वामपंथी विचारधारा की चुनौतियाँ
वामपंथी विचारधारा और स्वघोषित बुद्धिमत्ता का मिश्रण, एक ऐसा कॉकटेल है जो समाज को धीरे-धीरे जहर देता है। यह विचारधारा खुद को सर्वोच्च नैतिक और बौद्धिक ऊंचाई पर स्थापित करने का दावा करती है, लेकिन वास्तव में यह प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध चलती है। वामपंथ कहीं भी पूर्ण रूप से सफल नहीं हुआ है चाहे सोवियत संघ हो, चीन हो, क्यूबा हो या भारत में नहरुवादी आर्थिक विरासत। यह हिंसा को जन्म देता है, लोकतंत्र को कुचलता है, भ्रष्टाचार को पनपने देता है, और मीडिया-अखबारों तथा शिक्षा प्रणाली को हथियार बनाकर समाज को manipulate करता है। वामपंथ खुद में बुद्धिजीवी होने का भ्रम भरता है। यह एक ऐसा जाल है, जहाँ एक अदना सा सरकारी बाबू को भी लगता है कि वह दुनिया के सारे दुखों का निदान जानता है, बस इसलिए क्योंकि उसने कुछ किताबें पढ़ लीं, सरकारी नौकरी लग गई और सोशल मीडिया पर कुछ नारे लगाने या गए जिसे लाइक मिल गया। असल में, यह बुद्धिजीविता का दिखावा मात्र है एक खोखला तमगा, जो तर्क और उपलब्धियों की बजाय भावुकता पर टिका होता है। वामपंथी खुद को 'इंटेलेक्चुअल' कहते हैं, लेकिन उनकी बहसें अक्सर आंकड़ों से नहीं, बल्कि 'फीलिंग्स' से चलती हैं। अक्सर टीवी बहसों में वे "What I feel' वाक्यांशों का प्रयोग करते है। वामपंथी भ्रम में जीते हैं कि वे ही 'सच्चे विद्वान' हैं। यह भ्रम उन्हें अंधभक्ति की ओर धकेलता है, जहाँ आलोचना को 'फासीवाद' कहकर खारिज कर दिया जाता है।
वामपंथ तथ्य और आंकड़ों को नहीं, विमर्शों को बिलीफ (Belief) मानकर पवित्र कर देता है। वामपंथी विज्ञान और डेटा को 'बुर्जुआ साजिश' कहते है। भारत में वामपंथी इतिहासकारों ने नेहरू युग को 'स्वर्णिम' बनाया, जबकि आंकड़े बताते हैं कि 1947-64 में GDP ग्रोथ मात्र 3.5% रही (मोदी युग में 6-7%)। वामपंथ का यह मूलभूत पहलू है की विमर्श ही सत्य है—'कास्ट ऑप्रेशन', 'ट्रांस फोबिया', 'इस्लामोफोबिया' जैसे शब्दों को पवित्र ग्रंथ बना देना। सोवियत संघ का पतन याद कीजिए, स्टालिन के लाखों कत्लेआम को 'क्रांति की कीमत' कहकर जस्टिफाई किया गया था। आज भी वामपंथी कंबोडिया के पोल पॉट को 'समाज सुधारक' कहने से नहीं हिचकते, जहाँ 25% आबादी मारी गई। वामपंथी तरीकों में तथ्य मायने नहीं रखते; विमर्श ही भगवान है।
दुनिया भर में वामपंथी प्रयोगों की लिस्ट लंबी है, लेकिन सफलता का प्रमाण शून्य। सोवियत संघ (1917-1991) में बोल्शेविक क्रांति के बाद स्टालिन ने 20 मिलियन से अधिक लोगों की हत्या कराई—होलोडोमोर अकाल में यूक्रेन के 4 मिलियन किसान मारे गए। आर्थिक रूप से, 1980 तक जीडीपी प्रति व्यक्ति अमेरिका का मात्र 30% था (वर्ल्ड बैंक डेटा)। 1991 में संघ ढह गया क्योंकि केंद्रीकृत नियोजन ने उत्पादकता को ठप कर दिया। माओ का ग्रेट लीप फॉरवर्ड (1958-1962) ने 45 मिलियन लोगों की मौत कराई (फ्रैंक डिकोटर की 'माओज ग्रेट फेमिन')। कम्युनिस्ट पार्टी आज भी सत्ता में है, लेकिन पूंजीवादी सुधारों (1978 के बाद डेंग शियाओपिंग) के कारण, वामपंथ से नहीं। क्यूबा में फिदेल कास्त्रो के 60 वर्षों में औसत आय $2000 प्रति वर्ष रही, जबकि पड़ोसी डॉमिनिकन गणराज्य $10000 पार कर गया (IMF 2023)। वेनेजुएला का चावेज-मादुरो प्रयोग: 2013 में विश्व की सबसे अमीर अर्थव्यवस्था (तेल भंडार) से 2023 तक 95% गरीबी (UN डेटा), हाइपरइन्फ्लेशन 10 मिलियन %। ये उदाहरण सिद्ध करते हैं: वामपंथी मॉडल जो की संपत्ति का सामूहिककरण और राज्य नियंत्रण पर आधारित होते है हमेशा असफल होता है। यह व्यक्तिगत प्रेरणा को मारता है, जिससे उत्पादन गिरता है। भारत में केरल को छोड़कर वामपंथी शासित राज्य (प. बंगाल 1977-2011) गरीबी और पलायन के केंद्र बने। वामपंथ हिंसा को वैध ठहराता है। लेनिन ने कहा, "क्रांति बिना तोपों के नहीं होती।" सोवियत युग में 18 मिलियन कैदी ठूंस दिए गए। चीन की कल्चरल रेवोल्यूशन (1966-1976) में 1-2 मिलियन लोग मारे गए। कंबोडिया के पोल पोट (1975-1979) ने 2 मिलियन (जनसंख्या का 25%) खेतों में मार डाला। यह हिंसा "श्रेणी संघर्ष" के नाम पर होती है लेकिन भुगतना परिवार को पड़ता है। प्राकृतिक नियम कहता है की मनुष्य प्रतिस्पर्धी है और हिंसा दमनकारी व्यवस्था से जन्म लेती है। वामपंथ इसे उकसाता है। वामपंथ लोकतंत्र का दुश्मन है। एक बार सत्ता मिली, चुनाव खत्म। सोवियत में कोई स्वतंत्र चुनाव नहीं; स्टालिन विरोधियों को "ट्रॉटस्कीवादी" कहकर साफ किया। क्यूबा में एकदलीय राज, वेनेजुएला में मादुरो ने सुप्रीम कोर्ट को अपने पक्ष में मोड़ा। उत्तर कोरिया का किम राजवंश पूर्ण वामपंथी है कोई दूसरा नहीं, कोई लोकतंत्र नहीं।
भारत में CPI(M) ने प. बंगाल में भ्रष्टाचार और दमन से 34 वर्ष शासन किया। नंदीग्राम (2007) में किसानों पर गोलीबारी की गई जिसमें 14 मारे गए। यह "डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म" कहलाता है: ऊपर का आदेश नीचे मानो, कोई बहस नहीं। लोकतंत्र बहुलवाद मांगता है, वामपंथ एक विचारधारा थोपता है। वामपंथ भ्रष्टाचार को जन्म देता है क्योंकि शक्ति केंद्रित होती है। जब कोई निजी संपत्ति ही नहीं होती तो जवाबदेही की कोई अवधारणा ही नहीं होगी। पूंजीवाद में प्रतिस्पर्धा भ्रष्टाचार रोकती है।
वामपंथ प्रकृति विरोधी है। डार्विन का survival of fittest कहता है: प्रतिस्पर्धा से प्रगति। वामपंथ सबको बराबर बनाने के नाम पर सबसे कमजोर को ऊपर चढ़ाता है। सबसे घृणित यह की यह महिलाओं को 'वोक' बनाकर उनको उनके पति और परिवार के विरुद्ध उकसाता है। वामपंथ का फेमिनिज्म एक हथियार है, जो पारिवारिक बंधनों को तोड़ने का काम करता है। 'वोक' बनना मतलब है हर पुरुष को 'पेट्रिआर्की का एजेंट' मानना, हर परिवार को 'दमन का केंद्र' मानना। #MeToo को वामपंथी कार्यकर्ताओं ने इसे सामान्य पति-पत्नी कलह तक खींच लिया। एक सर्वे (NFHS-5, 2021) बताता है कि भारत में 70% महिलाएँ परिवार को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं, लेकिन वामपंथी नैरेटिव उन्हें विद्रोह सिखाता है: 'पति को विरोधी बना दो, परिवार को जेल!' अमेरिका में भी 'वोक कल्चर' ने तलाक दरें बढ़ाईं—CDC डेटा के अनुसार, 1960 के बाद तलाक 250% ऊपर चढ़े, जब फेमिनिस्ट आंदोलन चरम पर था। यह उकसावा समाज को विखंडित करता है, जहाँ महिला को 'पीड़ित' बनाकर वोट बैंक तैयार किया जाता है। वामपंथी कहते हैं 'महिला सशक्तिकरण', लेकिन असल में यह परिवार-विरोधी एजेंडा है, जो अकेली महिलाओं को राज्य की भिक्षा पर निर्भर बनाता है।
वामपंथी खुद को "प्रोग्रेसिव इंटेलेक्चुअल" कहते हैं। नोआम चॉम्स्की से लेकर प्रोफेसरों तक—वे डेटा ignore कर moral high ground लेते है। लेकिन सच तो यह है की लेफ्टिस्ट अधिक पढे लिखे है लेकिन खुश कम है (Genovesse २०२१)। यह कॉकटेल बीमारी पैदा करता है क्योंकि इनके विचारों से productivity गिरती है और इससे परिवार टूटते है। वांपनती खुद को लिबरल कहता है, लेकिन बैलेट नहीं, बुलेट को पूजता है। यह मुखौटा सबसे बड़ा धोखा है। असल में वामपंथी हिंसा के उपासक हैं। केरल में CPI(M) कार्यकर्ताओं के हमले, पश्चिम बंगाल में TMC की गुंडागर्दी (जो वाम से निकली), सबूत साफ हैं। भारत में JNU के 'टुकड़े-टुकड़े' गैंग ने देश-विरोधी नारे लगाए, लेकिन खुद को 'लिबरल' कहा। इतिहास गवाह है: बोल्शेविक क्रांति से लेकर माओ के कल्चरल रेवोल्यूशन तक, वामपंथ ने 1 करोड़ से ज्यादा जानें लीं (ब्लैक बुक ऑफ कम्युनिज्म)। EVM की बात ही क्या करनी-चुनाव हारने पर वोट चोरी हो जाता है। बुलेट ही इनका न्याय है—'रेवोल्यूशन' के नाम पर।
वामपंथ का भ्रम युवाओं और समाज को खोखला कर रहा है। बुद्धिजीविता का दावा करते हुए अज्ञान फैलाना, परिवार तोड़ना, तथ्यों को कुचलना, और हिंसा पूजना यह सब एक वामपंथी एजेंडा है। यह हिंसा, अलोकतंत्र, भ्रष्टाचार, मैनिपुलेशन से भरा हुआ है। वामपंथ प्राकृतिक नियम तोड़ता है, स्वघोषित बुद्धिमत्ता का पक्ष पोषण करता है जो समाज को बीमार बना रहा है। समय है इसे त्यागने का। स्वतंत्रता, बाजार, व्यक्तिवाद ही रास्ता है।
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