आदिवासी प्रवासन : औपनिवेशिक उत्पाद का एक Faultline

झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है। यहाँ की आदिवासी जनसंख्या विविध परंपराओं, भाषाओं, और सांस्कृतिक पहचान के साथ रहती है एवं इनकी सामाजिक, धार्मिक, और सांस्कृतिक गतिविधियाँ इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर हैं। यद्यपि आर्थिक विकास के मुख्य धार अब ये समुदाय शामिल हो चुके है लेकिन कई ऐसे आदिवासी समूह, राज्य के कई जिलों में बसे हुए हैं जो कृषि, शिकार, खेती, वन आधारित परंपरागत जीवनशैली पर निर्भर हैं। झारखंड के आदिवासी समूहों की कुल अनुसूचित जनजाति आबादी लाखों में है, जो राज्य की एक महत्वपूर्ण सामाजिक इकाई बनाती है। ये जनजाति झारखंड के विभिन्न जिलों में निवास करती हैं और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और भाषा-परंपराओं के लिए जानी जाती हैं। इनका क्षेत्रीय प्रसार इससे लगे अन्य राज्यों यथा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के साथ भी होता है जो सामुदायिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए है।

जहां तक आदिवासियों के समाजशास्त्रीय अध्ययन का प्रश्न है, हर्बर्ट रिजले की पुस्तक दी पीपुल्स ऑफ इंडिया (The People of India) इस संदर्भ में एक क्लैसिकल कृति मानी जाती है। 1915 में प्रकाशित उनकी यह पुस्तक ब्रिटिश भारत के जाति, जनजाति, और नस्लीय अध्ययन पर आधारित एक महत्वपूर्ण कार्य है। इस पुस्तक में रिजले ने भारतीय लोगों को मुख्यतः सात जातीय प्रकारों में वर्गीकृत किया, जो उनके शारीरिक, सामाजिक और सांस्कृतिक लक्षणों के आधार पर थे। उन्होंने भारत की जटिल जाति और जनजाति व्यवस्था को वैज्ञानिक और मानवमिति (Anthropometry) दृष्टिकोण से समझाने का प्रयास किया। यह महत्वपूर्ण है की रिजले ने भारतीय समाज को नस्लीय पदानुक्रम के रूप में देखा, जहाँ जनजातियां (tribes) और जातियां (castes) समाज के विभिन्न स्तरों पर स्थित थीं। उन्होंने विशेष रूप से जनजातियों की पहचान, उनकी भाषा, भू-स्थान, सांस्कृतिक प्रथाएं, और सामाजिक संगठन का विवेचन किया। इन्हें आधार बनाकर उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन द्वारा नीतियाँ बनाने और जनगणना के लिए वर्गीकरण का आधार तैयार किया। कहने की यह आवश्यकता नहीं रिजले की यह पुस्तक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत भारतीय समाज की "वैज्ञानिक" समझ विकसित करने का प्रयास थी और इसके केंद्र में में नस्लीय विभेद था। इस किताब में भारतीय जनजातियों के जिस भौतिक एवं सामाजिक पहलुओं का वर्णन किया गया तत्कालीन ब्रिटिश प्रशासन के नीतिगत फैसलों के लिए महत्वपूर्ण बना। क्योंकि 1947 के बाद भी औपनिवेशिक विरासत को बदलने का कोई प्रयास नहीं किया गया यह समाज शास्त्रीय अध्ययनों के केंद्र मे बना रहा। वर्तमान स्थिति यह है की झारखंड में मुख्य रूप से 32 आदिवासी (जनजातीय) समूह पाये जाते हैं, जिनमें से 24 प्रमुख जनजातियों की श्रेणी में आते हैं और 8 आदिम जनजाति के रूप में। झारखंड की सबसे बड़ी जनजाति संथाल है, उसके बाद उरांव, मुंडा, और हो प्रमुख हैं। अन्य महत्वपूर्ण जनजातियों में कोल, माहली, भूमिज, बिरहोर, असुर, बैगा, खारिया, करमाली, सौरिया पहाड़िया, बिरजिया, कोरवा, किसान, गोंड, कंवर, सावर, सबर, चेरो आदि शामिल हैं।

अंग्रेजों ने जो ‘भारत का इतिहास’ लिखा उसमें न तो भारत था और न ही इतिहास था। औपनिवेशिक राज के अनुसार भारत को बनाने वाले पहले पहल बाहरी आर्य थे, फिर यूनानी आए, शक आए, कुषाण आए, हुण आए, ईरानी आए, मंगोल आए, तुर्क आए मुग़ल आए और और फिर अंग्रेज आए। उपरोक्त सभी तो बाहरी थे ही, आंतरिक प्रवास की कहानियाँ भी तैयार की गई। आर्यों ने द्रविड़ों को सुदूर दक्षिण विस्थापित कर दिया। बिहार, बंगाल उड़ीसा की जनजातियाँ के बारे में भी यही प्रसारित किया गया प्रवासन का इनका लंबा इतिहास रहा है जिसका निष्कर्ष यही था की ये इस देश के मूल बाशिंदे कभी नहीं रहे। उत्तरपूर्व के आदिवासी समुदाय अलग थे, मध्य भारत के आदिवासी समुदाय अलग थे, पश्चिमी भारत के आदिवासी समुदाय अलग थे

19 वीं सदी उत्तरार्ध में प्रयास कही अधिक सुनियोजित था। जबकि सांस्कृतिक एकरूपता के तत्वों को जानबूझकर अनदेखी की गई। हर्बर्ट होप रिसले जो एक ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासक थे, बंगाल प्रेसीडेंसी की जनजातियों और जातियों पर उसका अध्ययन किया अकादमिक अध्ययनों और उस पर आधारित प्रशासकीय नीति निर्धारण का अगुआ बना। उसने क्षेत्रीय सर्वेक्षण और मानवमितीय मापों के माध्यम से जनजातीय समाजों की वर्गीकरण प्रणाली विकसित की यद्यपि वह विशुद्ध रूप से नस्लवाद पर आधारित था।

रिसले ने 1885-1891 में बंगाल के नृवंशविज्ञान सर्वेक्षण का संचालन किया, जिसके परिणामस्वरूप द ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ बंगाल नामक चार खंडों वाली पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें जनजातियों, जातियों और उपजातियों का विस्तृत शब्दकोश तथा मानवशास्त्रीय आंकड़े शामिल थे। उन्होंने नाक सूचकांक जैसे मापों से भारतीयों को आर्यन, द्रविड़ियन और मंगोलॉइड सहित सात नस्लीय प्रकारों में वर्गीकृत किया।​ 1901 की भारतीय जनगणना के आयुक्त के रूप में रिसले ने जाति व्यवस्था को औपचारिक रूप से मान्यता दी और नस्लीय सिद्धांतों पर आधारित वर्गीकरण लागू किया। उसनें जनजातियों को जातियों से अलग करते हुए उनके नस्लीय मूल का विश्लेषण किया, जो बाद में द पीपल्स ऑफ इंडिया (1908) में संकलित हुआ। यह कार्य जनजातीय अध्ययनों को प्रशासनिक नीतियों से जोड़ने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।​ 1885 का वह वर्ष था जब भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना हुई थी और अगले 20 वर्षों मे राष्ट्रीय आंदोलनों ने अपनी जड़ें ग्रामीण समाजों मे विस्तारित करने लगी थी। 1901 और 1908 का वर्ष भी ध्यान देने योग्य है। 1905 ही वह वर्ष था जब राष्ट्रवादी आंदोलनों को तोड़ने के लिए बंग विभाजन की घोषणा की गई थी।

इस तरह रिसले ने समाज विज्ञान (sociology) से अलग नृवंशविज्ञान (Anthropology) की शाखा स्थापित कर दी ताकि ऐसे अध्ययनों को कही अधिक संरचनात्मक रूप प्रदान किया जा सके। समाज शास्त्र जहां मुख्यधारा (शहरी/सभ्यता) के सामाजिक समूहों के आचार, व्यवहार और लोकाचारों का अध्ययन करता है वही नृवंशविज्ञान (Anthropology) के लिए एक ऐसा समूह बनाया गया जिसके बारे में यह मान लिया गया की ऐसे लोग मुख्यधारा से अलग है, जबकि देश का कोई ऐसा भौगोलिक भाग नहीं था जहां आज के जनजातीय समुदाय बास नहीं करते थे। वर्तमान पाकिस्तान के सिंध, राजस्थान के भील, बंगाल प्रेसिडेंसी, मुंबई प्रेसिडेंसी सभी भौगोलिक भूभागों में ये अन्य स्थानीय जनसंख्या के साथ समाहित थे और सामुदायिक अर्थतन्त्र से बिना किसी भेदभाव से जुड़े हुए थे।

जहां तक इनके मौखिक परंपराओं (oral tradition) का सवाल है, देश का ऐसा कोई समूह नहीं है जिसके पास ऐसी परम्पराएं नहीं है। समुदाय आधारित मौखिक परम्पराएं इतनी विशिष्ट नहीं थी उनके मुख्यधारा से ही अलग मान लिया जाए। विभिन्न सामाजिक समुदायों की अपनी परम्पराएं वैदिक प्रणाली के द्वारा मान्य थी। ऋग्वेद के मंडल 1, सूक्त 164, मंत्र 46 में "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" श्लोक आता है जो परम सत्य की एकता पर जोर देता है। ऋगवेद यह मानता है की विद्वान पुरुषों द्वारा सत्य को विभिन्न नामों से पुकार जाता है। इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि सहित सभी देवता भले ही वो किसी छोटे मोटे समुदाय द्वारा पूजित हो एक ही सत्य के रूप हैं। इतना ही नहीं ऋग्वेद का अंतिम सूक्त जो सामंजस्य सूत्र या सूक्त (10.191) के नाम से जाना जाता है तत्कालीन (सर्वयुगीन) समाजों मे सामंजस्य, एकता और सामूहिक सद्भाव का संदेश देता है। यह सूक्त घोषित तौर पर आपसी मतभेद भुलाकर संगठित होने की प्रेरणा देता है। ऋग्वेद का यह सूक्त भारतीय समाज जो की विविधताओं से भारी हुई है की सामूहिकता को दर्शाता है। विद्वान इसे एकता का प्रतीक मानते हैं, जो यज्ञ और सामाजिक जीवन दोनों में लागू होता है।

जनजाति के इंग्लिश में ट्राइब शब्द का प्रयोग होता है। "ट्राइबस" का उपयोग प्राचीन रोम में राज्य के भीतर विभाजन को दर्शाने के लिए किया जाता था। समय के साथ, यह रिश्तेदारी और सामान्य रीति-रिवाजों द्वारा एकीकृत लोगों की सामाजिक इकाइयों का वर्णन करने लगा, जो अक्सर पूर्व-राज्य समाजों या साझा वंशावली और सामाजिक नियमों वाले समूहों में देखी जाती थीं।

भारतीय संदर्भ में "आदिवासी" शब्द औपनिवेशिक और मानवशास्त्रीय उपयोग से प्रभावित था, लेकिन "आदिवासी" शब्द, जो आमतौर पर भारत के आदिवासी लोगों को संदर्भित करने के लिए उपयोग किया जाता है, पहली बार 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में गढ़ा और लोकप्रिय हुआ था। समाज सुधारक ठक्कर बप्पा को 1930 के दशक में आदिवासी समुदायों का वर्णन करने के लिए "आदिवासी" का उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति के रूप में श्रेय दिया जाता है, जिसका उद्देश्य उन्हें भारत के "मूल निवासियों" के रूप में उजागर करना और उन्हें अन्य समूहों से अलग करना था। समग्रतः जनजातियों की उत्पत्ति रिश्तेदारी, सामान्य वंश और साझा सांस्कृतिक प्रथाओं की विशेषता वाले सामाजिक समूहों के रूप में हुई। उनका उद्भव मानव प्रवास, विविध वातावरणों में अनुकूलन और राज्यों के गठन से पहले के सामाजिक संगठन से जुड़ा हुआ है।

यह अवधारणा भारत सहित विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट ऐतिहासिक जड़ों के साथ, दुनिया भर के विविध लोगों को शामिल करते हुए, सहस्राब्दियों से विकसित हुई है। "आदिवासी" शब्द किसी भी प्राचीन आदिवासी, धार्मिक या शास्त्रीय ग्रंथों में नहीं पाया जाता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि यह केवल बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में व्यापक रूप से जाना जाता है, जो स्वदेशी समूहों के बीच राजनीतिक और सामाजिक आत्म-पहचान को दर्शाता है। एक प्रशासनिक और मानवशास्त्रीय श्रेणी के रूप में "आदिवासी" ब्रिटिश भारत में मुख्यधारा बन गया, जो कानूनी और जनगणना दस्तावेजों में संहिताबद्ध है। भारतीय संविधान ने बाद में आधिकारिक उद्देश्यों के लिए "अनुसूचित जनजाति" शब्द को अपनाया, इसके प्रारूपण के दौरान शब्दावली पर बहस के बाद भारत में आदिवासी समुदायों को "जनजाति," "गिरिजन," "वनवासी" सहित विभिन्न शब्दों से संदर्भित किया गया है, लेकिन "आदिवासी" विशेष रूप से 20 वीं शताब्दी के शुरुआती सुधार सक्रियता से जुड़ा है, न कि प्राचीन इतिहास से।

मानवीय प्रवास का बहुलतावादी दृष्टिकोण

आज इस बात के पर्याप्त प्रमाण है "आउट ऑफ अफ्रीका" सिद्धांत के अनुसार, आधुनिक मनुष्य (होमो सेपियंस) की उत्पत्ति लगभग 2-3 लाख वर्ष पूर्व पूर्वी या दक्षिणी अफ्रीका में हुई और फिर ये 60,000-70,000 वर्ष पूर्व विभिन्न लहरों में बाहर निकले जो जलवायु परिवर्तन, संसाधन खोज या तटीय मार्गों से प्रेरित हुए थे। इन लोगों ने दो प्रमुख रास्तों का उपयोग किया। दक्षिणी तटीय मार्ग (Southern Dispersal Route) बाब-ए-मंडब जलसंधि पार अरब प्रायद्वीप होते हुए हिंद महासागर तट के साथ भारत, ऑस्ट्रेलिया (65,000 वर्ष पूर्व) तक। निम्न समुद्र स्तर ने भूमि सेतु बनाया; mtDNA L3 हैप्लोग्रुप M/N इसकी पुष्टि करता है। ओरंग असली और अंडमानियों के DNA इसकी पुष्टि करते है। उत्तरी मार्ग (Northern Route) सिनाई प्रायद्वीप या लेवांत होते हुए यूरोप/एशिया, लेकिन मुख्य लहर दक्षिणी थी। प्रवास का उत्तरी मार्ग नील नदी-सिनाई भूमि सेतु या जॉर्डन रिफ्ट घाटी होते हुए लेवांत (इज़राइल), अरब और अंततः यूरेशिया तक गया था। कुछ प्रमाण रिफ्ट वैली नदियों या लाओस गुफा (68,000 वर्ष पूर्व) से आंतरिक/तटीय संयोजन सुझाते हैं, लेकिन मुख्य लहरें दक्षिणी और उत्तरी ही थी।
डीएनए विश्लेषण से पता चलता है कि अफ्रीका में सबसे अधिक आनुवंशिक विविधता है, जो बाहरी क्षेत्रों की तुलना में सबसेट है, तथा सभी गैर-अफ्रीकियों एक ही लहर से जुड़े हैं। वैसे समय के साथ मानवों के समानांतर विकास या मिश्रण से इनकार नहीं किया जा सकता हैं। संभव है की आधुनिक मनुष्य अफ्रीका से बाहर निकलकर निएंडरथल और अन्य होमिनिन प्रजातियों के साथ संकरण किए होंगे। जहां तक भारत की बात है नर्मदा घाटी (हथनौरा) से 1.6 लाख वर्ष पुरानी होमो सेपियंस खोपड़ी प्राप्त हुई है। नर्मदा घाटी से प्राप्त ये जीवाश्म (हथनौरा) और उच्च आनुवंशिक विविधता प्रारंभिक अफ्रीकी वंश को पुष्टि करते हैं। भारत में आदिवासियों के बीच प्रवास के प्रमाण मुख्यतः आनुवंशिक अध्ययन, जीवाश्म अवशेष और ऐतिहासिक/आधुनिक जनगणना डेटा से मिलते हैं। ये AASI (Ancient Ancestral South Indians) को दर्शाते हैं, जो अफ्रीका से 50,000-65,000 वर्ष पूर्व दक्षिणी मार्ग से आए थे। DNA और mtDNA जैसे आनुवंशिक विश्लेषण से पता चलता है कि आदिवासी समूहों में AASI, प्राचीन ईरानी किसान और स्टेपी चरवाहों का मिश्रण है, और यह वही भूभाग है जो सिंधु-सरस्वती सभ्यता और उसके आसपास ग्रामीण क्षेत्रों (ऋग्वैदिक सभ्यता) से संबद्धधता रखता है। संभव है आज की कई जनजातियाँ जंगलों के विनाश, बदलती पारिस्थितिकी तंत्रों के कारण या बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में विस्थापित होकर मध्यप्रदेश, बंगाल या दक्षिण की ओर प्रवासित हुईं। एक अन्य पहलू भी यह हो सकता है की वर्तमान आदिवासी समुदायों, इतिहास के किसी चरण में अपने सैन्य जनरलों के अधीन कोई विशेष सफलताएं अर्जित की हो और विजिट प्रदेशों मे अपनी बस्तियां बसा ली हो लेकिन समय के साथ वह स्थायी नहीं रह सका। जैसे की सेल्यूकस के नेतृत्व में यूनानी वस्तियाँ बस्तियां पश्चिमी भारत में और फिर मौर्यो से उनके वैवाहिक संबंध स्थापित हो जाने के बाद पाटलिपुत्र में में भी बसायी गई थी। हाल के दिनों में एंग्लो इंडियन समुदायों की बस्तियों से तब की दृश्य की साम्यता बैठाई जा सकती है। संभव है की जिसे हम जनजातीय समुदाय को ‘असुर’ कहते है वह ऋग्वेद के "असुर महत्" (Asura Mahat) से जुड़ा हुआ हो। ऋग्वेद के मंडल 2, सूक्त 1, मंत्र 6 में इसका संकेत मिलता है, जहां इसे सर्वोच्च, सर्वज्ञ और महान असुर कहा गया है। यह वैदिक "असुर" की अच्छी अवधारणा को दर्शाता है। ऋग्वेद (2.1.6) में अग्नि को संबोधित करते हुए "असुर महत्" का प्रयोग एक महान शक्ति के रूप में हुआ है।"असुरं महद् विश्वं..." – महान असुर जो सब कुछ जानता हो। यह इंडो-ईरानी साझा विरासत दिखाता है, जहां वैदिक असुर अच्छे थे।

इस संबंध मे एक अन्य साक्ष्य भी बहुत ही महत्वपूर्ण है। सिंगबोंगा (या सिगबोंग) नामक देवता झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और बिहार की मुंडा, हो, संथाल, भूमिज, असुर, बिरहोर आदि जनजातियों का सर्वोच्च देवता है। सूर्य देव के रूप में पूजित सिंगबोंगा को सृष्टि का रचयिता माना जाता है, जो प्रकाश, जीवन और उर्वरता का प्रतीक है। आदिवासी समुदाय सुख, शांति और समृद्धि हेतु इसकी पूजा सरना स्थलों पर करते हैं। सिंगबोंगा की पूजा आदिवासी समूहों द्वारा द्वारा सरना, जंगल या पवित्र वृक्ष/पाषाण के नीचे संपन्न होती है। खास अवसर जैसे सरहुल, माघे परब में सिंगबोंगा और मरांग बुरु की पूजा की जाती है। यह आश्चर्यजनक है की अफ्रीकी समूहों में प्रचलित जूलू भाषा में सिंगबॉंग से मिलती-जुलती ही ध्वनि है। सियाबोंगा को जूलु भाषाई कोश में हम सम्मान के साथ धन्यवाद/अभिवादन करने के संदर्भ मे प्रयुक्त होते पा सकते है। बोंगा का अर्थ होता है "प्रशंसा करना" या "धन्यवाद," जो "सियाबोंगा" का हिस्सा है। संस्कृत में "श्री" एक अत्यंत ही सम्मानसूचक शब्द है जिसका उल्लेख ऋग्वेद में है। श्री स्वयंभू शब्द है जो श्रि धातु से जन्मी है और सृष्टि की आधारभूत अर्थात् सब कुछ धारण करने वाली शक्ति को दर्शाता है।

सिंगबोंगा की पूजा न केवल सूर्य की उपासना है यह सामुदायिक एकता को मजबूत करती है। यह सरना धर्म का मूल है, जहाँ सूर्य को जीवन दाता मानकर कृषि, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है। और यही भाव उत्तरी भौगोलिक प्रदेश बिहार में छठ पर्व में देखी जाति है। देवता सविता तो है ही, नदी प्रकृति का प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित है और समुदायिक तो दिखती ही है।

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