे महाभारत में गूँजता है।
सप्तम स्तम्भ — करुणा (Compassion): कृष्ण का समग्र जीवन करुणा से भरा है। वे दुर्योधन से भी अन्त में मिलते हैं।
अष्टम स्तम्भ — मैत्री (Friendship): दुर्योधन-कर्ण की मित्रता, कृष्ण-अर्जुन की मित्रता — दोनों मित्र-धर्म के दो रूप हैं।
नवम स्तम्भ — वैराग्य (Detachment): युधिष्ठिर का महाप्रस्थान, कृष्ण का गीतोपदेश — सब वैराग्य का महत्त्व बताते हैं।
दशम स्तम्भ — ईश्वर-भक्ति (Devotion): द्रौपदी की भक्ति ने उसे चीरहरण से बचाया। यह महाभारत का परम सन्देश है।
अहिंसा सत्यवचनं क्षमा च शौचं दयाऽऽर्जवमनाभिमानः। एते धर्मस्य बहवः पदार्थाः सर्वेऽपि धर्मः परमोऽयमेव॥
अर्थ: अहिंसा, सत्यवचन, क्षमा, पवित्रता, दया, सरलता, और अनहंकार — ये धर्म के अनेक पदार्थ हैं, परन्तु यही परम धर्म है।
२२. गीता का व्यापक धर्म-दर्शन
२२.१ गीता की अठारह अध्यायों में धर्म
भगवद्गीता के अठारह अध्याय अठारह प्रकार के धर्म-दर्शन का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रथम अध्याय 'अर्जुन-विषाद' — यह मनुष्य के धर्म-संकट का चित्रण है। द्वितीय अध्याय 'सांख्य-योग' — यह आत्म-तत्त्व का ज्ञान है। तृतीय अध्याय 'कर्मयोग' — यह कर्तव्य-धर्म का विवेचन है।
चतुर्थ अध्याय 'ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग' — यह ज्ञान और कर्म के समन्वय का धर्म है। पञ्चम 'कर्म-संन्यास-योग' — सन्यास और कर्म का समन्वय। षष्ठ 'ध्यान-योग' — ध्यान और एकाग्रता का धर्म। सप्तम 'ज्ञान-विज्ञान-योग' — ईश्वर-ज्ञान का धर्म।
अष्टम 'अक्षरब्रह्म-योग' — परब्रह्म का ज्ञान। नवम 'राजविद्या-राजगुह्य-योग' — सर्वोच्च विद्या और रहस्य। दशम 'विभूति-योग' — ईश्वर की विभूतियों का ज्ञान। एकादश 'विश्वरूप-दर्शन-योग' — ईश्वर के विराट स्वरूप का दर्शन।
द्वादश 'भक्ति-योग' — भक्ति का धर्म, जो सबसे सरल मार्ग है। त्रयोदश 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग' — शरीर और आत्मा का ज्ञान। चतुर्दश 'गुणत्रय-विभाग-योग' — तीन गुणों का ज्ञान। पञ्चदश 'पुरुषोत्तम-योग' — परमात्मा का ज्ञान।
षोडश 'दैवासुर-सम्पद्-विभाग-योग' — दैवी और आसुरी सम्पत्ति का विवेचन। सप्तदश 'श्रद्धात्रय-विभाग-योग' — श्रद्धा के तीन भेद। और अष्टादश 'मोक्ष-संन्यास-योग' — मोक्ष और संन्यास का परम धर्म।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥
अर्थ: फिर से सुनो मेरा सर्वगुह्यतम परम वचन। तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए तुम्हारे हित की बात कहता हूँ। (गीता १८.६४)
२२.२ त्रिगुण और धर्म-अधर्म
गीता में कहा गया है कि सृष्टि तीन गुणों — सत्त्व, रज, और तम — से बनी है। सत्त्वगुण धर्म का मार्ग है; रजोगुण कर्म और इच्छाओं का मार्ग है; तमोगुण अज्ञान और अधर्म का मार्ग है।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥
अर्थ: हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम — ये प्रकृति से उत्पन्न गुण देहधारी जीव को शरीर में बाँधते हैं। (गीता १४.५)
दुर्योधन तमोगुण-प्रधान था — क्रोध, ईर्ष्या और अहंकार से भरा। कर्ण रजोगुण-प्रधान था — कर्मठ, महत्त्वाकांक्षी, किन्तु कभी-कभी धर्म-सम्मत। युधिष्ठिर सत्त्वगुण-प्रधान था — शान्त, सत्यनिष्ठ और क्षमाशील।
२२.३ श्रद्धा और धर्म
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
अर्थ: श्रद्धावान, तत्पर और जितेन्द्रिय व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है; और ज्ञान पाकर शीघ्र ही परम शान्ति को पाता है। (गीता ४.३९)
महाभारत में श्रद्धा को धर्म का प्राण कहा गया है। बिना श्रद्धा के धर्म केवल एक कर्म-काण्ड बन जाता है। द्रौपदी की कृष्ण में श्रद्धा, अर्जुन की कृष्ण में श्रद्धा, युधिष्ठिर की धर्म में श्रद्धा — यही श्रद्धा महाभारत का प्रेरक तत्त्व है।
२३. महाभारत के अन्य महत्त्वपूर्ण धर्म-प्रसंग
२३.१ शिशुपाल-वध — धर्म का न्याय
शिशुपाल — चेदिराज — ने कृष्ण की बार-बार निन्दा की थी। एक बार युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में जब शिशुपाल ने सभा के समक्ष कृष्ण की अपमानजनक निन्दा की, तब कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र छोड़ा। शिशुपाल का वध हो गया।
एकशतं शिशुपाल अपराधानाम् पराक्रमन्। सहामि चेति प्रतिज्ञातं तस्मान्नाहं हनिष्यामि॥
अर्थ: मैंने प्रतिज्ञा की थी कि शिशुपाल के सौ अपराध सह लूँगा, इसलिए अब तक नहीं मारा। (कृष्ण का कथन — महाभारत, सभापर्व)
यह प्रसंग बताता है कि धर्म धैर्यशील है। कृष्ण ने शिशुपाल को बार-बार क्षमा किया। किन्तु जब क्षमा का दुरुपयोग होने लगा, तब दण्ड दिया गया। यह 'दण्ड-नीति' भी धर्म का ही एक अंग है।
२३.२ भगीरथ की तपस्या और धर्म
महाभारत में भगीरथ की कथा है जिन्होंने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने की तपस्या की। यह 'पितृ-धर्म' का सर्वोच्च उदाहरण है। भगीरथ ने केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए तप किया — यही धर्म है।
पितृणां च गतिं दत्त्वा भगीरथोऽभवन्महान्। एष सत्यस्य धर्मस्य पराक्रमस्य च सारः॥
अर्थ: पितरों को सद्गति देकर भगीरथ महान हुए। यही सत्य, धर्म और पराक्रम का सार है।
२३.३ एकलव्य — गुरु-दक्षिणा और धर्म-संकट
एकलव्य का प्रसंग महाभारत के सर्वाधिक हृदयस्पर्शी प्रसंगों में से एक है। उसने द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर मानसिक रूप से उन्हें गुरु स्वीकार किया और धनुर्विद्या सीखी। जब द्रोण ने गुरु-दक्षिणा में उसका अँगूठा माँगा — एकलव्य ने निःसंकोच दे दिया।
एकलव्येन दत्तं तद् गुरुदक्षिणया अङ्गुष्ठम्। शिष्यस्य धर्ममाचार्यः नानृशंसं च वेद यः॥
अर्थ: एकलव्य ने गुरु-दक्षिणा में अँगूठा दिया। जो आचार्य शिष्य-धर्म जानता हो, वह इस अनृशंसता को नहीं करेगा।
यह प्रसंग 'गुरु-शिष्य धर्म' का चरम उदाहरण है। एकलव्य का समर्पण अद्भुत था। किन्तु द्रोण का माँगना विवादास्पद — कई विद्वान इसे धर्म-उल्लंघन मानते हैं। महाभारत यहाँ प्रश्न छोड़ता है — क्या गुरु-भक्ति की कोई सीमा है?
२३.४ नल-दमयन्ती — धर्म-प्रेम की कथा
महाभारत के अरण्यपर्व में नल-दमयन्ती की कथा है। यह कथा 'पतिव्रत-धर्म' और 'पत्नी-धर्म' का सुन्दर चित्रण है। नल ने जुए में अपना सर्वस्व खोया, दमयन्ती को त्यागा — फिर भी दमयन्ती ने उनका साथ नहीं छोड़ा। अन्ततः धर्म की विजय हुई और नल को अपना राज्य वापस मिला।
धर्मो रक्षति रक्षितः। यत्र सत्यं तत्र धर्मः। यत्र धर्मस्तत्र कृष्णः। यत्र कृष्णस्ततो जयः॥
अर्थ: धर्म रक्षित होने पर रक्षा करता है। जहाँ सत्य है वहाँ धर्म है। जहाँ धर्म है वहाँ कृष्ण हैं। जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है।
२४. महाभारत का आधुनिक सन्दर्भ — आज का धर्म-संकट
२४.१ आधुनिक समाज में धर्म-अधर्म
आज के समाज में भी महाभारत के प्रश्न उतने ही जीवन्त हैं। राजनेता दुर्योधन की भूमिका में हैं — जानते हुए भी अधर्म करते हैं। न्यायपालिका भीष्म की भूमिका में है — देखती है किन्तु कभी-कभी मौन रहती है। जनता युधिष्ठिर की भूमिका में है — धर्म जानती है, किन्तु परिस्थितियों के वशीभूत हो जाती है।
कर्ण जैसे लोग आज भी हैं — प्रतिभाशाली, किन्तु जन्म के कारण वंचित। द्रौपदी जैसी स्त्रियाँ आज भी हैं — अपमानित, किन्तु लड़ने का साहस रखने वाली। और विदुर जैसे लोग आज भी हैं — सत्य बोलने वाले, किन्तु अनसुने।
इदं महाभारतमुत्तमं मखः सर्वेषु लोकेषु सदा च पूज्यते। यो धर्मराज्ये विचरन् पठेत् संसारस्थितिं वेद स पण्डितः॥
अर्थ: यह उत्तम महाभारत महायज्ञ है जो सभी लोकों में सदा पूजित है। जो इसे पढ़कर धर्म-राज्य में विचरण करता है, वह संसार की स्थिति को जानने वाला ज्ञानी है।
२४.२ गीता का आधुनिक प्रासंगिकता
गीता का सन्देश — 'कर्म करो, फल की चिन्ता मत करो' — आज के तनावग्रस्त जीवन में सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक उपचार है। 'अनासक्ति' का सिद्धान्त आज के 'burnout' और 'depression' की समस्या का समाधान है। 'स्वधर्म में निधन श्रेयस्कर है' — यह आज के career counselling का सर्वश्रेष्ठ सूत्र है।
महात्मा गाँधी ने गीता को अपना 'माँ' कहा था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 'गीता-रहस्य' लिखा। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गीता पर टीका लिखी। इन महान आत्माओं ने महाभारत और गीता से जीवन-मार्ग लिया — यही इस ग्रन्थ की आधुनिक प्रासंगिकता का प्रमाण है।
२४.३ विश्व-शान्ति और महाभारत का सन्देश
महाभारत का अन्तिम सन्देश विश्व-शान्ति का है। युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं — यह स्वयं एक नई समस्या है। कुरुक्षेत्र युद्ध में सभी पक्षों को हानि हुई। विजेता पाण्डव भी शोकाकुल रहे। महाभारत कहता है — युद्ध अन्तिम उपाय है, प्रथम उपाय नहीं।
ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
अर्थ: हे जनार्दन! यदि आप बुद्धि को कर्म से श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर मुझे इस घोर कर्म (युद्ध) में क्यों लगा रहे हैं? (गीता ३.१ — अर्जुन का प्रश्न)
यह प्रश्न आज के सन्दर्भ में और भी महत्त्वपूर्ण है। परमाणु-युग में युद्ध का अर्थ है — सम्पूर्ण विनाश। महाभारत का सन्देश है — वार्ता से, सत्य से, न्याय से, और विनम्रता से समस्याओं का समाधान करो। युद्ध केवल तब करो जब अन्य सभी उपाय विफल हो जाएँ।
२५. उपसंहार — महाभारत का शाश्वत सन्देश
महाभारत का यह विशाल आख्यान समाप्त होते-होते एक महान सत्य की ओर संकेत करता है — 'धर्म शाश्वत है। मनुष्य आते-जाते हैं, युग बदलते हैं, किन्तु धर्म का नियम नहीं बदलता। जो धर्म का पालन करता है, वह अमर हो जाता है।'
महाभारत ने हमें दुर्योधन का उदाहरण देकर दिखाया — अहंकार, लोभ और ईर्ष्या का अन्त क्या होता है। भीष्म का उदाहरण देकर दिखाया — प्रतिज्ञा-पालन की अति भी अधर्म बन जाती है। कर्ण का उदाहरण देकर दिखाया — समाज का अन्याय व्यक्ति को गलत मार्ग पर ले जाता है। और युधिष्ठिर का उदाहरण देकर दिखाया — धर्म का मार्ग कठिन है, किन्तु अन्ततः वही श्रेयस्कर है।
न जातु कामान्न भयान्न लोभात् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः। नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः॥
अर्थ: कभी भी काम, भय या लोभ के कारण जीवन के लिए भी धर्म का त्याग मत करो। धर्म नित्य है, सुख-दुख अनित्य हैं; जीव नित्य है, उसका कारण (शरीर) अनित्य है। (महाभारत, उद्योगपर्व)
यह श्लोक महाभारत का हृदय है। 'धर्म नित्य है' — यह सन्देश तीन हजार वर्षों से भारत की आत्मा को जीवित रखे हुए है। जब-जब भारत ने संकट देखा, जब-जब अन्याय का सामना किया — इस देश ने महाभारत की ओर देखा और शक्ति पाई।
महाभारत केवल एक ग्रन्थ नहीं है — यह एक जीवन-दर्शन है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में सदा धर्म-अधर्म के बीच संघर्ष होता रहेगा। इस संघर्ष में हार-जीत नहीं — केवल मार्ग का चुनाव महत्त्वपूर्ण है। धर्म का मार्ग चुनने वाला — चाहे जीते या हारे — विजेता ही है।
नमो नमस्ते व्यासाय विष्णुरूपाय वेधसे। व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे॥
अर्थ: व्यास को नमस्कार है जो विष्णु के रूप हैं, विधाता हैं। व्यास के रूप में विष्णु को, और विष्णु के रूप में व्यास को नमस्कार है।
।। इति महाभारतस्य धर्माख्यानं सम्पूर्णम् ।।
यतो धर्मस्ततो जयः
— जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है —
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