जातीय व्यवस्था : ऐतिहासिक अवलोकन और आर्थिक सामाजिक विमर्श
वर्तमान मीडिया और राजनितिक वातावरण में जातीय व्यवस्था को लेकर एक एकपक्षीय नकारात्मक का बोलबाला है। वर्तमान संदर्भ जाति प्रथा की उत्पत्ति और उसकी आर्थिक-सामाजिक उपयोगिता पर कोई ठोस विमर्श प्रस्तुत करने के स्थान पर इसे भारत की सारी समस्याओं का जड़ बताता है। यह आज भी औपनिवेशिक व्यवस्था के द्वारा निर्देशित और निर्धारित मूल्यों के अनुरूप संचालित हो रही है। यह दुर्भाग्य है की भारत में ‘कास्ट-सिस्टम’ जैसी स्थायी, जन्माधारित व्याख्या जो की अंग्रेजी राज की दें थी और जो औपनिवेशिक वर्चस्व और राजनीतिक हितों का परिणाम स्वरूप जन्मी थी राजनीतिक विमर्श की धुरी बना दी गई है। असली भारतीय परंपरा वर्ण/जाति को एक सशक्त, जीवंत, योग्यता आधारित व्यवस्था के रूप में देखती है, जिसका उद्देश्य समाज में संतुलन और कौशल आधारित विभाजन रहा है, उच्च-निम्नता या भेदभाव नहीं।
अंग्रेजी काल में हुआ यह था की एक बार जब जेम्स मिल ने अपनी यह समझ बना ली की भारत एक "अशिष्ट" और
"पिछड़ा" समाज है और जिसमे वास करने वाले हिंदू, नपुंसक की तरह, गुलाम के
गुणों में श्रेष्ठ होता है, अंग्रेजी राज जाति
प्रथा को सचेत रूप से संरचनात्मक रूप प्रदान करने मे लग गया ताकि उसकी आलोचना नीतिगत तौर पर लगातार
किया जा सके। इसका एक उद्देश्य यह भी था की तत्कालीन भारत के समाज को बदलना था ताकि
उसकी साम्यता ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति बैठाया जा सके। यह वह दौर था जब कंपनी के अधिकारी सर्वथा
परंपरावादी थे। जैसा की पहला वायसराय
वारेन हेस्टिंग्स ने कहा था वह "इंग्लैंड के लोगों को हिंदुस्तान के स्वरूप से सामंजस्य
बिठाने" के लिए प्रतिबद्ध है।
उसके
अनुसार भारतीय समाज और यहाँ के लोगों की
जीवनशैली की व्याख्या
करना कंपनी का काम था। लेकिन जेम्स मिल का उद्देश्य इसे बदलना था। अन्य समकालीन भी जाति व्यवस्था की असमानताओं को सहजता से स्वीकार करते थे। लेकिन मिल भारत के प्रति एक अजीब सी
कुंठा से ग्रसित थे जो शायद उनके अपने अपने ब्रिटिश समाज के अनुभवों के मिला था। उसने
‘ब्राह्मणों’ जो की भारत के
बौद्धिक विरासत के प्रतिनिधि थे और यहाँ प्रचलित लोकाचारों के प्रतिनिधि थे के प्रति घृणित विचारों से ग्रसित रहा। उसने
जाति को "अधीनता
की एक अपमानजनक और हानिकारक व्यवस्था" बताया और हिंदू "पुजारीवाद की
व्यवस्था" को "सबसे भयानक और कष्टदायक अंधविश्वास पर आधारित" बताया।
इसी कारण मिल ने हिंदुओं को "मानव जाति का सबसे गुलाम हिस्सा" बताया। ऐसा नहीं था जेम्स
के ये विचार ही सर्व मान्य थे। माउंटस्टुआर्ट
एल्फिंस्टन (Mountstuart
Elphinstone) जो बॉम्बे के गवर्नर (1819-1827) के रूप में जाति प्रथा को भारतीय
समाज की महत्वपूर्ण वास्तविकता माना। उन्होंने जाति व्यवस्था के प्रति सम्मानजनक
रवैया अपनाया क्योंकि यह सामाजिक
स्थिरता का स्रोत था और इसने भारत के पूरे ऐतिहासिक काल में आर्थिक समृद्धि को
सुनिश्चित किया था। लेकिन क्योंकि मिल राजकीय सेवा में थे, औपनिवेशिक सत्ता ने जेम्स मिल
वाली निर्देशित व्यवस्था को न केवल स्थायी ही
नहीं बनाया, बल्कि उसे अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक सुविधा के लिए संहिताबद्ध किया और एक दमनकारी
रूप प्रदान कर दिया।
परंपरागत रूप से जाति प्रथा में पर्याप्त गतिशीलता थी। ग्रामीण समाज में जाति केवल
जन्म से तय सामाजिक स्थिति भर नहीं था। जातीय व्यवस्था विभिन्न
जातीय पेशागत भूमिकाओं, ग्राम-देवताओं तथा विविध सांस्कृतिक प्रथाओं से निर्मित
संबंधों के माध्यम से एक तुलनात्मक रूप से लचीली सामाजिक व्यवस्था के रूप में काम
करती थी। परंतु ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारतीय समाज को ब्रिटिश के समाज के अनुरूप
ढालने और उस पर नियंत्रण सुदृढ़ करने के उद्देश्य से जनगणना और ‘एथनोग्राफी’ की एक
नई प्रशासनिक प्रणाली विकसित की। इस परियोजना के माध्यम से जाति, धर्म और समुदायों को ऐसे ‘वर्गों’ में बांधा गया जिन्हें औपनिवेशिक शासन के
लिए प्रबंधनीय और गणनायोग्य बनाया जा सके। 1871 से आरम्भ हुई decennial (दशवार्षिक) जनगणनाओं में लोगों से उनकी जाति, धर्म और पेशा आदि दर्ज कराए गए, जिससे पहली बार अखिल भारतीय
स्तर पर जाति को एक समान प्रशासनिक श्रेणी के रूप में माना जाने लगा। अनेक स्थानीय विशेषताओं जो की कहीं अधिक लचीली थी अब स्थायी, क्रमबद्ध और कठोर वर्गों में तब्दील होने लगे। इसी क्रम मे ब्रिटिश राज ने शिक्षा, नियुक्ति, भू-राजस्व तथा सैनिक भर्ती जैसी नीतियों में जाति-आधारित
वर्गीकरण को एक वैध मानदंड मान लिया। एक सवर्ण या उच्च जातियों का एक वर्ग गढ़ा गया
जो ब्रिटिश राज से नौकरियों में अवसरों की माँग करता था, जबकि निम्न और ‘अछूत’ मानी जाने वाली जातियों को प्रायः कोई अवसर प्राप्त नहीं
था जबकि उनके पेश जो की आर्थिक उत्पादन की एक इकाई थे को को सीधे ब्रिटिश राज ने समाप्त
किया था जिसने उनके समकालीन आर्थिक समृद्धि से वंचित कर दिया था। सैनिक भर्ती, पुलिस सेवा और राजकीय नौकरियों में विशेष जातियों को ‘वफादार’ या ‘योद्धा’
घोषित कर विभिन जातीय समूहों के बीच अविश्वास और वैमनस्य को बढ़ावा दिया गया।
इसी के निमित्त ‘मनुस्मृति जैसे ग्रंथों सार्वभौमिक स्रोत के रूप में अपनाया, जबकि वास्तविक सामाजिक जीवन विविध स्थानीय रीति-रिवाजों और प्रथाओं पर आधारित
था। इस संहिताकरण के परिणामस्वरूप अनेक जातिगत तथा पितृसत्तात्मक नियमों को
औपचारिक कानूनी वैधता मिल गई जो समकालीन समाज में प्रचलन मे ही नहीं थी। भगवद गीता का संदर्भ यह अपेक्षित है। इस पूज्य ग्रंथ में व्यक्तित्व
की उन्नति और समाज के भले के लिए कर्मों का महत्व बताया गया है। जाति और वर्ण पर
आधारित किसी भेदभाव का समर्थन इसमे नहीं किया गया है। इसके श्लोकों में वर्ण व्यवस्था का वर्णन है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं:
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं
गुणकर्मविभागश:।
तस्य कर्तारमपि
मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥ (4.13)
अर्थात "चातुर्वर्ण
व्यवस्था मैंने (भगवान ने) गुणों और कर्मों के आधार पर रची है। उस व्यवस्था के
कर्ता को भी मुझे ही जानो, क्योंकि मैं ही अनश्वर
कर्ता हूँ।" यह श्लोक यह दर्शाता है कि वर्ण व्यवस्था को गुणों और
कर्मों के आधार पर आधारित था। अर्थात व्यक्ति के गुण और कर्म ही उसकी स्थिति और कर्तव्य
का निर्धारण करते हैं, न कि जन्म या जाति। इस
श्लोक में यह भी स्पष्ट किया कि इस व्यवस्था का उद्देश्य धर्म, समाज और जीवन के उद्देश्य के साथ
सामंजस्य बनाए रखना है।
जो भी हो जेम्स मिल द्वारा समझी गई जातीय दुराग्रहों पर आधारित नीतियों का
समग्र परिणाम यह हुआ कि जाति धीरे‑धीरे एक अनिवार्य और जन्म-आधारित पहचान में बदल
गई। औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा तैयार की गई सूचियाँ, रजिस्टर और
नियमावली ने जाति की सीमाओं को अधिक दृढ़ और सार्वजनिक बना दिया, जिससे उनसे बाहर निकलने या उन्हें पुनर्परिभाषित करने की संभावनाएँ सीमित हो
गईं। जातीय गतिशीलत और परस्पर
संवाद समय के साथ सिमटता गया। इस तरह से जाति आधारित
भेदभाव को बीसवीं सदी तक ककहों अधिक कठोर और संगठित हो गई। प्रोफेसर बलू (S.N.
Balagangadhara) के विचार है की "कास्ट सिस्टम" जैसा कोई संगठित
प्रणाली भारत में कभी रहा ही नहीं। उनके अनुसार हर समाज में जाति जैसे सामाजिक समूह
होते हैं। उनका यह मानना हैं कि 'ब्राह्मणवाद', 'हिंदूइज़्म', 'बौद्ध इज़्म' जैसी धारणाएँ भी
पश्चिमी Indology (इंडोलॉजी) ने गढ़ी हैं। भारत में इनकी कोई परंपरा या ठोस
अस्तित्व नहीं। ये अवधारणाएँ और शब्द भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक बहुलता को एक
सांचे में ढालने की औपनिवेशिक कोशिशों का हिस्सा हैं। भारतीय परंपरा में ऐसा कोई
अनिवार्य फिक्स्ड सिस्टम नहीं था। महालिंगम
बालाजी का अध्ययन भी यही बताता है कि "जाति-प्रथा" (caste system) एक उपनिवेशवादियों (ब्रिटिश) द्वारा गढ़ी गई अवधारणा है, जिसका उद्देश्य
भारतीय समाज को बाँटना था। उनके अनुसार ब्रिटिश राज ने ग्रामीण परंपराओं की गलत
व्याख्या कर 'कास्ट सिस्टम' जैसी काल्पनिक, श्रेणीबद्ध
व्यवस्था को बनाया। बालाजी ने 5 मुख्य मान्यताओं को झूठा
सिद्ध करने के तथ्य दिए:
- जाति-प्रथा
3000 साल पुरानी है
- इसका
शास्त्रों में आधार है
- यह केवल
भारत में है
- यह जन्म
आधारित है
- यह सभी
निम्न जातियों द्वारा स्वीकार की गई थी
डॉ. भीमराव अंबेडकर के अनुसार 'अछूत प्रथा' 400 ईस्वी के बाद शुरू हुई, इससे पहले इसका
कोई उल्लेख नहीं। ब्रिटिश राज इस बात को अनदेखा कर दिया की कई समुदायों द्वारा
ब्राह्मणों का भी बहिष्कार होता था। जातीय भेदभाव की केवल एकतरफा कहानी प्रचारित
की गई। गांवों में जो पारस्परिक अलगाव था, उसे अंग्रेजों
ने 'कास्ट सिस्टम' का रूप दे
दिया। ऐतिहासिक रूप से तथ्य यह है की ब्रिटिश काल में दक्षिण भारत में तांत्रिक
मंदिरों (पेय कोइल्स) को 'डैविल टेम्पल्स' कहकर 20,000 मंदिर तोड़े गए। 1901 की जाति जनगणना
में जातियों के स्तर निर्धारण पर हजारों शिकायतें आईं। हर जाति अपने आपको ऊपर दर्ज कराना चाहती थी। जातिवाद की
अवधारणा और जनगणना के लिए बार-बार मापदण्ड व परिभाषाएं बदली गईं, कोई ऐतिहासिक
स्थायित्व या स्पष्टता नहीं थी।
जाति (caste) शब्द का ऐतिहासिक प्रयोग
पहले पहल पुर्तगालियों
ने 15वीं सदी में
भारत के पश्चिमी तट पर पहुंचकर हिन्दू सामाजिक समूहों से सामना किया और इसे समझने का
प्रयास किया। ‘जाति’ के प्रति उनकी आरंभिक समझ को उन्होंने अपने भाषाई शब्द "कास्टा"
शब्द से समतुल्य पाया। यही शब्द बाद में जाति के लिए अंग्रेजी "कास्ट" (caste) बन गया, जिसे उन्होंने प्रशासनिक
रिकॉर्ड और जनगणना में इस्तेमाल किया। भारतीय जाति व्यवस्था को विदेशी नजरिए से
"नस्लीय शुद्धता" के रूप में समझा गया, जो पुर्तगालियों की यूरोपीय
"कास्टा" अवधारणा से प्रभावित था। इतिहासकार सुमित गुहा के अनुसार, पुर्तगाली व्यापार भाषा होने से यह शब्द पूरे यूरोप में फैला, जिसने भारतीय वर्ण-जाति को जैविक पदानुक्रम के रूप में चित्रित किया। अंग्रेजों ने भारत में इसे और मजबूत किया और ‘जन्मजात
जातिवाद’ की अवधारणा को भारतीय परिवेश मे लागू कर दिया। लेकिन मूल रूप से यह पुर्तगाली योगदान था[1]। यह शब्द "castus" था। इसका अर्थ
"पवित्र" या "शुद्ध" है, और
स्पेनिश-पुर्तगाली भाषाओं में 15वीं सदी में यह "नस्लीय
श्रेणी" के शुद्धता लिए प्रयुक्त होता रहा था। खासकर मिश्रित विवाहों को वर्गीकृत करने के लिए। "limpieza de sangre" (रक्त
शुद्धता) का प्रचालन पुराने ईसाइयों को यहूदी या मुस्लिम कन्वर्ट्स से अलग करता था
जो की सामाजिक पदानुक्रम को रक्त की शुद्धता पर आधारित कर वैध बनाती थी। इस प्रणाली को कानूनी दस्तावेजों और चर्च रिकॉर्ड के माध्यम से लागू किया
जाता था। यह माता-पिता की जातियों के आधार पर संतानों को वर्गीकृत करती थीं,
जैसे स्पेनिश+स्वदेशी=मेस्टिज़ो। ये (pinturas de castas) सामाजिक मानदंड स्थापित करने और नस्लीय मिश्रण को नियंत्रित करने के लिए
सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित होते थे। व्यवहार में उदाहरणस्वरूप,
"peninsulares" (स्पेन से) सबसे ऊपर थे, जबकि निचली castas पर भेदभावपूर्ण कर लगते थे। जन्म
प्रमाणपत्रों, जनगणनाओं और अदालती मामलों में रक्त शुद्धता
सत्यापित की जाती थी, जो सामाजिक गतिशीलता सीमित रखती थी और स्पेनिश
वर्चस्व को सुनिश्चित करती थी। पुर्तगालियों ने भी इसी शब्द का उपयोग अपने
उपनिवेशों में किया जिससे अंग्रेजों ने सिख और भारत मे लागू कर दिया। जबकि भारतीय समाज
में कभी ‘प्योरिटी ऑफ ब्लड’ का कांसेप्ट नहीं था। यह विदेशी विचार भारत पर थोपा
गया, जबकि भारतीय वर्ण/जाति व्यवस्था का मूल भाव बहुत भिन्न है। भारत
मे वर्ण व्यवस्था थी। वर्ण शब्द संस्कृत
से आता है, जिसका वास्तविक अर्थ है “सेलेक्ट करना” (to select)। गीता, निरुक्त, सहित अन्य प्राचीन
ग्रंथों से यह स्पष्ट है कि व्यक्ति अपनी योग्यता, स्वभाव, क्षमताओं व
आचरण के अनुसार वर्ण चुन सकता था। धार्मिक ग्रंथों में वर्ण जन्म से नहीं, बल्कि
ज्ञान/योग्यता और आचरण पर आधारित था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का सामाजिक
विभाजन योग्यता एवं व्यवसाय के आधार पर था न की जन्म के आधार पर। गुरु शिष्य की शिक्षा, व्यवहार व
प्रतिभा देखकर उसका वर्ण निर्धारित करता था। जो शिक्षा पूरी नहीं करता या असक्षम
है, उसे शूद्र वर्ग में रखा जाता था, लेकिन उसकी
संतान अगले पीढ़ी में पुनः किसी भी वर्ण में जा सकती थी। एक ही व्यक्ति अपने
कर्म/स्थिति के अनुसार समय-समय पर अलग-अलग वर्ण निभा सकता था जैसे शिक्षक
(ब्राह्मण), सैनिक (क्षत्रिय), व्यवसायी
(वैश्य) और सेवक (शूद्र)। क्योंकि यह एक व्यावसायिक समूह था अंग्रेजी राज ने उनके (गिल्ड्स)
को कास्ट बना दिया। ब्रिटिश काल शोषणकारी नीतियों
के कारण कई पिछड़े वर्ग शिक्षा और संपत्ति से वंचित रह गए,
और बाद में वे
‘निम्न जाति’ घोषित हो गए। इतिहासकार धर्मपाल के अनुसार ब्रिटिश शासन से पहले भारत
में शिक्षा दर बहुत ऊँची थी तथा विभिन्न समूहों में पर्याप्त समावेशिता थी। आज भी
भारत के त्योहार, पारंपरिक अनुष्ठान आदि में कास्ट की नहीं, वर्ण की बात
चलती है।
(मद्रास प्रेसीडेंसी)
आर्थिक उत्पादन के संदर्भ मे देखे तो प्रो. वैद्यनाथन बताते हैं कि भारत में "जाति" (caste) केवल सामाजिक-सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से 'सोशल कैपिटल' (Social Capital) यानी सामाजिक संपत्ति के रूप में भी काम करती है। अपने अध्ययन के समर्थन में उन्होंने पाया है की भारतीय समाज में कई आर्थिक समूह आज भी लिप्त है जैसे की तीरुप्पुर (तमिलनाडु) – गाउंडर समुदाय द्वारा वस्त्र उद्योग, सिवाकासी – नाडार समुदाय द्वारा माचिस, पटाखे, प्रिंटिंग, पाटीदार/पटेल – अमेरिका में होटल कारोबार, जैन – भारत व विदेश में डायमंड उद्योग। ये क्लस्टर बिना सरकारी सहायता के, अपने जातीय नेटवर्क के दम पर खड़े हुए और विस्तार पाए। जातीय आर्थिक प्रणाली से यह फायदा होता ;है की शुरुआती पूंजी (Initial Capital), बाजार पहुँच (Market Access), स्थानीय नियमों की जानकारी (Local Law/Regulation व्यक्ति को अपनी जाति-समुदाय से मिलती है। नए व्यापार या स्टार्टअप के लिए अधिकतर लोग बैंक से लोन लेने की बजाय अपनी जाति/समुदाय में उधार (बहुत अच्छे Return, Success Rate के साथ) लेते हैं। अपने ही जाति/समूह में क्रेडिट, बाजार, प्रशिक्षण, जोखिम सहन करने और असफलता की स्थिति में दोबारा शुरू करने में मदद – इसलिए जाति एक 'सोशल कैपिटल' है। (UN की स्टडी, 1987-88 की Indian caste cluster studies: इन सभी में दिखता है कि जातीय क्लस्टर आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हैं। प्रोफेसर का यह कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है की "राजनीति में जाति विभाजन करती है, लेकिन आर्थिक क्षेत्र में जाति (समुदाय) एकजुट करती है।" सरकारें जाति के आधार पर नीतियाँ बनाती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में समुदायों की आर्थिक नेटवर्किंग कहीं ज्यादा कारगर होती है। विवेकानंद ने भी कोलंबो के सम्बोधन में कहा—हिंदू समाज को एकजुट होकर 'वर्ल्ड हिंदू इकोनॉमिक फोरम' बनाना चाहिए ताकि समुदाय में आर्थिक शक्ति बढ़े। व्यवहार में होता यह है की स्थानीय कानूनी, सामाजिक, व्यापारिक जटिलताओं से निपटने के लिए जाति समूह बड़ी मदद करता है—इसी कारण छोटे व्यापारी, उद्यमी सफल होते है। जाति आर्थिक शक्ति और बढ़ानेवाला नेटवर्क है—तकनीकी अर्थ में यह एक 'सोशल कैपिटल' है। औपचारिक संस्थाओं के स्थान पर अनौपचारिक जाति नेटवर्क असली काम करते हैं। समुदाय, जातियां मिलकर व्यापार, शिक्षा, प्रोफेशनल नेटवर्किंग को मजबूत करती हैं। दिन प्रतिदिन के राजनीति मे में जाति को विभाजनकारी बताकर केवल नेगेटिव रूप दिखाया जाता है, जबकि अर्थव्यवस्था में उसी जाति नेटवर्क ने सदियों से भारत को आर्थिक स्तर पर खड़ा किया है। जातीय प्रणाली का आर्थिक पक्ष ही भारत की ताकत है, जिसके बिना छोटे व्यापारी, क्लस्टर और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पनपी ही नहीं पाती
[1] https://indianexpress.com/article/research/caste-how-a-spanish-word-carried-by-the-portuguese-came-to-describe-social-order-in-india-9999873/
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