आज के सामाजिक परिदृश्य में स्त्री-पुरुष संबंधों की मर्यादाएँ टूट रही हैं तो ऐसे में रामचरितमानस में वर्णित तुलसीदास का दृष्टिकोण प्रासंगिक लगता है। आधुनिक काल का वोकिज्म मध्ययुगीन स्त्री के दैहिक भोग वाली प्रवृति की वापसी प्रतीत होती है। आजकल की स्वतंत्रता के नाम पर हो रही अराजकता उसी मध्ययुगीन कुरीतियों की याद दिलाती है, जब स्त्रियों को संपत्ति या बोझ की तरह देखा जाता था। वोकिज्म, जो खुद को प्रगतिशील कहता है, वास्तव में पुरानी रूढ़ियों को नया नाम दे रहा है। विवाह से ज्यादा तलाक के मामले बढ़ रहे हैं, विवाह टूट रहे हैं, और दूसरी ओर नारीवाद के नाम पर पुरुषों को अपराधी ठहराया जा रहा है। वोकिज्म स्त्री को इतना ऊँचा बिठा रहा है कि पुरुष बोझ बन गया है। रामचरितमानस की सीता मर्यादा की मूर्ति हैं, जो कष्ट सहती हैं किंतु धर्म का पालन करती हैं। आज की 'मजबूत महिला' छवि उलटी है वह पुरुष को कमजोर और शोषण करती है। आज वोकिज्म पुरुष पर बोझ डाल रहा है। 'टॉक्सिक मस्कुलिनिटी' का शोर मचा रहा है, जो पुरुष को अपराधी बनाता है। परिणामस्वरूप, युवा पीढ़ी डर रही है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में तलाक दर 1% से बढ़कर 13% हो गई है। एकल माताएँ बढ़ रही हैं, किंतु बच्चे भावनात्मक बोझ तले दब रहे हैं।
स्त्री पुरुष संतुलन आवश्यक है। घर परिवार और समाज के संचालन के लिए दोनों आवश्यक हैं लेकिन वोकिज्म यह संतुलन बिगाड़ रहा है, मध्ययुगीन विभेद को पुनर्जीवित कर। इस दृष्टि से रामचरितमानस हमें सिखाता है कि मर्यादा ही जीवन का आधार है। वोकिज्म का प्रचार बंद हो, तो शायद हम संतुलित समाज बना सकें।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है। यह मानव-जीवन के समस्त आयामों का एक महाकाव्यात्मक दर्पण है। इस ग्रंथ में स्त्री और पुरुष के सम्बन्धों को जितनी गहराई, सूक्ष्मता और यथार्थता से चित्रित किया गया है, वह अतुलनीय है। राम-सीता का दिव्य प्रेम हो, दशरथ-कैकेयी का त्रासदीपूर्ण विवाद हो, शंकर-पार्वती की प्रगाढ़ जिज्ञासा हो, अथवा कौशल्या का धैर्यपूर्ण सहनशीलता प्रत्येक सम्बन्ध अपने में एक सम्पूर्ण जीवन-दर्शन समेटे हुए है।
इस आलेख में हम रामचरितमानस की उन चौपाइयों और दोहों का विश्लेषण करेंगे जो स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के चार प्रमुख पहलुओं — प्रेम, विवाद, शंका और समाधान — को प्रकाशित करती हैं। इसके साथ ही, हम उस सूत्र पर भी विशेष ध्यान देंगे जिसे तुलसीदास ने बड़ी चतुराई से बुना है। 'स्वर्ण मृग की चाह' वह भी दारिद्रय के दिनों में? राम को सीता से दूर कर देती है। यही हाल समान्य परिवारों का भी है। भौतिक सुख सम्पत्ति की लालसा परिवार को तोड़ देती है। पत्नी और प्रेम से दूर कर देती है। यह केवल पौराणिक कथा नहीं, यह आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक सत्य है।
सीता का प्रथम दर्शन और मौन प्रेम
रामचरितमानस के बालकाण्ड में वह अविस्मरणीय क्षण आता है जब राम और सीता पुष्पवाटिका में पहली बार एक-दूसरे को देखते हैं। यह दृश्य मात्र प्रेम का चित्रण नहीं है, अपितु आत्मा का आत्मा से मिलन है। तुलसीदास इसे इन शब्दों में व्यक्त करते हैं:
देखन मिस मृग बिहग तरु, फिरइ बहोरि बहोरि। निरखि निरखि रघुबीर छबि, बाढ़इ प्रीति न थोरि॥
अर्थात् — सीता मृग, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने बार-बार घूम-घूमकर रघुवीर राम की छवि को निहारती हैं, और उनकी प्रीति बढ़ती ही जाती है, घटती नहीं। यह पंक्ति उस मनोवैज्ञानिक सत्य को उद्घाटित करती है जो प्रेम के प्रारम्भिक काल में स्त्री-हृदय में जन्म लेती है — बहाने की आवश्यकता, किंतु भाव की प्रगाढ़ता।
इसी क्रम में राम की स्थिति भी कम नहीं है। वे सीता को देखते हैं और तुरन्त उनके मन में एक अलौकिक अनुभूति जागती है:
जेहि दिसि बैठे नारद फूलहिं। सोई दिसि चितव सकुच मन भूलहिं॥कहि न सकत कछु चितव अकेले। मनहुँ सकुच अरु प्रेम दुहेले॥
राम का यह संकोच, यह मौन, यह असमर्थता — शब्दों में न कह पाने की व्यथा — यह वही प्रेम है जो अनुभव किया जाता है, कहा नहीं जाता। तुलसी ने यहाँ 'सकुच और प्रेम दुहेले' — लज्जा और प्रेम के दोहरे बोझ को बड़े काव्यात्मक ढंग से चित्रित किया है।
गृहस्थ प्रेम — सुमित्रा और दशरथ का सहज दाम्पत्य
रामचरितमानस केवल आदर्श प्रेम की बात नहीं करता, वह सामान्य गृहस्थ जीवन के प्रेम को भी उतना ही सम्मान देता है। दशरथ का अपनी तीनों रानियों के प्रति व्यवहार, कौशल्या के प्रति उनका आदर, और समस्त अन्तःपुर में उनका प्रेमपूर्ण व्यवहार — यह सब मिलकर एक आदर्श गृहस्थ का चित्र उकेरते हैं।
राजहि बंधु प्रेम अति गाढ़ा। सेवक सुतनि सहित परिवाढ़ा॥
यह चौपाई बताती है कि सच्चा प्रेम केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं, वह परिवार के समस्त सदस्यों में प्रवाहित होता है। जहाँ पति का हृदय उदार और प्रेमपूर्ण हो, वहाँ घर एक तीर्थ बन जाता है।
शिव-पार्वती — प्रेम और भक्ति का अद्भुत संगम
बालकाण्ड में शिव-पार्वती का प्रेम-प्रसंग एक विशेष प्रकार का है। यहाँ स्त्री साधना करती है, तपस्या करती है, पुरुष को पाने के लिए नहीं, बल्कि उस परम सत्य को पाने के लिए जो उसने मन में बसा लिया है। पार्वती की तपस्या पर तुलसीदास लिखते हैं:
अति सुकुमारि न तनु तप जोगू। पति पद नेहु न कतहुँ बियोगू॥ जिमि जल नव घन तृषित चातक। महा मोह जस तिमिर दिवाकर॥
पार्वती के इस प्रेम में जो समर्पण है, वह स्त्री-प्रेम का उच्चतम स्वरूप है। यह भोग की कामना नहीं, यह एकाकार होने की साधना है। और शिव का उस प्रेम को स्वीकार करना — यह पुरुष का उस स्त्री के प्रति सम्मान है जो प्रेम में भी अपनी आत्मा नहीं खोती।
स्त्री पुरुषि विवाद भी श्रीरामचरित में वर्णित है जहाँ सम्बन्ध के टूटने और बनने की परीक्षा होती है
कैकेयी-दशरथ के बीच वरदान का विवाद और श्रीराम का वनवास रामचरितमानस में सबसे प्रासंगिक विवाद है। यह विवाद तब उत्पन्न होता है जब मंथरा की दुष्ट बुद्धि कैकेयी के हृदय में विष घोल देती है। कैकेयी, जो दशरथ की सबसे प्रिय पत्नी थी, कोपभवन में जाकर बैठ जाती है:
प्रिया हास रति रुचिर बिलासा। सब परिहरि कीन्हेसि कटु भाषा॥मनहुँ कालरात्रि अवतारी। कुभाँति बिहँसि बोली महतारी॥
दशरथ जब कैकेयी को मनाने जाते हैं तो उनका प्रेम, उनकी आसक्ति, उनका मोह — सब एक साथ दिखता है। राजा किसी से नहीं डरते, किंतु प्रिया की अप्रसन्नता से काँप उठते हैं। यह विवाद केवल दो व्यक्तियों का नहीं, यह प्रेम और कर्तव्य के बीच का टकराव है:
कहइ राउ कछु मोर सुहाई। कहु मनभावत देइ दिलाई॥ प्रिया प्रानहु तें प्यारी। मोहि जियत न होइहि दुखारी॥
दशरथ का यह वचन — 'तुम मुझे प्राणों से भी प्रिय हो' — यह वही वाक्य बन जाता है जो उनके विनाश का कारण बनता है। तुलसीदास यहाँ एक गहरा संकेत देते हैं: जब पुरुष अपनी स्त्री को इतना प्रेम करता है कि अपना विवेक खो देता है, तो वही प्रेम उसका शत्रु बन जाता है।
इस प्रसंग में विवाद की जड़ है — मंथरा (बाहरी प्रभाव), कैकेयी का भय और महत्त्वाकांक्षा, तथा दशरथ का असीमित प्रेम।
तुलसीदास यहाँ तीनों पक्षों को दोष और सहानुभूति दोनों से देखते हैं, जो उनकी दृष्टि की विशालता को प्रकट करता है। सोने की चाह' का दूसरा रूप है राज्य-सम्पत्ति की लालसा जो पहली बार उद्धृत हुआ है अप्रत्यक्ष रूप से। कैकेयी को किसी चीज की कमी नहीं थी सुख, प्रेम, सम्मान, सब कुछ था। किंतु मंथरा ने उनके मन में 'राज्य के सोने' की चाह जगा दी। और इसी चाह ने दशरथ को कैकेयी से दूर किया — उनके सम्बन्ध की डोर को तोड़ा:
कत बिधि सृजि नारी जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं॥
यह चौपाई तुलसी के उस दर्शन को व्यक्त करती है जहाँ परावलम्बिता को वे स्त्री का सबसे बड़ा दुःख मानते हैं। कैकेयी की 'सोने की चाह' वास्तव में उस स्वतन्त्रता की चाह थी जो उसे कभी मिली नहीं। किंतु मंथरा ने उस चाह को विकृत रूप दे दिया।
परिणाम यह हुआ: जो राजा अपनी पत्नी को प्राणों से प्रिय मानता था, वह उसी पत्नी के हाथों मरा। 'सोने की चाह' राज्य की लालसा ने पति-पत्नी के बीच की हर कोमल डोर काट दी। दशरथ जब कोपभवन से निराश लौटे, तब तुलसीदास लिखते हैं:
कहत कथा सुनि ह्याति मन माहीं। कहउँ राम रघुबीर सनाहीं॥
राम बिरह जेहिं समुझि अकेला। सो बिधि बिरचि बिधिहिं मिलेला॥
रामचरितमानस में 'सोने की चाह' का सबसे स्पष्ट और प्रतीकात्मक चित्रण स्वर्णमृग के प्रसंग में मिलता है। रावण ने मारीच को स्वर्णमृग बनाकर भेजा — यह कोई संयोग नहीं। रावण जानता था कि स्त्री को सोने के आकर्षण से और पुरुष को उसे दिलाने की कामना से — दोनों को एक साथ फँसाया जा सकता है:
मृग बिलोकि अति रुचिर बिसाला। पुलकि गात बोली मृदुबाला॥सुंदर स्याम मनोहर देहा। कनक बिंदु अंकित बर बाहा॥
सुनहु प्रानपति कहउँ सुभाऊ। मृग मनोज मम मन अति भाऊ॥
सीता का यह वाक्य — 'यह मृग मेरे मन को बहुत भाया है' — यहाँ 'सोने की चाह' का वह क्षण है जो समस्त त्रासदी की जड़ बनता है। राम जानते हैं कि यह माया है:
मृग मायावी मरिहि न काऊ। जग जानत सब तव प्रभुताऊ॥
हठ करि राम गए बन माहीं। बात चली जो घर में नाहीं॥
'सोने की चाह' ने यहाँ तीन काम किए: पहला, राम को आश्रम से दूर किया। दूसरा, लक्ष्मण को सीता के साथ छोड़ने की विवशता उत्पन्न की। तीसरा, सीता के सुरक्षा-चक्र (लक्ष्मण-रेखा) को तोड़ने का अवसर रावण को दिया। यह 'सोने की चाह' की त्रिविध विनाशकारी शक्ति का रूपक है।
वनवास के दौरान सबसे हृदयविदारक विवाद तब उत्पन्न होता है जब सीता को स्वर्णमृग (सोने के हिरन के रूप में मारीच) दिखता है। यह वह क्षण है जहाँ 'सोने की चाह' पति को दूर कर देती है — शाब्दिक रूप से भी और प्रतीकात्मक रूप से भी। सीता राम से उस मृग को लाने का आग्रह करती हैं:
सुनहु प्रिया यह मृग मायावी। अतिसय लोभ रम्य बन पावी॥ राम जानत ते जग वैसा। जो देखहिं अस भास तैसा॥
राम समझते हैं कि यह माया है, किंतु सीता का आग्रह और उनका प्रेम उन्हें वहाँ से दूर ले जाता है। 'सोने की चाह' — स्वर्णमृग की यह लालसा — सीता की एकमात्र भूल है जो सम्पूर्ण रामायण के सबसे बड़े विवाद की जड़ बनती है।
इसी विषय पर लक्ष्मण और सीता के बीच एक कटु संवाद होता है जो रामचरितमानस में सबसे दुखद विवाद के रूप में अंकित है। जब सीता, राम की आवाज सुनकर व्याकुल हो जाती हैं और लक्ष्मण से जाने का आग्रह करती हैं, लक्ष्मण संकोचवश नहीं जाते। तब सीता के वचन बड़े कठोर हो जाते हैं। और लक्ष्मण भी:
भाभी सतीं अस मन अनुमाना। नहि निसिचर कहुँ तात गिराना॥ जौं पै सीय सुरत बिसराई। खेलत रहे सो सहज सुभाई॥
यह प्रसंग सिखाता है कि सम्बन्धों में अविश्वास, क्रोध और शंका किस प्रकार एक-एक करके प्रवेश करते हैं, और कैसे एक क्षण का क्रोध जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी का कारण बन सकता है।
सीता की अग्निपरीक्षा रामचरितमानस का सबसे विवादास्पद और सबसे पीड़ादायक प्रसंग है — राम द्वारा सीता को लोकाचार के भय से अग्निपरीक्षा देने का आदेश। यह प्रसंग लंकाकाण्ड में आता है जब राम, रावण का वध कर, विजयी होकर सीता से मिलते हैं। किंतु उनके वचन सुनकर हृदय काँप उठता है:
सुनु सीता तव तिय बिचारा। नहिं मोहि प्रान भए तुम्हारा॥ जनकसुता कुल रहित बिचारी। मातु भगिनि तव सेवा करी॥
राम के ये शब्द सुनकर सीता जो उत्तर देती हैं, वह रामचरितमानस की सबसे गरिमामयी और सबसे मर्मस्पर्शी पंक्तियों में से हैं। सीता क्रोध नहीं करतीं, प्रतिकार नहीं करतीं वे लक्ष्मण से अग्नि प्रज्वलित करने को कहती हैं। यह वह क्षण है जहाँ स्त्री की आत्मा सबसे ऊँची उठती है।
लगे गहन सीता कह लाई। छन महुँ कृसानु भयउ सुहाई॥ जानि परम पावनि जग जाना। अग्निदेव आनि प्रकट महाना॥
अग्नि ने सीता को स्वयं प्रकट होकर पवित्र घोषित किया। इस प्रसंग में तुलसीदास एक गहरा सन्देश देते हैं: पुरुष की शंका कितनी भी बलवान हो, सत्य की अग्नि उसे जला देती है। स्त्री का स्वयं को सिद्ध करने का साहस यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
किंतु इस प्रसंग का दूसरा पहलू भी है। राम की यह शंका व्यक्तिगत नहीं, वह लोकनायक की सामाजिक विवशता है। तुलसीदास इस द्वन्द्व को बड़ी कुशलता से दिखाते हैं। एक ओर राम का व्यक्तिगत प्रेम, दूसरी ओर राजधर्म। यह टकराव आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
रामचरितमानस में उर्मिला का प्रसंग एक अनकही कथा है, किंतु उनकी अनुपस्थिति ही उनकी सबसे बड़ी उपस्थिति है। जब लक्ष्मण वन जाने का निर्णय करते हैं तो उर्मिला क्या कहती हैं? तुलसी ने उनके मौन को ही उनका उत्तर बनाया है। यह मौन ही स्त्री की वह शंका है जो पूछती है — 'क्या मेरे प्रेम से बड़ा कोई कर्तव्य हो सकता है?'
यह भी एक प्रकार का विवाद है — वह विवाद जो बोला नहीं जाता, किंतु हृदय की गहराई में दहकता रहता है। उर्मिला की शंका यह नहीं कि लक्ष्मण क्या करते हैं, उनकी शंका यह है — 'क्या मैं पर्याप्त नहीं हूँ?' और यही शंका हर उस स्त्री की है जो अपने पति को कर्तव्य और प्रेम के बीच खिंचते देखती है।
बालकाण्ड में पार्वती के मन में शंका तब उत्पन्न होती है जब नारद उन्हें शिव के चरित्र के विषय में विचित्र बातें बताते हैं। शिव को कामदेव की तरह नहीं, एक वैरागी, अघोरी के रूप में वर्णित किया जाता है। पार्वती की माँ उन्हें समझाती हैं:
जोगि जटिल अकाम मन नाना। देखत कुधरु कबहुँ न आना॥ जो बरु तुम्ह कहुँ सहित बिबाहा। सो बरु देहि मागु मन चाहा॥
किंतु पार्वती की शंका प्रेम की शंका नहीं, वह श्रद्धा की जिज्ञासा है। वे जानना चाहती हैं कि शिव वास्तव में कैसे हैं — इसलिए नहीं कि वे डरती हैं, बल्कि इसलिए कि वे पूर्ण समर्पण करना चाहती हैं। यह शंका नहीं, यह बोध की तलाश है।
तुलसीदास इस प्रसंग में बताते हैं: सम्बन्ध में शंका तब उत्पन्न होती है जब हम दूसरों के वचनों पर, अपने प्रत्यक्ष अनुभव से अधिक विश्वास करते हैं। मंथरा और नारद — दोनों बाहरी शक्तियाँ हैं जो सम्बन्धों में विष घोलती हैं। पहली दुर्भावना से, दूसरी परीक्षा के लिए।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में 'अर्थ' अर्थात् धन-सम्पत्ति की अत्यधिक कामना को सम्बन्धों के विनाश का कारण बताया है। उत्तरकाण्ड में वे कलियुग के स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं:
लोभ ग्रसे सब पुनरपि नाहीं। भूमि लाभ रति कहुँ मन माहीं॥
धर्म न दोसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना॥
नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी॥
सुत काजे बिक्रिय पितु माता। सो तनय जासु तनय बिख्याता॥
ये पंक्तियाँ कलियुग के उस रूप का चित्रण करती हैं जहाँ पत्नी के मृत होते ही व्यक्ति संन्यासी हो जाता है — किंतु यह वैराग्य नहीं, यह सम्पत्ति के लिए मुक्ति है। पुत्र माता-पिता को बेच देता है। यह 'सोने की चाह' का वह अन्तिम और वीभत्स रूप है जहाँ प्रत्येक सम्बन्ध धन के तराजू पर तुलने लगता है।
तुलसीदास का संदेश स्पष्ट है: जब घर में 'सोने की चाह' प्रवेश करती है, तो सबसे पहले पति-पत्नी का प्रेम विदा होता है, फिर परिवार बिखरता है, और अंततः समाज का ताना-बाना टूटता है
तुलसीदास समाधान भी पेश करते है। जब अग्निपरीक्षा के पश्चात् अग्निदेव सीता को शुद्ध घोषित करते हैं, तो राम का हृदय खुल जाता है। यहाँ तुलसीदास एक अद्भुत दृश्य रचते हैं — पुरुष का अपनी शंका को त्यागकर पुनः प्रेम में लौटना:
अब लगि राम तुम्ह सन रहेऊ। निज गुन जनि अपमान सहेऊ॥
पुनि गहि पानि कुटिल भव माया। बिनय बचन हृदय अति भाया॥
राम का यह पुनः सीता का हाथ थामना — यह केवल एक भौतिक क्रिया नहीं, यह उस शंका का समाधान है जो कभी सम्बन्ध में आ गई थी। तुलसीदास का सन्देश है: विश्वास एक बार टूट सकता है, किंतु जब पुरुष सत्य को पहचाने और स्त्री की पवित्रता को स्वीकार करे — तब सम्बन्ध पुनः स्थापित हो सकता है।
कौशल्या का चरित्र रामचरितमानस में सबसे अधिक धैर्यशील स्त्री का है। जब दशरथ राम को वन भेजने का निर्णय लेते हैं और स्वयं टूट जाते हैं, तब कौशल्या उनके पास आती हैं। यहाँ सम्बन्ध का समाधान मिलता है। कौशल्या दशरथ को धर्म और विवेक का स्मरण कराती हैं। वे स्वयं पुत्र-वियोग से व्यथित हैं, किंतु पति के सामने वे दृढ़ रहती हैं। यह स्त्री-शक्ति का वह रूप है जो पुरुष को टूटने से बचाती है। सम्बन्ध का यह समाधान कौशल्या की धीरता में है।
धीरज धरहु बिबेकु बिचारहु। राम भजहु जग संसय टारहु॥
नाथ समुझि मन करहु बिचारू। पुत्र बिरह कर एहि बिधि भारू॥
शिव-पार्वती की कथा प्रेम का सबसे सुंदर पक्ष है। पार्वती की तपस्या का फल मिलता है जब शिव स्वयं ब्राह्मण के वेश में उनकी परीक्षा लेने आते हैं। वे राम की निन्दा करते हैं यह देखने के लिए कि पार्वती का निश्चय कितना दृढ़ है। पार्वती उठकर चली जाती हैं वे निन्दा नहीं सुनती। शिव प्रसन्न होते हैं:
बहुत दिन तें मोहि बिसराई। कबहुँ न मिली तुम्ह बड़ाई॥
अब मैं तुम्हार अनन्य एकाई। जानि परी मोहि महिमा भाई॥
शिव का पार्वती को स्वीकार करना यह वह समाधान है जो तुलसीदास देते हैं। सम्बन्ध में जब स्त्री अपने सिद्धान्तों पर अडिग रहती है, निन्दा सुनकर भी विचलित नहीं होती, और पुरुष जब उस दृढ़ता को पहचान लेता है तब सम्बन्ध अपनी पूर्णता को प्राप्त होता है।
सुन्दरकाण्ड में एक और महत्त्वपूर्ण प्रसंग है। हनुमान लंका में सीता को खोजते हैं। जब वे उनसे मिलते हैं तो सीता को राम के प्रतिनिधि के रूप में विश्वास दिलाते हैं। यहाँ एक बहुत सुन्दर संवाद है जो स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के विश्वास और संशय के बीच की बारीक रेखा को दिखाता है:
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहदानी॥
हनुमान मुद्रिका दिखाकर सीता का विश्वास जीतते हैं। यहाँ समाधान यह है सम्बन्ध में शंका तब दूर होती है जब प्रमाण दिया जाए, न कि केवल वचन। राम ने मुद्रिका भेजकर यह सिद्ध किया कि वे सीता को भूले नहीं, वे उन्हें पाने के लिए व्याकुल हैं। यह पुरुष का वह कर्म है जो स्त्री की शंका को विश्वास में बदलता है।
स्त्री पुरुष सम्बन्धों का वास्तविक दर्शन और तुलसी की दृष्टि
तुलसीदास पर अनेक बार यह आरोप लगाया गया है कि उन्होंने स्त्री-विरोधी पंक्तियाँ लिखी हैं। सुन्दरकाण्ड की एक प्रसिद्ध पंक्ति — 'ढोल गँवार सूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी' — को लेकर बड़ा विवाद है। किंतु यह पंक्ति समुद्र के मुख में है, राम के मुख में नहीं। यह तत्कालीन समाज की मानसिकता का चित्रण है, तुलसी का अपना विचार नहीं।
वास्तव में तुलसीदास ने रामचरितमानस में स्त्री के जिस रूप को प्रतिष्ठित किया है, वह बहुत ऊँचा है। सीता सहनशीलता की प्रतीक हैं, किंतु निष्क्रिय नहीं। पार्वती ज्ञान और भक्ति की प्रतीक हैं। कौशल्या धर्म की प्रतीक हैं। और कैकेयी वे इस बात की प्रतीक हैं कि जब स्त्री का स्नेह लोभ में बदल जाता है, तो क्या होता है।
जासु बिमल जस त्रिभुवन छाया। सोइ करि करुना काहिं न माया॥
नारि सहित जहँ कोउ रघुनंदन। पाइ परम पद होइ निर्बंधन॥
यह पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं कि तुलसी की दृष्टि में स्त्री के साथ सम्बन्ध जब वह प्रेम, भक्ति और सहयोग पर आधारित हो — मोक्ष का मार्ग है।
रामचरितमानस के ये प्रसंग आज के दाम्पत्य जीवन में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। 'सोने की चाह' आज करियर, धन और महत्त्वाकांक्षा के रूप में आती है। पति को 'स्वर्णमृग' के पीछे भागने का आमंत्रण आज भी मिलता है और परिवार, पत्नी, बच्चे सब पीछे छूट जाते हैं।
कैकेयी का विवाद आज बोर्डरूम की महत्त्वाकांक्षा में दिखता है। सीता की शंका आज सोशल मीडिया के 'लंकापति' रावणों की छाया में दिखती है। और उर्मिला का मौन — वह आज भी उन स्त्रियों में दिखता है जो सब कुछ जानती हैं, किंतु कहती नहीं।
समाधान भी वही है जो तुलसीदास ने बताया: विश्वास, प्रमाण, संवाद और समर्पण। राम ने मुद्रिका भेजी आज का पुरुष समय भेजे, उपस्थिति भेजे। शिव ने पार्वती की दृढ़ता को पहचाना आज का पुरुष भी स्त्री की आत्मा को, उसके मूल्यों को पहचाने।
रामचरितमानस केवल राम की कथा नहीं है — यह मानव सम्बन्धों का महाशास्त्र है। इस ग्रंथ की प्रत्येक चौपाई में जीवन का कोई न कोई सत्य छुपा हुआ है। स्त्री और पुरुष के सम्बन्धों को तुलसीदास ने जिस गहराई से समझा और चित्रित किया है, वह आज भी अतुलनीय है। स्वर्णमृग जो आज भी हर घर के बाहर खड़ा है, पति को दूर बुला रहा है। यदि हम रामचरितमानस से कुछ सीख सकते हैं, तो वह यही है: उस स्वर्णमृग के पीछे मत जाओ। जो घर में है प्रेम, विश्वास, परिवार वही वास्तविक सोना है।
सो भव बिसनु अरु अज कहैं। सुनि परजा भव सागर लहैं॥
जग परिवारु जिआवत पोसत। सीय राम पद नेह सरोसत॥
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