झारखंड : पूर्व ऐतिहासिक बस्तियां और निरन्तरता

वर्तमान का झारखंड जिसकी साम्यता ऐतिहासिक मगध के दक्षिणी भूभागों से आसानी से बैठाई जा सकती है प्रागैतिहासिक काल से मानव बस्तियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। छोटानागपुर और आसपास के क्षेत्रों में महापाषाण (मेगालिथ) स्थलों के बारे में पहली खोजें 1872 में ब्रिटिश प्रशासन के कर्नल इटी डाल्टन और टीएफ पेपे जैसे अधिकारियों द्वारा की गई थीं। उन्होंने बड़े पैमाने पर समाधि पत्थर (मेगालिथ) और प्राचीन कब्रों का अध्ययन किया, जो लगभग 2000 वर्ष पुराने हैं। हाल के पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि यहाँ पुरापाषाण काल से ही मानव निवास के प्रमाण मिलते हैं। इस क्षेत्र में पुरापाषाण काल लगभग 25 लाख वर्ष पूर्व से 10,000 ई.पू. तक फैला हुआ था। लेकिन इस कहानी की शुरुआत हम हजारीबाग का इस्को गांव से करते है। यह गाँव प्रागैतिहासिक शैलकला के लिए प्रसिद्ध है। यह गांव झारखंड के हजारीबाग से 25 Km दूर बरकागांव के पास पुंकरी बरवाडीह महापाषाण स्थल के पास है। यहाँ महापाषाणों की शानदार परंपरा है क्योंकि महापाषाण स्थल बनाने के लिए सबसे जरूरी चीज पहाड़ियां थीं जो यहाँ सुलभ थी और समकालीन लोगों की अपनी गोत्रीय परम्पराएं तो थी ही। प्रत्येक महापाषाण स्थल उसे बनाने वाले वंश की मान्यताओं के अनुरूप एक विशेष अभिविन्यास पर आधारित है। उदाहरण के लिए, छोटानागपुर पठार के मुंडा प्रजाति के लोगों ने प्राकृतिक कारणों से मरने वालों की याद में उत्तर-दक्षिण अभिविन्यास में सासंदिरी और अप्राकृतिक कारणों से मरने वालों और समाज में विशेष स्थान रखन वालों की याद में पूर्व-पश्चिम अभिविन्यास में बिरिदरी का निर्माण कराया था।

कुछ अध्ययनकर्ता के अनुसार पुंकरी बरवाडीह अन्य जनजातीय कब्रगाहों की तरह नहीं है लेकिन यह पुरातत्व-खगोल विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए दिलचस्प विषय है क्योंकि इसके निर्माण में ग्रेट ब्रिटेन के स्टोनहेंज और आयरलैंड के महापाषाण स्थलों की तरह ही खगोल विद्या और गणित का प्रयोग किया गया था. उनके अनुसार पुंकरी बरवाडीह का उपयोग प्राचीन काल में वसंत और शरद ऋतु में समय को देखने के लिए किया जाता था।  हजारीबाग से लगभग 60 कम दूर चतरा में उर्सू महापाषाण पड़ता हैं। अभी उस स्थान ग्रामीण पूजा प्रार्थना करते हैं। इससे महापाषाणों की रक्षा हो जाती है। देखा जाए तो यह भारतीय इतिहास के कुछ सबसे महत्वपूर्ण स्मारक चिन्ह हैं, जो हमारे पूर्वजों के द्वारा द्वारा बनाए गए थे। लगभग 7 एकड़ का मुंडा समुदाय का कब्रिस्तान चोकहाटू, जो अभी भी उपयोग में है और जिसे झारखंड सरकार एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना चाहती है इसी इतिहास की जीवंत विरासत है।

हजारीबाग की ही तरह सिंहभूम, और दामोदर घाटी में क्वार्टजाइट तथा बेसाल्ट से बने हैंड एक्स, चॉपर जैसे पत्थर के औजार मिले हैं। लोग शिकार और भोजन संग्रह पर निर्भर थे तथा नदियों और गुफाओं के निकट आश्रय लेते थे। मध्यपाषाण काल का दौर लगभग 10,000 ई.पू. से 8,000 ई.पू. तक चला, जिसमें सूक्ष्म पाषाण औजार (माइक्रोलिथ्स) का प्रचलन हुआ। हजारीबाग की चट्टानी आश्रयस्थलों में शिकार, नृत्य और अनुष्ठानों के चित्र मिले हैं। पशुपालन की शुरुआत हुई तथा जीवनशैली में परिवर्तन नवपाषाण काल के साथ ही देखने को मिलने लगा। नाव पाषाण की अवधि लगभग 8,000 ई.पू. से 2,000 ई.पू. तक रही जिसमें बस्तियाँ विकसित हुईं। छोटानागपुर पठार पर पॉलिश्ड स्टोन टूल्स, अनाज भंडारण गड्ढे और पशुपालन के प्रमाण प्राप्त हुए। मेगालिथिक संस्कृति के प्रारंभिक संकेत भी दिखते हैं, जो स्थानीय कृषि समाज को दर्शाते हैं। पूर्वी सिंहभूम जिले गलूडीह एक महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक साइट है जहाँ पुरापाषाण (Paleolithic) और सूक्ष्माश्म (Microlithic) उपकरण पाए गए हैं। यह स्थल दलमा पर्वत श्रृंखला के पास स्थित है। यहाँ क्वार्ट्ज और क्वार्टज़ाइट से बने प्रागैतिहासिक पत्थर के उपकरण मिले हैं, जो इस क्षेत्र के प्रागैतिहासिक मानव निवास का प्रमाण देते हैं। यह स्थल प्राचीन मानव की जीवन शैली और तकनीकी विकास को दर्शाता है। धालभूमगढ़ क्षेत्र में प्राचीन ईंट संरचनाएँ, मिट्टी के बर्तन और स्थानीय लोक परंपराओं से जुड़े अवशेष मिले हैं। यह स्थान ऐतिहासिक रूप से धालभूम राजवंश से संबंधित माना जाता है और यहाँ के किलों के अवशेष अब भी देखे जा सकते हैं।

पांडव शिला (घाटशिला) से आदिम युग की 10,000 साल पुरानी चट्टानी नक़्शे और रॉक कार्विंग पाए गए हैं। यह स्थल पौराणिक रूप से पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा हुआ माना जाता है और इसे प्रागैतिहासिक काल की श्रेणी में रखा जाता है । बनारी, बहारगढ़ तथा अन्य क्षेत्रों में पत्थर के स्लैब, टेरेकोटा बर्तन, रिंग पत्थर, और अन्य प्रागैतिहासिक उपकरण मिले हैं, जो झारखंड में मनुष्य की प्रारंभिक गतिविधियों का संकेत देते हैं। ये स्थल इस क्षेत्र की प्राचीनता और मानव सभ्यता के विकास के गहरे प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इन स्थलों पर किये गए उत्खननों से पता चलता है कि पूर्वी सिंहभूम प्रागैतिहासिक काल से ही मानव आवासीय गतिविधियों का केंद्र रहा है ।

रुआम का प्राचीन दुर्ग स्थल यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित है। सिंहभूम जिला गजेटियर (1910) में इसका उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि यह स्थान प्राचीन जैन या श्रावक समुदायों से जुड़ा था। यहाँ मिट्टी से निर्मित प्राचीर, ईंटों के अवशेष और लाल मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े मिले हैं। पास में एक सरोवर से तांबे के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र कभी तांबा गलाने का केंद्र रहा होगा। यहां मिट्टी और ईंट से बने प्राचीर, लाल मिट्टी के बर्तन और तांबे के औजारों के अवशेष पाए गए हैं। उत्खनन कार्य 20वीं सदी के मध्य से प्रारंभ हुआ था, जिसमें विभिन्न मिट्टी कलाकृतियां, तांबे की वस्तुएं और औजार निकाले गए। इस उत्खनन में मिट्टी के पात्रों के टुकड़े, ईंट के खंड, और तांबे के छोटे औजार प्राप्त हुए हैं, जिससे यह पता चलता है कि यह स्थल एक प्राचीन बस्ती या औद्योगिक केन्द्र रहा होगा।

बुरूडीह डैम क्षेत्र में 2020 के आसपास में ताम्र युगीन वस्तुएं एवं मानव बस्तियों के अवशेष खोजे गए। सभी उत्खनन में मिट्टी के पात्र, पत्थर के औजार, तांबे की वस्तुएं, और अवशेष निकाले गए हैं जिनसे स्थलों की सभ्यता एवं वाणिज्यिक गतिविधियों का पता चलता है। उत्खनन प्रक्रियाओं में हाथ से खुदाई, छानना और नाजुक वस्तुओं के लिए ब्रश आदि का उपयोग किया गया है, जिससे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जानकारी मिली है. मुसाबनी क्षेत्र, जहाँ तांबा एवं यूरेनियम खनन के साथ-साथ प्राचीन औद्योगिक अवशेषों के प्रमाण मिलते हैं । इन समस्त स्थलों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि पूर्वी सिंहभूम सांस्कृतिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध जिला है।

पश्चिमी सिंहभूम जिले में मेगलिथ स्थल (महापाषाण स्मारक) मुख्य रूप से बंदगांव ब्लॉक और पोराहाट क्षेत्र के कई गाँवों में पाए जाते हैं। यहाँ के Ho जनजाति की परंपरा के तहत ये स्मारक मृतकों के सम्मान के लिए बनाए जाते हैं, जिन्हें 'बिरदिरी' और 'ससनदिरी' कहा जाता है। बंदगांव ब्लॉक के कई गाँवों में मेगलिथ स्थल मौजूद हैं, जैसे दमुडिह और इचाहातु। पश्चिमी सिंहभूम के पोराहाट क्षेत्र में भी कई मेगालिथिक स्मारक फैले हुए हैं। इन मेगलिथ स्थलों की ऊँचाई 12-14 फीट तक होती है और पत्थर के ये स्तंभ स्थानीय समाज की जीवंत परंपरा का हिस्सा हैं। Ho जनजाति के मेगालिथ क्षेत्र, इतिहास एवं संस्कृति के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और ये स्मारक आज भी पूजे जाते हैं। इन महापाषाण स्थलों का इतिहास हजारों वर्षों पुराना है, जो यहाँ की जनजातीय संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। इन स्थलों का निर्माण मुख्य रूप से हो, मुंडा, और अन्य आदिवासी समुदायों द्वारा अपने पूर्वजों की स्मृति और सम्मान में किया जाता था।प्रसिद्ध स्थल चोकाहातु और आसपास के क्षेत्र, जहाँ हज़ारों महापाषाण पत्थर मिले हैं, आज भी स्थानीय समुदाय द्वारा अंतिम संस्कार और पूर्वज-पूजा के लिए उपयोग किए जाते हैं। महापाषाण स्थल मुख्य रूप से समाधिपत्थर, स्तंभ, वृत्तीय संरचनाओं तथा मेनहिर के रूप में पाए जाते हैं। इनका उपयोग प्राचीनकाल से अंतिम संस्कार केंद्र, पूर्वज पूजा और शोक मनाने के लिए होता रहा है, और आज भी कुछ स्थानों पर यह परंपरा जीवित है। ऐसे स्मारकों में पत्थरों की ऊँचाई 12-14 फीट हो सकती है और इनकी विशिष्टता यह है कि इन्हें बिना किसी चूने या मसाले के खड़ा किया गया है। बेनीसागर में ASI द्वारा खुदाई में बहु-सँख्यक कलाकृतियाँ, मूर्ति-टुकड़े, मंदिर अवशेष और बड़ा जलाशय (टैंक)। खुदाई के प्रमाण बताते हैं कि यह क्षेत्र 5वीं शताब्दी ई. से लेकर 16-17वीं शताब्दी तक लगातार आबाद रहा। ASI Ranchi Circle ने इस स्थल का दस्तावेजीकरण और प्रदर्शन सामग्री प्रकाशित की है। पोरा/पोरा हात (Porahat) और आसपास के मेगालिथिक स्थानक्षेत्र में हो/मुंडा समुदायों से जुड़े कई मेगालिथिक स्मारक और स्मृति-स्थल हैं — विशेषकर Porahat क्षेत्र और उसके आस-पास के गाँवों (जैसे Damudih, Ichahatu) में megalithic के प्रमाण दिखाई देता है। ये क्षेत्र जनजातीय संस्कृति-आधारित मेगालिथिक परंपराओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं। Porahat का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है यह पुराना राजकीय/धार्मिक केंद्र भी रहा है (किला, देवी/पौरि मंदिर आदि का संदर्भ ऐतिहासिक लेखों में मिलता है)।




पश्चिमी सिंहभूम में अन्य स्थानीय गाँवों/घाटियों में छोटे-छोटे अवशेष, पुरानी मंदिरविहीन मूर्तियाँ और ग्रामीण स्मारक मिलते हैं — लेकिन बेनीसागर और पोरा-क्षेत्र सबसे अधिक दस्तावेजीकृत और शोध-प्रवण हैं। चोकाहातु मेगलिथ साइट की खुदाई और सर्वेक्षण से निम्नलिखित प्रमुख तथ्य सामने आए हैं। चोकाहातु साइट रांची के पास, करीब सात एकड़ क्षेत्र में फैली हुई है, और इसे “शोक की भूमि” कहा जाता है। यहाँ करीब 7300-8000 बड़े-बड़े भग्नावशेष या समाधिपत्थर (डोलमेन/ ससंदिरी) गड़े पाए गए हैं, जो इसे भारत की सबसे बड़ी ज्ञात मेगलिथिक साइट्स में शामिल करता है। भूगर्भ वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के अनुसार, यह स्थल लगभग 2500 साल पुराना माना जाता है और इसका संबंध मुंडा समुदाय की परंपरा से है, जहाँ मृतकों को दफनाने का रिवाज़ रहा है। खुदाई से यहां पाए जाने वाले अधिकांश पत्थर ग्रेनाइट, नीस और शिस्ट पत्थरों से बने हैं। समाधिपत्थरों के आकार और तकनीक से ये शोधकर्ता आज भी अचंभित हैं; सबसे बड़ी स्लैब की लंबाई 15-18 फीट पाई गई। यहाँ की समाधियाँ व स्मारक आज भी मुंडा समुदाय के लोगों द्वारा अंतिम संस्कार, पूर्वज पूजन और 'हड़गड़ी' रस्म के लिए इस्तेमाल होती हैं, जिससे यह परंपरा आज भी जीवित है। इस स्थल का ऐतिहासिक महत्व और जीवंत परंपरा इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने का मजबूत दावेदार बनाती है। इस प्रकार, चोकाहातु प्राचीन काल से लेकर आज तक निरंतर उपयोग में आने वाली एक अनूठी एवं अद्भुत मेगलिथ साइट है, जिसने झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को भी समृद्ध किया है।

सराइकेला खरसावाँ का क्षेत्र प्राचीन राजवंशों के अधीन था और यहाँ अनेक प्राचीन मंदिर, किले और अन्य ऐतिहासिक स्मारक मौजूद हैं। जिले का प्रमुख सांस्कृतिक आकर्षण विश्व प्रसिद्ध "सरायकेला छऊ नृत्य" है, जो मार्शल और लोक नृत्य का समन्वय है और इसकी तीन विशिष्ट शैलियाँ हैं। यह नृत्य क्षेत्र की जनजातीय परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं का प्रतीक है। पुरातात्विक दृष्टि से, सराइकेला खरसावाँ में प्राचीन शिव मंदिर और अन्य धार्मिक स्थल हैं, जैसे जयदा बूढ़ा बाबा शिव मंदिर, जो ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के हैं। इन्हें 18वीं-19वीं सदी के शासकों ने संरक्षित किया। जिले में प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ भीमखंदा जैसे स्थल भी हैं, जो मकर संक्रांति तक पिकनिक और धार्मिक आस्था के केंद्र होते हैं। सिरायकेला किला (Seraikela Fort) जिले का प्रमुख ऐतिहासिक स्थल है और नदी के किनारे स्थित है। किले की वास्तुकला और संरचनाएं स्थानीय इतिहास की गवाही देती हैं। खरसावां किला (Kharsawan Fort) ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है और इसकी संरचना प्राकृतिक सुंदरता से घिरी हुई है। धार्मिक और पुरातात्विक दृष्टि सेजयदा बूढ़ा बाबा शिव मंदिर (Jaida Budha Baba Shiv Mandir) स्थानीय संस्कृति का केंद्र है।

सरायकेला-खरसावाँ जिले में मेगालिथिक समाधिपथर पाए जाते हैं, जो हजारों साल पुराने हैं और जनजातीय धार्मिक प्रथाओं से संबंधित हैं। भीमखंदा, बिरसा झील, झांझरकता और दुग्दा जलप्रपात भी यहां की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत में शामिल हैं। 17वीं शताब्दी में निर्मित राजा महल सरायकेला शाही निवास वास्तुकला एवं सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

सरायकेला किले में अब तक मिले प्रमुख पुरातात्विक अवशेषों में शामिल हैं: किले की मिट्टी से बनी पुरानी ईंटों के टुकड़े, जो किले के भौतिक ढांचे और प्राचीन निर्माण तकनीक की जानकारी देते हैं। लाल मिट्टी के मृदभाण्ड के टुकड़े, जिनसे उस युग के दैनिक उपयोग के बर्तनों और सांस्कृतिक क्रियाकलापों का पता चलता है। तांबे के औजारों और आभूषणों के अवशेष, जो स्थानीय शिल्पकला और उस समय की तकनीकी प्रगति को दर्शाते हैं। प्राचीन सरोवर के आसपास से मिले धातु के अवशेष, जो किले के आसपास की आर्थिक गतिविधियों और संभवतः तांबा गलाने के कार्य को सूचित करते हैं। किले के भीतर और निकटस्थ स्थानों पर मूर्तियाँ और धार्मिक प्रतीकात्मक वस्तुएं भी मिली हैं, जो उस समय की धार्मिक आस्था को दर्शाती हैं। स्थापत्य और मूर्तिकला के अवशेष, जो स्थानीय राजसी और धार्मिक जीवन की झलक प्रस्तुत करते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने 2011-12 और 2012-13 में इटागढ़ मंदिर परिसर में पुरातात्विक खुदाई की थी। इस खुदाई के दौरान वहाँ से लगभग 1000 वर्ष पूर्व की सभ्यता और संस्कृति के अनेक अवशेष प्राप्त हुए। खुदाई में सैंडस्टोन से तराशे गए हिंदू और बौद्ध देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ, प्राचीन कलाकृतियाँ, पकी हुई मिट्टी एवं पत्थर के मनके, लोहे के औजार तथा रसोई में प्रयोग होने वाला सिलोटी जैसे उपकरण मिले। इन सभी अवशेषों को सूचीबद्ध किया गया और भारतीय पुरातत्व विभाग अपने साथ ले गया है। वर्तमान में ये अवशेष विभाग के रांची कार्यालय में रखे हैं और मंदिर परिसर में विभाग का म्यूजियम बनने के बाद ही इन्हें वापस लाया जा सकेगा। खुदाई में मिले अवशेष 9वीं से 10वीं शताब्दी के बीच के हैं, जो क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की पुष्टि करते हैं।

सरायकेला-खरसावां जिला पूर्व में पश्चिम बंगाल और ओडिशा के तत्कालीन राजा सिंहदेव परिवार की राजधानी हुआ करता था, जो 17वीं सदी के आसपास स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विकास का केंद्र था। जिले के चांडिल क्षेत्र में 2000 साल से अधिक पुराने शिलालेख मिले हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता को दर्शाते हैं। चांडिल डैम के समीप भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का म्यूजियम भी है। भीमखंदा को महाभारत काल की पांडवों की अज्ञातवास भूमि माना जाता है। कुलुगढ़ा और बासपुर जैसे स्थानों में प्राचीन घाटियाँ और गढ़ की खोजें हुई हैं, जिनमें राजा विक्रम का गढ़ होने का दावा है। भीमखंदा के पास से प्राचीन वस्तुएं और मंदिर के अवशेष मिले हैं, जो धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

असुर पुरास्थल खूंटी टोला स्थित है, जिसे सबसे पहले 1916 में एस.सी. राय ने पहचाना था। यहाँ 50 से ज्यादा पत्थर की समाधियाँ मिलीं, जिनमें मृत्तकों की हड्डियाँ, मृदभांड, तांबे, कांसे व लोहे के आभूषण और औजार पाए गए। शोध के अनुसार, यह स्थल ईस्वी सन की प्रारंभिक सदियों का माना जाता है। इसके अलावा, खूंटी जिले में ऐतिहासिक दृष्टि से अन्य स्थल भी हैं, जैसे जरियागढ़ किला और उलिहातू (भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली), लेकिन प्रामाणिक रूप से प्रीहिस्टोरिक अवशेष 'असुर पुरास्थल खूंटी टोला' में ही मिले हैं। खूंटी टोला की खोज 1916 में हुई थी और यहाँ से अनेक प्रकार के मृदभांड, तांबे, कांसे, लोहे के मनके, कड़े, पायल, औजार तथा मानव अस्थियाँ खुदाई में मिली हैं, जिससे यह क्षेत्र झारखंड के महत्वपूर्ण प्रीहिस्टोरिक साइट्स में शामिल है। खूंटी जिले के प्रमुख पुरापाषाण (प्रीहिस्टोरिक/पलियोलिथिक) स्थलों में सबसे महत्वपूर्ण है असुर पुरास्थल सारिदकेल जो वर्तमान मे तजना नदी के किनारे, खूंटी से तमाड़ जाने वाले मार्ग पर है। यहाँ से प्राचीन सभ्यता के अवशेष, संभावित नगर बसावट के प्रमाण, महानगरीय महापाषाण संस्कृति के संकेत मिलते है। असुर पुरास्थल कुंजाला से प्रागैतिहासिक कब्र, मृदभांड आदि के अवशेष मिले है यद्यपि खुदाई/संरक्षण प्रक्रिया धीमी है। कटहरटोली भी एक असुर पुरास्थल है जहां से मेगलिथ कब्र स्थल प्राप्त हुए है। और गहरे खुदाई से पुरापाषाण अवशेष मिलने की संभावना है। असुर पुरास्थल हंसा से प्राचीन मानव सभ्यता के विभिन्न पत्थर उपकरण, कब्र के अवशेष, मृदभांड प्राप्त होते है

खूँटी समेत भारत के अन्य पुरापाषाण कालीन स्थलों पर मिले अवशेष मानव इतिहास, विकास एवं प्रारंभिक सभ्यता की गहरी समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन स्थलों की खुदाई में मुख्यतः पत्थर के औजार, मृद्भांड, अस्थियाँ, आदि प्राप्त हुए हैं, जिनकी वैज्ञानिक जाँच से प्रारंभिक मानव जीवन, उनकी तकनीकी प्रगति, भोजन, शिकार, और सामाजिक संगठन का पता चलता है। इन स्थलों से प्राप्त हाथ की कुल्हाड़ी, चॉपर, क्लेवर, खुरचनी, औजार आदि यह सिद्ध करते हैं कि प्रारंभिक मानव ने किस प्रकार पत्थरों को आकार देकर उन्हें दैनिक जीवन और शिकार के लिए ढाला। यह उस समय के तकनीकी विकास और सृजनशीलता का प्रमाण है। इन अवशेषों से उस समय के खानाबदोश जीवन, सामूहिक और व्यक्तिगत प्रयास, कुटीर उद्योग, और आपसी सामाजिक संगठन की भी जानकारी प्राप्त होती है। गुफा चित्र तथा मूर्तियाँ उनके प्रतीकात्मक एवं धार्मिक जीवन को समझने में सहायक हैं। खूँटी जैसे पुरापाषाणीय अवशेष न सिर्फ झारखंड बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के आदिमानव, उनके तकनीकी कौशल, सामाजिक-सांस्कृतिक आयाम और विकास की निरंतरता को उजागर करते हैं। इन स्थलों का अध्ययन हमारे पूर्वजों के जीवन, उनके नवाचार और प्रारंभिक सभ्यता के गठन को समझने की प्रमुख कड़ी है।

खूँटी जिले के नवपाषाण (Neolithic) स्थल मुख्यतः "असुर संस्कृति" से जुड़े हैं। इन स्थलों में खुदाई और सर्वेक्षण में नवपाषाण युगीन अवशेष मिले हैं, जो मानव सभ्यता के विकास और रोजमर्रा की गतिविधियों की जानकारी देते हैं। सारिदकेल (Saridkel) जो की तजना नदी के तट पर, खूंटी-तमाड़ मार्ग पर स्थित है असुर संस्कृति का प्रमुख स्थल माना जा सकता है जहां एक दीर्घ काल तक निरन्तरता बनी रही। यहाँ से ईंट, मिट्टी के बर्तन, मनके, औजार और सोने के आभूषण के अवशेष मिले हैं। हंसा (Hansa) भी असुर संस्कृति से जुड़ा स्थल है। यहाँ खुदाई में नवपाषाणिक अवशेष प्राप्त हुए है। कुंजला से मृदभांड, पत्थर के औजार, धातु की वस्तुएं तथा अस्थियाँ मिली हैं। खूंटी टोला (Khunti Tola) के साथ साथ कटहर टोली (Kathar Toli) से नवपाषाण कालीन मनके, पायल, मृदभांड व हड्डियाँ मिली हैं।

गढ़वा छोटानागपुर पर्वतीय क्षेत्र का हिस्सा है, जो सामान्य रूप से प्रारंभिक और मध्य पाषाण युग के औजारों और मृद्भांडों के लिए जाना जाता है। गढ़वा में मुख्य रूप से ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल, जैसे बाबा खोंहर नाथ मंदिर, भवनाथपुर क्षेत्र के किले, और पुराने मंदिर और जलप्रपात, अधिक प्रचलित हैं। पुरी तरह से गढ़वा जिले की प्रागैतिहासिक धरोहरें झारखंड की व्यापक प्रागैतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखी जानी चाहिए, जहां पड़ोसी जिलों में पुरातात्विक खोजें हुई हैं जिनमें Neolithic और Mesolithic सभ्यताओं के अवशेष शामिल हैं। गढ़वा की प्राकृतिक सुंदरता, प्राचीन मंदिर, जलप्रपात और सांस्कृतिक विरासत इसे ऐतिहासिक और पर्यटन दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं, लेकिन प्रागैतिहासिक खुदाइयों एवं स्थलों की वैज्ञानिक और आधिकारिक रिपोर्टिंग सीमित है।

पलामू जिले का प्रीहिस्टॉरिक और पुरातात्विक महत्व इसके ऐतिहासिक और प्राकृतिक धरोहरों से जुड़ा हुआ है। पलामू में कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल और ऐतिहासिक किले मौजूद हैं, जो जिले की प्राचीन सभ्यता, शासकों और सांस्कृतिक विरासत को उजागर करते हैं। पलामू जिला प्राकृतिक और जैव-विविधता के लिए जाना जाता है। जिले के मोहम्मदगंज क्षेत्र और नागरुआ पहाड़ में मध्यपाषाण युग के (लगभग 10,000 से 8,000 ईसा पूर्व) पुरातात्विक अवशेष पाए गए हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन मानव बस्तियों की झलक देते हैं। सजवन गांव में प्राचीन बुद्ध की खंडित मूर्ति, गणेश की मूर्ति सहित अन्य प्रतीकात्मक पाषाणकालीन अवशेष मिले हैं, जो जिले के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास को दर्शाते हैं। इसके अलावा, पलामू के विभिन्न स्थल जैसे शाहपुर और बेतला में किले और अन्य संरचनाओं के भग्नावशेष भी पुरातात्विक महत्व के हैं

पलामू जिला अपने किलों के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें प्रमुख हैं पुराना और नया पलामू किला। ये किले लगभग 350 वर्ष पुराने हैं और चेरो राजवंश से जुड़े हैं। पलामू किला मूलतः चेरो राजाओं द्वारा शुरू किया गया था और बाद में राजा मेदिनी राय ने 17वीं सदी में इसका पुनर्निर्माण कराया। किला मुग़लकालीन और राजपूत वास्तुकला का मिश्रण प्रस्तुत करता है। किले की दीवारें, बस्तियाँ और अन्य संरचनाएँ तत्कालीन सैन्य, राजनीतिक और सामाजिक शक्ति का परिचायक हैं। वर्तमान में ये जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य पुरातत्व निदेशालय लगातार पलामू किला और आसपास के स्थलों पर खुदाई, संरचना की मरम्मत, और संरक्षण कार्य कर रहे हैं। खुदाई में प्राचीन काल की pottery shards, मूर्तियाँ, और संरचनात्मक अवशेष मिले हैं, जिनसे इलाके की विभिन्न कालखंडों में निरंतर मानव गतिविधि की पुष्टि होती है। ASI किले की दीवारों और आधार की मजबूती पर ध्यान केंद्रित कर रहा है ताकि इसे पर्यटकों और शोधकर्ताओं के लिए सुरक्षित बनाया जा सके.

इसे पुरातात्विक धरोहर के रूप में संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए राज्य सरकार और पुरातत्व विभाग द्वारा कई प्रयास चलाए जा रहे हैं। 2025 में सरकार ने किले के जीर्णोद्धार और संरक्षण के लिए व्यापक सर्वेक्षण शुरू किए हैं। इस कार्य में हेरिटेज कंस्ट्रक्शन टीम, पुरातत्व विशेषज्ञ, और वन प्रबंधन विभाग शामिल हैं। इसके साथ बेतला क्षेत्र में टाइगर सफारी परियोजना का निर्माण भी हो रहा है, जिससे इस क्षेत्र का पर्यटन बढ़ेगा। किले की वास्तुकला, सुरंगों, और ऐतिहासिक संरचनाओं का शोध और संरक्षण तेजी से हो रहा है.

लातेहार जिले सहित आसपास के इलाकों में तांबे के औजार, पाषाण युग के उपकरण और मिट्टी के बर्तन मिलना दर्शाता है कि यहाँ की पुरावशेष खोज 20वीं सदी के आरंभ से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और स्थानीय शोधकर्ताओं द्वारा लगातार होती रही है। झारखंड के खूंटी में 1915 में एस.सी. राय द्वारा पुरावशेष की खोज की गई थी, जिसके आधार पर आसपास के जिलों में भी पुरातात्विक अध्ययन हुआ। इस प्रकार, लातेहार में पुरावशेष खोज की प्रक्रिया अंग्रेजों के समय से प्रारंभ होकर बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत विस्तारित हुई। खोज मुख्यतः स्थानीय आदिवासी क्षेत्रों के प्राकृतिक स्थलों और किलों के आस-पास हुई, जहां पत्थर और तांबे के युग के अवशेष मिले। यहाँ बड़ी मात्रा में मेगालिथिक स्मारक जैसे पत्थर के मकबरे और समाधि स्थल पाए गए हैं, जो लगभग 2000-3000 वर्षों पुराने हैं। बड़े पत्थर और स्फटिक की संरचनाएं इस क्षेत्र की पुरातन सभ्यता का संकेत हैं। यहाँ से ताम्र युग के औजार जैसे हड्डी, पत्थर और तांबे के उपकरण मिले हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन मानव सभ्यता को दर्शाते हैं। यह खोज आज तक जारी है और यहाँ के इतिहास और संस्कृति को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। प्राचीन स्थल और स्मारक स्थानीय कंकाल और मिट्टी के बर्तन भी मिलते हैं, जो करोड़ों वर्षों पुराने मानव निवास का प्रमाण हैं। इन्हें राष्ट्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षण में रखा गया है। उग्रतारा मंदिर इस क्षेत्र का एक धार्मिक स्थल है, जो स्थानीय परंपराओं और पुरातात्विक खोजों के साथ जुड़ा है। इसकी आयु लगभग 400 वर्षों की है और इसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है।

सिमडेगा की उत्पत्ति प्रागैतिहासिक काल से हुई है जब यहाँ स्वदेशी आदिवासी लोग रहते थे। सदियों से, इस क्षेत्र ने मौर्य, गुप्त और मुगलों सहित कई राज्यों और साम्राज्यों के उत्थान और पतन को देखा है। 19वीं शताब्दी में, यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया और 2000 में बिहार से अलग होने के बाद झारखंड के नवगठित राज्य का हिस्सा बन गया। यह जिला स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देने के लिए जाना जाता है। गंगा बिशुन रोहिल्ला सिमडेगा के एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। सिमडेगा को कभी बीरू-कैशलपुर परगना के नाम से जाना जाता था, जब इस पर राजा कटंगदेव का शासन था। उनके निधन के बाद, इसे महाराजा शिवकर्ण ने अपने अधीन कर लिया। कुछ समय के लिए यह कलिंग साम्राज्य का हिस्सा था और 1336 ई. में गंग वंश (ओडिशा के कलिंग-उत्कल साम्राज्य के गंगा वंशी गजपति शाही परिवार) के हरिदेव को बीरू का राजा बनाया गया। हालाँकि, सिमडेगा जिले का इतिहास उसके मूल जिले गुमला से अलग नहीं किया जा सकता। 1881-82 के कोल विद्रोह के बाद, ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक इकाई, दक्षिण-पश्चिम सीमांत, जो वर्तमान झारखंड के अधिकांश हिस्से को सम्मिलित करती थी, अस्तित्व में आई। इसके परिणामस्वरूप लोहरदगा का निर्माण हुआ, जिसमें अभी का गुमला जिला शामिल था। 1899 में, जिले का नाम लोहरदगा से बदलकर रांची कर दिया गया।

प्राचीन काल में, जिले का क्षेत्र और पड़ोसी पश्चिमी क्षेत्र मुंडा और ओरांव के निर्विवाद अधिकार क्षेत्र में था। अशोक महान (273-232 ईसा पूर्व) के शासनकाल के दौरान, यह मगध साम्राज्य के अधीन था। मौर्यों की शक्ति के पतन के साथ, कलिंग के राजा खारवेल ने झारखंड के रास्ते एक सेना का नेतृत्व किया और राजगृह और पाटलिपुत्र को लूट लिया। बाद में, समुद्र गुप्त (335-380 ई।) अपने दक्कन अभियान पर इस क्षेत्र से गुजरे होंगे। कहा जाता है कि चीनी यात्री इत्सिंग भी नालंदा और बोधगया की अपनी यात्रा पर छोटानागपुर पठार से होकर गुजरे थे। ऐसा माना जाता है कि छोटानागपुर राज की स्थापना 5वीं शताब्दी ई. में शाही गुप्तों के पतन के बाद हुई थी। फणीमुकुट को इसका पहला राजा चुना गया था। एक किंवदंती के अनुसार, उन्हें एक तालाब के किनारे एक नाग (सांप) की शरण में पाया गया था। इसलिए, उनके द्वारा स्थापित राजवंश को नाग राजवंश कहा गया।

दिसंबर 1771 में छोटानागपुर को बिहार में शामिल कर लिया गया। आंतरिक विवादों से प्रेरित होकर ब्रिटिश कैप्टन कैमक ने पलामू पर हमला किया। उनके बाद चैपमैन ने छोटानागपुर के पहले नागरिक प्रशासक का पद संभाला। 19वीं सदी के अंत में, इस क्षेत्र में कृषि असंतोष ने सरदारी आंदोलन को जन्म दिया। 1887 तक, आंदोलन ने गति पकड़ ली और कई मुंडा और उरांव किसानों ने जमींदारों को लगान देने से इनकार कर दिया। 1895 में बिरसा मुंडा के उदय के साथ यह आंदोलन अपने चरम पर पहुंच गया, जिन्हें भगवान का अवतार माना जाता था। उन्होंने घोषणा की कि भूमि उन लोगों की है जिन्होंने इसे जंगलों से वापस लिया है और इसलिए किसी भी शासक को लगान देने की कोई आवश्यकता नहीं है। बिरसा मुंडा का सिमडेगा के किसानों और लोगों पर बहुत गहरा प्रभाव था।

बीरूगढ़ सूर्य मंदिर एक प्रसिद्ध सूर्य मंदिर है। यह एक ही विशाल पत्थर को तराशकर बनाया गया है और इसका निर्माण 7वीं सदी में हुआ माना जाता है। यह स्थान सिमडेगा के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है। इस मंदिर में उकेरी गई मूर्तियां और वास्तुकला प्राचीन कला का अद्भुत उदाहरण हैं। बीरूगढ़ का सतघरवा महल राजा कतनदेव के शासन का प्रतीक रही है। महल का अधिकांश हिस्सा भूकंप से क्षतिग्रस्त हो गया है, लेकिन इसकी दीवारों और प्रवेश द्वार पर उकेरे गए प्रतीक और मूर्तियां पुरातात्विक महत्त्व की हैं। यह स्थल सिमडेगा के प्राचीन राजवंशों के इतिहास को उजागर करता है और इसकी खुदाई की मांग उठी है। उसी तरह रामरेखा धाम भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के वनवास काल से जुड़ा पवित्र स्थल है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से यह धरोहर महत्वपूर्ण है। परंतु इसकी ऐतिहासिकता से सही मैने मे परिचय कराया अंशुमाला तिर्की और बालेश्वर कुमार बेसरा ने। उन्होंने जिले के कई स्थानों जैसे बिरू, बंगरू घोसरा, छूरिया, पूरनापानी, कोलेबिरा के भंवर पहाड़ आदि में नवपाषाण काल के शैलचित्रों की खोज की है। इन चित्रों में लाल और सफेद रंगों का उपयोग किया गया है और वे शिकार, जंगली जीवों और ज्यामितीय आकृतियों को दर्शाते हैं, जिनका कालक्रम मध्यपाषाण से नवपाषाण काल तक माना जाता है।

सिमडेगा के प्रागैतिहासिक शैलचित्र मुख्यतः नवपाषाण (Neolithic) युग के हैं और प्राचीन मानव जीवन, उनकी गतिविधियों, धार्मिक आस्थाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को दर्शाते हैं। चित्रों में पशु-जीवों जैसे जंगली बाइसन, घोड़े, हाथी, हिरण, और अन्य वन्यजीवों के साथ-साथ मानव आकृतियों का चित्रण है, जो शिकार, नृत्य, संगीत और धार्मिक अनुष्ठानों से संबंधित हैं। शैलचित्रों में लाल, सफेद और अन्य प्राकृतिक रंगों का उपयोग हुआ है, जो पौधों, खनिजों और अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त रंगद्रव्य से बनाए गए थे। इन चित्रों में जादुई, अनुष्ठानिक क्रियाओं, सामाजिक जीवन, शरीर सज्जा, मखौटे पहने हुए व्यक्तियों और शिकार अभियानों का चित्रण मिलता है। यह चित्र उस समय की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी देते हैं। शैलचित्रों को अक्सर कई परतों में बनाया गया है, यानी पहले बनाए गए चित्रों के ऊपर कालानुक्रम में नए चित्र उकेरे गए हैं, जिससे विभिन्न पीढ़ियों की सांस्कृतिक परतें सामने आती हैं। ये चित्र प्राकृतिक चट्टानों, गुफाओं, और शैलाश्रयों पर पाए जाते हैं, जिनकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए पुरातत्वविद निरंतर प्रयासरत हैं। सिमडेगा के शैलचित्रों की शैली और विषय वस्तु में क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विशेषताएं भी विद्यमान हैं, जो इसे भारतीय प्रागैतिहासिक कला में महत्वपूर्ण बनाती हैं। सिमडेगा के उपरोक्त प्रागैतिहासिक शैलचित्र मात्र कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि उस युग की मानव सभ्यता, पर्यावरण और सांस्कृतिक जीवन का ऐतिहासिक दस्तावेज हैं, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को समझने में मदद करते हैं.

झारखंड के सिमडेगा जिले के केरसई प्रखंड में स्थित ढोडीजोर (या ढोडीजोर) गांव एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जहाँ नवपाषाण काल के 500 से अधिक गड्ढे या pits मिले हैं। ये खोजें प्राचीन मानव बस्तियों के प्रमाण प्रदान करती हैं। ये गड्ढे स्थायी बस्तियों, कृषि और भंडारण प्रणाली के संकेत देते हैं। पुरातत्वविदों ने इन्हें सिमडेगा क्षेत्र के प्राचीन मानव इतिहास से जोड़ा है।नवपाषाण काल (लगभग 10,000-2,000 ई.पू.) में झारखंड के छोटानागपुर पठार पर ऐसी बस्तियाँ विकसित हुईं, जहाँ पॉलिश्ड औजार और अनाज भंडार मिलते हैं। ढोडीजोर के गड्ढे इस काल की कृषि-आधारित जीवनशैली को प्रमाणित करते हैं। यह स्थल झारखंड के प्रागैतिहासिक इतिहास को समृद्ध करता है।


पकरी बरवाडीह मेगालिथिक साइट

हजारीबाग जिले में झारखंड के सबसे महत्वपूर्ण प्रागैतिहासिक स्थल चट्टानी आश्रय, गुफाएं और मेगालिथ संरचनाएं हैं, जो पैलियोलिथिक से मेसोलिथिक काल के हैं। ये स्थल शैल चित्रों, पाषाण उपकरणों और खगोलीय अवलोकन संरचनाओं के माध्यम से प्राचीन मानव जीवन, कला और विज्ञान को दर्शाते हैं। इस्को (बड़कागांव) में प्रागैतिहासिक चट्टानी चित्र हैं, जहां बाइसन, हिरण, मेंढक जैसे जीवों के गेरू, सफेद और काले रंगों से बने चित्र मिले हैं। हजारीबाग के शैलाश्रय चित्र मध्य पाषाण काल से ताम्रपाषाण काल के माने जाते हैं। इनकी उम्र अनुमानित रूप से 10,000 वर्ष पुरानी या 9,000-5,000 ईसा पूर्व तक है। पुरातत्वविदों ने उत्खनन से तांबे-पाषाण औजार पाए, जो इन्हें मध्य-ताम्रपाषाण काल (लगभग 7,000-4,000 ईसा पूर्व) से जोड़ते हैं। कुछ स्रोत इन्हें 5,000 से अधिक वर्ष पुराने या मेसोलिथिक युग के बताते हैं, जो सोहराय कला से जुड़े हैं। ये ASI द्वारा संरक्षित हैं। बहोरनपुर पहाड़ी (हजारीबाग से 10 किमी दूर) पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 2020-2022 तक कई चरणों में खुदाई की, जहां 1400 वर्ष पुरानी नगरीय सभ्यता के अवशेष मिले। यहां बौद्ध मंदिर, विहार, अवलोकितेश्वर, ध्यानी बुद्ध, देवी तारा की मूर्तियां, लोहे के हुक, तीर की नोक, ईंट की संरचनाएं और कोयले के प्रमाण पाए गए। जुलजुल पहाड़ी पर 2019-2021 में खुदाई से पाल वंश (9वीं-12वीं शताब्दी) के बौद्ध साधना स्थल, स्तूप, मूर्तियां, पूजन चक्र और चांदी के सिक्के मिले। बहोरनपुर से सेखा तक फैले अवशेषों में कुएं और बावड़ियां भी शामिल हैं।


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