हिंदीभाषियों का विमर्श

भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि किसी संस्कृति, सभ्यता और विचारधारा का दर्पण होती है। यह समाज के सरोकारों को तय करती है, उसके मूल्यों को आकार देती है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक विरासत रचती है। हिंदी भाषा, जो भारत की आत्मा मानी जाती है, अपनी यात्रा में विभिन्न प्रभावों से गुजरी है। लेकिन इसकी साहित्यिक विरासत को समझने के लिए उर्दू का उल्लेख अपरिहार्य है। उर्दू, जो इस्लामी अधिपत्य से उपजी है, ने हिंदी साहित्य के नायक-चरित्रों और कथानकों को गहराई से प्रभावित किया। इस्लामी आक्रमण ने भाषाई परिदृश्य और सामाजिक-राजनीतिक मूल्यों-मान्यताओं को बदल दिया। दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में फारसी-अरबी का प्रभाव पड़ा। फारसी लिपि, शब्दावली और इस्लामी सौंदर्यबोध से युक्त उर्दू ने साहित्य को अपना रंग दिया।

उर्दू साहित्य का नायक चरित्र, इस्लामी आक्रांता की छवि से प्रेरित प्रतीत होता है। मीर तकी मीर, ग़ालिब जैसे शायरों के ग़ज़लों में प्रेमी अक्सर विजेता की भाँति उभरता है – आशिक़ का इश्क़ एक युद्ध की तरह वर्णित होता है। "इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के" – यहाँ प्रेम की तीव्रता आक्रामकता से ओतप्रोत है। उर्दू का ऐतिहासिक साहित्य, जैसे 'अकबरनामा' या 'तारीख-ए-फ़रिश्ता', आक्रमणों को विजय गाथाएँ बनाता है। नायक यहाँ सिपाही, बादशाह या सूफी संत होता है, जो कुफ्र पर विजय पाने को अपना धर्म मानता है। इस्लामी अधिपत्य ने उर्दू को 'ग़ज़ल', 'मसनवी' जैसे रूप दिए, जहाँ नायक का संघर्ष धार्मिक उत्साह से प्रेरित होता है।

हिंदी साहित्य पर इस उर्दू प्रभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रेमचंद से मिलता है। वे हिंदी के प्रथम महान उपन्यासकार माने जाते हैं, लेकिन उनका अधिकांश कार्य उर्दू में ही लिखा गया। 'गोदान', 'गबन', 'कर्मभूमि' जैसे उपन्यासों में नायक संघर्षशील तो हैं, लेकिन पृष्ठभूमि में ज़मींदारों और ताल्लुकदारों की छवि इस्लामी शासकों जैसी है। प्रेमचंद के नायक इस्लामी भाव को प्रतिबिंबित करता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि हिंदी साहित्य में उर्दू का प्रभाव 'इस्लामी आक्रामकता' का रूप ले लेता है, जहाँ नायक कमजोर को लूटने या विजय प्राप्त करने वाला बन जाता है। जयशंकर प्रसाद के 'कामायनी' में मनु नायक के रूप में उभरता है, लेकिन उसके संघर्ष में इस्लामी जिहाद का भाव झलकता है। यशपाल, नागार्जुन जैसे लेखकों के नायक ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ते हैं, लेकिन उनकी प्रेरणा उर्दू की क्रांतिकारी ग़ज़लों से ली गई।

इस प्रभाव के पीछे ऐतिहासिक कारण हैं। भारत पर इस्लामी अधिपत्य ने उर्दू को मुस्लिम पहचान का प्रतीक बनाया, जिसका प्रभाव हिंदी साहित्यकारों पर पड़ा। आजादी के बाद भी, हिंदी सिनेमा और लोकप्रिय साहित्य में यह जारी है – 'मुगल-ए-आज़म' से लेकर 'पानीपत' तक, नायक आक्रांता बादशाहों के रूप में चित्रित होते हैं। भाषा के सरोकार तय करने में साहित्य की भूमिका केंद्रीय है। हिंदी का सरोकार अब आज भी इतना ही है कि यह उर्दू नायक को आक्रामक बनाए रखता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'हिंदी साहित्य का इतिहास' में उल्लेख किया है कि उर्दू प्रभाव ने हिंदी को 'इस्लामी रंग' दिया। नायक का आक्रांता स्वरूप आज भी बना हुआ है। ऊपर से वामपंथी विचारों के आरोपण नें मिश्रण हिंदी भाषियों को बीमार, बहुत बीमार बना चुका है। यह एक विचित्र रोग है। यह रोग कोई शारीरिक महामारी नहीं, बल्कि वैचारिक जहर है।

वामपंथी विचारधारा एक घुसपैठिए की तरह फैली। यह समानता का स्वांग रचती है, लेकिन वास्तव में व्यक्तिगत प्रयास को कुचलती है। हिंदी पट्टी—उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश—में यह विचार स्कूलों, कॉलेजों और मीडिया के जरिए परोसा गया। छात्रों को सिखाया गया कि पूंजीवाद शत्रु है, राज्य सब देगा। नतीजा? आलस्य, भ्रष्टाचार और सरकारी नौकरियों की होड़। बेरोजगारी 20% से ऊपर है, लेकिन युवा 'सिस्टम बदलो' के नारे लगाते हैं, बजाय स्किल सीखने के। लगे हाथ secularists नें इसमें धर्मनिरपेक्षता को भी घुसा दिया। ये हिंदी भाषी महिलाओं और समाज को निशाना बनाते हैं। वामपंथी इसे 'सामाजिक न्याय' कहकर समर्थन देते हैं।

यह कॉकटेल हिंदी भाषियों की मानसिकता को विकृत कर रहा है। पहले, हिंदी क्षेत्र रामायण-महाभारत की भूमि था—कर्म, धर्म और परिवार पर आधारित। अब? युवा टिकटॉक पर 'फ्री पैसा' मांगते हैं, या ISIS जॉइन करने का सपना देखते हैं। बिहार में 40% साक्षरता के बावजूद, विचारशून्यता। यूनिवर्सिटी से निकले छात्र आजादी अजादी' चिल्लाते हैं, लेकिन गांव लौटकर अपराध करते हैं। वामपंथी नीतियां जैसे की आरक्षण, सब्सिडी ने मेहनतकश को लाचार बनाया। झारखंड जैसे राज्य नक्सलवाद (वामपंथी) और जिहादी घुसपैठ से जूझ रहे। टॉलरेंस की अवधारणा शक्ति संतुलन से जुड़ी है, संस्कृति को मार रही है।

यह बीमारी आर्थिक भी है। GDP में हिंदी पट्टी का योगदान 25%, लेकिन गरीबी 40%। वामपंथी ट्रेड यूनियन हड़तालें लगाती हैं कामचोर (disruptors) को नेता बनाती है। इसका नतीजा यह होता है कि उद्योग भागते हैं टाटा कोलकाता छोड़ गया, अमूल गुजरात गया। बिहार का युवा गुजरात-महाराष्ट्र जाकर मजदूरी करता हैं और घर लौटकर 'फासीवाद' चिल्लाता है।

शैक्षिक डिग्रियों का कबाड़ा

पतन का स्तर यह है कि यहाँ डिग्री से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस तक हर दस्तावेज 'सेट' हो जाता है, बस थोड़ी सी रिश्वत चुकाओ। B.Ed., ITI या कोई भी तकनीकी डिप्लोमा? मेहनत की क्या जरूरत, जब 'ले-दे' से मामला सुलझ जाता है। उत्तर प्रदेश में तो सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हर साल लाखों छात्र डिग्री 'खरीद' लेते हैं। ITI के सर्टिफिकेट? ड्राइविंग लाइसेंस के लिए तो RTO अफसरों के चक्कर काटने पड़ते हैं—पैसे न दो तो लाइसेंस न दो।

यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, अपमान है। असली योग्य छात्र सड़क पर भटकते हैं, जबकि 'सेट' वाले सरकारी नौकरियों में बैठे आराम फरमाते हैं। बिहार में तो हालात इतने खराब हैं कि इंजीनियरिंग कॉलेजों से निकलने वाले 90% ग्रेजुएट बेरोजगार घूम रहे हैं, क्योंकि उनकी डिग्री कागजी है। हिन्दी भाषी समाज 'जुगाड़' को ही वीरता का पर्याय मानता है। पिता बेटे को सलाह देते हैं: 'पढ़ाई छोड़, पैसे से सेट कर ले।' यह वंचना है—शिक्षा के नाम पर धोखा, जो पीढ़ियों को अंधेरे में धकेल रहा है।

मंदिरों का अपमान

अब मंदिरों की तरफ नजर डालिए। राम मंदिर का उद्घाटन हुआ, लेकिन क्या बदला? हिंदी भाषी क्षेत्र के मंदिर अब टिकटॉक जोन बन चुके हैं। बनारस के घाटों पर पूजा कम, शॉर्ट्स ज्यादा। युवा फोन थामे डांस करते हैं—'हर हर महादेव' के नाम पर वायरल वीडियो। परंपरा? वह तो मर चुकी। कोई दीप प्रज्वलन नहीं, कोई मंत्र पाठ नहीं। बस सेल्फी और लाइक्स की होड़। छोटे मंदिरों में तो हालत और खराब। पुजारी भिक्षा मांगते हैं, भक्त रील्स बनाते हैं। शायद भगवान ने भी थककर छोड़ दिया। क्यों? क्योंकि यहाँ आस्था नहीं, व्यापार है। प्रसाद बेचो, दान की थैली भर लो, लेकिन पूजा? रीयल लाइफ में नहीं। मंदिर रील्स के लिए हो गए। यह धार्मिक पतन है। हमारी संस्कृति में पूजा जीवन का आधार थी, अब वह इंस्टाग्राम स्टोरी बन गई। समाज वंचित है आस्था से, लेकिन हम सब उत्सव मना रहे हैं।

साहित्य का श्मशान: पाठक लुप्त

हिंदी साहित्य का क्या हाल है? यहाँ कवि हैं, लेकिन श्रोता कहाँ? घरों में एक किताब तक नहीं। बच्चे बूढे सब यूट्यूब देखते हैं। एक सर्वे कहता है: उत्तर भारत में प्रति घर औसतन 0.5 किताबें। कवि अपने कैडर के लिए गीत लिखते हैं, पुरस्कार पाते हैं, लेकिन साधारण हिंदी भाषी के घर में एक किताब तक नहीं। । वामपंथी कवि दलित-मुस्लिम गीत गाते हैं, पुरस्कार पाते हैं। लेकिन साधारण श्रोता? वह तो नहीं। प्रयागराज कुम्भ में कवि पाठ होते हैं, लेकिन दर्शक रील्स बनाते हैं। साहित्य अकादमियां गुटबाजी का अड्डा बन गईं। अक्सर हमें लगता है कि जो कहानियाँ हम पढ़ रहे हैं, वे हमारी अपनी जमीन से नहीं जुड़ी हैं। ​हिन्दी साहित्य के नायक और उनकी बातें विदेशी हैं। वामपंथी नायक भारतीय जड़ों, लोक कथाओं और स्थानीय प्रतीकों से घृणा करते हैं। यह साहित्यिक मृत्यु है। पढ़ने की संस्कृति के खात्मे नें समाज को बौध्दिक रूप से तोड़ दिया है। साहित्यकारों को कैडर छोड़कर आम आदमी के लिए लिखना होगा।

राजनीतिक सक्रियता की अधिकता

बिहार जैसे राज्यों में हर टेबल पर, बस में और ट्रेन में राजनीतिक चर्चा सुनने को मिल जाती है। यह अत्यधिक राजनीतिक सक्रियता विकास और जिम्मेदारी को प्रभावित कर रही है। यह स्थिति राज्य के लिए चिंताजनक है। इसके कारण लगातार विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी होती है और लोग सड़कों पर उतर आते हैं। इससे प्रशासनिक कामकाज बाधित होता है। राजनीतिक ड्रामा के कारण बुनियादी ढांचे जैसे सड़कें, पुल और मेट्रो परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं। बजट सत्रों में 500 से अधिक मांगें उठाई जाती हैं, लेकिन अमल कम होता है। नतीजतन, बेरोजगारी और गरीबी बढ़ती है। क्योंकि राजनीतिक विचारों पर कभी लगाम नहीं लगता, जातीय दुराग्रह राजनीतिक विमर्श से मिट ही नहीं पाता। इसका कारण यह है की 1991 के बाद राजनीतिक पार्टियों की स्थापना और जन लामबंदी के प्रेरक तत्व जाति ही रही है।

उप-राष्ट्रवाद का अभाव

उत्तरी भारत जहां करोड़ों हिन्दी भाषी लोग रहते हैं, विकास की रफ्तार बहुत धीमी है। इसका एक बड़ा कारण है हमारी 'उप-राष्ट्रवाद' की कमी। हम कश्मीर, अनुच्छेद 370, सीमा विवादों में तो पूरी ताकत झोंक देते हैं, लेकिन गली-मोहल्ले की टूटी सड़क, गंदी नाली, गांव के जर्जर स्कूल को नजरअंदाज कर देते हैं। यह उपेक्षा ही हमारी पिछड़ापन की असली कहानी है। इनके गांवों में बच्चे कीचड़ भरे स्कूलों में पढ़ते हैं, जहां छत टपकती है और शिक्षक अनुपस्थित रहते हैं। पास की सड़क पर गड्ढे हैं, जिनमें बरसात आते ही जलजमाव हो जाता है। नालियां इतनी गंदी कि बीमारियां फैलती हैं। लेकिन हमारा ध्यान राष्ट्रीय मुद्दों पर रहता है—पाकिस्तान की सीमा पर तनाव, कश्मीर का विशेष दर्जा क्यों?

उप-राष्ट्रवाद का मतलब है अपने क्षेत्र को प्राथमिकता देना। जैसे तमिलनाडु ने अपने भाषा और संस्कृति को मजबूत किया, तो विकास भी तेज हुआ। केरल ने स्थानीय शिक्षा और स्वास्थ्य पर फोकस किया, आज सबसे साक्षर राज्य है। हमारे गांव अंधेरे में डूबे हैं, सड़कें टूटी पड़ी हैं, बिजली कटती रहती है, लेकिन हम दिल्ली के फैसलों पर बहस करते रहते हैं।सोशल मीडिया पर #KashmirHamara ट्रेंड कराते हैं। इस चक्कर हमारा विकास अखिल भारतीय राष्ट्रवाद का शिकार हो जाता है।

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