महिला आरक्षण और परिसीमन

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास उन वादों से भरा पड़ा है जो मतपेटी के पास आते-आते अपना रंग बदल लेते हैं। जब सितंबर 2023 में संसद के नए भवन में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ, तो देश का एक बड़ा हिस्सा उत्साह से भर उठा। सत्ता पक्ष ने इसे ऐतिहासिक बताया, विपक्ष ने इसे अपना पुराना सपना कहा और मीडिया ने इसे महिलाओं की बड़ी जीत के रूप में परोसा। लेकिन जब इस कानून की बारीकियाँ सामने आईं — विशेषकर परिसीमन की अनिवार्य शर्त — तो यह स्पष्ट हो गया कि यह केवल एक राजनीतिक घोषणापत्र है, क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं।

राजनीतिक रूप से कुछ प्रश्नों को जानबूझकर सत्ता के गलियारों में अनुत्तरित छोड़ दिया जाता है: क्या संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की सीटें बढ़ाने से उन लाखों महिलाओं का जीवन बदलेगा जो थानों के दरवाजे पर खड़ी रहती हैं लेकिन FIR नहीं लिखी जाती? क्या लोकसभा में एक तिहाई सीटें आरक्षित हो जाने से किसी गाँव की लड़की स्कूल जा सकेगी जिसे उसके परिवार ने आठवीं कक्षा के बाद घर बिठा दिया है? क्या संसद भवन की दीर्घाओं में अधिक महिला चेहरे दिखने से अस्पताल में प्रसव के दौरान मरने वाली माताओं की संख्या कम होगी? आरक्षण की राजनीति और सशक्तिकरण की वास्तविकता के बीच एक गहरी खाई है।

महिलाओं के संसदीय प्रतिनिधित्व की माँग कोई नई नहीं है। 1974 में 'स्टेटस ऑफ वुमेन इन इंडिया' की रिपोर्ट में पहली बार इसे गंभीरता से उठाया गया। 1996 में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार ने पहली बार महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया — और तब से लेकर 2023 तक यह विधेयक हर बार राजनीतिक उठापटक का शिकार होता रहा। इसे 'लालू-मुलायम गठजोड़' ने कभी पास नहीं होने दिया। कारण स्पष्ट था: शक्तिशाली पुरुष राजनेताओं के वर्चस्व को कोई चुनौती नहीं चाहिए थी।

2023 में जो विधेयक पारित हुआ वह तकनीकी रूप से महत्त्वपूर्ण है: लोकसभा, राज्यों की विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की जाएंगी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में से भी एक-तिहाई महिलाओं को मिलेंगी। यह प्रावधान 15 वर्षों के बाद समाप्त होने की भी व्यवस्था है, यद्यपि संसद इसे आगे बढ़ा सकती है।

परंतु इस विधेयक की सबसे बड़ी खामी उसकी शर्त में छिपी है: यह कानून तभी लागू होगा जब अगली जनगणना हो और उसके बाद परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया पूरी हो। अगली जनगणना 2021 में होनी थी, जो कोविड के कारण टल गई और 2024-25 तक अनिश्चित बनी रही। परिसीमन की प्रक्रिया वर्षों तक चलती है। इसका अर्थ यह है कि यह कानून 2029 के आम चुनाव से पहले लागू होने की संभावना लगभग नगण्य है — और कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि 2034 तक भी संदेह है।

तो प्रश्न उठता है: क्या यह कानून वास्तव में महिलाओं को सत्ता में भागीदारी देने के लिए बनाया गया था, या यह अगले चुनाव में मतों की कटाई के लिए एक चतुर राजनीतिक दाँव था? उत्तर खोजने के लिए हमें परिसीमन की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को समझना होगा।

परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसमें जनगणना के आँकड़ों के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। सैद्धांतिक रूप से यह लोकतांत्रिक न्याय का उपकरण है — 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को सुनिश्चित करने का माध्यम। परंतु व्यवहार में भारतीय संदर्भ में परिसीमन एक अत्यंत विवादास्पद और राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्रक्रिया बन चुकी है।

1976 में इंदिरा गाँधी की सरकार ने 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या को 2001 तक के लिए फ्रीज कर दिया था। बाद में इसे 2026 तक बढ़ाया गया। इसके पीछे की राजनीतिक वास्तविकता यह थी कि दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन कार्यक्रमों को अधिक सफलतापूर्वक लागू किया था — जिसके कारण उनकी जनसंख्या वृद्धि दर उत्तरी राज्यों से कम थी। यदि परिसीमन होता, तो उत्तर प्रदेश, बिहार, और मध्य प्रदेश जैसे उच्च जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक सीटें मिलतीं और दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटता।

अब 2023 के नारी शक्ति वंदन अधिनियम के साथ परिसीमन की शर्त जोड़ी गई है। इसका परिणाम क्या होगा? नई जनगणना और परिसीमन के बाद लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 750 से 800 तक हो सकती हैं। इनमें से एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। परंतु इस विस्तार का सबसे बड़ा लाभ उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे राज्यों को मिलेगा जहाँ जनसंख्या सर्वाधिक है।

दक्षिणी राज्य — केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना — जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई, उनकी सीटें सापेक्ष रूप से घटेंगी। यह एक ऐसा संवैधानिक विरोधाभास है जिसमें जिम्मेदार व्यवहार को दंडित किया जाता है। दक्षिणी राज्यों की जनता पूछती है: हमने परिवार छोटा रखा, शिक्षा में निवेश किया, GDP में योगदान दिया — और अब हमारी संसदीय शक्ति कम होगी? यह प्रश्न महिला आरक्षण के उद्देश्य से परे जाकर भारतीय संघवाद की बुनियाद को हिलाता है।

इस संदर्भ में महिला आरक्षण केवल एक 'ट्रोजन हॉर्स' बन जाता है — एक ऐसा उपकरण जिसकी आड़ में परिसीमन को जायज ठहराया जा सके और उत्तर भारत केंद्रित राजनीतिक पुनर्संरचना को गति दी जा सके। महिलाओं का सशक्तिकरण यहाँ साध्य नहीं, साधन है।

बुनियादीसवाल : असली लाभार्थी कौन होंगे?

भारतीय राजनीति का एक कटु सत्य यह है कि यहाँ राजनीतिक दल प्रायः पारिवारिक उद्यमों की तरह संचालित होते हैं। समाजवादी पार्टी में मुलायम-अखिलेश-डिंपल का परिवार, राष्ट्रीय जनता दल में लालू-राबड़ी-मीसा-तेजस्वी की पारिवारिक राजनीति, नेशनल कांफ्रेंस में अब्दुल्लाह परिवार, द्रमुक में करुणानिधि से स्टालिन की विरासत, तेलुगु देशम पार्टी, शिवसेना — इन सभी में पारिवारिक उत्तराधिकार की परंपरा दशकों से चली आ रही है। यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में नेहरू-इंदिरा-राजीव-सोनिया-राहुल-प्रियंका की वंश परंपरा इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है।

अब महिला आरक्षण के संदर्भ में एक सरल प्रश्न पूछें: जब किसी निर्वाचन क्षेत्र को महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित किया जाएगा, तो वहाँ के राजनीतिक दल किसे उम्मीदवार बनाएंगे? क्या वे किसी नई, योग्य, शिक्षित महिला कार्यकर्ता को चुनेंगे? या वे अपने उस पुराने पुरुष नेता की पत्नी, बेटी, बहू, या बहन को उतारेंगे जो पहले उस सीट पर जीतते रहे हैं?

उत्तर स्वयंस्पष्ट है। 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज और नगर निकायों में महिला आरक्षण का अनुभव हमारे सामने है। शोध दर्शाते हैं कि 'प्रॉक्सी राजनीति' या 'सरपंच पति' की घटना व्यापक रूप से मौजूद है जिसमें पति या परिवार का पुरुष सदस्य वास्तविक निर्णय लेता रहा जबकि महिला केवल नाम की सरपंच या पार्षद थी। संसदीय स्तर पर यह घटना और अधिक विस्तृत रूप लेगी।

सोचिए — एक परिवारवादी पार्टी के पास दस सीटें हैं। अब उनमें से तीन-चार महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाती हैं। पार्टी का नेता परेशान नहीं होगा — वह बस उन सीटों पर अपनी पत्नी, बेटी या भतीजी को उम्मीदवार बना देगा। सीट परिवार के ही पास रहेगी। कागज पर एक महिला जीतेगी — परंतु वास्तविक शक्ति पुरुष के हाथ में ही रहेगी। इस प्रकार महिला आरक्षण परिवारवाद को खत्म करने का उपकरण बनने की बजाय उसे और संस्थागत रूप देने का माध्यम बन जाएगा।

इसके विपरीत जो महिलाएं स्वतंत्र रूप से राजनीति में आना चाहती हैं — जिनके पीछे कोई राजनीतिक परिवार नहीं है, जो अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर खड़ी होना चाहती हैं — उन्हें इस व्यवस्था से क्या मिलेगा? जब पार्टियाँ टिकट देंगी ही पारिवारिक उम्मीदवारों को, तो आम महिला कार्यकर्ता का रास्ता और बंद हो जाएगा। वह सोचेगी: पहले मेरे सामने कोई पुरुष प्रतिद्वंद्वी था — अब कोई 'नेता जी की बेटी' है जिसे मनोनीत पदोन्नति मिल रही है।

इस प्रकार महिला आरक्षण न केवल परिवारवाद को पोषित करेगा, बल्कि योग्यता के आधार पर राजनीति में आने की इच्छुक महिलाओं के रास्ते में एक नई बाधा भी खड़ी करेगा।

सीटें और सशक्तिकरण: एक भ्रामक समीकरण

सशक्तिकरण की राजनीतिक समझ और उसकी जमीनी वास्तविकता के बीच एक गहरी खाई है। हमारे नीति-निर्माताओं ने एक सरल समीकरण बना दिया है: अधिक सीटें = अधिक सशक्तिकरण। परंतु यह समीकरण उतना ही भ्रामक है जितना यह कहना कि अधिक डॉक्टर = बेहतर स्वास्थ्य सेवा, चाहे अस्पताल में दवाइयाँ हों या नहीं।

सशक्तिकरण एक बहुआयामी प्रक्रिया है। इसके तीन मूलभूत स्तंभ हैं: पहला, स्वावलंबन — अर्थात अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने की क्षमता। दूसरा, संसाधन — अर्थात शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्वतंत्रता तक पहुँच। तीसरा, संरचना — अर्थात ऐसी संस्थाएं और कानून जो महिलाओं की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करें। संसदीय सीटें तीसरे स्तंभ का एक छोटा-सा हिस्सा हैं — और वह भी तब, जब वे वास्तव में स्वतंत्र और सक्षम महिलाओं द्वारा भरी जाएं।

रवांडा का उदाहरण अक्सर दिया जाता है जहाँ संसद में महिलाओं की भागीदारी 60 प्रतिशत से अधिक है — दुनिया में सबसे अधिक। परंतु क्या रवांडा की सामान्य महिला को वे अधिकार और सुविधाएं मिली हैं जो किसी विकसित लोकतंत्र में मिलती हैं? आँकड़े इस सीधे संबंध को चुनौती देते हैं। बांग्लादेश में शेख हसीना लगातार प्रधानमंत्री रहीं — परंतु बांग्लादेश की महिलाओं की सामाजिक स्थिति की तुलना वहाँ की GDP या राजनीतिक प्रतिनिधित्व से करना भ्रामक होगा।

भारत में ही देखें: राजनीतिक रूप से शक्तिशाली राज्यों में महिलाओं की स्थिति क्या है? उत्तर प्रदेश में पिछले चालीस वर्षों में कई महिला मुख्यमंत्री रही हैं — मायावती, और अखिलेश की सरकारों में डिंपल यादव जैसे चेहरे। परंतु उत्तर प्रदेश अभी भी महिला सुरक्षा, लिंगानुपात, मातृ मृत्यु दर, और बालिका शिक्षा के मामले में देश के निचले पायदान पर है। दूसरी ओर केरल और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में राजनीतिक नेतृत्व में महिलाओं की भागीदारी कम है, परंतु सामाजिक सूचकांकों में वे बहुत बेहतर हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व अनावश्यक है। इसका अर्थ है कि वह प्रतिनिधित्व तब अर्थपूर्ण होता है जब वह वास्तविक उद्देश्यों के साथ आता है — न कि जब वह परिवारवाद की उपज हो या राजनीतिक दलों की चुनावी गणित का परिणाम।

महिला सशक्तिकरण की सबसे कटु परीक्षा किसी थाने के सामने खड़ी उस महिला की स्थिति में होती है जो अपनी शिकायत लिखवाने आई है। वह घरेलू हिंसा की पीड़िता है, या दुष्कर्म की, या कार्यस्थल पर उत्पीड़न की। वह थाने पहुँची है — यही अपने आप में बड़ी हिम्मत का काम है क्योंकि भारतीय समाज में शिकायत दर्ज करवाने को 'इज्जत का सवाल' बना दिया जाता है।

परंतु थाने में क्या होता है? सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्देशों, राष्ट्रीय महिला आयोग की गाइडलाइनों, और CrPC की धाराओं के बावजूद देश भर में FIR न लिखने की शिकायतें सामान्य हैं। पीड़िता को 'समझौता करने' की सलाह दी जाती है। उसे कहा जाता है कि 'घर की बात घर में रहनी चाहिए।' महिला थाने खोले गए — परंतु वहाँ भी मानसिकता नहीं बदली। दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों की बात छोड़िए — छोटे शहरों और गाँवों में तो स्थिति और भी विकट है।

यहाँ प्रश्न उठता है: क्या लोकसभा में 181 महिला सांसद होने से किसी थाने का SHO FIR लिखने से मना करेगा? क्या महिला आरक्षण लागू होने से दारोगा की मानसिकता बदलेगी? क्या संसद में बैठी एक महिला सांसद — जो किसी नेता की पत्नी है — उस पीड़िता के लिए कुछ करेगी जो उसके निर्वाचन क्षेत्र के किसी गाँव में रहती है?

भारतीय दंड विधान पहले से ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधानों से भरा है। घरेलू हिंसा अधिनियम 2005, यौन उत्पीड़न अधिनियम 2013 (POSH Act), दहेज निषेध अधिनियम, IPC की धाराएं 354, 375, 498A — ये सब कागज पर मौजूद हैं। समस्या कानून की कमी नहीं है। समस्या कानून के अनुपालन की है। और अनुपालन के लिए जो चाहिए वह है: एक संवेदनशील पुलिस बल, एक स्वतंत्र न्यायपालिका, एक जवाबदेह प्रशासन और एक परिवर्तित सामाजिक मानस।

इनमें से कोई भी महिला आरक्षण से नहीं आएगा। इनके लिए चाहिए: पुलिस सुधार, न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता, IAS/IPS प्रशिक्षण में जेंडर संवेदनशीलता पर ज़ोर, और सबसे महत्त्वपूर्ण — एक ऐसी सांस्कृतिक क्रांति जो थानेदार को यह बताए कि उसकी नौकरी का अर्थ नागरिकों की सेवा करना है, न कि शक्तिशाली लोगों की रक्षा करना।

अनुपालन की इस विफलता का एक और आयाम है: न्यायिक देरी। जब एक महिला हिम्मत करके FIR लिखवाती है, तो मुकदमे की सुनवाई वर्षों तक चलती रहती है। जमानत आसानी से मिल जाती है। गवाह दबाव में आकर मुकर जाते हैं। पुलिस जांच ढीली-ढाली होती है। और अंत में अभियुक्त बरी हो जाता है — या बहुत छोटी सज़ा पाता है। इस पूरी प्रक्रिया में वह महिला टूटती रहती है। यह व्यवस्थागत विफलता है जिसे किसी संसदीय आरक्षण से ठीक नहीं किया जा सकता।

एंटाइटलमेंट की संस्कृति: करदाता पर अनावश्यक बोझ

जब भी किसी वर्ग के लिए विशेष अधिकार या आरक्षण की बात होती है, तो उसके साथ एक 'एंटाइटलमेंट' की मानसिकता भी जन्म लेती है। एंटाइटलमेंट का अर्थ है — यह भाव कि मुझे यह मिलना ही चाहिए, मेरी योग्यता या योगदान चाहे जो हो। यह मानसिकता व्यक्ति को उत्कृष्टता के लिए प्रयास करने की प्रेरणा से वंचित करती है और समाज में एक ऐसा वातावरण बनाती है जहाँ श्रेष्ठता की नहीं, पहचान की राजनीति हावी हो जाती है।

महिला आरक्षण के साथ यह खतरा विशेष रूप से प्रासंगिक है। यदि कोई महिला इस धारणा के साथ राजनीति में आती है कि 'मुझे सीट मिली है क्योंकि मैं महिला हूँ' — तो वह उस नैसर्गिक प्रतिस्पर्धा से वंचित हो जाती है जो एक राजनेता को वास्तव में सक्षम बनाती है। दूसरी ओर जो पुरुष प्रतियोगिता से बाहर हो जाता है — केवल इसलिए कि उसकी सीट आरक्षित हो गई — वह भी इस व्यवस्था को अपमानजनक मानता है।

परंतु एंटाइटलमेंट का सबसे बड़ा बोझ उस करदाता पर पड़ता है जो इस पूरी व्यवस्था को चलाने के लिए अपना पैसा देता है। महिला आरक्षण से जुड़े कई प्रावधानों में — चाहे वह पंचायती राज के स्तर पर हो या नगर निकायों में — विशेष भत्ते, प्रशिक्षण कार्यक्रम, जागरूकता अभियान, और प्रशासनिक पुनर्गठन की लागत आती है। यह बुरा नहीं है यदि इससे वास्तविक परिवर्तन आए। परंतु जब यह पूरी मशीनरी केवल 'प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व' का माध्यम बन जाए — जहाँ पत्नी के नाम पर पति शासन करे — तो यह राष्ट्रीय संसाधनों का घोर अपव्यय है।

इससे भी बड़ी समस्या यह है कि आरक्षण की राजनीति एक ऐसे चक्र को जन्म देती है जो कभी समाप्त नहीं होता। जैसे ही एक वर्ग को आरक्षण मिलता है, दूसरे वर्ग की माँग शुरू हो जाती है। आज महिला आरक्षण में ओबीसी उपकोटा की माँग है। कल अल्पसंख्यकों की माँग होगी। परसों किसी और वर्ग की। इस प्रतिस्पर्धी पहचान की राजनीति में राज्य अपने सभी नागरिकों को मूल अधिकार और समान अवसर देने की अपनी मूल जिम्मेदारी से भटकता जाता है।

यह एक ऐसा आर्थिक और राजनीतिक मॉडल है जहाँ सीमित संसाधनों के लिए असंख्य दावेदार हैं और किसी को वास्तव में न्याय नहीं मिलता। करदाता का पैसा उस नौकरशाही को पोषित करता है जो इन आरक्षण योजनाओं को 'प्रबंधित' करती है — और जो महिला सशक्तिकरण के नाम पर खड़ी की गई है वह इमारत असल में राजनीतिक दलों के चुनावी हितों की सेवा करती है।

जमीनी सशक्तिकरण के चार मुख्य स्तंभ हैं जिन पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। भारत में बालिका शिक्षा के आँकड़े पिछले दो दशकों में सुधरे हैं — यह सच है। परंतु सुधर जाना पर्याप्त नहीं है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार 15-17 वर्ष की आयु में लड़कियों की स्कूल में उपस्थिति दर लड़कों से काफी कम है। यह 'ड्रॉपआउट संकट' सबसे तीव्र रूप से कक्षा आठ से दस के बीच दिखाई देता है — जब लड़कियों को 'विवाहयोग्य' मान लिया जाता है और घर बिठा दिया जाता है।

इसके कारण बहुआयामी हैं: स्कूल में शौचालयों की अनुपलब्धता, दूरी और परिवहन की समस्या, बाल विवाह की परंपरा, घरेलू काम का बोझ, और सबसे महत्त्वपूर्ण — एक सांस्कृतिक दृष्टिकोण जो लड़की की शिक्षा को 'निवेश' नहीं, 'खर्च' मानता है। यह दृष्टिकोण कहता है: लड़की पराये घर जाएगी, तो उसकी पढ़ाई पर क्यों खर्च करें?

इस समस्या का समाधान किसी लोकसभा सीट से नहीं आएगा। इसके लिए चाहिए: हर स्कूल में लड़कियों के लिए अलग शौचालय (और उनकी नियमित सफाई), मध्याह्न भोजन योजना का प्रभावी क्रियान्वयन जो पोषण सुनिश्चित करे, मुफ्त साइकिल या परिवहन सुविधा जिससे दूरस्थ क्षेत्रों की लड़कियाँ स्कूल पहुँच सकें, और सबसे महत्त्वपूर्ण — बाल विवाह के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई जो वास्तव में हो, न केवल कागज पर।

इसके साथ ही उच्च शिक्षा में लड़कियों की संख्या बढ़ाने के लिए छात्रवृत्तियों का विस्तार, महिला छात्रावासों की स्थापना, और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्र खोलने की आवश्यकता है। एक शिक्षित महिला अपने घर में, अपने बच्चों के लिए, और अपने समाज में जो परिवर्तन ला सकती है — वह किसी भी संसदीय आरक्षण से अधिक दीर्घकालिक और गहरा है।

भारत में महिलाओं का स्वास्थ्य एक ऐसा विषय है जो आँकड़ों में जितना दिखता है उससे कहीं अधिक गंभीर है। मातृ मृत्यु दर (Maternal Mortality Rate) पिछले वर्षों में घटी है — 2014-16 में 130 प्रति लाख जीवित जन्म से घटकर 2018-20 में 97 हुई। परंतु यह संख्या अभी भी अस्वीकार्य है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम जैसे राज्यों में यह दर राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक है।

एनीमिया (रक्त अल्पता) भारतीय महिलाओं की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। NFHS-5 के अनुसार 15-49 वर्ष की 57 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं। यह एक राष्ट्रीय संकट है जो उत्पादकता, मातृ स्वास्थ्य, और शिशु विकास — तीनों को प्रभावित करता है। इसके मूल में हैं: अपर्याप्त पोषण, महिलाओं द्वारा परिवार के लिए खाना खिलाकर खुद कम खाने की आदत, और मासिक धर्म के दौरान उचित देखभाल की कमी।

ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) की स्थिति जगजाहिर है। डॉक्टर अनुपस्थित रहते हैं, दवाइयाँ नहीं होतीं, और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता (ASHA) पर जिम्मेदारियों का अंबार है पर संसाधन नाम-मात्र के। इस व्यवस्था में एक आम महिला के लिए प्रसव सुरक्षित कराना एक संघर्ष है — चाहे देश की राजधानी में कितनी भी महिला सांसद क्यों न बैठी हों।

महिला स्वास्थ्य सशक्तिकरण के लिए आवश्यक है: हर गाँव में एक प्रशिक्षित दाई या ANM की उपस्थिति, PHC में महिला डॉक्टरों की नियुक्ति का प्रयास, माहवारी स्वच्छता पर सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने का अभियान, और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक महिलाओं की पहुँच। महिला मानसिक स्वास्थ्य तो एक ऐसा क्षेत्र है जिसे भारतीय स्वास्थ्य नीति ने लगभग पूरी तरह उपेक्षित किया है।

भारतीय कार्यस्थलों में महिलाओं की भागीदारी एक विरोधाभासी चित्र प्रस्तुत करती है। एक ओर IT, BFSI, और मीडिया जैसे उद्योगों में महिलाएं बड़ी संख्या में और उच्च पदों पर हैं। दूसरी ओर, श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) के मामले में भारतीय महिलाएं दुनिया में सबसे कम के बीच हैं। ILO के आँकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी मात्र 20-25 प्रतिशत के आसपास रही है — जबकि वैश्विक औसत लगभग 47 प्रतिशत है।

इसके कारणों में सुरक्षा की चिंता, परिवारों की मंजूरी न होना, बच्चों की देखभाल की सुविधाओं का अभाव, और कार्यस्थल पर उत्पीड़न का भय प्रमुख हैं। 2013 का POSH अधिनियम एक महत्त्वपूर्ण कदम था — परंतु इसका अनुपालन भी असंतोषजनक है। छोटे और मध्यम उद्यमों में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की अनुपस्थिति सामान्य है। और जहाँ ICC है भी, वहाँ शिकायतकर्ता महिला को 'ट्रबलमेकर' का ठप्पा लगाए जाने का भय रहता है।

कार्यस्थल पर सम्मान की यह लड़ाई वास्तव में सांस्कृतिक है। किसी महिला सहकर्मी का मजाक न उड़ाना, उसके विचारों को गंभीरता से लेना, मातृत्व अवकाश के बाद उसे समान अवसर देना — ये छोटी-छोटी बातें हैं जो न किसी आरक्षण से आती हैं, न किसी संसदीय विधेयक से। इनके लिए चाहिए: कॉर्पोरेट संस्कृति में परिवर्तन, नेतृत्व की प्रतिबद्धता, और एक ऐसा सामाजिक वातावरण जहाँ काम करने वाली महिला का सम्मान हो।

सरकारी स्तर पर महिलाओं की कार्यबल भागीदारी बढ़ाने के लिए क्रेच और डे-केयर सुविधाओं की अनिवार्यता, समान वेतन कानूनों का सख्त अनुपालन, और लचीले कार्य घंटों की नीति आवश्यक है। ये नीतिगत हस्तक्षेप महिलाओं को वास्तव में आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाएंगे — और आर्थिक स्वतंत्रता ही सबसे बड़ा सशक्तिकरण है।

न्याय तक पहुँच — या 'Access to Justice' — एक ऐसा संकल्पनात्मक ढाँचा है जो महिला सशक्तिकरण की बुनियाद है। यदि एक महिला को यह भरोसा नहीं है कि वह थाने जाकर शिकायत कर सकती है और उस पर कार्रवाई होगी — तो वह कभी न्याय नहीं माँगेगी। और यदि वह न्याय नहीं माँगती, तो उत्पीड़क को संरक्षण मिलता है और उत्पीड़न का सिलसिला जारी रहता है।

भारतीय पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याएं हैं: अपर्याप्त संख्या (भारत में प्रति लाख नागरिकों पर मात्र 155 पुलिसकर्मी, जबकि संयुक्त राष्ट्र का अनुशंसित मानक 222 है), महिला पुलिसकर्मियों का अत्यंत कम अनुपात (राष्ट्रीय औसत 11 प्रतिशत के आसपास), जातिगत और लैंगिक पूर्वाग्रह, और राजनीतिक दबाव में काम करने की विवशता।

जब एक पीड़िता थाने पहुँचती है और उसकी FIR नहीं लिखी जाती, तो वह सुप्रीम कोर्ट के ललिता कुमारी निर्णय (2013) का हवाला दे सकती है जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि संज्ञेय अपराध की सूचना पर FIR दर्ज करना पुलिस का कानूनी दायित्व है, विवेकाधीन नहीं। परंतु यह जानकारी कितनी महिलाओं को है? कितनी महिलाएं इतनी शिक्षित और सशक्त हैं कि पुलिस को उसके कानूनी दायित्व की याद दिला सकें?

इसके समाधान के लिए आवश्यक है: पुलिस थानों में 'महिला हेल्प डेस्क' का प्रभावी संचालन, महिला पुलिसकर्मियों की संख्या में तत्काल वृद्धि और उनकी विशेष ट्रेनिंग, मोबाइल-आधारित शिकायत पोर्टल जिसका जवाब समयसीमा में अनिवार्य हो, और विधिक सहायता केंद्र जो महिलाओं को निःशुल्क कानूनी सलाह और प्रतिनिधित्व दें। जब एक महिला यह जानेगी कि उसकी बात सुनी जाएगी, तभी वह आगे आएगी।

न्यायालयों में भी त्वरित सुनवाई की आवश्यकता है। फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना हुई है — परंतु उनमें भी जजों की कमी और मामलों का अंबार है। यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की गवाही के लिए सुरक्षित वातावरण — जैसे वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से बयान दर्ज करना — एक आवश्यकता है। न्यायिक देरी न केवल पीड़िता को न्याय से वंचित करती है, बल्कि अपराधियों को प्रोत्साहित भी करती है।

राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है — परंतु वह उपस्थिति वास्तविक होनी चाहिए, प्रतीकात्मक नहीं। एक वैकल्पिक दृष्टिकोण यह हो सकता है: राजनीतिक दलों को कानूनी रूप से बाध्य किया जाए कि वे अपने कुल उम्मीदवारों में से कम से कम एक-तिहाई महिलाओं को टिकट दें। यह अनुपात सुनिश्चित करे कि टिकट देने में पारदर्शिता हो और पारिवारिक संबंध के आधार पर मनोनयन हतोत्साहित हो। यदि किसी दल ने महिला उम्मीदवारों का कोटा पूरा नहीं किया, तो उसके चुनाव आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त प्रतीक को चुनौती दी जा सकती है।

इसके साथ ही पंचायत से लेकर जिला परिषद तक के स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए वास्तविक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के कार्यक्रम चलाए जाएं। यह महिला नेत्री वास्तव में निर्णय लेना सीखे — बजट बनाना, निविदाएं जारी करना, शिकायतें सुनना। यदि पंचायत स्तर पर महिला नेतृत्व को वास्तव में सशक्त बनाया जाए, तो वहाँ से प्रशिक्षित महिला नेत्रियों की एक पूरी पीढ़ी तैयार होगी जो राज्य और केंद्र स्तर तक अपनी योग्यता के दम पर पहुँचेगी।

समाज में महिला नेतृत्व के प्रति सम्मान विकसित करने के लिए पाठ्यक्रम में परिवर्तन भी आवश्यक है। जब बच्चे स्कूल में पढ़ेंगे कि रानी लक्ष्मीबाई, सरोजिनी नायडू, कल्पना चावला, इंदिरा गाँधी, और आधुनिक काल की अनेक महिला उद्यमी और वैज्ञानिकों ने किस प्रकार अपनी पहचान बनाई — तो उनमें एक सांस्कृतिक बदलाव आएगा। यह बदलाव किसी संविधान संशोधन से नहीं, शिक्षा और सांस्कृतिक नवीनीकरण से आएगा।

भारतीय मीडिया की महिला सशक्तिकरण में भूमिका अत्यंत विरोधाभासी है। एक ओर मीडिया महिला उपलब्धियों को सामने लाता है और महिलाओं के खिलाफ अपराधों को उजागर करता है। दूसरी ओर, मुख्यधारा का मनोरंजन मीडिया अभी भी महिलाओं को प्रायः उपभोक्ता वस्तु के रूप में प्रस्तुत करता है — चाहे वह फिल्म हो, टेलीविजन धारावाहिक हो, या विज्ञापन।

महिला आरक्षण की बहस में भी मीडिया ने वही किया जो वह अक्सर करता है: सतह को चमकाया, गहराई से परहेज किया। कैमरे संसद के उस ऐतिहासिक दृश्य पर टिके रहे जब विधेयक पारित हुआ। परंतु किसी ने यह नहीं पूछा कि जब तक परिसीमन नहीं होता, इस कानून का कोई अर्थ नहीं है। किसी ने यह विश्लेषण नहीं किया कि पंचायती राज में महिला आरक्षण के तीन दशकों के बाद 'सरपंच पति' की घटना कितनी व्यापक है।

मीडिया को चाहिए कि वह महिला सशक्तिकरण की कहानियों को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करे। केवल 'सफलता की कहानियाँ' नहीं — बल्कि वे संघर्ष भी जो थाने के बाहर खड़ी महिला झेलती है, वे सवाल भी जो कक्षा आठ के बाद स्कूल छोड़ने वाली लड़की के सामने हैं, और वे बाधाएं भी जो एक महिला को कार्यस्थल पर पुरुष से कम वेतन पर काम करने पर मजबूर करती हैं।

सशक्तिकरण और राजनीतिक नारेबाजी में फर्क करना आवश्यक है। जब एक सरकार एक ऐसा कानून बनाती है जो अगले दस वर्षों तक लागू नहीं होगा, जिसकी शर्तें उसे 'सुविधाजनक रूप से अनिश्चितकाल के लिए स्थगित' कर देती हैं, और जो लागू होने पर भी मुख्यतः परिवारवादी पार्टियों के हित साधेगा — तो उसे 'ऐतिहासिक कदम' कहना एक छल है।

महिला सशक्तिकरण की असली लड़ाई उस गाँव की पाठशाला में है जहाँ एक आठ साल की लड़की पहली बार किताब खोलती है। वह उस जिला अस्पताल में है जहाँ एक गर्भवती महिला को समय पर उचित देखभाल मिलती है। वह उस थाने में है जहाँ एक पुलिस अधिकारी न केवल FIR लिखता है, बल्कि पीड़िता से सम्मान के साथ पेश आता है। वह उस कार्यालय में है जहाँ एक महिला कर्मचारी को उसके काम के लिए सम्मान मिलता है — न उसके लिंग के आधार पर पदोन्नति, न उसके लिंग के आधार पर भेदभाव।

भारत का संविधान अनुच्छेद 14, 15, और 16 के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार देता है। इसका अर्थ यह है कि राज्य का दायित्व है कि वह प्रत्येक महिला को — चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, क्षेत्र, या वर्ग की हो — समान अवसर और सुरक्षा प्रदान करे। यह दायित्व आरक्षण से पूरा नहीं होता — यह दूरा होता है व्यवस्था के वास्तविक सुधार से।

लोकतंत्र की परिपक्वता इसमें नहीं मापी जाती कि संसद में कितनी महिला चेहरे दिखती हैं — यह मापी जाती है इसमें कि हर नागरिक को, हर महिला को, हर वर्ग की, हर क्षेत्र की — न्याय और अवसर मिलता है या नहीं। जब तक यह व्यावहारिक वास्तविकता नहीं बनती, तब तक संसद के शीशे महल में आरक्षित सीटें केवल एक सजावट ही रहेंगी।

सच्चा सशक्तिकरण एंटाइटलमेंट से नहीं आता। वह आता है सामर्थ्य से। और सामर्थ्य बनती है शिक्षा, स्वास्थ्य, कानूनी सुरक्षा, और आर्थिक स्वतंत्रता से। इन चारों के बिना कोई भी आरक्षण केवल एक राजनीतिक मिसएडवेंचर है — एक ऐसा साहसिक अभियान जो दिखने में भव्य है, परंतु जिसकी मंजिल कहीं नहीं। भारत की करोड़ों महिलाएं इससे बेहतर की हकदार हैं।

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