नीतीश कुमार: बिहार के सबसे सफल मुख्यमंत्री की पूरी कहानी








नीतीश कुमार — यह नाम बिहार की राजनीति में सुशासन का पर्याय बन चुका है। 8 बार मुख्यमंत्री रह चुके नीतीश कुमार ने बिहार को जंगलराज की छाया से निकालकर देश के तेज़ी से विकसित होते राज्यों में शामिल कर दिया।1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद बिहार में जातीय राजनीति चरम पर थी। इसी पृष्ठभूमि में नीतीश कुमार का उदय हुआ।

बिहार राजनीति का इतिहास उथल-पुथल से भरा पड़ा है। जेपी आंदोलन से उपजी हर चीज व्यर्थ सिद्ध हुई—चाहे आपातकाल की त्रासदी हो, जनता पार्टी की सरकार का विघटन हो या लालू प्रसाद जैसे नेताओं का उदय। जंगलराज की छाया में विकास ठप हो गया था। लेकिन इस सबके बीच एक चमकता सितारा उभरा—नीतीश कुमार। वे बिहार के अजातशत्रु बने रहे, जिन्होंने विध्वंस की विरासत को मलबे से उठाकर निर्माण की इमारत खड़ी की।

नीतीश ने न केवल लालू के अराजक शासन को समाप्त किया, बल्कि भाजपा विरोधी राजनीतिक अस्पृश्यता को भी तोड़ा। बिहार की सड़कें आज दिल्ली से बेहतर हैं, हालांकि नोएडा वाला मीडिया इसका प्रचार नहीं करता। ईमानदारी और सुशासन के प्रति उनका समर्पण उन्हें समकालीन नेताओं से अलग करता है। जहां अन्य नेता बेलगाम बयानबाजी करते हैं, नीतीश नवीन पटनायक की भांति सौम्य बने रहे। 1990 के बाद जब जातीय लामबंदी स्वाभाविक हो गई, नीतीश इसका अपवाद बने। उनका स्टारडम किसी जातीय संकीर्णता से परे रहा। महिलाओं से लेकर सभी वर्गों में उनके प्रशंसक बने।

यह सब संभव हुआ उनकी दूरदर्शिता से। उन्होंने बुनियादी ढांचे को मजबूत किया, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ाया। बिहार अब प्रवासी मजदूरों का निर्यातक नहीं, बल्कि निवेश का केंद्र बन रहा है। उनकी राजनीति विकास-केंद्रित रही, न कि नकारात्मक।

1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों ने पिछड़ा वर्ग को सशक्त किया। लालू प्रसाद के काल में बिहार का प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 40% न्यून था (आरबीआई, 2004); अपराध दर राष्ट्रीय औसत से 200% अधिक (एनसीआरबी, 2004)। विकास बजट का 70% वेतनभोगियों पर व्यय होता था।

नीतीश कुमार इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि से राजनीतिक में प्रवेश किया। 1985 में बेलची विधानसभा से विजयी; 1989-90 हरिनगर लोकसभा। 1994 में समता पार्टी की स्थापना (जॉर्ज फर्नांडिस सह-संस्थापक) ने भाजपा गठबंधन आरंभ किया। 1996 का 11-दिवसीय मुख्यमंत्रित्व लालू सरकार गिराने का प्रयास था। 2000 में पुनः प्रयास असफल रहा, किंतु 2005 में एनडीए की 143 सीटों वाली विजय निर्णायक सिद्ध हुई।

नीतीश शासन का प्रथम चरण (2005-10) कानून-केंद्रित था। पुलिस बल वृद्धि (1 लाख से 1.5 लाख), विशेष अदालतें एवं 'पुलिस सुधार आयोग' गठन से अपराध दर 48% घटी (एनसीआरबी, 2010)। किडनैपिंग घटनाएं 2005 की 1,500 से 2010 में 200 रह गईं। ग्रामीण पट्टी में 'थाना मजबूत' अभियान ने विश्वास पुनर्स्थापित किया।

बुनियादी ढांचा एवं आर्थिक विकास

सड़क विकास में 1 लाख किमी नेटवर्क (2005-20); प्रति वर्ष 5,000 किमी निर्माण। 'मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना' ने ग्रामीण संपर्कता सुनिश्चित की। विद्युतीकरण: 2005 में 15% से 2020 में 99% (केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय)। जीडीपी वृद्धि 11.3% (2011-17), राष्ट्रीय औसत 7.5% से श्रेष्ठ (नीति आयोग)। औद्योगिक निवेश 2005 के 1,000 करोड़ से 2023 में 50,000 करोड़।

सामाजिक क्षेत्र

शिक्षा में 'सर्व शिक्षा अभियान' विस्तार; 60,000 विद्यालय। कन्या साइकिल योजना (2006): 1 करोड़ लड़कियों लाभान्वित, ड्रॉपआउट 60% न्यून (यूनेस्को, 2018)। स्वास्थ्य: 'मुक्ताम्मा योजना' से 5 करोड़ कार्ड जारी। शौचालय निर्माण (1.5 करोड़) ने ओडीएफ स्थिति प्राप्ति (2018) सुनिश्चित की। 'सात निश्चय' (2015) ने महिला-केंद्रित विकास को प्राथमिकता दी। तुलनात्मक रूप से, लालू राज (1990-2005) में साक्षरता 38% से 47%; नीतीश काल में 76% (जनगणना 2011- NFHS-5)।

सौम्यता, ईमानदारी एवं सामाजिक आधार

नीतीश कुमार का व्यक्तित्व वस्तुनिष्ठता एवं संयम से परिपूर्ण है। उनके भाषणों में आंकड़िक तथ्यों को प्राथमिकता प्राप्त है, जबकि अपशब्दों का पूर्णतः अभाव नवीन पटनायक के शैली से तुलनीय है। नियंत्रक एवं महालेखाकार (CAG) की रिपोर्टों में उनकी सरकार के विरुद्ध कोई प्रमुख अनियमितता दर्ज नहीं है। 2016 में लागू शराबबंदी एक महत्वाकांक्षी सामाजिक सुधार के रूप में उभरी, यद्यपि इसके कार्यान्वयन में काला बाजार जैसी चुनौतियाँ सामने आईं। जातीय अपील के संदर्भ में, कुर्मी (OBC) पृष्ठभूमि होने पर भी नीतीश ने जाति-निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाया। उन्होंने अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC, 36%) एवं महादलित (16%) समुदायों के लिए 25% आरक्षण सुनिश्चित किया। 2006 में गठित EBC महासभा ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ बनाया। CSDS-लोकनीति सर्वेक्षण (2020) के अनुसार, महिलाओं में उनका समर्थन 55% तक पहुँचा। जनता दल (यूनाइटेड) का स्टारडम कार्यकर्ता-आधारित है, जो जातिगत गठजोड़ों से परे विस्तारित है।

गठबंधन राजनीति एवं उतार-चढ़ाव

नीतीश की राजनीतिक यात्रा गठबंधन-केंद्रित उतार-चढ़ावों से भरी रही। 2014 लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के कारण जद(यू) को केवल 2 सीटें प्राप्त हुईं। तथापि, 2015 विधानसभा चुनावों में महागठबंधन (आरजेडी-कांग्रेस) के साथ गठजोड़ ने पुनर्विजय सुनिश्चित की। 2017 में आरजेडी से अलगाव के पश्चात् भाजपा के साथ पुनर्संघ हुआ। 2022 में आठवीं बार मुख्यमंत्री पद ग्रहण किया। ये परिवर्तन रणनीतिक अनुकूलन की कला को दर्शाते हैं, जो बिहार की जटिल राजनीतिक भूराजनीति में जीवंतता प्रदान करते हैं।वर्तमान परिदृश्य में भाजपा का प्रभुत्व, तेजस्वी यादव का उभार, शराबबंदी की विफलताएँ (जैसे काला बाजार) तथा अधर लटके प्रोजेक्ट (एक्सप्रेसवे) प्रमुख चुनौतियाँ हैं। COVID-19 महामारी (2020-22) का प्रबंधन सराहनीय रहा, किंतु प्रवासी संकट ने प्रशासनिक कमजोरियों को उजागर किया।

आगे की राह 

तेजस्वी यादव राष्ट्रीय जनता दल के युवा प्रणेता के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने 2020 विधानसभा चुनावों में 75 सीटें अर्जित कीं। तथापि, जाति-बंधनों की कमजोरी शहरीकरण एवं विकास के कारण उजागर हो रही है, जहाँ वर्ग-आधारित मतदान प्रबल हो रहा है। समृद्धि शांति एवं अपराध नियंत्रण पर निर्भर करेगी। तेजस्वी को नीतीश-मॉडल की नकल करनी होगी। 2025 विधानसभा चुनावों में EBC-महिला समीकरण निर्णायक सिद्ध होगा।

केंद्रीय भूमिका की संभावना

2024 लोकसभा चुनावों में जद(यू) के 12 सांसद नीतीश को केंद्रीय राजनीति में प्रभावशाली बनाते हैं। मोदी के तीसरे कार्यकाल (2024-29) में एंटी-इनकंबेंसी का खतरा है, जबकि राहुल गांधी की स्वीकार्यता संदिग्ध बनी हुई है। चिराग पासवान सहित तीसरा मोर्चा संभव है। मनमोहन सिंह (2004-14) की भाँति नीतीश केंद्र-मंच पर किंगमेकर की भूमिका निभा सकते हैं।

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