ऋग्वेद का ऐतिहासिक विमर्श : नगरीय (सिंधु सरस्वती सभ्यता) और ग्रामीण भारत की साझी बौद्धिक विरासत

पुरातत्व विज्ञान की एक परिपाटी है जिसके अनुसार किसी सभ्यता का नामकरण उससे जुड़े स्थलों में से पहले पहल मिले स्थल के नाम पर किया जाता है। क्योंकि हड़प्पा जिसे पहले सिंधु घाटी सभ्यता और फिर सिंधु सभ्यता कहा जाने लगा, इस सभ्यता से जुड़े अवशेषों की पहली आधिकारिक खोज थी, पुरातत्व की परिपाटी के अनुसार हड़प्पा सभ्यता कहलाती है। इसके बाद वर्ष 1926 में माधव स्वरुप व 1946 में आर.ई.एम. व्हीलर और आगे अन्य पुरातत्वविदों द्वारा भी खुदाई होती रही। 1930 के दशक में अन्य स्थलों जैसे—मोहनजोदड़ो (1922), धोलावीरा, कालीबंगा, राखीगढ़ी की भी खुदाई शुरू हुई। तब उस समय इनकी लिपि अपठनीय रही थी और फिर 'मोहनजोदड़ो' जैसे स्थल सिंधु नदी के किनारे बसे थे; इसलिए इसे 'सिंधु घाटी सभ्यता' कहा गया। लेकिन समय के साथ खुदाई में ऐसे स्थल (जैसे कालीबंगा, राखीगढ़ी, बनावली, धोलावीरा आदि) भी मिले जो ऋग्वेद मे वर्णित सरस्वती नदी (या घग्घर-हकड़ा) के किनारे थे, तो इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इसे 'सिंधु-सरस्वती घाटी सभ्यता' कहना शुरू किया, ताकि इसके पूरे फैलाव और सभी स्थलों का उल्लेख हो सके।

वर्तमान में इस सभ्यता से जुड़े लगभग 1,500 स्थलों की जानकारी हो चुकी है। इनमें से करीब अधिकांशतः लगबहग 80% स्थल सरस्वती नदी (घग्गर-हकरा) और उसकी सहायक नदियों के किनारे पाए गए हैं जैसे की कालीबंगा, राखीगढ़ी, बनावली, धोलावीरा, लोथल, रोपड़, आलमगीरपुर आदि। शेष स्थल सिंधु नदी घाटी में स्थित हैं। भारत में इनकी संख्या लगभग 925 स्थल हैं, जबकि पाकिस्तान में स्थित स्थलों की संख्या लगभग 575 हैं, जिनमें हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हुदड़ो, कोटदीजी आदि प्रमुख है। यह एक विस्तृत प्रदेश है और जिसमे पर्याप्त भौगोलिक विविधता थी। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 12,99,600 वर्ग किलोमीटर था, जो प्राचीन मिस्र और मेसोपोटामिया सभ्यताओं से कहीं अधिक विशाल था। आलमगीरपुर (मेरठ, उत्तर प्रदेश, भारत) जहा इसका पूर्वी छोर है तो पश्चिमी छोर सुत्कागेनडोर (बलूचिस्तान, पाकिस्तान) को माना जाता यही जिसकी लबाई लगभग 1,600 किलोमीटर है। मांडा (अखनूर, जम्मू-कश्मीर, भारत) और दैमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र, भारत) इसके उत्तरी और दक्षिणी सीमा का निर्धारण करता है जो लगभग 1,200 किलोमीटर लंबा है।

इसका प्रभाव अफगानिस्तान और ईरान तक प्रत्यक्ष दिखता है। संभव है इसका भौगोलिक विस्तार सीरिया और एशिया माइनर (वर्तमान तुर्की) तक हो क्योंकि जिस तरह की साम्यता जेन्द अवेस्ता और ऋग्वेद में मिलती है वह अद्भुत है। पुरातात्विक प्रमाण स्पष्ट करते है की सिंधु सरस्वती नदी का क्षेत्र इसके मुख्य प्रभाव वाले क्षेत्र थे जबकि अन्य नदी घाटी वाले क्षेत्र इससे जुड़े हुए थे। इसकी पुष्टि ऋग्वेद से भी होती है। इस संबंध में पुरातात्विक स्रोतों की एक सीमा को भी समझना होगा। हम मान लेते है की एक ऐसा शहर है जो समय के साथ विलुप्त हो गया। वहाँ के वास करने वाले लोगों के द्वारा प्रयोग में आने वाली समस्त वस्तुओं की सूची संभव है? एक लंबे समय के बाद जो कुछ भी बचे रहेंगे वह अत्यंत न्यून मात्र मे ही होगा। होता तो यह है की हमारे आपके घरों में प्रयोग की जाने वाली वस्तुएं भी महज 10-20 सालों मे बदल जाती है वह भी बिना किसी तरह के पुरातात्विक अवशेष छोड़े। लेकिन उल्लेखनीय यह है की यद्यपि हम अपने घरों के प्रयुक्त वस्तुओं को नष्ट कर देते है लेकिन उससे जुड़ी स्मृतियाँ और उससे जुड़ी कहानियाँ हमारी यादों का हिस्सा हो जाती है और समय के साथ यही यादें स्मृतियाँ मौखिक परंपरा (oral tradition) का रूप ले लेती है यह खासकर अपने पितृ कुल, वंश परंपरा से जुड़े कुछ विशेष आचार और प्रवासन के मामले में तो जरूर होता है और खूब होता है। फिर यही परम्पराएं सामूहिक रूप ले लेती है और साझी होकर संहिताबद्ध (codified) हो जाती है जिसमे कुछ नए अनुभव भी जुड़ जाते है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है। मौखिक परंपरा में समाज की रीति-नीति, संस्कार, इतिहास, संस्कृति और आस्था को अधिकांशत: कहानियों, गीतों, लोक कथाओं और प्रतीकों के माध्यम से सुरक्षित और हस्तांतरित किया जाता है। यह प्रणाली मानव सभ्यता के आरंभ से ही चली आ रही है। यह खास तौर से साक्षरता के अभाव वाले क्षेत्रों में बहुत महत्व दिया जाता है

सिंधु सरस्वती सभ्यता के लोगों के साथ भी यही हुआ। लगभग 10,000 ईसा पूर्व में इस क्षेत्र मे आरंभिक कृषि समुदायों का विकास हुआ। समय के साथ इनके परस्पर सम्मिलन ने सभ्यता के विचार को जन्म दिया जिसे हम आज हड़प्पा सभ्यता कहते है। तत्कालीन समय में यहाँ के लोग प्रचलित संगठित मजहबी विचारधारा से बहुत दूर थे। जो था वह अनुभवजन्य था और यही प्रकृति और पर्यायवरण के प्रति समझ से उपजी थी। यही पहली आध्यात्मिकता थी जिसे कुछ लोगों नें अपनी स्मृतियों में स्थायी बना लिया और आगे बढ़ाया। तत्पश्चात जैसे जैसे पारस्परिक संपर्क बढ़ा, सभ्यता भौतिक रूप से अधिक सक्षम हुई, इन अनुभवों पर गहन चर्चा प्रारंभ हुई। इसी क्रम मे नए विचार जुड़े, नई कहानियाँ जुड़ी और नए अनुभव जुड़े क्योंकि इसका भौगोलिक विस्तार बहुत बड़ा था और विविधता के प्रति समकालीन गुरुओं के बीच आपसी सहमति थी। इससे समकालीन आध्यात्मिकता को नए पंख लगे। श्रुतियों की लंबी परंपरा और उनका विस्तृत वांगमय का यही मूलभूत कारण है। आरंभिक कृषि और पशुपालन के अनुभवों से शुरू होकर भव्य नगरीय उत्कर्ष का यह अनुभव कितना शानदार और विविध रहा होगा इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। ऋग्वेद की वैचारिक भव्यता का यही मूल है। ये जिस भूभाग का प्रतिनिधित्व कर रहे थे उसके पश्चिमी भाग मे ऐसे ही समान पृष्ठभूमि वाले लोग रह रहे थे जिनके अनुभव जेंद अवेस्ता के लिए संकलित हो रहे थे। लेकिन ऋग्वेद से उनकी एक एक अलग भाषाई पहचान थी। चुकी दोनों की अनुभूतियाँ समान थी भाषा, देवता और धार्मिक परंपराओं में दोनों ग्रंथों में कई गहरी समानताएँ मिलती हैं। दोनों की भाषा मेल खाती है। कई शब्द, जैसे सोम (ऋग्वेद) - होमा (अवेस्ता), असुर (ऋग्वेद) - अहुरा (अवेस्ता), मित्र (ऋग्वेद) - मिथ्र (अवेस्ता) तथा वरुण, अग्नि, यज्ञ आदि दोनों ग्रंथों में पाए जाते हैं। दोनों ग्रंथों में यज्ञ, होम, देवता पूजन, अग्नि पूजा, देखे जा सकते है। सामाजिक और धार्मिक संस्कार, मंत्र, गाथा, दान, ऋषि—यहाँ तक कि वर्ण व्यवस्था तक में भी साम्यता है[1]

जहां तक इसके पुरातात्विक स्रोतों का सवाल है मेहरगढ़ (Mehrgarh) जो वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में क्वेटा के पास बोलन नदी घाटी में स्थित है, आरंभिक चरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल माना जा सकता है। यह इस क्षेत्र मे नवपाषाण (Neolithic) काल का सबसे पुराना स्थल माना जाता है, जिसकी समयावधि लगभग 7000 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व तक है। यह इस बहुगोलिक प्रदेश ममें हड़प्पा सभ्यता के उद्भव और विकास को समझने में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। मेहरगढ़ विश्व के उन पहले स्थलों में से है, जहाँ गेहूँ (Wheat) और जौ (Barley) की खेती के प्रारंभिक प्रमाण मिले हैं। जंगली भैंस से पालतू भैंस का विकास का साक्ष्य मेहरगढ़ में प्राप्त होता है। इसकी भौगोलिक स्थिति से पता चलता है इस स्थान ने पश्चिमी (मध्य पूर्व) और दक्षिण एशियाई कृषि परंपराओं को जोड़ा होगा। संभव है की पहली ग्राम्य बस्तियां यहाँ भी बसी होगी जो आगे चलकर होकर प्रारंभिक शहरी संरचनाओं तक विकसित हुईं क्योंकि यहाँ के काले-लाल मिट्टी के बर्तन (Black and Red Ware) और अन्य हस्तशिल्प हड़प्पा सभ्यता से समानता रखते हैं। यहाँ प्रारंभिक हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तनों से लेकर चाक पर बने बर्तनों तक का विकास देखा गया। ये बर्तन हड़प्पा के बर्तनों के प्रारंभिक रूप थे और आगे चलकर यहाँ तांबे के औजारों का उपयोग शुरू हुआ, जो हड़प्पा के धातु-आधारित अर्थव्यवस्था का आधार बना। मिट्टी और पत्थर की मूर्तियाँ, मनके (Beads), और टेराकोटा की वस्तुएँ हड़प्पा की कला से जुड़ी हैं, मातृदेवी (Mother Goddess) की मूर्तियाँ भी हड़प्पा की धार्मिक परंपराओं से समानता रखती हैं। लाजवर्द (Lapis Lazuli) और समुद्री शंख (Conch Shells) की प्राप्ति अन्य बातों के साथ साथ मध्य एशिया और अरब सागर के साथ प्रारंभिक व्यापार के संकेत भी दे सकते है।

क्वेटा घाटी में डंब सादात वर्तमान मे अफगानिस्तान, ईरान और सिंधु घाटी के बीच सांस्कृतिक सेतु के रूप में कार्य करता है। एक कृषि-समृद्ध क्षेत्र है और हड़प्पा सभ्यता के पश्चिमी विस्तार को समझने में सहायक है। यह बोलन और खोजक दर्रों (Bolan and Khojak Passes) के माध्यम से दक्षिणी अफगानिस्तान को सिंधु घाटी से जोड़ता है। इस घाटी में कुल 37 डंब सादात-संबंधित स्थल हैं, जिनमें सबसे बड़ा क्वेटा मिरी है। अन्य प्रमुख स्थल: किली घुल मोहम्मद, किली केची बेग और मंडिगाक (अफगानिस्तान) है। डंब सादात में मिट्टी की ईंटों से बने मजबूत घर मिले हैं, जो कई छोटे कमरों वाले थे। ये संरचनाएँ प्रारंभिक शहरीकरण को दर्शाती हैं जो हड़प्पा के सुनियोजित शहरों का प्रारंभिक रूप हैं। खुदाई में यहाँ काले रंग के डिजाइनों वाले बर्तन मिले हैं जो चाक पर बने हैं। खुदाई से मानव अवशेष, आभूषण और औजार भी मिले है। यह स्थल मातृदेवी पूजा का प्रारंभिक प्रमाण दिखाता है, जो हड़प्पा संस्कृति से जुड़ता है। यहाँ तांबे के औजार (Copper Tools) का भी उपयोग हुआ, जो ताम्र युग की शुरुआत को दर्शाता है।

मध्य एशिया के अन्य कृषि समुदायों की परंपराएँ भी हड़प्पा सभ्यता के उदय से पहले के काल में फले-फूले। ये समुदाय मुख्य रूप से गेहूँ, जौ, दालें और कपास जैसी फसलों साथ साथ गाय, भैंस, भेड़ और बकरी पालते थे। वे सिंचाई के लिए नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर थे। इनकी बस्तियों में कई कमरे, भंडारण के साथ साथ सामुदायिक कार्यों के लिए खुले स्थान भी होती थी। मिट्टी के बर्तन बनाना एक प्रमुख परंपरा थी। ये बर्तन प्रायः सजावटी और उपयोगी होते थे। पत्थर और हड्डी के औजारों का उपयोग के साथ साथ ताँबे और अन्य धातुओं का प्रारंभिक उपयोग भी देखा गया। मातृदेवी की पूजा के प्रमाण मिले हैं व्यापक है। मृतकों को दफनाने की प्रथा थी, जिसमें शवों के साथ बर्तन, आभूषण आदि रखे जाते थे।

हड़प्पा सभ्यता के विकास को समझने में तारकाई किला का विशेष महत्व है। यह प्राचीन कारीगरों की कार्यशालाओं का प्रमाण देता है। यहां बड़े पैमाने पर औजार और हथियारों का उत्पादन होता था, जो सावधानीपूर्वक चयनित पत्थरों से बनाए जाते थे। पुरातत्वविद यह मानते है की यह स्थल कृषि, पशुपालन और शिल्पकला की प्रारंभिक परंपराओं का प्रमाण है, जो मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के बीच सांस्कृतिक पुल का काम करता है। यह स्थल यह बताता है कि कैसे प्रागैतिहासिक समुदायों ने एक जटिल समाज का निर्माण किया, जो आगे चलकर भारतीय उप महाद्वीप की नींव रखने में सहायक सिद्ध हुआ।

अमरी (Amri) पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जो हड़प्पा सभ्यता के प्रारंभिक चरण से संबंधित है। यह पूर्व-हड़प्पा और परिपक्व हड़प्पा संस्कृति के बीच एक संक्रमणकालीन कड़ी को दर्शाता है। अमरी के निवासी गेहूँ, जौ, दालें और कपास जैसी फसलों की खेती करते थे। सिंधु नदी के निकट होने के कारण, यहाँ सिंचाई की प्रणाली विकसित थी। गाय, भैंस, भेड़ और बकरी जैसे पशुओं का पालन आम था। यहाँ के अवशेषों से पशुपालन की उन्नत प्रथाओं का पता चलता है। अमरी में मिट्टी के ईंटों से बने घर और भंडारण सुविधाएँ थीं। बस्तियाँ सुनियोजित थीं, जो सामुदायिक जीवन और संगठन को दर्शाती हैं। अमरी की मिट्टी के बर्तनों की विशेषता उनकी सजावट और निर्माण तकनीक है। ये बर्तन लाल और भूरे रंग के थे, जिन पर काले रंग से ज्यामितीय और प्राकृतिक डिज़ाइन बनाए जाते थे। यह बर्तन पूर्व-हड़प्पा और हड़प्पा शैली के बीच मिश्रण को दर्शाते हैं। पत्थर, हड्डी और ताँबे से बने औजारों का उपयोग होता था। पत्थर के ब्लेड और हथियार खेती, शिकार और अन्य कार्यों में प्रयुक्त होते थे। अमरी में कार्नेलियन, शंख और मिट्टी के मनकों के निर्माण के प्रमाण मिले हैं, जो सौंदर्य और व्यापार की समझ को दर्शाते हैं। सामुदायिक कार्यों के लिए साझा स्थान की प्राप्ति यहाँ की बस्तियाँ एक संगठित समाज की ओर इशारा करती हैं। यहाँ से भी मातृदेवी की मूर्तियों और पूजा के प्रमाण मिले हैं। मृतकों को दफनाने की प्रथा थी, जिसमें उनके साथ बर्तन और आभूषण रखे जाते थे। यहाँ से प्राप्त शंख, मनके और अन्य सामग्री व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा थीं। यह स्थल सिंधु नदी के व्यापारिक मार्ग पर स्थित था, जो इसे क्षेत्रीय और अंतर-क्षेत्रीय व्यापार का केंद्र बनाता था। अमरी में मिट्टी की ईंटों से बने घर और संरचनाएँ थीं, जो प्रारंभिक शहरीकरण की ओर संकेत करती हैं। दीवारों और भवनों में सरल लेकिन कार्यात्मक डिज़ाइन देखा गया।यहाँ की बस्तियाँ में जल निकासी और भंडारण की प्रणालियाँ थीं, जो हड़प्पा सभ्यता की विशेषताओं का प्रारंभिक रूप थीं।

कोट दीजी एक अन्य महत्वपूर्ण स्थल है जो हड़प्पा सभ्यता के प्रारंभिक चरण और परिपक्व हड़प्पा सभ्यता के बीच की हमारी समझ को बढ़ाता है। कोट दीजी में एक मजबूत रक्षात्मक दीवार (प्राचीर) के अवशेष मिले हैं, जो मिट्टी की ईंटों से बनी थी। यह प्रारंभिक शहरीकरण और संगठित समाज का प्रमाण माना जा सकता है। यहाँ मिट्टी की ईंटों से बने घर, भंडारण क्षेत्र और सामुदायिक स्थान मिले हैं। घरों में कई कमरे और आंगन थे, जो एक सुनियोजित बस्ती की ओर इशारा करते हैं। कोट दीजी में जल निकासी की प्रारंभिक प्रणाली के प्रमाण मिले हैं, जो बाद में हड़प्पा सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता बनी। यहाँ से से प्राप्त मिट्टी के बर्तन लाल या भूरे रंग के हैं जिन पर काले रंग से ज्यामितीय पैटर्न, पशु-पक्षियों के चित्र और पौधों की आकृतियाँ बनाई जाती थीं। यह तकनीक हड़प्पा सभ्यता के बर्तनों से मिलती-जुलती थी, जो सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाती है। कुछ बर्तनों पर छेद और ढक्कन के प्रमाण भी मिले हैं। कोट दीजी के निवासी गेहूँ, जौ, दालें और कपास की खेती करते थे। सिंधु नदी की निकटता ने कृषि को समृद्ध किया। गाय, भैंस, भेड़ और बकरी जैसे पशुओं के अवशेष मिले हैं, जो पशुपालन की प्रचलित प्रथा को दर्शाते हैं। यहाँ से प्राप्त शंख, कार्नेलियन और लैपिस लाजुली के मनके पड़ोसी क्षेत्रों (जैसे बलूचिस्तान और मध्य एशिया) के साथ व्यापारिक संपर्कों को दर्शाते हैं। संभव है कोट दीजी एक व्यापारिक केंद्र के रूप में उभर रहा था। ताँबे के प्रारंभिक उपयोग के प्रमाण मिले हैं। कोट दीजी की बस्ती में सामुदायिक संरचनाएँ और रक्षात्मक दीवारें एक संगठित समाज का संकेत देती हैं। मातृदेवी (Mother Goddess) की मूर्तियों और छोटे पूजा स्थलों के अवशेष भी मिले हैं। मृतकों को दफनाने की प्रथा थी, जिसमें उनके साथ बर्तन, आभूषण और अन्य सामग्री रखी जाती थी। कोट दीजी में कुछ स्थानों पर आग लगने के निशान मिले हैं, जो शायद किसी स्थानीय स्तर पर आगजनी का संकेत देते है। संभव है यह कृषि क्षेत्रों के विस्तार का एक प्रारम्भिक पुरातात्विक साक्ष्य भी रहा हो (झूम कृषि के सदृश्य)।

‘इस प्रकार से यह आरंभिक खेतिहर समुदायों का स्वाभाविक विकास था जिसे ‘आरंभिक हड़प्पा’ कहा जाता है। इन्ही समुदायों के द्वारा दीर्घकालीन उपस्थिति और समन्वय नें एक हड़प्पा सभ्यता के जन्म दिया क्योंकि विचार यद्यपि पक्षियों की भांति उड़ते है लेकिन वे अचानक ही प्रतिफलित नहीं हो पाते है जैसा की मार्टीमर व्हीलर ने 1968 में दावा किया था। उनका यह दावा की हड़प्पा का विचार मेसोपोटामिया से आया होगा वास्तव में एक साम्राज्यवादी दुराग्रह था जो यह मानता था की भारत मे जो कुछ भी विदेशी आयातित है। और हड़प्पा सभ्यता का विचार भी। जबकि सच यही है हड़प्पा का विचार कम से कम 10,000 वर्ष पूर्व चली प्रक्रिया की चरम परिणति थी जो लगभग 4,000 वर्ष पूर्व सिंधु और सरस्वती के प्रभाव वाले वाले क्षेत्रों में दृश्यमान होने लगे थे। इन नदियों ने इनके विकास को संभव इसलिए भी बनाया की बाकी सब क्षेत्र दुरूह रहे होंगे और मैदानी भाग गतिशीलता नहीं होती होगी। इन नदी घाटी घाटियों ने कृषि अधिशेष को भी सुनिश्चित किया होगा। इसने बर्तन निर्माण के लिए मिट्टी प्रदान की होगी और व्यापारिक मार्ग भी। इन कारणों से यहाँ के निवासियों में पर्याप्त आर्थिक गतिशीलता रही होगी। इस संदर्भ मे एक अन्य बात भी महत्वपूर्ण है की मानव का प्रवास (वैयक्तिक और साहसिक, आर्थिक-वाणिज्यिक और राजकीय सैन्य विस्तार) सदैव होता रहा है। इनके कारण पशुपालकों, खेतिहर समुदायों के बीच पारस्परिक आदान प्रदान से इसके आसपास के क्षेत्रों के बीच के संसाधनों और उनकी जरूरतों के प्रति सहयोग भी बढ़ा होगा और यही वह पहलू था जिसने व्यापार की आर्थिक व्यवस्था को जन्म दिया जिसने नियंत्रण की एक केन्द्रीय प्रणाली अर्थात सहीं मापन और विनिमय के साधन की जरूरतों को संभव बनाया होगा। संसाधनों पर नियंत्रण के लिए संघर्ष भी हुए होंगे इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इसी क्रम मे एक ऐसा सामाजिक समूह उभरा जो सभ्यतागत प्रतिमानों को बदलती सामाजिक और आर्थिक जरूरतों की रूप रेखा तय करने में लगा था। नया समूह बदलती आर्थिक व्यवस्था में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर रहा था। चुकी सभ्यतागत प्रतिमान शहरों और नगरों में ज्यादा दर्शनीय होते है, सिंधु और सरस्वती नदी वाले केन्द्रीय प्रदेश मे शहरीकरण/नगरीकरण को प्रोत्साहित किया होगा। मोहनजोदड़ो की "नृत्यांगना" (Dancing Girl) जो की कांसे की एक छोटी मूर्ति ~10.5 सेमी की है और जिसमें एक किशोरी को आत्मविश्वासपूर्ण मुद्रा में दिखाया गया है, इसी सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती नजर आती है। तत्कालीन शहरीकरण को मेसोपोटामिया से होने वाले व्यापार से भी मदद मिली होगी। इस व्यापार के पुरातात्विक दृष्टिकोण से भरपूर प्रमाण है। अधिकांश ऐतिहासिक और पुरातात्विक प्रमाण यह दिखाते हैं कि मेसोपोटामिया में हड़प्पा के व्यापारी वहां अस्थायी तौर पर रहते थे। मेसोपोटामिया में हड़प्पा शैली के खिलौनों—विशेषकर मिट्टी, टेराकोटा, मनके, पशुअकृतियाँ आदि के प्रमाण बहुतायत में मिले हैं।

हड़प्पा, वह पहला स्थल था जिसकी खोज की की गई थी। यह वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में रावी नदी के किनारे स्थित है। यह स्थल अपनी उन्नत ग्रिड-आधारित नगर योजना के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें कुशल जल निकासी प्रणाली सहित व्यवस्थित आवासीय व्यवस्था थी। हड़प्पा की नगर योजना आयताकार ग्रिड प्रणाली पर आधारित थी, जिसमें सड़कें उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में सीधी रेखाओं में कटी हुई थीं, जो शहर को आयताकार ब्लॉकों में विभाजित करती थीं। शहर को दो मुख्य भागों में बांटा गया था। उपरी भाग पश्चिमी की ओर स्थित था जो ऊंचे कृत्रिम टीले पर बनाया गया था (लगभग 40 फीट ऊंचा), जो कुल क्षेत्र का लगभग 460 गज उत्तर-दक्षिण और 215 गज पूर्व-पश्चिम फैला था। यहां महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन जैसे अनाज भंडार की प्राप्ति हुई है। निचला भाग पूर्वी ओर स्थित था और यह आवासीय क्षेत्र था। शहर की परिधि में मोटी दीवारें (आधार पर 14 मीटर चौड़ी) थीं, जिनमें नियमित अंतराल पर बुर्ज (bastions) बने थे। मुख्य द्वार उत्तर और पश्चिम में थे। यह लेआउट खगोलीय आधार पर (जैसे तारे रोहिणी या प्लेडीज) उन्मुख था, जो सूर्योदय या चंद्रमा पर निर्भर करता था। मुख्य सड़कें 13 से 34 फीट चौड़ी थीं, जो पूर्णतः सीधी और समकोण पर कटी हुई थीं। कोने गोलाकार थे ताकि गाड़ियां आसानी से मुड़ सकें। छोटी गलियां मुख्य सड़कों से जुड़ी होती थीं, और रथों के निशान से पता चलता है कि सड़कें परिवहन के लिए चिह्नित थीं। नगर प्रबंधन के भरपूर संकेत मिलते हैं। ये सड़कें लगभग 2800-2600 ईसा पूर्व से ही इस तरह विकसित हुईं। घर एक से दो मंजिला (कभी-कभी तीन मंजिला) होते थे, जो ईंटों से बने केंद्रीय आंगन के चारों ओर व्यवस्थित थे। प्रत्येक घर में निजी स्नानघर, शौचालय, रसोई और कुआं होता था। मुख्य दरवाजे सड़क की ओर न खुलते थे, बल्कि गलियों या दीवारों के माध्यम से पहुंच होती थी। खिड़कियां जालीदार या पत्थर की होती थीं। बड़े घर छोटे घरों से जुड़े होते थे जो संभवतः संयुक्त परिवार का संकेत है। सामग्री में सूरज-सुखाई और भट्टी-पकी ईंटें (अनुपात 1:2:4) प्रमुख थीं। हड़प्पा की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इसकी भूमिगत जल निकासी थी, जो स्वच्छता पर जोर देती थी। हर घर की निकासी सड़क के नालों से जुड़ी होती थी, जो पत्थर या ईंटों से बने होते थे। स्नानघरों से पानी अलग नालों से निकलता था, जबकि ठोस अपशिष्ट सोख्ते (soak pits) में जमा होता था। मुख्य नाले में निरीक्षण छेद (manholes) नियमित अंतराल पर होते थे, जिन्हें साफ करने के लिए ईंटें हटाई जा सकती थीं। कोर्बेल्ड छत वाले बड़े नाले थे। प्रत्येक बड़े घर में निजी कुआं था, और सड़कों पर सार्वजनिक कुएं (हड़प्पा में लगभग 30 अनुमानित, 8 खोजे गए)। स्नानघरों के फर्श जलरोधक ईंटों से बने होते थे। हड़प्पा का 'ग्रेट ग्रेनरी' टीले F पर था (50m x 40m), जिसमें 12 कमरे, खोखली फर्श और वेंटिलेशन डक्ट थे। यह गेहूं, चावल आदि भंडारण के लिए था, संभवतः व्यापार या आपातकालीन उपयोग के लिए। सभागार, बाजार और कार्यशालाएं (जैसे अगे्ट, शंख और तांबे की)। हालांकि 'ग्रेट बाथ' मुख्यतः मोहनजो-दारो में था, लेकिन हड़प्पा में भी स्नान संबंधी संरचनाएं मिलीं।

मोहनजो-दारो वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में सिंधु नदी के किनारे स्थित है। यह शहर अपनी उन्नत नगर योजना के लिए विश्व प्रसिद्ध है, जो ग्रिड-आधारित संरचना, उत्कृष्ट जल निकासी प्रणाली, स्वच्छता और व्यवस्थित आवास पर आधारित थी। मोहनजो-दारो का कुल क्षेत्रफल लगभग 250 हेक्टेयर था, और यह हड़प्पा से भी अधिक संगठित दिखता है। मोहनजो-दारो की नगर योजना आयताकार ग्रिड प्रणाली पर आधारित थी, जिसमें सड़कें उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में सीधी और समकोण पर कटी हुई थीं, जो शहर को नियमित ब्लॉकों में विभाजित करती थीं। शहर को दो मुख्य भागों में बांटा गया था: उपरी भाग पश्चिमी ओर स्थित यह भाग ऊंचे कृत्रिम टीले पर बनाया गया था (लगभग 12 मीटर ऊंचा), जो कुल क्षेत्र का लगभग 400 मीटर लंबा और 200 मीटर चौड़ा था। यहां महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन जैसे 'ग्रेट बाथ', अनाज भंडार और विधानसभा कक्ष थे। यह भाग मजबूत दीवारों और रक्षात्मक संरचनाओं से घिरा था, जो बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करती थीं। निचला भाग पूर्वी ओर स्थित था जो एक आवासीय क्षेत्र था। शहर की परिधि में मोटी दीवारें (आधार पर 3-4 मीटर मोटी) थीं, जो ईंटों से बनी थीं। मुख्य द्वार दक्षिण और उत्तर में थे, और शहर की दिशा उत्तर-दक्षिण उन्मुख थी, संभवतः खगोलीय गणनाओं (जैसे ध्रुव तारा) पर आधारित। पूरा शहर लगभग 5 किलोमीटर की परिधि में फैला था, और इसमें कोई अनियमित निर्माण नहीं था। मुख्य सड़कें 9 से 10 मीटर चौड़ी थीं, जो पूर्णतः सीधी और पक्की ईंटों से बनी होती थीं। छोटी गलियां 1.5 से 3 मीटर चौड़ी थीं, जो मुख्य सड़कों से जुड़ी होती थीं।सड़कों के कोने गोलाकार थे, ताकि बैलगाड़ियां या रथ आसानी से मुड़ सकें। सड़कों पर लैंप पोस्ट के प्रमाण मिले हैं, जो रात में रोशनी के लिए इस्तेमाल होते थे। शहर में यातायात प्रबंधन के संकेत हैं, जैसे सड़कों पर निशान और कचरा प्रबंधन। यह योजना बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में होने के बावजूद स्थिर थी, क्योंकि समय-समय पर सड़कें ऊंची की जाती थीं। घर एक से तीन मंजिला होते थे, जो भट्टी-पकी ईंटों (अनुपात 4:2:1) से बने होते थे। प्रत्येक घर में केंद्रीय आंगन, रसोई, स्नानघर और शौचालय होता था। दीवारें 50-70 सेमी मोटी और छत सपाट होती थीं, जो लकड़ी के बीमों पर टिकी होती थीं। मुख्य दरवाजे सड़क की ओर न खुलकर गलियों या पिछवाड़े से होते थे। खिड़कियां ऊंची और जालीदार होती थीं, ताकि हवा आए लेकिन गोपनीयता बनी रहे। बड़े घर (20x20 मीटर तक) छोटे घरों से जुड़े होते थे। सामग्री में जिप्सम प्लास्टर, बिटुमेन (जलरोधक के लिए) और लकड़ी का उपयोग प्रमुख था। घरों में सीढ़ियां और छत पर पहुंच होती थी। मोहनजो-दारो की जल निकासी प्रणाली दुनिया की सबसे प्राचीन और उन्नत थी, जो स्वच्छता पर विशेष जोर देती थी। हर घर की निकासी भूमिगत नालों से जुड़ी होती थी, जो ईंटों या पत्थर से बने होते थे। नाले ढके हुए थे, और उनमें निरीक्षण छेद (manholes) हर 30 मीटर पर होते थे, जिन्हें साफ करने के लिए ईंटें हटाई जा सकती थीं। स्नानघरों से पानी अलग नालों से निकलता था, जबकि ठोस अपशिष्ट सोख्ते गड्ढों (cesspits) में जमा होता था। मुख्य नाले शहर के बाहर सिंधु नदी में गिरते थे, और उनमें झुकी हुई छतें थीं।यदि नाले रुक जाते, तो नई परतें बनाकर शहर ऊंचा किया जाता था (कुल 9 स्तर मिले हैं)। यह प्रणाली इतनी कुशल थी कि आधुनिक शहरों से तुलनीय है। शहर में 700 से अधिक कुएं मिले हैं, जिनमें से कई सार्वजनिक थे। प्रत्येक ब्लॉक में एक कुआं होता था, और पानी की आपूर्ति नहरों से होती थी। 'ग्रेट बाथ' मोहनजो-दारो की प्रतिष्ठित संरचना है, जो 12x7 मीटर का जलकुंड है, जिसमें सीढ़ियां, जलरोधक ईंटें और निकासी व्यवस्था थी। यह धार्मिक या सामाजिक स्नान के लिए था, और इसमें गर्म पानी की व्यवस्था के प्रमाण हैं। कुओं की गहराई 20 मीटर तक थी, और वे ईंटों से मजबूत किए गए थे। ग्रेट बाथ (Great Bath) उपरी भाग में स्थित यह मुख्य आकर्षण है, जो ईंटों से बना और बिटुमेन से जलरोधक था। इसके चारों ओर कमरे थे, संभवतः पुजारियों या स्नानकर्ताओं के लिए। अनाज भंडार 50x40 मीटर का बड़ा भंडार, जिसमें वेंटिलेशन और खोखली फर्श थी, गेहूं, जौ आदि भंडारण के लिए। सभा हॉल (Pillared Hall), बाजार, कार्यशालाएं (मनके, मिट्टी के बर्तन और धातु की)की प्राप्ति भी ऊई है। जो अतीत का कोई मंदिर या किला की ओर इशारा करता है।

कालीबंगन, एक महत्वपूर्ण स्थल है, जो वर्तमान भारत के राजस्थान राज्य में हनुमानगढ़ जिले में सरस्वती नदी (प्राचीन घग्गर नदी) के किनारे स्थित है। यह सभ्यता अपनी व्यवस्थित नगर योजना के लिए जाना जाता है, जो ग्रिड-आधारित संरचना, कुशल जल निकासी और आवासीय व्यवस्था पर आधारित थी। कालीबंगन का कुल क्षेत्रफल लगभग 100 हेक्टेयर था। यहां की योजना कृषि, व्यापार और धार्मिक गतिविधियों को दर्शाती है, जहां अग्नि-वेदिकाएं (fire altars) और भूकंप के प्रमाण मिले हैं। कालीबंगन की नगर योजना आयताकार ग्रिड प्रणाली पर आधारित थी, जिसमें सड़कें उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में सीधी रेखाओं में कटी हुई थीं, जो शहर को नियमित ब्लॉकों में विभाजित करती थीं। शहर को दो मुख्य भागों में बांटा गया था: परी भाग दक्षिणी ओर स्थित यह भाग ऊंचे टीले पर बनाया गया था (लगभग 1.9 मीटर ऊंचा), जो कुल क्षेत्र का लगभग 120x240 मीटर फैला था। यहां महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन जैसे अग्नि-वेदिकाएं और प्रशासनिक संरचनाएं थीं। यह भाग मजबूत दीवारों से घिरा था। निचला भाग उत्तर की ओर स्थित था जो की आवासीय क्षेत्र था। मुख्य द्वार पूर्व और पश्चिम में थे, और शहर की दिशा उत्तर-दक्षिण उन्मुख थी, संभवतः खगोलीय आधार पर। पूरा शहर तीन स्तरों (पूर्व-हड़प्पाई, हड़प्पाई और उत्तर-हड़प्पाई) में विकसित हुआ, और इसमें भूकंप के कारण पुनर्निर्माण के प्रमाण हैं। मुख्य सड़कें 3 से 7.5 मीटर चौड़ी थीं, जो पूर्णतः सीधी और समकोण पर कटी हुई थीं। छोटी गलियां 1.8 से 3 मीटर चौड़ी होती थीं, जो मुख्य सड़कों से जुड़ी होती थीं। सड़कों के कोने गोलाकार थे, ताकि गाड़ियां आसानी से मुड़ सकें। सड़कों पर बैलगाड़ियों के निशान मिले हैं, जो परिवहन व्यवस्था दर्शाते हैं। शहर में यातायात प्रबंधन के संकेत हैं, जैसे नियमित अंतराल पर सड़कें। कालीबंगन में सड़कें मोहनजो-दारो से कम चौड़ी लेकिन समान रूप से व्यवस्थित थीं। घर एक से दो मंजिला होते थे, जो मुख्यतः मिट्टी की ईंटों (सूरज-सुखाई) से बने होते थे, क्योंकि यहां भट्टी-पकी ईंटें कम मिलीं। प्रत्येक घर में केंद्रीय आंगन, रसोई, स्नानघर और शौचालय होता था। दीवारें 40-60 सेमी मोटी और छत सपाट होती थीं, जो लकड़ी के बीमों पर टिकी होती थीं। मुख्य दरवाजे सड़क की ओर न खुलकर गलियों से होते थे। खिड़कियां छोटी और ऊंची होती थीं। बड़े घर छोटे घरों से जुड़े होते थे। सामग्री में मिट्टी का प्लास्टर और लकड़ी प्रमुख थी। यहां घरों में अग्नि-कुंड मिले हैं, जो धार्मिक महत्व दर्शाते हैं।कालीबंगन की जल निकासी प्रणाली कुशल थी, हालांकि मोहनजो-दारो जितनी जटिल नहीं। घरों की निकासी सड़क के नालों से जुड़ी होती थी, जो ईंटों या मिट्टी से बने होते थे। नाले ढके हुए थे, और उनमें सोख्ते गड्ढे (soak pits) होते थे। मुख्य नाले शहर के बाहर गिरते थे, और उनमें निरीक्षण छेद मिले हैं। स्नानघरों से पानी अलग निकलता था। शहर में बाढ़ के कारण निकासी प्रणाली को बार-बार सुधारा गया, और भूकंप के बाद पुनर्निर्माण हुआ। यह प्रणाली स्वच्छता पर जोर देती थी, लेकिन यहां भूमिगत नाले कम थे। शहर में कई कुएं मिले हैं, जिनमें से कुछ सार्वजनिक थे। पानी की आपूर्ति नदी और वर्षा से होती थी, और नहरें घरों तक पहुंचाती थीं।स्नानघरों में जलरोधक फर्श थे। यहां जल संरक्षण के लिए कुंड और बांध के प्रमाण हैं। कालीबंगन में कृषि पर जोर था, इसलिए सिंचाई नहरें महत्वपूर्ण थीं, और यहां विश्व की सबसे प्राचीन जोती हुई खेत मिले हैं। कालीबंगन की अनोखी विशेषता, जहां घरों और सड़कों पर अग्नि-कुंड मिले हैं, जो यज्ञ या धार्मिक अनुष्ठानों के लिए थे। ये ईंटों से बने गोल या आयताकार होते थे। छोटे भंडार मिले हैं, जो कृषि उत्पादों के लिए थे। भूकंप के कारण शहर का पतन हुआ, जैसा कि टूटे घरों से पता चलता है।

राखीगढ़ी हरियाणा के हिसार जिले में स्थित सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख और सबसे बड़ा पुरातात्विक स्थल है। राखीगढ़ी में हड़प्पा सभ्यता की परिपक्व अवस्था की उन्नत शहरी योजना दिखती है, जो मोहनजोदड़ो से भी बड़ी (~300–350 हेक्टेयर) है। यहाँ 11 टीले हैं, जिनमें से 5 मुख्य शहरी क्षेत्र बनाते हैं। पाँच मुख्य टीले (RGR-1 से RGR-5) एक किलेनुमा शहर बनाते हैं, जिसमें ऊँचा टीला (RGR-2, ~14 मीटर) और आवासीय क्षेत्र हैं। RGR-6 पुराना बस्ती क्षेत्र और RGR-7 कब्रिस्तान है। सड़कों का जाल सीधा और सुनियोजित था। सड़कें 1.92 मीटर चौड़ी पक्की सड़कें ग्रिड पैटर्न में थीं, जिनमें कूड़ा संग्रह के लिए कोने बने थे। 2022 की खुदाई में सीधी सड़कें और कूड़ेदान मिले। ईंटों से बनी भूमिगत नालियाँ घरों से गंदे पानी को बाहर ले जाती थीं। विशाल वर्षा जल संग्रहण प्रणाली और टैंक सूखे क्षेत्र में जल प्रबंधन दर्शाते हैं। मिट्टी की ईंटों और टेराकोटा से बने घरों में कुएँ, स्नानघर और आंगन थे। सात कक्षों वाला अनाज भंडार, अग्नि वेदियाँ, और सोने-चाँदी के गहनों की भट्टियाँ मिलीं। बहुमंजिला इमारतें और हवादार डिज़ाइन थे। यह योजना केंद्रीकृत नियोजन, स्वच्छता और स्थिरता को दर्शाती है। हाल की हड्डियों की खोज से सभ्यता का समय ~6000 ईसा पूर्व तक जाता है।

गनवेरिवाला (Ganweriwala) सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) का एक प्रमुख पुरातात्विक स्थल है, जो पाकिस्तान के दक्षिणी पंजाब में चोलिस्तान रेगिस्तान (Cholistan Desert) में स्थित है। यह हकरा नदी (प्राचीन सरस्वती नदी) के किनारे बसा था और सभ्यता के सबसे बड़े शहरों में से एक माना जाता है, जो मोहनजो-दारो और हड़प्पा के बीच लगभग समान दूरी पर है। शहरी योजना इस सभ्यता की विशेषता थी। हालांकि, गनवेरिवाला सबसे कम खुदाई वाला स्थल है इसलिए इसकी योजना मुख्य रूप से सतह सर्वेक्षण और अन्य हड़प्पा स्थलों के समानताओं पर आधारित है। गनवेरिवाला का क्षेत्रफल लगभग 80 हेक्टेयर है, जो इसे हड़प्पा सभ्यता के पाँच प्रमुख शहरों (हड़प्पा, मोहनजो-दारो, धोलावीरा, राखीगढ़ी) में से एक बनाता है। यहाँ दो टीले हैं: टीला A (पूर्वी) और टीला B (पश्चिमी, बड़ा)। शहर दो मुख्य टीलों से बना था, जो एक केंद्रीय मुख्य सड़क से जुड़े हुए थे। यह सड़क परिवहन और वस्तुओं के आवागमन के लिए केंद्रीय मार्ग के रूप में कार्य करती थी। टीले किलेनुमा संरचना दर्शाते हैं, जिसमें दुर्ग (उन्नत क्षेत्र) और निचला नगर (आवासीय) हो सकता था। यह योजना हड़प्पा और मोहनजो-दारो जैसी ही है, जहाँ शहर को पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण दिशाओं में विभाजित किया गया था। सड़कें जाल (ग्रिड) पैटर्न में बनी थीं, जो समकोण पर एक-दूसरे को काटती थीं। मुख्य सड़कें चौड़ी (लगभग 9-34 फुट) और सीधी थीं, जो शहर के दोनों हिस्सों को जोड़ती थीं। यह डिज़ाइन व्यापार, यातायात और स्वच्छता को सुनिश्चित करता था, जैसा कि अन्य स्थलों में देखा गया। हड़प्पा सभ्यता की तरह, यहाँ भी भूमिगत नालियाँ और जल निकासी प्रणाली होने की संभावना है, जो पक्की ईंटों से बनी होती थीं। घरों से गंदे पानी को बाहर ले जाने के लिए ढकी हुई नालियाँ थीं, जो वर्षा जल और अपशिष्ट प्रबंधन के लिए उन्नत थीं। पक्की ईंटों (आयताकार, अनुपात 4:2:1) से बने घर बहुमंजिला हो सकते थे, जिनमें आंगन, स्नानघर और कुएँ शामिल थे। सतह पर मिले अवशेषों में यूनिकॉर्न आकृतियाँ वाली टेराकोटा पट्टिकाएँ मिली हैं, जो धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व दर्शाती हैं।

धोलावीरा (Dholavira) गुजरात के कच्छ जिले में स्थित एक प्रमुख और अत्यंत व्यवस्थित पुरातात्विक स्थल है। यह खादिर बेट द्वीप पर, रण ऑफ कच्छ के मध्य में, प्राचीन सरस्वती नदी के निकट बसा था। धोलावीरा की "नगर योजना" अपनी जटिल और वैज्ञानिक शहरी संरचना के लिए प्रसिद्ध है, जो हड़प्पा सभ्यता की इंजीनियरिंग और नियोजन क्षमता को दर्शाती है। यह स्थल 47 हेक्टेयर में फैला है। यह UNESCO विश्व धरोहर स्थल (2021) भी है। धोलावीरा की नगर योजना अत्यंत सुनियोजित और त्रिस्तरीय थी, जिसमें तीन मुख्य हिस्से थे: किला, मध्य नगर और निचला नगर। यह हड़प्पा सभ्यता के अन्य शहरों से अधिक जटिल और अनूठी है। किला शहर का सबसे ऊँचा और सुरक्षित हिस्सा, जो शासकीय और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र था। इसे मोटी दीवारों (10–13 मीटर मोटी) से घेरा गया था, जिसमें चार बड़े प्रवेश द्वार थे। यहाँ महल जैसी संरचनाएँ थीं। मध्य नगर आवासीय क्षेत्र था जो किले के चारों ओर था। यहाँ नियमित आकार के मकान और सड़कें थीं यह एक बड़ा आवासीय क्षेत्र, जो ग्रिड पैटर्न में व्यवस्थित था। शहर का लेआउट गणितीय अनुपात (5:4) पर आधारित था, जो हड़प्पा सभ्यता में अद्वितीय है। सड़कें सीधी और ग्रिड पैटर्न में थीं, जो समकोण पर एक-दूसरे को काटती थीं। मुख्य सड़कें 10 मीटर तक चौड़ी थीं, और गलियाँ 1.8–3.6 मीटर चौड़ी थीं। सड़कों के किनारे जल निकासी के लिए नालियाँ थीं, जो सुनियोजित यातायात और स्वच्छता को दर्शाती थीं। धोलावीरा की जल प्रबंधन प्रणाली अत्यंत उन्नत थी। शहर में 16 जलाशय (reservoirs) थे, जो मानसून जल संग्रह के लिए बनाए गए थे। सबसे बड़ा जलाशय (79.4 x 7.5 मीटर) पत्थरों से तराशा गया था। भूमिगत नालियाँ पक्की ईंटों और पत्थरों से बनी थीं, जो घरों से गंदे पानी को जलाशयों या शहर के बाहर ले जाती थीं। नहरें जल आपूर्ति के लिए थीं, जो रेगिस्तानी क्षेत्र में जीवन के लिए महत्वपूर्ण थीं। मकान पक्की ईंटों (अनुपात 4:2:1) से बने थे, जिनमें आंगन, स्नानघर, और कुएँ थे। कुछ मकान बहुमंजिला थे। एक विशाल सार्वजनिक उद्देश्य के निमित संरचना (283 x 47 मीटर) मिली है जो सामाजिक और व्यापारिक गतिविधियों के लिए प्रयुक्त हो रहा हो। इसके प्रवेश द्वार पर दस अक्षरों वाला शिलालेख मिला, जो संभवतः दुनिया का पहला साइनबोर्ड है। यहाँ से प्राप्त मनके, मिट्टी के बर्तन, धातु और अनाज भंडार व्यापार और अर्थव्यवस्था को दर्शाते हैं।

कोट डिजी (Kot Diji) सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) का एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जो पाकिस्तान के सिंध प्रांत के खैरपुर से लगभग 45 किमी दक्षिण में, सिंधु नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। यह मोहनजो-दारो के विपरीत किनारे पर है और हड़प्पा सभ्यता के प्रारंभिक चरण (Early Harappan Phase, ~3300–2600 ईसा पूर्व) का प्रतिनिधित्व करता है, जो परिपक्व हड़प्पा अवस्था की ओर संक्रमण को दर्शाता है। कोट डिजी की नगर योजना हड़प्पा सभ्यता की प्रारंभिक अवस्था की है, जहाँ शहर एक किले (citadel) के रूप में विकसित था, जो परिपक्व चरण (जैसे मोहनजो-दारो) की ग्रिड-आधारित योजना का पूर्ववर्ती है। यह ~3000 ईसा पूर्व का है और शहर को पत्थर की मलबे वाली दीवार से घेरा गया था। शहर एक ऊँचे टीले (मुख्य किला क्षेत्र) और निचले आवासीय क्षेत्र में विभाजित था। किला केंद्रीय प्राधिकरण का प्रतीक था, जो शासकीय और धार्मिक गतिविधियों का केंद्र हो सकता था। कुल क्षेत्रफल सीमित था, लेकिन यह एक किलेनुमा बस्ती थी, जो बाढ़ या आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करती थी। यह अमरी और रहमान देहरी जैसे अन्य प्रारंभिक स्थलों से जुड़ा है। प्रारंभिक चरण में पूर्ण ग्रिड पैटर्न नहीं था, लेकिन सीधी सड़कें और गलियाँ थीं, जो बाद के हड़प्पा शहरों की योजना का आधार बनीं। मुख्य सड़कें किले को निचले क्षेत्र से जोड़ती थीं। प्रारंभिक स्तर पर उन्नत भूमिगत नालियाँ नहीं मिलीं, लेकिन सिंधु नदी के निकट होने से जल प्रबंधन प्राकृतिक था। खुदाई में जल संग्रहण के संकेत मिले हैं, जो बाद की परिपक्व प्रणाली का पूर्वसंकेत हैं। शहर में बाढ़ के निशान और जल निकासी के प्रारंभिक साधन पाए गए। पक्की ईंटों और पत्थरों से बने घर और संरचनाएँ थीं, जिनमें आवासीय भवन शामिल थे। किले की दीवारें मोटी (कई मीटर) थीं, जो रक्षा के लिए बनाई गईं। खुदाई में टेराकोटा बैल, मातृ देवी की मूर्तियाँ, और बड़े ईंट-लाइन वाले ओवन मिले। प्रारंभिक हड़प्पा लिपि के संकेत (मिट्टी के बर्तनों पर) और मुहरें भी पाई गईं। अनाज भंडार और कार्यशालाएँ व्यापार और कृषि को दर्शाती हैं। शहर में व्यापक जलने के निशान मिले है। यहाँ से वजन मानकीकरण और मुहरों का उपयोग शुरू हुआ।

नौशरो (Nausharo) सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) का एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मेहरगढ़ से लगभग 6 किमी दूर स्थित है। यह सभ्यता के प्रारंभिक (Early Harappan) से परिपक्व (Mature Harappan) चरण के संक्रमण को दर्शाता है (~2800–2000 ईसा पूर्व)। नौशरो मेहरगढ़ के बाद के चरणों के समकालीन और समान है, जो दक्षिण एशिया के प्रथम शहरों के उदय को दिखाता है। नौशरो की नगर योजना हड़प्पा सभ्यता के प्रारंभिक चरण की है, जहाँ शहर एक छोटी लेकिन सुनियोजित बस्ती के रूप में विकसित था। यह कोट डिजी, अमरी और गाजी शाह जैसे स्थलों के साथ परिपक्व हड़प्पा अवस्था (जैसे मोहनजो-दारो) की ओर संक्रमण का प्रतिनिधित्व करता है। कुल क्षेत्रफल सीमित था, लेकिन यह ग्रिड-आधारित योजना का पूर्ववर्ती है। शहर एक मुख्य आवासीय क्षेत्र से बना था। कोई स्पष्ट किला (citadel) विभाजन नहीं था, लेकिन ऊँचे टीले पर बस्ती थी, जो प्रारंभिक किलेबंदी का संकेत देती है। शहर उत्तर-दक्षिण दिशा में बड़े सड़कों के साथ व्यवस्थित था, जो बाद के हड़प्पा शहरों (जैसे हड़प्पा, कालीबंगन, कोट डिजी) की योजना का आधार बना। प्रारंभिक स्तर पर सीधी सड़कें थीं, विशेष रूप से उत्तर-दक्षिण दिशा में, जो ग्रिड पैटर्न का प्रारंभिक रूप दर्शाती हैं। ये सड़कें यातायात और वस्तुओं के आवागमन के लिए बनी थीं। पूर्ण जाल पैटर्न (जैसे मोहनजो-दारो में) नहीं था, लेकिन यह शहरीकरण की शुरुआत दिखाता है, जहाँ सड़कें समकोण पर कटती थीं। प्रारंभिक चरण में उन्नत भूमिगत नालियाँ नहीं मिलीं, लेकिन सिंधु नदी के निकट होने से प्राकृतिक जल प्रबंधन था। खुदाई में जल संग्रहण के संकेत मिले हैं, जो बाद की परिपक्व प्रणाली (ईंटों से बनी नालियाँ) का पूर्वसंकेत हैं। घरों में साधारण जल निकासी के अवशेष पाए गए, जो स्वच्छता पर ध्यान दर्शाते हैं। घर पक्की ईंटों से बने थे, जिनमें आंगन और साधारण कमरे थे। ईंटों का आकार समान था, जो हड़प्पा मानक (4:2:1 अनुपात) का प्रारंभिक रूप था। कार्यशालाएँ (मिट्टी के बर्तन, मनके और धातु शिल्प) और अनाज भंडार मिले, जो कृषि और व्यापार को दर्शाते हैं। टेराकोटा वस्तुएँ, मूर्तियाँ और प्रारंभिक मुहरें पाई गईं। कोई बड़े सार्वजनिक भवन (जैसे ग्रेट बाथ) नहीं मिले, लेकिन आवासीय संरचनाएँ बहुमंजिला होने के संकेत देते हैं। नौशरो सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ से वजन मानकीकरण, लिपि और व्यापार नेटवर्क (मेसोपोटामिया से जुड़े) की शुरुआत दिखती है। यह मेहरगढ़ से निरंतरता प्रदान करता है, जो दक्षिण एशिया के प्रथम कृषि गाँवों से शहरों तक का संक्रमण दर्शाता है।

रहमान देहरी (Rehman Dheri) सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) का एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक पुरातात्विक स्थल है, जो पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के डेरा इस्माइल खान के निकट स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता के प्रारंभिक चरण (Early Harappan Phase, ~3300–2600 ईसा पूर्व) का प्रतिनिधित्व करता है, जो परिपक्व हड़प्पा अवस्था (जैसे मोहनजो-दारो) की ओर संक्रमण को दर्शाता है। रहमान देहरी की नगर योजना हड़प्पा सभ्यता के प्रारंभिक चरण की है, जहाँ शहर एक आयताकार टीले पर बसा था और ग्रिड-आधारित सड़क नेटवर्क के साथ सुनियोजित था। यह अमरी, कोट डिजी और मेहरगढ़ जैसे स्थलों के समान है, जो शहरीकरण की शुरुआत दर्शाता है। कुल क्षेत्रफल सीमित था, लेकिन यह केंद्रीकृत नियोजन का प्रमाण है। शहर आयताकार आकार का था, जिसमें मुख्य टीला आवासीय और शिल्प क्षेत्रों से बना था। यह एक किलेनुमा बस्ती थी, जो प्रारंभिक केंद्रीकृत प्राधिकरण (centralised authority) को दर्शाती है। शहर को मजबूत दीवारों से घेरा गया था, जो बाढ़ या आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करती थीं। यह परिपक्व हड़प्पा शहरों (जैसे हड़प्पा) की योजना का पूर्ववर्ती है। सड़कें जाल (ग्रिड) पैटर्न में बनी थीं, जो उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में समकोण पर कटती थीं। यह डिज़ाइन यातायात, व्यापार और स्वच्छता को सुनिश्चित करता था। मुख्य सड़कें चौड़ी थीं, जो शहर के विभिन्न हिस्सों को जोड़ती थीं। भवनों की दीवारें और सड़क के किनारे अभी भी दिखाई देते हैं। प्रारंभिक चरण में पूर्ण भूमिगत नालियाँ नहीं मिलीं, लेकिन साधारण जल निकासी प्रणाली थी, जो घरों से गंदे पानी को बाहर ले जाती थी। सिंधु नदी के निकट होने से प्राकृतिक जल आपूर्ति थी। भवन पक्की ईंटों (बर्न्ट ब्रिक्स) से बने थे, जिनमें आवासीय घर, छोटे-मोटे औद्योगिक क्षेत्र शामिल थे। भट्टियाँ (kilns) और स्लैग के अवशेष मिले, जो शिल्प कार्य (bead industry) को दर्शाते हैं। मुहरें, टेराकोटा बैल और मातृ देवी की मूर्तियाँ पाई गईं, जो धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन दिखाती हैं। प्रारंभिक हड़प्पा लिपि के संकेत (inscribed seals) मिले, जो लेखन प्रणाली के विकास को इंगित करते हैं। किलेबंद दीवारें शहर की सुरक्षा के लिए थीं। यह स्थल टोची-गोमल चरण से जुड़ा है, जो हड़प्पा सभ्यता के लेखन के विकास में योगदान देता है। मध्य तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में परिपक्व हड़प्पा चरण की शुरुआत पर स्थल परित्यक्त हो गया। यह दक्षिण एशिया के सबसे पुराने शहरी केंद्रों में से एक है, जहाँ मणि (beads) उद्योग समृद्ध था।

लोथल (Lothal) सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley Civilization) का एक प्रमुख पुरातात्विक स्थल है, जो गुजरात के अहमदाबाद जिले में भाल क्षेत्र में स्थित है। यह सभ्यता का सबसे दक्षिणी शहर माना जाता है और एक महत्वपूर्ण बंदरगाह शहर (port-town) था, जो प्राचीन सरस्वती नदी (अब सूख चुकी) के किनारे बसा था। लोथल की नगर योजना हड़प्पा सभ्यता की परिपक्व अवस्था की है, लेकिन अन्य शहरों (जैसे मोहनजो-दारो) से भिन्न रूप से यह एक आयताकार बस्ती थी, जो ईंट की दीवार से घिरी हुई थी। कोई स्पष्ट किला (citadel) विभाजन नहीं था, बल्कि यह एक एकीकृत शहर था, जो व्यापारिक केंद्र के रूप में डिज़ाइन किया गया था। कुल क्षेत्रफल लगभग 7 हेक्टेयर था, लेकिन डॉकयार्ड के साथ यह बंदरगाह गतिविधियों के लिए अनूठा था। शहर आयताकार था, जिसमें ऊपरी नगर (upper town) और निचला नगर (lower town) था। ऊपरी हिस्सा शासकीय और कार्यशाला क्षेत्र हो सकता था, जबकि निचला हिस्सा आवासीय और बाजार था। शहर को मोटी ईंट की दीवार (बिना आंतरिक विभाजन) से घेरा गया था, जो बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करती थी। बाढ़ (2350 ईसा पूर्व) के बाद शहर का पुनर्निर्माण किया गया, जो सुनियोजित था। सड़कें ग्रिड पैटर्न में बनी थीं, जो उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम दिशाओं में समकोण पर कटती थीं। मुख्य सड़कें चौड़ी (10 मीटर तक) थीं, जो शहर को आयताकार ब्लॉकों में विभाजित करती थीं। सड़कों के किनारे ढकी नालियाँ थीं, जो यातायात और स्वच्छता को सुनिश्चित करती थीं। यह डिज़ाइन व्यापारिक शहर के रूप में कुशलता दर्शाता है। उन्नत जल निकासी प्रणाली थी, जिसमें पक्की ईंटों से बनी भूमिगत नालियाँ घरों से गंदे पानी को बाहर ले जाती थीं। ये नालियाँ सड़कों के साथ-साथ चलती थीं। इसका सबसे अनूठा हिस्सा डॉकयार्ड था। यह दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात कृत्रिम डॉक (222 x 37 x 4 मीटर), जो ज्वार-भाटा से जुड़ा था। इसमें जल प्रवेश-निकास चैनल थे, जो जहाजों के लिए उपयोगी थे। हाल के शोध (2024) से साबरमती नदी के प्राचीन चैनलों की पुष्टि हुई, जो लोथल को व्यापार नेटवर्क से जोड़ते थे।मकान पक्की ईंटों (अनुपात 4:2:1) से बने थे, जिनमें आंगन, स्नानघर और कुएँ थे। कुछ बहुमंजिला थे। कार्यशालाएँ (मनके, धातु, मिट्टी के बर्तन) और अनाज भंडार व्यापार को दर्शाते हैं। ताँबा शुद्ध था, जो अरब प्रायद्वीप से आयातित लगता है। बाजार क्षेत्र और गोदाम जहाजों से आयातित वस्तुओं (ताँबा, चर्ट, अर्ध-कीमती पत्थर) के लिए थे। मेसोपोटामिया से व्यापार के प्रमाण मिले। लिपि वाली मुहरें, टेराकोटा मूर्तियाँ और वजन मानकीकरण हड़प्पा सभ्यता की विशेषताएँ दर्शाते हैं।

द्वारका

द्वारका एक प्राचीन शहर है जो गुजरात के तट पर स्थित था। इसकी नगर योजना पौराणिक वर्णनों और पुरातात्विक खोजों पर आधारित है। महाभारत और पुराणों में इसे एक उन्नत, सुनियोजित शहर के रूप में वर्णित किया गया है, जबकि पुरातात्विक प्रमाण (जैसे एस.आर. राव की खुदाई) इसे देर हड़प्पा काल (लगभग 1700-1500 ई.पू.) से जोड़ते हैं। हाल की खोजें (2025 तक) बताती हैं कि यह एक जलमग्न शहर था, जिसमें ग्रिड पैटर्न वाली सड़कें, किले और सिंचाई प्रणाली थीं। पौराणिक आख्यान बताते है की शहर को छह मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया गया था—प्रशासनिक केंद्र, आवासीय इलाके, बाजार, मंदिर, उद्यान और बंदरगाह। यह एक सुनियोजित ग्रिड सिस्टम पर आधारित था, जहाँ मुख्य सड़कें चौड़ी और सीधी थीं। चारों ओर ऊँची दीवारें (सुवर्णमयी प्राचीर) और छह मुख्य द्वार थे, जो सुरक्षा प्रदान करते थे। शहर के बीच में सुबाहु नदी बहती थी, जो जल प्रबंधन का हिस्सा थी। राजमहल, सभा भवन और आम घरों में आंगन, कमरे और जल निकासी की व्यवस्था थी। पुरातात्विक खोजें मुख्य रूप से जलमग्न अवशेषों (submerged ruins) पर आधारित हैं, जो आधुनिक द्वारका (बेट द्वारका) के तट से 30-40 मीटर गहराई में मिले हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राष्ट्रीय महासागर विज्ञान संस्थान (NIO) की खुदाइयों से पता चलता है कि द्वारका एक प्राचीन बंदरगाह शहर था, जिसकी नगर योजना हड़प्पा सभ्यता से प्रेरित थी। अवशेषों की तिथि लगभग 3000 ई.पू. से 1500 ई.पू. तक है, जो देर हड़प्पा चरण से जुड़ी है। हाल की ASI की 2025 की जलमग्न खोजें इसे 4000 वर्ष पुराना (लगभग 2000 ई.पू.) बताती हैं। शहर को दो मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया गया था—उच्च क्षेत्र (किला या दुर्ग) और निचला क्षेत्र (आवासीय)।

कुल आठ बस्तियाँ (settlements) पहचानी गई हैं, जो क्रमिक विकास दर्शाती हैं। ग्रिड-लाइक पैटर्न वाली सड़कें और गलियाँ मिली हैं, जो हड़प्पा की तरह व्यवस्थित थीं। शहर की नींव पर मजबूत किले की दीवारें (fortified foundations) मिली हैं, जो नदी किनारों पर बनी थीं। पत्थर की दीवारें, गढ़ी (bastions), और सुरक्षा प्रणाली के प्रमाण हैं। हाल की खोजों में प्राचीन सड़कें और पत्थर की संरचनाएँ मिली हैं। ग्रिड पैटर्न में बनी सड़कें, जो मुख्य द्वारों से जुड़ी थीं। खुदाई में प्राचीन सड़कों के अवशेष मिले हैं, जो पक्की और व्यवस्थित थीं। उन्नत सिंचाई प्रणाली (irrigation systems) मिली है, जिसमें नहरें और जल निकासी शामिल हैं। शहर नदी और समुद्र से जुड़ा था, जो जल संरक्षण को दर्शाता है। द्वारकाधीश मंदिर परिसर में तीन मंदिर अवशेष मिले हैं, जो जल-आधारित डिज़ाइन का हिस्सा थे। द्वारका एक प्रमुख बंदरगाह था, जहाँ पत्थर के लंगर (anchors), गोदाम और व्यापारिक संरचनाएँ मिली हैं। यह फारस की खाड़ी और अन्य क्षेत्रों से जुड़ा था, हड़प्पा के लोथल बंदरगाह की तरह। घर पकी ईंटों और पत्थरों से बने थे, जिसमें आंगन और कमरे थे। खुदाई में मिट्टी के बर्तन, मुहरें और औजार मिले हैं, जो शहरी जीवन दर्शाते हैं। मंदिर, सभा भवन और संभवतः बाजार क्षेत्र। 1979 की खुदाई में मंदिर अवशेष मिले हैं। द्वारका की नगर योजना हड़प्पा से काफी मिलती-जुलती है। दोनों में ग्रिड पैटर्न, जल निकासी और किलेबंदी की संयत है। द्वारका को हड़प्पा का तटीय विस्तार माना जाता है, जहाँ लोथल जैसी बंदरगाह व्यवस्था थी। इसका ह्रास जलवायु परिवर्तन, भूकंप और समुद्री कटाव। 2025 में ASI ने 4000 वर्ष पुरानी द्वारका की जलमग्न खोज शुरू की है, जो शहर की दीवारों की नींव खोजने पर केंद्रित है। यूनेस्को इसे सिल्क रोड्स प्रोग्राम के अंतर्गत जलमग्न विरासत के रूप में मानता है।

नगरीकरण के अन्य प्रादर्श

महाभारत में शहरों का वर्णन विभिन्न संदर्भों में मिलता है, जो उस काल की संस्कृति, स्थापत्य, और सामाजिक व्यवस्था को दर्शाता है। महाभारत में उल्लिखित प्रमुख शहरों में हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ, द्वारका, मथुरा, और कुरुक्षेत्र जैसे स्थान शामिल हैं। हस्तिनापुर यह कौरवों और पांडवों की राजधानी थी। महाभारत में हस्तिनापुर को गंगा नदी के तट पर बसा एक समृद्ध और शक्तिशाली नगर बताया गया है। यह कुरु वंश का मुख्य केंद्र था, जहां राजा धृतराष्ट्र और पांडु का शासन था। शहर का वर्णन भव्य महलों, सभाओं, और समृद्ध व्यापारिक गतिविधियों के साथ किया गया है। यहाँ की सभा (जैसे द्यूत सभा) में महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं, जैसे द्रौपदी का चीरहरण। पांडवों द्वारा खांडव वन को जलाकर स्थापित किया गया इंद्रप्रस्थ शहर उनकी राजधानी था। इस नगर को अत्यंत सुंदर और वैभवशाली बताया गया है। ऐसा भी प्रसंग है की मायासुर ने पांडवों के लिए एक अद्भुत सभा भवन (मायासभा) बनाया, जिसमें जादुई और भ्रामक वास्तुकला थी, जैसे पानी और जमीन का भ्रम पैदा करने वाले फर्श। इंद्रप्रस्थ की समृद्धि और वैभव का वर्णन युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मथुरा यदुवंशियों का प्राचीन नगर था, जहां श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। कंस के शासनकाल में यह शहर भय और अत्याचार का केंद्र था, लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा कंस के वध के बाद इसकी महिमा पुनः स्थापित हुई। मथुरा को एक सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र के रूप में वर्णित किया गया है। कुरुक्षेत्र को यद्यपि यह युद्ध के कारण ज्यादा प्रसिद्ध है, कुरुक्षेत्र एक पवित्र तीर्थस्थल और नगर के रूप में भी उल्लिखित है। इसे धर्मक्षेत्र के रूप में जाना जाता है, जहां भगवद्गीता का उपदेश श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया। महाभारत में शहरों का वर्णन प्रायः उनके वैभव, सुरक्षा, और स्थापत्य कला के आधार पर किया गया है। इन शहरों में भव्य महल, सभाएँ, बाजार, और मंदिर थे, जो उस काल की उन्नत शहरी योजना को दर्शाते हैं। शहरों की रक्षा के लिए दुर्ग, परकोटे, और सेनाएँ थीं। सामाजिक और धार्मिक गतिविधियाँ, जैसे यज्ञ और सभाएँ, इन शहरों का महत्वपूर्ण हिस्सा थीं। महाभारत में शहरों का वर्णन न केवल भौतिक संरचना, बल्कि उनके सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक महत्व को भी उजागर करता है।

उत्तर हड़प्पाई संस्कृतियाँ

जब एक बार हड़प्पाई सभ्यता का पतन शुरू हो गया तो इस सभ्यता के शहरी चरण की सभी विशेषताएँ एक-एक कर लुप्त होती चली गईं। नगर योजना, सड़कों का जाल (ग्रिड), मलजल निकासी की व्यवस्था, मानक माप-तौल की प्रणाली जैसी खूबियाँ धीरे-धीरे लुप्त हो गईं और विशिष्ट प्रादेशिक रूपांतरों के साथ एक प्रकार की ग्रामीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई। हड़प्पाई सभ्यता के संपूर्ण क्षेत्र को मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है : (i) उत्तर भारतीय उत्तर-हड़प्पाई संस्कृति का क्षेत्र; जिसमें पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के पाकिस्तानी हिस्से शामिल हैं; (ii) गुजारात तथा महाराष्ट्र; और (iii) बलूचिस्तान। ये संस्कृतियाँ भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की तत्कालीन ताम्रपाषाण संस्कृतियों के साथ परस्पर संपर्क एवं आदान-प्रदान करती रहीं।

इन तीनों क्षेत्रों में कुछ अवशिष्ट विशेषताएँ, जैसे - मृद्भांडों के कुछ रूप, कांस्य उपकरण, मनके और अन्य छोटी वस्तुएँ हड़प्पाई सभ्यता के साथ अपना संपर्क-संबंध दर्शाती हैं। यद्यपि हड़प्पाई सभ्यता 1300 ई.पू. के आसपास लुप्त हो चुकी थी, फिर भी इस सभ्यता में विकसित अनेक सांस्कृतिक विशेषताएँ हमारे दैनिक सांस्कृतिक और भौतिक जीवन में देखी जा सकती हैं;

हड़प्पा सभ्यता और ऋग्वेद

हड़प्पा से जुड़े स्थलों को भारतीय संस्कृति की मूल वैचारिक नींव की खोज के रूप में वर्णित किया जा सकता है। भारतीय संस्कृति की जीवित निरंतरता में एक अनूठी आध्यात्मिक दृष्टि और सामाजिक अनुभव में निहित है। भारतीय संस्कृति न तो केवल सदियों से घटित संयोगवश घटनाओं का परिणाम है, और न ही मात्र प्रवासों और आक्रमणों की लिखावटों से बनी एक अभिलेख। अपने मौलिक स्वरूप में यह ऐसे बुनियादी विचारों का विकास है जो एक सृजनात्मक आधार-मैट्रिक्स का निर्माण करते हैं। ऋग्वेद सहित अन्य वैदिक वंगमयों के विकास के पीछे एक गहरी और स्थायी सृजनशीलता का स्रोत है, जिसकी प्रकृति आध्यात्मिक है। इसमें प्रतिपादित आध्यात्मिक दृष्टि के दो मूल पक्ष थे—वेदों की समग्र या संश्लेषित दृष्टि और श्रमण परंपरा की अतीन्द्रिय दृष्टि। पूर्णता और शून्यता भारतीय अध्यात्म के वे दो ध्रुव थे जिनके चारों ओर इसकी साधना और अनुभूति घूमती रही। वैदिक वांगमय न केवल द्विध्रुवीय आध्यात्मिक संरचना और साधना पद्धति का विश्लेषण करते हैं, बल्कि इसके गहन और प्राचीन इतिहास का भी अन्वेषण करते हैं। आगे चलकर वे उन महान प्रतीकात्मक रूपों—भाषा, मिथक, विज्ञान, साहित्य और कला—का भी अनुगमन करते हैं, जिनमें भारतीयता की बुनियादी दृष्टि अभिव्यक्त हुई। जब से हड़प्पा की सभ्यता की खोज हुई है, अनेक विद्वानों ने एक ओर उसे भारत की लंबी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परंपरा से और दूसरी ओर आर्यों से जोड़ने का प्रयास किया है। इसकी खोज के प्रथम दशक में ही कुछ इतिहासकारों तथा पुरातत्त्वविदों ने सोचा था कि हड़प्पा की सभ्यता वैदिक सभ्यता का ही प्रतिनिधित्व करती है, लेकिन इस सिद्धांत का विरोध करने वालों का मुख्य तर्क यह था कि इस संबंध में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। पिछले 50 वर्षों में किए गए अनुसंधानों से कुछ नए साक्ष्य उपलब्ध हुए हैं और उससे स्थिति काफी बदल गई है।

यदि हम ऋग्वेद के साक्ष्य का आलोचनात्मक अध्ययन करें तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि इसमें जिन लोगों तथा उनकी सभ्यता के संदर्भ मिलते हैं, वे हड़प्पा की सभ्यता के संदर्भ माने जा सकते हैं। ईसापूर्व चौदहवीं शताब्दी के बोगाज-कोई के अभिलेख में ऋग्वैदिक देवताओं का जो उल्लेख मिलता है, उससे पता चलता है कि ऋग्वेद पहले से ही विद्यमान था और उस प्राचीन काल में संस्कृति भारत से एशिया माइनर में फैली थी। जैसा कि इससे पहले इसी अध्याय में स्पष्ट किया गया है, अपने अंतिम रूप में ऋग्वेद का काल लगभग 3000 ई.पू. से बाद का नहीं माना जाना चाहिए। अगले पृष्ठों में हम ऋग्वैदिक और हड़प्पाई सभ्यताओं की समानताओं और उनके बीच पाए गए अंतरों के बारे में चर्चा करेंगे।

हड़प्पाई स्थलों के भौगोलिक वितरण को ऋग्वैदिक भूगोल के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। जैसा कि हम पहले अनुभाग में देख चुके हैं, ऋग्वैदिक भूगोल उत्तर में अफगानिस्तान से दक्षिण में गुजरात तक और पूर्व में गंगा से पश्चिम में कुमा (काबुल), पाकिस्तान तक फैला हुआ था। ऋग्वेद में उल्लिखित सभी नदियों में सरस्वती सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तथा पवित्र मानी जाती थी और सरस्वती एवं उसकी सहायक नदियों के आस-पास का क्षेत्र प्रमुख सांस्कृतिक क्षेत्र था। जैसा कि हमने पहले देखा है, हड़प्पा संस्कृति का मुख्य क्षेत्र सरस्वती की घाटी है, जहाँ 80 प्रतिशत से अधिक हड़प्पाई बस्तियाँ बसी हुई थीं। इस प्रकार, ऋग्वैदिक और हड़प्पाई भूगोल एक ही हैं।

ऋग्वेद में सैकड़ों नगरों, कस्बों और ऐसे दुर्गों का उल्लेख है जो लंबे (पृथिवी) और चौड़े (उर्वी) हैं, गायों से भरे (गोमती), 100 खंभों वाले (शतभुजी) तथा पत्थरों से बने हुए (अश्ममयी) हैं। उसमें शारदी किलों का भी उल्लेख है जो बाढ़ के समय शरण देते थे। इंद्र को पुरंदर यानी नगरों का स्वामी कहा गया है। ऋग्वेद में व्यापार और वाणिज्य से जुड़े लोगों का उल्लेख है, जिन्हें वहाँ वणिक् और पणि कहा गया है, और समुद्र से आने वाले तुर्वस और यदु जैसे वैदिक लोगों की भी चर्चा है।

सिंधु सभ्यता के लोगों को जो पशु ज्ञात थे उनमें से अधिकांश पशुओं; जैसे- भेड़, कुत्ता, महिष वृषभ आदि से ऋग्वैदिक लोग भी परिचित थे। ऋग्वैदिक लोगों के लिए शिकार के जानवर थे : हिरन, सूअर, गौर, शेर और हाथी; सिंधु सभ्यता के लोग भी इनमें से अधिकांश से परिचित थे। वैदिक काल में घोड़ा एक महत्त्वपूर्ण जानवर था। कुछ हड़प्पाई स्थलों पर भी घोड़े की हड्डियाँ और उसकी मिट्टी से बनी मूर्तियाँ पाई गई हैं।

हड़प्पा के लोगों में जो धार्मिक रीति-रिवाज प्रचलित थे, उनमें से कुछ आज भी हिंदुओं में पाए जाते हैं। पीपल के पेड़, साँड (नंदि), शिवलिंग की पूजा किए जाने के प्रमाण हड़प्पाई सभ्यता में पाए गए हैं। कमंडलु भी जिसे आजकल साधु-संन्यासी लोग पवित्र पात्र के रूप में अपने पास रखते हैं, हड़प्पा की सभ्यता में पाया गया है। बहुत-सी छोटी-छोटी मूर्तियाँ भी योगासन की भिन्न-भिन्न मुद्राओं में पाई गई हैं। नौशारो स्थान पर स्त्रियों की कुछ मिट्टी की ऐसी मूर्तियाँ पाई गई हैं, जिनकी मांग में अब भी सिंदूर भरा हुआ है। मांग में सिंदूर भरना विवाहित हिंदू स्त्रियों के लिए सुहाग का प्रतीक है। हड़प्पा से प्राप्त एक मिट्टी की पट्टी पर एक महिष यज्ञ का दृश्य चित्रित है, जो हमें महिषासुर मर्दिनी की याद दिलाता है।

चालाक लोमड़ी और प्यासे कौए की कहानियाँ हड़प्पा के कलशों पर चित्रित पाई गई हैं। हिंदुओं का पवित्र चिह्न स्वस्तिक मुद्राओं और चित्रकारियों में पाया गया है। हवन-कुंडों के रूप में काम में ली जाने वाली अग्नि-वेदिकाएँ भी हड़प्पा की सभ्यता का अभिन्न अंग हैं।

जहाँ तक धातुओं का संबंध है, ऋग्वेद में सोने (हिरण्य) के आभूषणों का उल्लेख है। उस समय कानों में बालियाँ, हाथों में कंगन, पैरों में पायल, गले में हार, मालाएँ और अन्य आभूषण पहनने का रिवाज था। हमने देखा है कि इनमें से । अधिकांश आभूषण हड़प्पा के लोगों द्वारा भी पहने जाते थे। सोने के अलावा ऋग्वेद में एक अन्य धातु अयस् का भी उल्लेख है, जिससे पात्र बनाए जाते थे।ऋग्वेद में अयस् का प्रयोग सामान्य रूप से धातुओं के लिए किया गया है, लेकिन अथर्ववेद में हमें लोहित अयस् और श्याम अयस् का उल्लेख मिलता है। इनमें से लोहित अयम् ताँबे को और श्याम अयम् लोहे को कहा जाता था। विद्वान लोग इस बारे में एकमत हैं कि ऋग्वैदिक काल में केवल ताँबे की ही जानकारी थी इसलिए वहाँ अयस् का प्रयोग ताँबे के लिए हुआ है। ऋग्वेद में पत्थर के औजारों; जैसे गोफन, गुलेल आदि का भी उल्लेख है।

पुरुषों तथा स्त्रियों द्वारा किए जाने वाले केशोपचार का भी ऋग्वेद में उल्लेख है। हड़प्पा के लोगों में भी लगभग वैसा ही रिवाज था। ऋग्वैदिक काल में बालों में तेल लगाया जाता था और उन्हें कंधी से संवारा जाता था। ऋग्वेद में एक ऐसी कुमारी का उल्लेख है, जो अपने बालों की चार वेणियाँ बनाती थी। पुरुष भी कुंडलियाँ बनाकर अपने गलों को सजाते थे और दाढ़ी रखते थे। ऐसी ही देश सज्जा हड़प्पाई सभ्यता की मिट्टी की मूरतों (घु मूर्तियों) में देखने को मिलती हैं। ऋग्वेद में बुनकर और कपड़ा बुनने के लिए उसके करघे, ढरकी और ताने-बाने का उल्लेख है। कुछ हड़प्पाई स्थलों पर भी कपड़े के अवशेष मिले हैं और वहाँ पाई गई कुछ लघु मूर्तियाँ कपड़ा पहने हुए दिखाई गई है।

ऋग्वैदिक सभ्यता और हड़प्पाई सभ्यता में पाई गई उपर्युक्त तथा अन्य अनेक समानताओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हड़प्पाई सभ्यता और वैदिक सभ्यता एक ही हैं और आर्य लोग भारत में बाहर से नहीं आए थे। इस संदर्भ मे हरियाणा के भिरड़ाना नामक जगह जिसे प्राचीनतम पुरातात्विक स्थल होने का भी दर्जा प्राप्त है का उल्लेख करना जरूरी है। यहाँ से मिली पुरातात्विक सामग्री मानव विकास और सभ्यता के उद्भव के कई रहस्यों को उजागर करती है।

भिरड़ाना गाँव फतेहाबाद जिले में स्थित है और इसकी स्थापना लगभग 7570 ईसा पूर्व मानी जाती है। यह सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख नगर था। 2003-2004 में हुए उत्खनन में इस नगर की खोज हुई। यहाँ से मोहनजोदड़ो की नर्तकी की आकृति वाले बर्तन भी मिले हैं, जो इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति को दर्शाते हैं। यहाँ से मिले अवशेषों में 5 सेंटीमीटर मोटी और 31 सेंटीमीटर लंबी ईंटें शामिल हैं, जो इसके प्राचीन होने का संकेत देती हैं। भिरड़ाना को सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे प्राचीन नगर माना गया है, जिसकी स्थापना लगभग 7570 ईसा पूर्व में हुई थी। यहाँ की नगर योजना और वास्तुकला हड़प्पा सभ्यता के अन्य प्रमुख स्थलों के समान विकसित थी। उत्खनन के दौरान मोहनजोदड़ो की कास्य की नर्तकी की आकृति वाले बर्तन भी प्राप्त हुए, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक समृद्धि और उसकी निरन्तरता को दर्शाते हैं। खुदाई में गोलाकार मकान भी मिले हैं, जो प्राचीन मानव बस्तियों की जीवनशैली, वास्तुकला और सामाजिक ढांचे को समझने में मदद करती हैं। ये गोलाकार घर मिट्टी की ईंटों से बने थे, जो न केवल निवास के लिए उपयोग होते थे, बल्कि इनके निर्माण में स्थानीय संसाधनों का उपयोग भी दर्शाता है। यह छोटे परिवार या समूह की ओर भी इशारा करता है। संभवतः प्रत्येक घर में तीन से चार व्यक्ति रहते होगे जिसके कारण से सामूहिक जीवन की आवश्यकता होती होगी। संभव है इन घरों का उपयोग धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों के लिए भी किया जाता था। कईयों में बकरियों के अवशेष मिले हैं जो यह दर्शाता है हैं कि ये स्थान धार्मिक क्रियाकलापों के लिए भी इस्तेमाल होते होंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में गोलाकार घरों का निर्माण आज भी देखा जा सकता है, जो पारंपरिक भारतीय वास्तुकला का हिस्सा हैं। ये घर जलवायु के अनुकूल होते हैं और गर्मी को कम करने में मदद करते हैं। जहां तक इनके ऐतिहासिकता का सवाल है, ये मकान हड़प्पाकालीन संस्कृति से पूर्व की सभ्यता के प्रमाण माने जाते हैं।

इसके साथ साथ भिरड़ाना में मिले मिट्टी के बर्तन सिंधु घाटी सभ्यता के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। ये बर्तन यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में एक विकसित समाज था जो दैनिक जीवन में इनका उपयोग करता था। मिट्टी के बर्तनों पर उकेरे गए जटिल डिज़ाइन और रंगीन चित्रण उस समय की कला और शिल्प कौशल को दर्शाते हैं। इनमें ज्यामितीय आकृतियाँ और प्राकृतिक रूपांकन शामिल हैं, जो उस समय की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को उजागर करते है। आज भी, कई ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाता है, जो उनकी पारंपरिक संस्कृति को बनाए रखने में मदद करता है। ये बर्तन स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी लाभकारी माने जाते हैं, क्योंकि मिट्टी से बने बर्तन भोजन को ताजगी प्रदान करते हैं। मिट्टी के बर्तनों का निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा किया जाता है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को समर्थन प्रदान करते हैं। यह पारंपरिक कारीगरी की एक निरंतरता भी है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही है। कहने की आवश्यकता नहीं की ये बर्तन प्राचीन भारत में रहने वाले लोगों की आदतों, रुचियों, सौन्दर्य के प्रति गहरी समझ के साथ साथ सांस्कृतिक विकास को समझने में मदद करते हैं। खुदाई से अन्य प्रकार के उपकरण, आभूषण और अन्य सामग्री भी मिलें हैं, जो उस समय की तकनीकी और कलात्मक क्षमताओं को दर्शाती हैं। खुदाई में मिले साक्ष्य यह भी दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन व्यापार मार्गों का हिस्सा था, जहाँ यमुना का प्रवाह भी हुआ करता था।

वैदिक साहित्य के प्रमुख स्रोत वेद हैं। वेद का अर्थ है "ज्ञान"। वेद किसी व्यक्ति विशेष द्वारा रचित कोई धार्मिक कृति नहीं हैं और न ही वे किसी खास समय पर रची गई बहुत-सी पुस्तकों का संग्रह हैं अपितु वैदिक साहित्य कई शताब्दियों के दौरान विकसित हुआ है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से सौंपा जाता रहा है। ये साहित्यिक कृतियाँ उत्तरोत्तरै तीन श्रेणियों में रची गई हैं। उनमें से अनेक रचनाएँ आज भी विद्यमान हैं, किंतु बहुत-सी रचनाएँ सदा-सर्वदा के लिए पूर्ण रूप से लुप्त हो चुकी हैं। इनकी तीन श्रेणियाँ हैं :
1. वेद : वेद सूक्तों, प्रार्थनाओं, स्तुतियों, मंत्र-तंत्रों और यज्ञ संबंधी सूत्रों के संग्रह हैं। वेद चार हैं, अर्थात् :

(i) ऋग्वेद : यह सूक्तों का संग्रह है।

(ii) सामवेद : यह गीतों का संग्रह है और इसके अधिकांश गीत ऋग्वेद से लिए गए हैं।

(iii) यजुर्वेद : यह यज्ञ संबंधी सूत्रों का संग्रह है।

(iv) अथर्ववेद : यह तंत्र-मंत्रों का संग्रह है।

वेद वैदिक साहित्य के सबसे प्राचीन भाग हैं और चारों वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन है।

ब्राह्मण ग्रंथ : ये गद्यबद्ध रचनाएँ हैं। इनमें वैदिक मंत्रों, सूक्तों का अर्थ स्पष्ट किया गया है, साथ ही उनके विनियोग और उत्पत्ति आदि की कथाएँ भी दी गई हैं। एक तरह से, इनमें कर्मकांड तथा दर्शन संबंधी जानकारी दी गई है।

आरण्यक और उपनिषद : इनमें से कुछ तो ब्राह्मण ग्रंथों में सम्मिलित या उनसे संबद्ध हैं और कुछ अन्य अलग कृतियों के रूप में विद्यमान हैं। इनमें आत्मा, ईश्वर, जगत आदि के विषय में मुनियों के दार्शनिक विचार संकलित हैं।

ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद चारों में से - किसी-न-किसी वेद से संबद्ध हैं।

वैर्दिक साहित्य का रचयिता ?

वैसे तो प्रत्येक सूक्त एवं मंत्र का कोई-न-कोई ऋषि होता है, जो उस मंत्र का द्रष्टा होता है, लेकिन हिंदुओं ने सदा उनके दिव्य उद्गम पर बल दिया है। इसीलिए वेदों को अपौरुषेय (मनुष्य द्वारा रचित नहीं) और नित्य (शाश्वत) कहा जाता है। यह माना जाता है कि ऋषिगण तो अनुप्राणित मंत्र-द्रष्टा थे, जिन्होंने परमेश्वर से मंत्र प्राप्त किए थे।

इसके अध्ययन से दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। इसके साथ साथ उसे स्वस्थ और सुसंस्कृत संतान सहित धन धान्य की प्राप्ति भी निश्चित है। परंपरा के अनुसार चार वेद है जो अपौरुषेय कहलाते है और इन चार ऋषियों को सर्वप्रथम वैदिक ज्ञान का प्रबोधन हुआ
ऋग्वेद का ज्ञान सबसे पहले अग्नि को मिला।
यजुर्वेद का ज्ञान सबसे पहले वायु को मिला।
सामवेद का ज्ञान सबसे पहले आदित्य को मिला
अथर्ववेद का ज्ञान सबसे पहले अंगिरस को मिला।

इसका अध्ययन हर घर मे होना चाहिए। इसकी पठन पाठन से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है। उप नः सूनवो गिरः शृंण्वन्त्वमृतस्य ये। सुमृळीका भवन्तु नः। [(यः) जो (नः) हमारे (सूनवः) सन्तान हों, वे (अमृतस्य) अविनाशी परमेश्वर वा नित्य वेद की (गिरः) वाणियों को (उप शृण्वन्तु) अर्थज्ञानपूर्वक गुरुमुख से सुनें। इस प्रकार विद्वान् होकर (नः) हमारे लिए (सुमृडीकाः) अति सुखकारी (भवन्तु) हों]

वेद आगे यह भी घोषणा करते है की यः पा॑वमा॒नीर॒ध्येत्यृषि॑भि॒: सम्भृ॑तं॒ रस॑म् । सर्वं॒ स पू॒तम॑श्नाति स्वदि॒तं मा॑त॒रिश्व॑ना अर्थात (यः) जो जन (पावमानीः) परमैश्वर्य स्तुतिरूप ऋचाओं को (अध्येति) पढ़ता है, (सः) वह (ऋषिभिः) मन्त्रद्रष्टाओंसे (संभृतं) स्पष्ट किया हुआ (रसं) ब्रह्मानन्द को (अश्नाति) भोगता है और (सर्वं) सम्पूर्ण (मातरश्विना स्वदितं) वायु से स्वादूकृत (पूतं) पवित्र पदार्थों को (अश्नाति) भोगता है। अतः यदि आप चाहते है की आप धनवान, विद्यावान और ब्राहमविद बनें तो वेदों का अध्ययन अध्यापन करना होगा।

वेदों का प्रत्येक मंत्र लौकिक और अलौकिक कामनाओं की वृद्धि करने वाला है। प्रत्येक सनातनी को स्वयं के निमित्त, एक बेहतर समाज और अंतत राष्ट्र और पूरी वसुधा के निमित्त वेद मंत्रों का अध्ययन नियमित रूप से करना चाहिए। वेदों का एक एक मंत्र ओजस्वी है और इस जगत के कल्याण का सुनिश्चित करने वाला है।

[1] https://sanatankasatya.blogspot.com/2020/11/blog-post_30.html

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