कॉंग्रेस कथा कही न जाए II
लोकतंत्र में सत्ता की एक भूमिका होती है। विपक्ष की भी एक भूमिका होती है। सत्ता शासन करती है। विपक्ष जनता की ओर से सवाल करता है। जब सत्ता गलत करे तो विपक्ष उसे रोकता है। जब जनता दुखी हो तो विपक्ष उसकी आवाज़ बनता है।
भारत में यह भूमिका सबसे लंबे समय तक कांग्रेस को मिली है। आज भी वह सबसे बड़ा राष्ट्रीय विपक्षी दल है। फिर भी एक प्रश्न बार बार उठता है। क्या कांग्रेस आज जनता की आवाज़ है? इस लेख का उत्तर है नहीं।
वर्तमान कांग्रेस भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श से कट चुकी है। वह जनता से बोलती नहीं है। वह जनता के ऊपर से बोलती है। वह जनता की भाषा नहीं समझती। वह जनता की चिंता नहीं पकड़ पाती। यह दूरी एक दिन में नहीं बनी। यह वर्षों की आदतों से बनी है।
विपक्ष का लोकतांत्रिक धर्म
विपक्ष का काम केवल विरोध करना नहीं है। यह सबसे बड़ी भूल है जो कोई विपक्षी दल कर सकता है। विरोध एक साधन है। लक्ष्य है जनता का भरोसा।
एक अच्छा विपक्ष तीन काम करता है।
पहला काम है मुद्दे पहचानना। वह देखता है कि गाँव का किसान क्या झेल रहा है। वह देखता है कि शहर का युवा क्या खोज रहा है।
दूसरा काम है उन मुद्दों को जनता की भाषा में रखना। भाषा वही असर करती है जो सुनने वाले के घर की हो।
तीसरा काम है विकल्प देना। केवल यह कहना कि सरकार बुरी है काफ़ी नहीं होता। जनता पूछती है कि आप क्या करेंगे। आप कैसे करेंगे। आप पर भरोसा क्यों करें।
इन तीनों कसौटियों पर कांग्रेस कमज़ोर दिखती है। आगे के खंडों में इसके कारण देखे जाएँगे।
दरबारी संस्कृति
आज़ादी के बाद यह पार्टी सत्ता की पार्टी बन गई। दशकों तक सत्ता में रहने से एक आदत बनी। नेता जनता के पास जाने के बजाय जनता को अपने पास बुलाने लगे। टिकट पाने के लिए कार्यकर्ता को दिल्ली की परिक्रमा करनी पड़ती थी। जनता का दुख सुनने वाला नेता पीछे रह जाता था। हाईकमान को खुश करने वाला नेता आगे बढ़ जाता था।
1975 का आपातकाल इस दूरी का बड़ा उदाहरण है। 1977 में जनता ने इसका उत्तर दिया। कांग्रेस केंद्र में पहली बार हारी। फिर भी पार्टी लौटी और सत्ता में रही। इस वापसी ने उसे सबक सिखाने के बजाय यह भ्रम दिया कि सत्ता उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।
यह भ्रम आज भी दिखता है। कांग्रेस के कई नेता अब भी बोलते हैं जैसे जनता को लौटकर उन्हीं के पास आना है। जो पार्टी यह मानती है कि सत्ता उसकी विरासत है वह विपक्ष की विनम्रता नहीं सीख पाती।
पराजयों की शृंखला
2014 में लोकसभा चुनाव हुए। कांग्रेस को केवल 44 सीटें मिलीं। यह उसका अब तक का सबसे कमज़ोर प्रदर्शन था। 2019 में उसे 52 सीटें मिलीं। इन दोनों चुनावों में उसके पास इतनी सीटें भी नहीं थीं कि वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद पा सके। इसके लिए लगभग दस प्रतिशत सीटें चाहिए होती हैं।
2019 में राहुल गांधी अपनी पारंपरिक सीट अमेठी से हार गए। यह केवल एक सीट की हार नहीं थी। अमेठी को गांधी परिवार का गढ़ माना जाता था। वहाँ से हारना प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ा झटका था। उसके बाद उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ दिया।
राज्यों में तस्वीर और भी कठिन रही। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस हाशिए पर पहुँच गई। बिहार में वह क्षेत्रीय दलों की सहायक बनकर रह गई। दिल्ली में 2015 2020 और 2025 के विधानसभा चुनावों में उसका खाता नहीं खुला। यह उस राजधानी में हुआ जहाँ उसने कभी लगातार पंद्रह वर्ष शासन किया था।
पंजाब में 2022 में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतीं। कांग्रेस की सत्ता चली गई। महाराष्ट्र में 2024 के विधानसभा चुनाव में उसे 288 में से केवल 16 सीटें मिलीं। हरियाणा में 2024 में उसे जीत की उम्मीद थी। वह नहीं मिली।
इन परिणामों को केवल चुनावी हार मानना भूल होगी। ये संकेत हैं। जनता बार बार कह रही है कि वह कांग्रेस को अपनी आवाज़ नहीं मानती।
परिवार की छाया
कांग्रेस की सबसे बड़ी बीमारी वंशवाद मानी जाती है। 1998 से 2017 तक सोनिया गांधी अध्यक्ष रहीं। फिर 2017 में राहुल गांधी अध्यक्ष बने। 2019 में उनके त्यागपत्र के बाद सोनिया गांधी फिर अंतरिम अध्यक्ष बन गईं। यह स्थिति 2022 तक रही।
2022 में मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने चुनाव में शशि थरूर को हराया। इसे पार्टी ने आंतरिक लोकतंत्र का प्रमाण बताया। परंतु आम धारणा यही रही कि असली निर्णय अब भी गांधी परिवार के हाथ में है। कई नेता सार्वजनिक रूप से यह बात मानते भी रहे हैं।
वंशवाद केवल एक परिवार का प्रश्न नहीं है। वह एक संस्कृति है। उस संस्कृति में योग्यता से बड़ी चीज़ निकटता होती है। जो नेता परिवार के करीब है वह आगे बढ़ता है। जो ज़मीन पर काम करता है वह प्रतीक्षा करता है।
इसका सीधा असर जनता से रिश्ते पर पड़ता है। एक साधारण युवा देखता है कि इस पार्टी में शीर्ष तक पहुँचना उसके लिए लगभग असंभव है। वह देखता है कि पार्टी का चेहरा वही रहता है। इसलिए वह इसे अपनी पार्टी नहीं मानता।
लोकतंत्र में जो दल दूसरों से पारदर्शिता मांगता है उसे अपने भीतर भी पारदर्शिता दिखानी चाहिए। कांग्रेस ने यह नहीं दिखाई। इसीलिए उसकी आलोचना का नैतिक वज़न कम हो जाता है।
संगठन का खोखलापन
किसी भी दल की असली ताकत उसका संगठन होता है। बूथ स्तर का कार्यकर्ता चुनाव जीताता है। वह घर घर जाता है। वह मतदाता का नाम जानता है। वह उसके सुख दुख में खड़ा होता है।
कांग्रेस का यह ढाँचा कई राज्यों में बिखर चुका है। बूथ समितियाँ कागज़ पर हैं। ज़िला अध्यक्ष महीनों खाली रहते हैं। कार्यकर्ता का मनोबल गिरा है। उसे नहीं पता कि उसके श्रम का फल कौन खाएगा।
इसके विपरीत प्रतिद्वंद्वी दल ने संगठन को अपनी सबसे बड़ी पूंजी बनाया। भाजपा के पास हर स्तर पर प्रशिक्षित कार्यकर्ता हैं। उसकी वैचारिक पृष्ठभूमि उसे निरंतरता देती है। कांग्रेस के पास ऐसा कोई साझा वैचारिक प्रशिक्षण नहीं बचा।
कार्यसमिति जैसी शीर्ष इकाइयों में लंबे समय तक नामांकन की परंपरा रही। चुनाव कम हुए। इसका अर्थ है कि ऊपर के लोग नीचे से नहीं उठे। वे ऊपर से बैठाए गए। जो नेता जनता के वोट से नहीं उठता वह जनता के प्रति उत्तरदायी भी कम महसूस करता है।
भाषा और भाव का फ़ासला
राजनीति भाषा का खेल है। जनता उसी को सुनती है जो उसकी तरह बोलता है।
कांग्रेस के कई नेताओं की भाषा अंग्रेज़ी के साँचे में ढली लगती है। उनके तर्क अकादमिक होते हैं। उनके उदाहरण विदेशी विश्वविद्यालयों से आते हैं। वे संस्थाओं की स्वतंत्रता की बात करते हैं। वे संवैधानिक मूल्यों की बात करते हैं। ये बातें महत्वपूर्ण हैं। परंतु गाँव का मतदाता पूछता है कि इससे उसकी रोटी और रोज़गार पर क्या असर पड़ेगा।
यही वह अभिजात्य दुराग्रह है जिसकी यह लेख चर्चा करता है। यह अहंकार का एक रूप है। इसमें नेता मानता है कि जनता को समझाना उसका काम है। यह नहीं मानता कि जनता से सीखना उसका काम है।
2013 की एक घटना इसका उदाहरण है। उस समय कांग्रेस की सरकार थी। दोषी सांसदों से जुड़े एक अध्यादेश पर बहस थी। राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से उसे बकवास कहा। उन्होंने उसे फाड़कर फेंकने की बात कही। उस समय प्रधानमंत्री विदेश में थे। अपनी ही सरकार के निर्णय का ऐसा सार्वजनिक अपमान पार्टी की आंतरिक संस्कृति को उजागर करता है। वहाँ चयनित प्रधानमंत्री से ऊपर एक अनिर्वाचित नेतृत्व माना जाता था।
2014 के चुनाव प्रचार में कुछ नेताओं की टिप्पणियाँ भी जनता को चुभीं। एक नेता ने नरेंद्र मोदी के चाय बेचने के अतीत का उपहास किया। यह टिप्पणी भाजपा के लिए एक प्रचार सामग्री बन गई। इसने इस धारणा को मज़बूत किया कि कांग्रेस के कुछ नेता साधारण पृष्ठभूमि वालों को तुच्छ समझते हैं।
2024 में भी ऐसे प्रसंग आए। पार्टी के एक वरिष्ठ सलाहकार ने विरासत कर पर बयान दिया। कुछ दिन बाद उन्होंने भारत के लोगों के रूप रंग पर एक टिप्पणी की। दोनों बयानों से पार्टी को सफ़ाई देनी पड़ी। इस तरह की घटनाएँ बताती हैं कि संदेश पर अनुशासन नहीं है। साथ ही यह भी कि नेतृत्व के आसपास के लोग जनता की संवेदना नहीं पढ़ पाते।
मुद्दों का चयन और अधूरी लड़ाइयाँ
एक सफल विपक्ष कुछ मुद्दे चुनता है। वह उन पर टिकता है। वह उन्हें जनता के जीवन से जोड़ता है।
कांग्रेस की समस्या यह रही कि वह मुद्दे बदलती रही। 2019 में उसने राफेल सौदे को केंद्र में रखा। राहुल गांधी ने चौकीदार चोर है का नारा चलाया। जनता ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय के नाम पर की गई एक टिप्पणी पर उन्हें अदालत में खेद व्यक्त करना पड़ा। नारा हार गया और पार्टी की विश्वसनीयता भी घटी।
फिर पार्टी ने संविधान बचाओ की बात उठाई। फिर जातिगत जनगणना की मांग उठी। फिर चुनाव आयोग पर सवाल उठाए गए। 2025 में मतदाता सूची को लेकर अभियान चला। इनमें से हर मुद्दे का अपना महत्व हो सकता है। परंतु इन्हें एक सतत कहानी में पिरोया नहीं गया।
जनता को एक सरल कहानी चाहिए। मेरी महंगाई। मेरी नौकरी। मेरी सुरक्षा। मेरा सम्मान। जो विपक्ष इन चार बातों को स्थायी रूप से नहीं पकड़ता वह मौसमी आवाज़ बनकर रह जाता है।
एक और कमज़ोरी यह है कि कांग्रेस अक्सर संसद में बहिष्कार और हंगामे में अधिक दिखती है। गंभीर बहस में कम दिखती है। जब विपक्ष सदन चलने नहीं देता तब जनता के प्रश्न सदन तक पहुँचते ही नहीं। यह बात विपक्ष के अपने ही उद्देश्य को हरा देती है।
पलायन का सिलसिला
किसी भी दल की सेहत इस बात से भी आँकी जाती है कि उसके लोग उसमें रहना चाहते हैं या नहीं।
2015 में हिमंत बिस्वा सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए। वे आज असम के मुख्यमंत्री हैं। 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पार्टी छोड़ी। इससे मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार गिर गई। 2022 में गुलाम नबी आज़ाद और कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेता अलग हुए। 2024 में मिलिंद देवड़ा और अशोक चव्हाण जैसे नेता भी चले गए।
2020 में 23 वरिष्ठ नेताओं ने नेतृत्व और संगठन में सुधार के लिए पत्र लिखा था। इसे असंतोष माना गया। कई नेताओं को बाद में किनारे कर दिया गया। पंजाब में 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाया गया। उसके बाद वे पार्टी से बाहर हो गए। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट का टकराव सार्वजनिक रहा।
इन सब घटनाओं का सार यह है कि पार्टी अपने भीतर के असंतोष को सुन नहीं पाती। जो पार्टी अपने नेताओं की बात नहीं सुनती वह जनता की बात कैसे सुनेगी। यह प्रश्न स्वाभाविक है।
गठबंधन की बैसाखी
2023 में विपक्षी दलों ने मिलकर इंडिया गठबंधन बनाया। यह एक राजनीतिक आवश्यकता थी। परंतु इससे कांग्रेस की अपनी कमज़ोरी भी स्पष्ट हुई। वह अकेले भाजपा का सामना करने की स्थिति में नहीं थी।
अनेक राज्यों में कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों पर निर्भर है। उत्तर प्रदेश में वह समाजवादी पार्टी के साथ लड़ी। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के साथ। तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ। इन राज्यों में कांग्रेस की अपनी पहचान दब गई है।
गठबंधन के भीतर भी तनाव रहा। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से तालमेल नहीं बैठा। दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी से टकराव रहा। सीटों के बँटवारे पर खींचतान बनी रही। जो दल गठबंधन की धुरी बनना चाहता है उसे पहले अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए।
एक दल जब दूसरों के कंधे पर चुनाव लड़ता है तब उसका जनता से सीधा संबंध और पतला होता है। वह जनता के प्रश्नों के लिए उत्तरदायी कम और साझेदारों के प्रति अधिक उत्तरदायी बन जाता है।
2024 की वापसी का भ्रम
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं। भाजपा को 240 सीटें मिलीं और वह अपने बल पर बहुमत से चूक गई। राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष का पद मिला। कांग्रेस के समर्थकों ने इसे बड़ी वापसी कहा।
इस लेख की दृष्टि में यह वापसी आधी सच्चाई है। कई बातें ध्यान देने योग्य हैं।
पहली बात यह कि 99 सीटें भी 2009 के कांग्रेस से बहुत कम हैं। तब उसे 200 से अधिक सीटें मिली थीं।
दूसरी बात यह कि 2024 का लाभ बहुत हद तक गठबंधन के कारण मिला। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं। इसमें समाजवादी पार्टी के वोट आधार का बड़ा योगदान था।
तीसरी बात यह कि इसके तुरंत बाद के चुनावों में पार्टी फिर लड़खड़ाई। हरियाणा में हार हुई। महाराष्ट्र में बहुत खराब प्रदर्शन रहा। दिल्ली में फिर शून्य रहा। बिहार के 2025 के चुनाव में भी उसकी स्थिति बहुत कमज़ोर रही। यदि 2024 सचमुच जनता से जुड़ाव का प्रमाण होता तो यह गिरावट नहीं आती।
भारत जोड़ो यात्रा का उल्लेख भी आवश्यक है। 2022 और 2023 में राहुल गांधी ने कन्याकुमारी से श्रीनगर तक लगभग चार हज़ार किलोमीटर की पदयात्रा की। फिर 2024 में उन्होंने भारत जोड़ो न्याय यात्रा की। यह प्रयास सराहनीय था। इससे उनकी छवि में कुछ बदलाव आया। परंतु यात्राएँ चुनावी जीत में स्थायी रूप से नहीं बदलीं। जिन राज्यों से यात्रा गुज़री वहाँ भी पार्टी का संगठन उतना मज़बूत नहीं हुआ। यात्रा एक घटना बनी। वह एक आंदोलन नहीं बन सकी।
विपक्ष की भूमिका और कांग्रेस की सीमाएँ
विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार नैतिक विश्वसनीयता है। जनता तभी सुनती है जब उसे लगे कि बोलने वाला निःस्वार्थ है।
कांग्रेस के सामने यहाँ एक कठिनाई है। उसके अपने शासन के इतिहास में भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। 2010 से 2014 के बीच कई घोटालों की चर्चा रही। इनका राजनीतिक असर गहरा हुआ। कांग्रेस आज भी उस छवि से पूरी तरह उबरी नहीं है।
जब वह आज की सरकार पर प्रश्न उठाती है तब जनता उसके अतीत को भी देखती है। उसके पास अपने शासन के किसी बड़े सुधार की कथा भी नहीं है जिसे वह साहस से रख सके। इसलिए उसके तीर अक्सर लक्ष्य तक नहीं पहुँचते।
विपक्ष का काम केवल सरकार को घेरना नहीं है। जनता को यह भरोसा देना भी है कि वह सत्ता सँभालने योग्य है। कांग्रेस इस भरोसे को अब तक पूरी तरह नहीं बना पाई। उसके पास स्पष्ट आर्थिक दृष्टि की कमी दिखती है। उसके पास राष्ट्रवाद पर कोई सुसंगत कथा नहीं दिखती। उसके पास धर्म और संस्कृति के प्रश्न पर भी स्थिर रुख नहीं दिखता।
कभी पार्टी नरम हिंदुत्व की ओर झुकती दिखती है। कभी वह अल्पसंख्यक राजनीति की ओर लौटती है। इस दुविधा ने उसके पुराने समर्थकों को भी भ्रमित किया और नए समर्थकों को भी दूर रखा।
सत्ता में लाना क्यों जोखिम भरा लगता है
यह एक कठोर बात है। परंतु सही है। जो दल विपक्ष की भूमिका में जनता से जुड़ नहीं सका उसे सत्ता सौंपना जनता के लिए एक जोखिम है।
सत्ता में आने के लिए संगठन चाहिए। नेतृत्व की स्पष्टता चाहिए। टीम चाहिए। नीतियों की समझ चाहिए। प्रशासन का अनुभव चाहिए। कांग्रेस के पास इन में से कई चीज़ें अधूरी दिखती हैं।
जो नेतृत्व स्वयं अपनी पार्टी को एकजुट नहीं रख पाता वह देश को एकजुट रखने का दावा कैसे करे। जो दल अपने भीतर के असंतोष को नहीं सँभाल पाता वह विशाल विविधता वाले देश को कैसे सँभालेगा।
यह तर्क उन मतदाताओं का है जो केवल सरकार के विरोध में वोट नहीं देना चाहते। वे विकल्प चाहते हैं। उन्हें अभी तक कांग्रेस में वह विकल्प पूरी तरह दिखाई नहीं देता।
निष्कर्ष
निष्कर्ष स्पष्ट है। कांग्रेस आज भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श से कट चुकी है। उसका संगठन कमज़ोर है। उसका नेतृत्व परिवार की छाया में बँधा है। उसकी भाषा जनता से दूर है। उसके मुद्दे बदलते रहते हैं। उसके नेता पार्टी छोड़ते रहे हैं। वह गठबंधनों की बैसाखी पर टिकी है।
2014 के बाद से जनता ने उसे बार बार संकेत दिए हैं। कुछ राज्यों में उसे जीत मिली है। परंतु राष्ट्रीय स्तर पर वह अब भी जनता की पहली पसंद नहीं है।
विपक्ष लोकतंत्र की साँस है। एक मज़बूत विपक्ष के बिना सत्ता निरंकुश हो सकती है। इसलिए कांग्रेस की कमज़ोरी केवल उसकी समस्या नहीं है। यह पूरे लोकतंत्र की समस्या है।
कांग्रेस के पास रास्ता है। उसे संगठन के चुनाव कराने होंगे। उसे परिवार से आगे नेतृत्व खोजना होगा। उसे जनता की भाषा सीखनी होगी। उसे कुछ मुद्दों पर वर्षों टिकना होगा। उसे अपने कार्यकर्ता को सम्मान देना होगा।
जब तक यह नहीं होता तब तक सवाल बना रहेगा। क्या यह दल जनता की आवाज़ है। इस लेख का उत्तर है कि अभी नहीं।

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