सनातन विश्वास प्रणाली का गणितीय आधार

संख्याएं सिर्फ गणित नहीं होती, यह विज्ञान का आधार भी होती है। जहां विज्ञान होता है वही सभ्यता होती है और जहां सभ्यता होती है संस्कृति अपने आप होगी। इस तरह से सभ्यता और संस्कृति की ऐतिहासिक विरासत, अंकों और संख्यायों के अनुप्रयोग और अवधारणाओं पर ही निर्भर करती है। जब तक मापन का गणित नहीं होगा, किसी भी सभ्यता और संस्कृति में वाणिज्य और व्यापार की कल्पना भी संभव नहीं। सिंधु- सरस्वती नदी घाटी सभ्यता के नगरीय अवशेष बिना ईंटों के गणितीय मापन के बिना संभव ही नहीं थे। उपर्युक्त भौतिक प्रादर्शो के अनुरूप ही भारत की दार्शनिक परंपरा इस अर्थ मे काफी समृद्ध रही की इससे जुड़े लगभग सारे प्रतीक किसी न किसी रूप से अंकीय गणनाओं/अनुप्रयोगों से जुड़े रहे हैं। अलग अलग अंकों से जुड़ी इसके धार्मिक जीवन के विभिन्न लोकाचार एक ऐसा सुंदर चित्र प्रस्तुत करती है जो इसकी श्रेष्ठता को तो बताते ही है अखिल ब्रह्मांड के साथ एकात्मकता का बोध करती है। सनातन की विश्वास प्रणाली में कुछ भी रहेटऑरिक नहीं है। यहाँ के हर विचार को अंकीय संदर्भों में व्यक्त किया गया है और तभी यह वैज्ञानिक है और समय के साथ खड़ा उतरा है। शून्य को हम ‘कुछ नहीं’ समझते लेकिन जब भी हम इसका प्रयोग करते है तो यह ‘कुछ नहीं’ कुछ न कुछ जगह जरूर छेकती है।  शून्य का सादृश्य ब्रह्मांड के पिंडों से बैठाया गया है। इसी तरह अन्य अंकों और संख्याओं का अपना अद्भूत विचार भी है जो भारतीय चिंतन प्रणाली मे व्यक्त हुआ है और यही वह मूल कारण है जिसने इसे वैज्ञानिक बना दिया है। चुकी इसकी प्रणाली वैज्ञानिक है इस पर आधारित सनातन की विश्वास प्रणाली की स्वीकार्यता कभी भी कम नहीं हुई। इसकी वैज्ञानिकता के मूल में इसका अंकीय और गणितीय परिणामों में व्यक्त होना ही है जिसके बिना सनातन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

शून्य (0) का विचार

शून्य की अवधारणा भारतीय संस्कृति की सबसे रहस्यमयी और उत्साही कल्पना है जिसने न केवल भारत की बल्कि पूरी मानवीय सभ्यताओं के अस्तित्व को भी संभव बनाया। समझ के अत्यंत ही निचले स्तरों पर हाथों के अंगुलियों की गणना सभी कर रहे थे लेकिन इस गणना की कहानी मे रोचक मोड़ अब आया जन शून्य अस्तित्व मे आया फिर गणना का विज्ञान के अनुप्रयोग से इस दस (10) लिखा गया। शून्य को दसवें अंक का दर्जा मिलते ही, अब सिर्फ दस (10) ही नहीं, बड़ी से बड़ी संख्यायों को भी आसानी से लिखा जा सकता था।

शून्य का व्यवहार हमारे संस्कृति के नियंताओं के प्रेक्षण की तीक्ष्णता का बोध करता है और साथ ही उनके ब्रह्मांड संबंधी विचारों की सटीकता का भी। गणितीय दृष्टिकोण के अनुसार शून्य की सबसे बड़ी विशेषता उसका स्थानीय मान रखना होता है जिसके अनुसार शून्य अगर किसी स्वतंत्र संख्यायों के बाएं पक्ष में लगा हो तो उसका लिखना या न लिखना महत्वहीन बन जाता है। लेकिन जैसे ही इसका प्रयोग किसी अन्य संख्या के दायें ओर होता है संख्यायों के मान मे दस गुणी वृद्धि हो जाती है। गणित के दशमलव प्रणाली शून्य के इसी प्रयोग पर आधारित है जिसने गणितीय गणनाओं को सरल बना दिया जिससे निर्माण, कला और वाणिज्य व्यापार संभव हुए क्योंकि अब जोड़ना घटाना संभव हो गया था। जहां तक दुनिया के अन्य भागों की स्थिति है चीनी यद्यपि जोड़ने घटाने की क्रियाओं से अवगत थे लेकिन बड़े संख्याओं को व्यक्त करने का तरीका उन्हे मालूम नहीं था। यही कारण था की चीनी बड़ी संख्यायों को लिखने के लिए चित्रों का सहारा लेते थे। मिश्र और बेबीलोन प्राचीन सभ्यताओं की भी कमोवेश यही कहानी थी। शून्य के प्रयोग की जानकारी के अभाव मे वे एक स्थान खाली छोड़ देते थे। लेकिन जब एक बार भारत के द्वारा प्रतिपादित शून्य के विचार ने मान्यता प्राप्त कर ली तो शून्य ने ‘गणित की दुनिया’ के साथ ही ‘दुनिया का गणित’ को हमेश के लिए बदल दिया।

आगे चलकर गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त ने शून्य के प्रयोग के बारे में विस्तार से बताते हुए इसके आधारभूत सिद्धांतों की जानकारी भी दी। उनके बताए गए नियम इस प्रकार है:

X+0 = X

X-0 = X

0*0= 0

और इस तरह यह दुनिया का पहली गणना थी ओ शून्य के साथ की गई थी। लेकिन अभी भी इस बात का कोई उत्तर नहीं था की अगर किसी अंक/संख्या में शून्य से भाग करते है तो क्या होगा। इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए दुनिया को लगभग 500 वर्षों की प्रतीक्षा करनी पड़ी जब 12वी सदी के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य ने यह बताया की किसी भी संख्या में शून्य से विभाजन का परिणाम अनन्त होगा। अनन्त का यह सिद्धांत भी सनातन ग्रंथों में वर्णित था। इस सिद्धांत के अनुसार ईश्वर का स्वरूप अनंत माना गया है। अनंत की यह कल्पना भी हर तरह से शून्य के विचार  को क्रांतिकारी बना देती है। जहां तक शून्य के वैचारिक चिंतन का प्रश्न है, यह हमारे सनातन विस्वस प्रणाली सदैव विद्यमान रहा है। और उस का यह स्वाभाविक प्रतिफल है। ऋग्वेद के 10 वें मण्डल का 129 वां सूक्त नासदीय सूक्त के अनुसार इस सृष्टि की उत्पत्ति शून्य से हुई है और अंत मे सब कुछ शून्य में ही समा जाएगा।  सिर्फ सनातन ही नहीं बल्कि बौद्ध विचारों में भी इसका महत्व है। बुद्ध धर्म ने एकाग्रता और ध्यान को सीधे-सीधे शून्य से जोड़ा है। शून्य अर्थात् निर्वाण का भाव जब कुछ विलीन हो जाता है और कुछ भी बाकी नहीं बचता। यह प्रतीकात्मक रूप मे आत्मा तथा परमात्मा के एकात्म होने का भाव है। यहाँ तक की बौद्ध धर्म में तो एक के बाद 53 शून्य लगाकर (जिन्हें लक्षण कहा गया है) चिंतन, ध्यान लगाया जाता है। यह एक बहुत बड़ी संख्या है जो एक तरह से अनंत की ओर का प्रयाण है। जैन धर्म में अनंत संख्याओं को अध्यात्म से जोड़ा गया है।

यह एक तरह की मुक्ति को दिखाता है। जब व्यक्ति अपने चरम पर होता है तो वह निर्वाण चाहता है। जब उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो चुकी होती हैं तो वह शून्य की अवस्था मे होता है और तब वहाँ कुछ भी नहीं बचता और इसी अवस्था मे सब कुछ होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कुछ भी न होना ही सब कुछ है। वेदांतों में जिसे ब्रह्म और परमात्मा कहा गया है, वह शून्य परमात्मा का प्रतीक है। अनंत का नाम ही शून्य है। गणित के अभ्यास से निर्वाण प्राप्त किया जा सकता है। काही ऐसा तो नहीं है की गणित की संख्याओं और निर्वाण यानी मुक्ति के बीच कुछ संबंध है। आधुनिक कल का एक महान गणितज्ञ और दार्शनिक गैलेलियो ने भी तो यही कहा था गणित वह भाषा है जिसमें भगवान ने ब्रह्मांड को लिखा है!

एक (१) का विचार

सनातन प्रणाली मे एक (१) विलक्षण अर्थ लिए हुए है। यह चेतना के अंतिम रूप को अभिव्यक्त करता है जिसे ब्रह्म कह कर पुकारा गया है। और क्योंकि वह परम सत्य है, जो एक ही हो सकता है गणितीय गणनाओं का प्रारंभ एक से ही होता है। एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति (ऋ. 1.164.46) या एको अहम्, दूजो नास्ति (अष्टावक्र गीता मंत्र 16.11) यदि जैसे उद्भूत विचार इसी एक को व्याख्यायित करते है। देवनागरी में इसकी आकृति १ भी यही व्यक्त करती है। इस १ का ऊपरी शिरा शून्य है जो की ब्रह्मांड का बोधक है और उस से निकली एक रेखा इसी बात कको प्रमाणित करती है की ब्रह्मांड में एक ही है जो सत्य है और सर्वकालिक है। य: अखिलं जगन्निर्माणेन बर्हति वर्द्धयति स ब्रह्मा । अर्थात् यो सम्पूर्ण जगत को रच के बढ़ाता है इसलिए परमेश्वर का नाम ब्रह्मा है। वेवेष्टि व्यापनोति चराचरं जगत् स विष्णु परमात्मा। अर्थात् चर और अचर रूप जगत् में व्याप्त होने से परमेश्वर का नाम विष्णु है।यो महतां ईश: स महेश:। अर्थात् जो महान देवों का देव, विद्वानों का भी विद्वान, सूर्य और सूत्रात्मा वायु जैसे बड़े पदार्थों का भी ईश (स्वामी) होने से परमेश्वर का नाम महेश है।

नासदीय सूक्त का यही प्रमाण है की जब कुछ भी नहीं था वह एक ही था जो जगत के भार को एक शून्य पर समेटे हुआ था और इस एक की व्यापकता का वर्णन वेदान्त खूब करते है। समसामयिक दौर में जो कुछ भी वैज्ञानिक निष्कर्षों के प्राप्त हुआ है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है की वास्तव में वह वेदान्त दर्शन है जो ब्रह्मांड की वैज्ञानिक और गणितीय रूप से व्याकहहया करने मे सक्षम है। यह आश्चर्य नहीं की क्वांटम भौतिकी के सिद्धांत जितना वेदान्त से मेल कहते है उतना दिनीय के किसी भी दर्शन अथवा विचारों से नहीं। संभव है आगे आने वाले समय में क्वांटम भौतिकी के सारे सिद्धां इसी वेदान्त मे समाहित हो जाएं।

लेकिन एक का एक व्यावहारिक पक्ष भी है जो हमारे आपके और सबके रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी हुई है। और अगर यह एक नहीं हो तो जीवन मे अराजकता का राज स्थापित हो जाएगा। सभी समाजों मे हम देखते है की यह उनके नियंत्रण और संचालन की मौलिक इकाई है। जैसे की एक घर या एक परिवार का एक मुखिया होगा। उसी तरीके से एक राष्ट्र, एक राजा, और एक विधान की व्यवस्था की गई है। इसका सीधा स अर्थ यह है की किसी खास समय में किसी भी समाज में सृष्टि के निर्माण और संचालन की इकाई के रूप में मे एक को ही जिम्मेदारी देने का आह्वान किया गया है। क्या यह उसी एक परम चेतन के अनुरूप निर्देशित नहीं लगता है? इससे ऊपर ऋग्वेद की यह प्रार्थना की हमारे विचार एक हो के संदर्भ को बड़े ही अलंकारिक तरीके से अभिव्यक्त करते है। समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति। (ऋग्वेद : मंडल 10, सूक्त 191, मंत्र 4)। अर्थात हे मनुष्यो! तुम लोगों के संकल्प और निश्चय एक समान हों, तुम सबके हृदय एक जैसे हों, तुम्हारे मन एक समान हों ताकि तुम्हें सब शुभ, मंगलदायक हो।

दो (२) का विचार

दो का विचार सनातन सिद्धांत का एक बुनियादी विचार है। यह स्वाभाविक रूप से एक के ही साथ उद्भूत हुआ है। जब एक परम सत्ता परम ब्रह्म ने स्वयं को विभिन्न रूपों मे व्यक्त किया तो गुणों-लक्षणों का एक द्वैध-द्वन्द्व का जन्म हुआ। जन्म-मरण, सुख-दुख, पुरुष-प्रकृति, लाभ-हानि यदि जैसे अनेक लाक्षणिक भाव/अनुभव इसी द्वैध को व्यक्त करते है। अर्थात इसका सीधा सा यह अर्थ यह है अपने बुनियादी स्तर पर यह जगत/सृष्टि मूल्यों के द्वैध को अभिव्यक्त करता है और इसी द्वैध गुणों/लक्षणों की अभिव्यक्ति ही अंक दो (२) का प्राथमिक आवश्यकता थी और है भी। कहने की अवश्यकता नहीं की मूल्यों का यह द्वैध समय के साथ हमारे कर्मकांडीय क्रियाकलापों का एक अभिन्न अंग बन चुका है। और फिर इसी के अनुरूप प्रसिद्ध भारतीय दर्शन द्वैत एवं अद्वैत का आविर्भाव हुआ है।

मध्वाचार्य द्वैतवाद के प्रेरक माने जाते है। मध्वाचार्य के अनुसार द्वैतवाद में स्वतन्त्र तत्त्व परमात्मा है जबकी अस्वतन्त्र तत्त्व जीवात्मा है। ये दोनों तत्त्व नित्य और अनादि हैं, जिनमें स्वाभाविक भेद है जिसे उन्होंने 'प्रपंच' कहा है। इसके विपरीत अद्वैत विचारधारा के संस्थापक शंकराचार्य है। उनके अनुसार संसार में ब्रह्म ही सत्य है, जगत् मिथ्या है। जीव और ब्रह्म अलग नहीं हैं। जीव केवल अज्ञान के कारण ही ब्रह्म को नहीं जान पाता जबकि ब्रह्म तो उसके ही अंदर विराजमान है। उन्होंने अपने ब्रह्मसूत्र में "अहं ब्रह्मास्मि" ऐसा कहकर अद्वैत सिद्धांत बताया है।

तीन (३) का विचार

अब तक हमने शून्य को जाना, एक को जाना और दो को जाना। तीन का विचार उसी की अगली कड़ी है। द्वैध अगर इस सृष्टि के दो विपरीत गुणों को अभिव्यक्त करता है तो दो के बीच की भी एक अवस्था होगी ही। अर्थात २ के विचार से ही ३ की उत्पत्ति मानी जा सकती है। अर्थात व्यावहारिक दरिस्टिकों से तो अतियों (extremes) के बीच की अवस्था को वर्णित करने के लिए एक तीसरी अवस्था की जरूरत पड़ी और इस तरह से ३ का अस्तित्व में आना सुनिश्चित हुआ।

लेकिन सनातन के सैद्धांतिक पक्ष इस बात को भी रेखांकित करते है की तीन की जरूरत उसकी प्रयोगात्मक व्यवहार का उपरोक्त सरलीकरण के अलावा कुछ अन्य बुनियादी संकल्पनाएं भी है जिसने तीन को संभव बनाया। इस इस कारणों से भी साबित होता है की की ३ शायद सनातन विश्वास प्रणाली मे सर्वाधिक प्रयोग में आने वाला अंक ही। तीन या कहें की त्रि का प्रयोग बहुविध विचारों को समझने मे किया जाता है। इसकी एक एक अन्य विशेषता होती यह होती है की यह अपने पूर्ववर्ती अर्थात ०, १, और २ का योग भो होता है। अर्थात इसमें इन तीनों के गुणों का भी समावेश होता है। त्रिदेव सहित त्रिदेवियाँ और त्रिदोष आदि जैसे विचार इसी ३ की अभिव्ययक्ति है।

त्रिदेव : जब एक परम चेतना ने स्वयं को विभिन्न रूपों मे व्यक्त किया तो उससे उपजे अनुभवों के द्वैध ने ही त्रिदेव के विचार को जन्म दिया। कक क्योंकि यह सब सृजन का ही रूप है जो बिना पुरुष प्रकृति के संयोग से नहीं हो सकता त्रिदेव के साथ ही त्रिदेवियों के विचार को भी कल्पित किया गया। स्थूल स्तर का यह विश्लेषण अपने सूक्ष्मतम स्तर पर इस ब्रह्मांड के त्रिविमीय (३-Dimensional) होने का बोध कराता है। क्योंकि जब शून्य में स्थित एक चेतना ने अपने आप को मूल्यों/लक्षणों के द्वैध के साथ व्यक्त किया तो उसका विस्तार सभी आयामों में हुआ और इन आयामों को सरलतम स्तर पर समझने के लिए हमे तीन संदर्भों रेखाओं की जरूरत पड़ती है जिसके लिए त्रिदेव की सुंदर कल्पना की गई। वराह पुराण की यह कथा इसी बात को पुष्ट करती है। कहा जाता है कि अपनी तपस्या तथा शक्ति के माध्यम से बलि ने त्रिलोक पर आधिपत्य पा लिया था। वामन भगवान ने बाली से तीन पग भूमि देने का आग्रह किया। बलि ने भगवान वामन को तीन पग भूमि दान में दे दी। फिर भगवान वामन ने अपना आकार इतना बढ़ा लिया कि पहले ही पग में पूरा भूलोक (पृथ्वी) नाप लिया। दूसरे पग में देवलोक नाप लिया। तीसरे पग के लिए जब कोई भूमि बची ही नहीं तो बली ने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। तीन पग का संदर्भ यही है।
चार (४) का विचार

चार की जरूरत जीवन से जुड़ी आवश्यकताओं को मूर्त रूप देने के लिए हुई थी। यह अपेकक्षाकृत एक बड़ी संख्या है जो स्थूल जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं को व्यक्त करने के लिए की गई थी। चार वर्णों की व्यवस्था और चार आश्रमों में करते हुए जीवन के लिए पुरुषार्थ की प्रावधान किया गया। और फिर अपौरुषेय ज्ञान को चार वेदों में भी संगृत किया गया। जहां तक कल की गणना का सवाल है चार युगों की प्रावधान कर दिया गया। हिन्दू धर्म-ग्रंथों के अनुसार समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है- क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र;।

ब्राह्मण' भारत में आर्यों की समाज व्यवस्था अर्थात वर्ण व्यवस्था का सबसे ऊपर का वर्ण है। भारत के सामाजिक बदलाव के इतिहास में जब भारतीय समाज को हिन्दू के रूप में संबोधित किया जाने लगा, तब ब्राह्मण वर्ण, जाति में भी परिवर्तित हो गया। ब्राह्मण वर्ण अब हिन्दू समाज की एक जाति भी है। ब्राह्मण को

क्षत्रिय वह है जो बाहुबल द्वारा समाज में व्यवस्था रखकर उन्हें उच्छृंखल होने से रोकता है। राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना है। भारतीय आर्यों में अत्यंत आरम्भिक काल से वर्ण व्यवस्था मिलती है, जिसके अनुसार समाज में उनको दूसरा स्थान प्राप्त था। उनका कार्य युद्ध करना तथा प्रजा की रक्षा करना था। ब्राह्मण ग्रंथों के अनुसार क्षत्रियों की गणना ब्राहमणों के बाद की जाती थी, परंतु बौद्ध ग्रंथों के अनुसार चार वर्णों में क्षत्रियों को ब्राह्मणों से ऊँचा अर्थात समाज में सर्वोपरि स्थान प्राप्त था। गौतम बुद्ध और महावीर दोनों क्षत्रिय थे और इससे इस स्थापना को बल मिलता है कि बौद्ध धर्म और जैन धर्म जहाँ एक ओर समाज में ब्राह्मणों की श्रेष्ठता के दावे के प्रति क्षत्रियों के विरोध भाव को प्रकट करते हैं, वहीं दूसरी ओर पृथक् जीवन दर्शन के लिए उनकी आकांक्षा को भी अभिव्यक्ति देते हैं। क्षत्रियों का स्थान निश्चित रूप से चारों वर्णों में ब्राह्मणों के बाद दूसरा माना जाता था।

जो नाश से रक्षा करे वह क्षत्रिय है। - कालिदास

खेती, गौ पालन और व्यापार के द्वारा जो समाज को सुखी और देश को समृद्ध बनाता है, उसे वैश्य कहते हैं। 'वैश्य' का हिंदुओं की वर्ण व्यवस्था में तीसरा स्थान है। इस वर्ण के लोग मुख्यत: वाणिज्यिक व्यवसाय और कृषि करते थे। हिंदुओं की जाति व्यवस्था के अंतर्गत वैश्य वर्णाश्रम का तीसरा महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। इस वर्ग में मुख्य रूप से भारतीय समाज के किसान, पशुपालक, और व्यापारी समुदाय शामिल हैं। 'वैश्य' शब्द वैदिक 'विश्' से निकला है। अर्थ की दृष्टि से 'वैश्य' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत से हुई है, जिसका मूल अर्थ "बसना" होता है। मनु के 'मनुस्मृति' के अनुसार वैश्यों की उत्पत्ति ब्रह्मा के उदर यानि पेट से हुई है। जबकि कुछ अन्य विचारों के अनुसार ब्रह्मा जी से पैदा होने वाले ब्राह्मण, विष्णु से पैदा होने वाले वैश्य, शंकर से पैदा होने वाले क्षत्रिय कहलाए; इसलिये आज भी ब्राह्मण अपनी माता सरस्वती, वैश्य लक्ष्मी, क्षत्रिय माँ दुर्गे की पूजा करते है

शूद्र भारतीय समाज व्यवस्था में चतुर्थ वर्ण या जाति है। वायु पुराण, वेदांतसूत्र और छांदोग्य एवं वेदांतसूत्र के शांकरभाष्य में शुच और द्रु धातुओं से शूद्र शब्द व्युत्पन्न किया गया। वायु पुराण का कथन है कि शोक करके द्रवित होने वाले परिचर्यारत व्यक्ति शूद्र हैं। भविष्यपुराण में श्रुति की द्रुति (अवशिष्टांश) प्राप्त करने वाले शूद्र कहलाए। दीर्घनिकाय में खुद्दाचार (क्षुद्राचार) में सुद्द शब्द संबद्ध किया गया। होमर के द्वारा उल्लिखित 'कूद्रों' से शूद्र शब्द जोड़ने का भी प्रयत्न हुआ। उपरोक्त तीनों वर्णों की सेवा करना शूद्र का कार्य था। इस वर्ण का भी उतना ही महत्त्व था जितना अन्य तीनों वर्णों का था। यह वर्ण ना हो तो शेष तीनों वर्णों की जीवन व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाए। यह व्यवस्था समाज के संतुलन के लिए थी। पाश्चात्य दार्शनिक प्लेटो ने भी समाज को चार वर्णों में विभाजित करना अनिवार्य बताया है। अन्य धर्मों में भी इस प्रकार की वर्ण व्यवस्था की गयी थी। प्रत्येक व्यवस्था गुणों और कर्मों के आधार पर थी। डॉ.राधाकृष्णन कहते हैं - 'जन्म और गुण इन दोनों के घालमेल से ही वर्ण व्यवस्था की चूलें हिल गयी हैं।' शूद्र शब्द मूलत: विदेशी है और संभवत: एक पराजित अनार्य जाति का मूल नाम था। शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति शूद्र पैदा होता है और प्रयत्न और विकास से अन्य वर्ण अवस्थाओं में पहुँचता है। वास्तव में प्रत्येक में चारों वर्ण स्थापित हैं। औसत जीवन 100 वर्ष माना जाता था। इसके आधार पर वैदिक जीवन के चार आश्रम थे- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। प्रत्येक चरण या आश्रम का लक्ष्य उन आदर्शों को पूरा करना था जिन पर ये चरण विभाजित थे। आश्रम जीवन के चरणों का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी आयु के आधार पर जीवन के सभी चार चरणों में आश्रय लेता है। ये अवस्थाएँ उन कर्तव्यों का स्तरीकरण करती हैं जिन्हें मनुष्य को अपने जीवनकाल में अभ्यास करना होता है। ये चार विभाग प्राचीन मनु की लिपियों में स्पष्ट हैं। ऐसी कार्यप्रणाली के साथ तत्कालीन समाज ने सामाजिक संस्थाओं को एक साथ रखने का भी लक्ष्य रखा। कम उम्र से ही आदमी को नैतिकता, आत्म-संयम, बुद्धिमत्ता, व्यावहारिकता, प्रेम, करुणा और अनुशासन के मार्ग दिखाए गए थे। उन्हें लालच, क्रूरता, सुस्ती, घमंड और कई अन्य दोषों से दूर रहने के लिए निर्देशित किया गया था। यह व्यवस्था बड़े पैमाने पर समाज के लिए भी फायदेमंद थी।

जीवन के चार आश्रमों के अनुसार एक आदमी को 4 चरणों में अपने जीवन का नेतृत्व करने की उम्मीद थी:
ब्रह्मचर्य: – यह चरण पहला है जो 25 वर्ष तक रहता है। इस अवस्था में मनुष्य विद्यार्थी जीवन जीता है और ब्रह्मचर्य का पालन करता है। इस चरण का आदर्श वाक्य मनुष्य को स्वयं को प्रशिक्षित करने के लिए प्रशिक्षित करना है।

गृहस्थ: – इस समय मनुष्य को अपने सामाजिक और पारिवारिक जीवन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह चरण 25 से शुरू होता है और 50 साल तक रहता है। गृहस्थ व्यक्ति के जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ मनुष्य को अपने पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों दोनों को संतुलित करना होता है। वह विवाहित है और अपने घर का प्रबंधन करती है और साथ ही साथ बाहर की दुनिया की जरूरतों को भी देखती है। उसे एक बेटे, भाई, पति, पिता और समुदाय के सदस्य के कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा।

वानप्रस्थ: – यह आंशिक त्याग का कदम है। यह अवस्था 50 वर्ष की आयु में मनुष्य के जीवन में प्रवेश करती है और 75 वर्ष की आयु तक रहती है। उसके बच्चे बड़े हो जाते हैं और वह धीरे-धीरे भौतिक संबंधों से दूर हो जाता है। यह सेवानिवृत्ति के लिए उसकी उम्र है और एक ऐसे रास्ते पर चलना शुरू करता है जो उसे दिव्य की ओर ले जाएगा।

संन्यास: उनके जीवन का अंतिम चरण तब आता है जब वह अपने सांसारिक संबंधों को पूरी तरह से बंद कर देते हैं। यह चरण 75 से शुरू होता है और मर जाने तक रहता है। वह भावनात्मक जुड़ावों से पूरी तरह मुक्त है। वह एक तपस्वी बन जाता है।

भारतीय परम्परा में जीवन का ध्येय पुरुषार्थ को माना गया है। धर्म का ज्ञान होना जरूरी है तभी कार्य में कुशलता आती है कार्य कुशलता से ही व्यक्ति जीवन में अर्थ अर्जित कर पाता है। काम और अर्थ से इस संसार को भोगते हुए मोक्ष की कामना करनी चाहिए। ये चार पुरुषार्थ है- 1.धर्म, 2.अर्थ 3.काम और 4.मोक्ष। इन पुरुषार्थों का क्रम अत्यंत वैज्ञानिक है। प्रथम स्थान पर धर्म को रखने का प्रयोजन इसके प्रतिपादक ऋषि की दूरदर्शिता को प्रकट करता है। भ्रष्टाचार मुक्त सामाजिक संरचना के लिए यह क्रम महत्वपूर्ण है। यदि धर्म पालन करते हुए अर्थ और काम की प्राप्ति की जाए तो मानव जीवन का प्रयोजन और लोकतंत्र की सिद्धि, दोनों स्वत: हो जाते हैं। दुर्भाग्यवश जब लोग धर्म छोड़कर अर्थ और काम की प्राप्ति में लग जाते हैं तभी अनीति और भ्रष्टाचार पनपते हैं। अत: लोकहित में धर्म का पालन करते हुए अर्थ और काम की र्पूित के लिए यत्न करना चाहिए। तभी लोकतंत्र का निहितार्थ सफल हो सकेगा और पुरुषार्थ की सिद्धि भी।



४ वेद

1. ऋग्वेद

2. सामवेद

3. अथर्ववेद

4. यजुर्वेद

ऋक अर्थात् स्थिति और ज्ञान ऋग्वेद सबसे पहला वेद है जो पद्यात्मक है। इसके 10 मंडल (अध्याय) में 1028 सूक्त है जिसमें 11 हजार मंत्र हैं। इस वेद की 5 शाखाएं हैं - शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन। इसमें भौगोलिक स्थिति और देवताओं के आवाहन के मंत्रों के साथ बहुत कुछ है। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा और हवन द्वारा चिकित्सा का आदि की भी जानकारी मिलती है। ऋग्वेद के दसवें मंडल में औषधि सूक्त यानी दवाओं का जिक्र मिलता है। इसमें औषधियों की संख्या 125 के लगभग बताई गई है, जो कि 107 स्थानों पर पाई जाती है। औषधि में सोम का विशेष वर्णन है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने की कथा भी मिलती है।

यजुर्वेद का अर्थ : यत् + जु = यजु। यत् का अर्थ होता है गतिशील तथा जु का अर्थ होता है आकाश। इसके अलावा कर्म। श्रेष्ठतम कर्म की प्रेरणा। यजुर्वेद में यज्ञ की विधियां और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। यह वेद गद्य मय है। इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिए गद्य मंत्र हैं। इस वेद की दो शाखाएं हैं शुक्ल और कृष्ण।

कृष्ण :वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है। कृष्ण की चार शाखाएं हैं।

शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है। शुक्ल की दो शाखाएं हैं। इसमें 40 अध्याय हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में च्ब्रीहिधान्यों का वर्णन प्राप्त होता है। इसके अलावा, दिव्य वैद्य और कृषि विज्ञान का भी विषय इसमें मौजूद है।

साम का अर्थ रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। सामवेद गीतात्मक यानी गीत के रूप में है। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। 1824 मंत्रों के इस वेद में 75 मंत्रों को छोड़कर शेष सब मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं।इसमें सविता, अग्नि और इंद्र देवताओं के बारे में जिक्र मिलता है। इसमें मुख्य रूप से 3 शाखाएं हैं, 75 ऋचाएं हैं।

अथर्व का अर्थ है कंपन और अथर्व का अर्थ अकंपन। ज्ञान से श्रेष्ठ कर्म करते हुए जो परमात्मा की उपासना में लीन रहता है वही अकंप बुद्धि को प्राप्त होकर मोक्ष धारण करता है। इस वेद में रहस्यमयी विद्याओं, जड़ी बूटियों, चमत्कार और आयुर्देद आदि का जिक्र है। इसके 20 अध्यायों में 5687 मंत्र है। इसके आठ खण्ड हैं जिनमें भेषज वेद और धातु वेद ये दो नाम मिलते हैं।

महावाक्य ।। प्रजानाम ब्रह्मा।। ।। अहम् ब्रह्मास्मि।। ।। तत्त्वमसि।। ।। अयामात्मा ब्रह्मा।।

४ युग

1. सतयुग

2. त्रेतायुग

3. द्वापरयुग

4. कलियुग

४ गुरु-शिष्य परंपरा

1. परमपदा

2. सुरेश्वरा

3. हस्तमलकाचार्य

4. टोटकाचार्य

४ मठ

1. गोवर्धन मठ

2. श्रृंगेरी शारदा मठ

3. द्वारकापीठ मठ

4. ज्योतिर्मठ


४ संप्रदाय

1. श्री संप्रदाय (गुरु - लक्ष्मी, आचार्य - रामानुजाचार्य)

2. माधव संप्रदाय (गुरु - ब्रम्हा, आचार्य - माधवाचार्य)

3. रूद्र संप्रदाय (गुरु - रूद्र, आचार्य - वल्लभाचार्य)

4. कुमार संप्रदाय (गुरु - चार कुमार, आचार्य - निम्बार्काचार्य)


सिद्धांत की मान्यता है की ब्रह्मांड पांच तत्वों से बना है, जो जल, वायु, अग्नि, आकाश और पृथ्वी है। ये तत्व ब्रह्मांड में संतुलित अवस्था में मौजूद हैं। ऋषि मुनियों का मानना था कि सारी प्रकृति व्यक्ति का हिस्सा है, क्योंकि हम सभी प्रकृति से बने हैं, हमारा अस्तित्व प्रकृति में हैं और इसी प्रकृति मे ही पांच तत्वों को बहुआयामी (multidimensional) माना जा सकता है, इस आर्टिकल में हम पांच तत्वों को मानव जीवन में उनकी भूमिका के अनुशार मानव शरीर के साथ संबंधित कर रहे हैं।


पंचमहाभूत और आयुर्वेद

वैदिक विज्ञान के अनुसार, जब आत्मा ( पुरुष) जीवन का रूप लेती है तो ये प्रकृति के पाँच तत्वों से बानी होती है, अर्थात - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। आयुर्वेद और योग सूत्र इनके महत्व के बारे में समझते हैं की ब्रह्मांड इन पांच तत्वों से बना एक एकीकृत इकाई (integrated unit) के रूप में काम करते है और पृथ्वी को संभालता है । सभी पदार्थ पाँच मूल तत्वों से बने हैं, उन्हें पंचमहाभूत के नाम से जाना जाता है। पौधों, जानवरों और मनुष्यों सहित सभी जीवित प्राणियों का आधार प्रकृति के पांच तत्व हैं | हमारे शरीर के साथ निम्नलिखित तरीके से पांच इंद्रियां जुड़ी हुई हैं:

1- अंतरिक्ष - कान (श्रवण / ध्वनि) से जुड़ा हुआ है

2- त्वचा के साथ वायु (स्पर्श)

3- आग (दृष्टि / रंग) के साथ

4- जीभ के साथ पानी (स्वाद)

5- पृथ्वी नाक के साथ (गंध)

परिणाम और चर्चा -

शरीर में ऊर्जा विभिन्न रूपों में मौजूद होती है जैसे जैव ऊर्जा (Bio Energy), विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा (electromagnetic energy), यांत्रिक ऊर्जा (Mechanical energy) और रसायन ऊर्जा (Chemical energy) इन सब को सामूहिक रूप से शरीर की महत्वपूर्ण ऊर्जा कहा जाता है और इन पांच तत्वों में कोई भी असंतुलन शरीर में बीमारियाँ लाता है।

पांच तत्त्व और उनका क्षेत्र:

1- शरीर में पृथ्वी तत्व का असंतुलन आंत्र, बड़ी आंत, की बीमारियों से जुड़ा हुआ है और शरीर के ठोस हिस्से जैसे: हड्डियाँ, दाँत आदि, पैर, पैर, घुटने, रीढ़ की हड्डी, खाने के विकार और बार-बार होने वाली बीमारियाँ पृथ्वी तत्त्व की कमी कमी से होती हैं ।

2- जल तत्व का असंतुलन प्रजनन अंगो (Reproductive organs), प्लीहा (Spleen), भूख न लगना, मूत्र संबंधी विकारों से जुड़ा है, इस के आलावा मासिक धर्म संबंधी कठिनाइयाँ, यौन रोग (Sexual Problems) और शिरर में लचीलेपन (Flexibility) की कमी भी जल तत्त्व के असंचलन की वजह से होती हैं

3- शरीर में अग्नि तत्व के असंतुलन से खाने और पाचन संबंधी विकार, अल्सर, मधुमेह, मांसपेशियों में ऐंठन,

थकान और उच्च रक्तचाप (Hypertension) जैसे बीमारियाँ होती हैं

4- हवा तत्त्व में असंतुलन के कारण हृदय के विकार, फेफड़े, स्तन विकार, सांस लेने में दिक्कत, अस्थमा, सर्कुलेशन प्रॉब्लम, इम्यून सिस्टम की कमी, कंधे और गर्दन में तनाव दर्द, छाती और शरीर में जलन होती हैं।

5- अंतरिक्ष तत्व के असंतुलन से थायरॉइड विकार, गले, भाषण, बोलने और कान से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

निष्कर्ष
जब तक आप के शरीर में प्रकृति के पंच तत्वों का संतुलन बना रहते है, तब तक वह सुरक्षित और स्वस्थ रहता है। जैसे ही किसी को इनमें से किसी भी तत्व में असंतुलन का सामना करना पड़ता है, वह स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हो जाता है | यदि सभी चिकित्सक पांच तत्वों का अध्ययन करते हैं और प्रकृति और मानव शरीर के साथ उनके संबंध में विश्वास करते हैं और उन्हें अपने रोगियों के विभिन्न स्वास्थ्य समय के साथ जोड़ कर देखते हैं, तो यह बीमारियों को समझने और उपचार करने में सहायता करेगा।

हिंदू धर्म में कुछ सामान्य विचारों को समझने के लिए संख्याओं का उपयोग करने के विचार पर कायम रहते हुए , अब हम संख्या पांच का अध्ययन करेंगे। हमने पहले चार गुना हिंदू धर्म और तीन में हिंदू धर्म के साथ यही अभ्यास किया था । पांच उंगलियों और पैर की उंगलियों से लेकर पंजाब तक, पांच नदियों की भूमि और एक फूल में पंखुड़ियों की सबसे आम संख्या, रहस्यमय पांच हमें चारों ओर घूरते हैं, आइए एक अस्वीकरण के साथ इसमें गोता लगाएँ कि यह न तो एक व्यापक सूची है पाँच, न ही कोई तार्किक संयोजन, बल्कि भारतीय सभ्यता के ज्ञान और कई उदार अवधारणाओं में कुछ अंतर्दृष्टि प्राप्त करने के लिए संख्या पाँच का उपयोग करने का एक बहाना मात्र है।
सभ्यता के मूल विचार

पंचभूत - हमारे भौतिक वर्गीकरण के मूल में पाँच मौलिक तत्व, पंच भूत हैं । वे अर्थात् आकाश (अंतरिक्ष), वायु (वायु), अग्नि (अग्नि), आपा (जल) और पृथ्वी (पृथ्वी) हैं। इसे हम वायु, जल या पृथ्वी के रूप में देखते हैं, जो विभिन्न भूतों का मिश्रण है, से भ्रमित नहीं होना चाहिए । चूँकि ब्रह्माण्ड पाँच भूतों का उत्पाद है , इसलिए इसे प्रपंच कहा जाता है । तमिल में, शव को भूत उदल कहा जाता है , जो शरीर की संरचना को दर्शाता है।

पंचतन्मात्राएँ - तन्मात्रा सूक्ष्म, प्रारंभिक तत्व है। वे स्पर्श (स्पर्श), रूप (रूप), गंध (गंध), रस (गंध) और शब्द (ध्वनि) हैं। ये सिद्धांत उनके बाहरी समकक्षों - पंचज्ञानेंद्रिय - को जन्म देते हैं ।

पंचज्ञानेंद्रिय - इंद्रियां मन द्वारा तैनात अंग हैं, जो जगत के संबंध में स्वयं को समझने के लिए निम्नलिखित पांच को तैनात करता है । वे हैं शोत्र (कान), चक्षु (आँखें), घ्राण (नाक), जिह्वा (जीभ) और त्वक् (त्वचा)। बाह्य सम्मुख रहना और संवेदी वस्तुओं के साथ निरंतर संपर्क में रहना, उन्हें नियंत्रित करना साधना का एक प्रमुख हिस्सा है ।

पंचकर्मेन्द्रियाँ - वास्तविक क्रिया को प्रभावित करने के लिए, मन/शरीर क्रिया के पांच अंगों को तैनात करता है। वे हैं वाक् (वाणी), पाणि (हाथ/चतुराई), पद (पैर/चलन), पयु (मलाशय/उत्सर्जन) और उपस्थ (जननांग/प्रजनन)।

पंचप्राण - प्राण ही जीवन का सार है। यह विचार दर्शन, चिकित्सा और भारतीय जीवन शैली से परे है। प्राण को किसी के शरीर विज्ञान में विभिन्न क्रियाएं करने वाला माना जाता है और यह मन के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है, इसलिए प्राणायाम के लाभ हैं । भूमिका के आधार पर उसी प्राण को प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान के रूप में वर्गीकृत किया जाता है । हृदय में स्थित प्राण श्वसन के लिए उत्तरदायी है। अपान का स्थान गुदा है; उत्सर्जन में सहायता करता है। समान नाभि में विराजमान है; पाचन के लिए जिम्मेदार. उदान गले में स्थित होता है जो निगलने में सक्षम बनाता है। व्यान पूरे शरीर में व्याप्त है, संचार भूमिका में सहायक माना जाता है।

पाँच उप प्राण भी हैं - नाग, कूर्म, देवदत्त, कृकल और धनंजय । नागा डकारें और हिचकी लाने का कार्य करता है। हमारी पलकें झपकाने के पीछे कूर्म होता है। हमारी उबासी के लिए देवदत्त जिम्मेदार है। कृकला हमारी भूख और प्यास का कारण बनता है। हृदय के वाल्वों के खुलने और बंद होने के पीछे धनंजय का ही हाथ है।

पंचकोश - सभी का सार आत्मा है , लेकिन भ्रम और भ्रम के कारण, मनुष्य खुद को कोश की पांच मायावी परतों में से एक मानता है। उन्हें एक के द्वारा दूसरे में निहित के रूप में चित्रित करने की प्रथा है। उपनिषदों द्वारा दिया गया वास्तविक विचार प्रत्येक उपनिषद से अधिक सूक्ष्म है। वे हैं अन्नमयकोश , प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनंदमयकोश । वास्तविक गहन जानकारी के लिए, कृपया पंच कोष - स्वामी शिवानंद पढ़ें ।
नाम, स्थान, वस्तुएँ, समय

पांडव - जिन्हें पंचपांडव भी कहा जाता है , वे पहले व्यक्ति हैं जिनके बारे में हम पांच लोगों के बारे में सोच सकते हैं। वे हैं युधिष्ठर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव । उनमें से प्रत्येक का द्रौपदी से एक पुत्र था और इन पांचों को एक साथ उपपांडव कहा जाता था । उन्हें क्रमशः प्रतिविन्ध्य , सुतसोम , श्रुतकर्मा , शतानिका और श्रुतसेन कहा जाता था । हालाँकि वे महाभारत युद्ध में बच गए, लेकिन अश्वत्थामा ने उनकी नींद में ही हत्या कर दी।

पंचकन्या - पांच महिलाओं को संदर्भित करता है, उनके जीवन को सही अर्थों में सोचने और समझने से हमारे पापों से मुक्ति मिलती है। वे हैं अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा और मंदोदरी । उपलब्ध छंदों के एक समान सेट में सीता को कुंती से बदल दिया गया है । बेहतर समझ के लिए भविष्य में विस्तृत चर्चा आवश्यक है।

अहल्या द्रौपदी सीता तारा मंदोदरी तथा। पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशिनीः ॥



पंचप्रयाग - सनातन धर्म में नदियों को तीर्थ के रूप में प्रमुख महत्व दिया गया है । नदियों का संगम एक सुखद दृश्य से कहीं अधिक है क्योंकि उनका हमारी वासनाओं पर शुद्धिकरण प्रभाव पड़ता है । सरस्वती के सूखने से पहले से ही गंगा हमारी सभ्यता के केंद्र में रही है । ऐसे पांच संगम हैं जिन्हें उच्च सम्मान में रखा जाता है - पंच प्रयाग - विष्णु प्रयाग, नंद प्रयाग, कर्ण प्रयाग, रुद्र प्रयाग और देव प्रयाग। 

विष्णु प्रयाग अलकनंदा और धौली गंगा नदियों के संगम पर है । नंद प्रयाग अलकनंदा और नंदाकिनी नदियों के जंक्शन पर है । कर्ण प्रयाग वह स्थान है जहां अलकनंदा पिंडर से मिलती है । रुद्र प्रयाग में अलकनंदा मंदाकिनी से मिलती है । देव प्रयाग में अलकनंदा नदियाँ भागीरथी से मिलकर गंगा का नाम लेती हैं । इसके अलावा हमारे पास प्रयागराज या प्रयाग भी है जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है।

पंचांग हिंदू कैलेंडर है जो वैदिक विचारों और सहस्राब्दियों से ब्रह्मांड के गहन अध्ययन पर आधारित है । समय की गणना करने में सक्षम पांच पहलू तिथि, नक्षत्र, योग, करण और वार हैं । इन पांच अंग या भागों ने हमारी सभ्यता को अपना समय सटीक रखने में सक्षम बनाया है।

मूर्तियाँ बनाने के लिए पंचलोहा एक बहुत लोकप्रिय मिश्र धातु है और यह सोना, चाँदी, तांबा, जस्ता और लोहे से बनाया जाता है। यह मिश्र धातु अपने बीते वर्षों में धातुकर्म कौशल का एक प्रमाण है।
दैवत्व

पंचायतन पूजा का श्रेय आदि शंकराचार्य को दिया जाता है और इसमें पाँच प्रमुख देवताओं को शामिल किया जाता है, जो पंचक रूप में व्यवस्थित हैं। उनमें शिव, विष्णु, पार्वती/देवी, सूर्य और एक इष्ट देवता - कार्तिकेय, गणेश शामिल हैं । कई पारंपरिक मंदिर भी इस वास्तुकला का अनुसरण कर सकते हैं, जिसमें प्राथमिक देवता को केंद्रीय मंदिर में और चार छोटे देवताओं को छोटे मंदिरों में व्यवस्थित किया जाता है।

पंचमुखी लिंग - शिव , हिंदू देवताओं के प्राथमिक त्रिदेवों में से एक, उनके पांच चेहरों द्वारा दर्शाया गया है। उन्हें पंचमुखी /पंचवक्त्र शिव कहा जाता है। पांच चेहरे उनके पांच पहलुओं को दर्शाते हैं - अघोरा, ईशान, तत् पुरुष, वामदेव और सद्योजात। सद्योजात पश्चिम दिशा की ओर मुख किए हुए है जो शिव के विनाशकारी रूप रुद्र का प्रतिनिधित्व करता है । वामदेव उत्तरमुखी हैं और पार्वती के रूप में स्त्री पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

अघोरा शिव की दक्षिणमुखी विनाशकारी शक्ति है । तत् पुरुष पूर्वमुखी है, जो ध्यान और आत्मज्ञान से जुड़ा है। ईशान आकाश की ओर मुख वाला पहलू है जो अन्य चार के संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है। जबकि प्रत्येक तत्व का अध्ययन करने में जीवन भर लग सकता है, विचार यह है कि परिचय प्राप्त किया जाए।

पंचाक्षर - शिव की मध्यस्थता या प्रतिनिधित्व पांच पवित्र अक्षरों द्वारा किया जाता है। ये अक्षर हैं - ना, म, सी, वा और य । जप , ध्यान या पूजा के प्रयोजनों के लिए शुरुआत में ओम शब्द जोड़ा जाता है । मंत्र की उत्पत्ति कृष्ण यजुर्वेद के तैत्तिरीय संहिता कांड में पाए जाने वाले श्रीरुद्रम भाग से हुई है । मंत्र की शैव व्याख्याएँ असंख्य हैं ।

पंचमुखी अंजनेय - हनुमान एक अन्य देवता हैं जिन्हें आमतौर पर पाँच के रूप में दर्शाया जाता है। पांच मुख हनुमान, हयग्रीव, नरसिम्हा, गरुड़ और वराह को दर्शाते हैं । ऐसे स्वरूप का ध्यान और पूजा करने से तेजी से आध्यात्मिक प्रगति होती है।
औषधीय

पंचामृत पांच खाद्य पदार्थों का मिश्रण है जिसका उपयोग पूजा की पेशकश के हिस्से के रूप में किया जाता है। वे आम तौर पर शहद, गुड़, गाय का दूध, दही और घी हैं। इन्हें आमतौर पर मिश्रण के रूप में पेश किया जाता है। संपूर्ण भारतीय भूगोल में विविधताएँ मौजूद हैं। पलानी जो मुरुगा के प्रसिद्ध निवासों में से एक है , अभिषेक और प्रसाद दोनों के लिए उपयोग किए जाने वाले पंचामृत के लिए प्रसिद्ध है । इस रेसिपी में केला, गुड़, घी, शहद, खजूर, इलायची और मिश्री शामिल हैं।

पंचगव्य (एम) सबसे अधिक दुर्व्यवहार और व्यंग्यपूर्ण हिंदू विचारों की सूची में प्रमुखता से शामिल है। यह देसी गाय की पांच सामग्रियों का मिश्रण है , न कि आयातित नस्लों से। इनमें गोमुत्र (मूत्र), गोमय (गोबर), गोक्षीरा (दूध), गोदाधि (दही) और गोघृत (घी) शामिल हैं। संस्कृत में इसका शाब्दिक अर्थ पांच गाय उत्पादों का मिश्रण है । आयुर्वेद इसके औषधीय गुणों का दस्तावेजीकरण करता है, हालांकि पंचगव्य कई अनुष्ठानों में प्रमुखता से शामिल है।

पंच निदान आयुर्वेद में उपयोग किए जाने वाले पांच निदान उपकरण या कारण हैं । उनमें निदान, पूर्व रूपा, रूपा, उपशय और सम्प्राप्ति शामिल हैं । निदान आहार, पर्यावरण, चोट या दोषों में असंतुलन जैसे कारण हैं । पूर्वा रूपा रोग के प्रारंभिक लक्षण हैं। रोग प्रकट होने के दौरान रूपा मुख्य लक्षण है। उपाशय विशेष या नैदानिक ​​लक्षण हैं जो विशेष बीमारियों के लिए निदान मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करते हैं। संप्राप्ति का अर्थ रोग के प्रकट होने के मार्ग के बारे में उचित ज्ञान प्राप्त करना है।

पंचकर्म आयुर्वेद में शरीर से खराब दोषों को साफ करने के लिए की जाने वाली पांच क्रियाओं को संदर्भित करता है । वे हैं वमन (वमन), विरेचन (विरेचन), निरोहवस्ति (काढ़ा एनीमा), नस्य (नाक के माध्यम से दवा डालना), और अनुवासनवस्ती (तेल एनीमा)। दुःख की बात है कि ये विधियाँ पश्चिम में भारतीयों की अज्ञानता के कारण अत्यधिक लोकप्रिय हैं।
सूक्ष्म विचार

यम व्यक्ति के आध्यात्मिक पथ में एक केंद्रीय विचार है। यद्यपि वे 'क्या न करें' की एक सूची की तरह लगते हैं, वे दस आज्ञाओं से बहुत भिन्न हैं। विभिन्न हिंदू ग्रंथ संकलन का एक अलग सेट देते हैं। सबसे लोकप्रिय में योग के मार्ग में एक शर्त के रूप में पांच विचार शामिल हैं , जो पतंजलि के योग सूत्र (II-30) में दर्ज हैं ।

अहिंसासत्यस्तेयब्रह्मचर्यपरिग्रह यमाः॥30॥

अहिंसा-सत्य-अस्तेय ब्रह्मचर्य-अपरिग्रहः यमः ॥ 30 ॥

अहिंसा गैर चोट पैदा कर रही है. यह सबसे गलत व्याख्या किया गया विचार हो सकता है। उदाहरण के लिए सीमा पर किसी आतंकवादी को मार गिराने वाला सैनिक हिंसा नहीं माना जाएगा । मकसद, स्थिति और आयाम सभी इसे रंग देते हैं। फिर भी बहुत व्यावहारिक स्तर पर, इस केंद्रीय विचार को ध्यान में रखना कि एक ही ब्रह्म सभी जीवित प्राणियों में स्वयं को व्यक्त करता है और इसलिए दूसरों को चोट पहुँचाना स्वयं को चोट पहुँचाने के समान है, अहिंसा है ।

सत्य तो सत्य है, जो बोलने या सोचने तक सीमित नहीं हो सकता। शायद शेक्सपियर का वाक्यांश "टू योर सेल्फ बी ट्रू" सत्य का सटीक सारांश प्रस्तुत करता है । यह मन को सभी अवस्थाओं में सत्य होने के लिए प्रशिक्षित करता है और विवेक विकसित करता है क्योंकि व्यक्ति को लगातार चीजों की वास्तविक प्रकृति के बारे में पूछताछ करनी होती है। अस्तेय चोरी न करने वाला है। इससे एकता के मन को प्रशिक्षित करने में मदद मिलती है। कोई भी अपने आप से चोरी नहीं करता है, क्योंकि इससे अधिक बेतुका कुछ भी नहीं हो सकता है।

ब्रह्मचर्य की शुरुआत वैवाहिक निष्ठा और शुद्धता से होती है, फिर भी इसके मूल में ब्रह्म का अनुकरण करने की प्रवृत्ति होती है । अपरिग्रह का तात्पर्य गैर-लोलुपता या लालच या अधिकार रखने के विचार की कमी से है। फिर से विचार सभी में आवश्यक ब्रह्म को सुदृढ़ करने का है। यदि सब एक है तो फिर लोभ करने की आवश्यकता ही कहाँ है?

नियम सकारात्मक पालन या अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किए जाने वाले विचार हैं। हालाँकि पाठ के आधार पर उनकी संख्या भिन्न हो सकती है, हमारा संदर्भ पतंजलि के योग सूत्र (II-32) से है।

शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥32॥

श अउच संतोष तपः स्व अ ध्य अ य-ए श वरप्रणिध अ न अ नि नियम अ ह ॥32॥

सौका स्वच्छता या पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें शारीरिक के साथ-साथ मानसिक अर्थ भी होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विचार और मन में स्पष्टता आती है। संतोष जीवन में चाहे कैसी भी परिस्थिति हो, संतुलन बनाकर संतोष का संकेत देता है। भगवद गीता में कृष्ण इस गुण पर बार-बार जोर देते हैं । तपस तपस्या है, किसी उच्च उद्देश्य की प्राप्ति के लिए गहन कार्य करने की क्षमता। इसमें उस तरह का त्याग करना शामिल नहीं है जैसा कि आमतौर पर समझा जाता है, बल्कि यह महसूस करना है कि दिव्य आंतरिक खजाने को प्राप्त करने के लिए हमारे पास मौजूद छोटी-मोटी चीजों को छोड़ देना चाहिए।

स्वाध्याय आत्म अध्ययन या आत्मनिरीक्षण है। इसमें किसी के आंतरिक स्व को समझने में सहायता के रूप में धर्मग्रंथों का अध्ययन शामिल हो सकता है। उच्च स्तर पर, यह स्वयं के विचारों, शब्दों और कार्यों का अध्ययन है। ईश्वरप्रणिधान सांसारिक विचारों की सीमित शारीरिक या मानसिक सोच से लेकर ब्रह्मांडीय स्तर तक चेतना का विस्तार करने के लिए ईश्वर , ब्राह्मण या अवतार का चिंतन है ।

पंचमहापातक का तात्पर्य पाँच महापापों से है। पातक का तात्पर्य पापों से है, महापातक महापाप है। यह इतना चौंकाने वाला होगा कि हममें से अधिकांश लोग दैनिक आधार पर कुछ नियमों का उल्लंघन करते हैं। उनमें किसी व्यक्ति की हत्या करना ( ब्राह्मण में डूबे व्यक्ति की अतिरिक्त गंभीरता के साथ ), नशीले पदार्थों (शराब, ड्रग्स) का सेवन करना, चोरी करना, झूठ बोलना (झूठ सिर्फ बाहरी अभिव्यक्ति हो सकता है) और अवैध यौन संबंध (जिसमें व्यभिचार शामिल है) शामिल हैं। यह निराशाजनक है कि इनमें से अधिकांश दैनिक घटनाएँ हैं जिनसे हमारा मन असंवेदनशील हो गया है। यदि हम यह महसूस कर सकते हैं कि किसी व्यक्ति की हत्या करना झूठ बोलने के बराबर है, तो संबंध का अनुमान लगाने के लिए दिमाग को कितना सूक्ष्म और विकसित होना होगा।

पंचक्लेश आध्यात्मिक प्रगति के मार्ग में आने वाली पाँच बाधाएँ हैं। इनमें अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेषा और अभिनिवेश शामिल हैं । अविद्या अज्ञान है. यही हमारी रचना या अस्तित्व के मूल में माना जाता है। अस्मिता मैं-पन, अहंकार है, विशेष रूप से मिथ्या पहचान सिद्धांत जो हमें अपने आत्म को शरीर, मन या बुद्धि के रूप में सोचने पर मजबूर करता है।

राग अतीत के अनुभवों की पसंद, लगाव, चाह है। द्वेषा को अप्रिय चीजों से घृणा है, जैसा कि माना जाता है, नापसंद है। राग और द्वेषा वे धक्का और खिंचाव वाली शक्तियां हैं जो वासनाओं को व्यक्त करने के लिए मन पर दबाव डालती हैं । अभिनिवेश जीवन से चिपकना, आत्म-संरक्षण का विचार है, लेकिन सांसारिक संसार से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है । ये पांचों ताकतों का एक घातक कॉकटेल है जो हमें सांसारिक तरीकों में डुबोए रखता है। कोई व्यक्ति दुनिया में बहुत सफल हो सकता है, फिर भी इनके कारण आध्यात्मिकता से प्रकाश वर्ष दूर रह सकता है।

पंचमकार पाँच माँ हैं जिनका उपयोग तांत्रिक प्रथाओं में किया जाता है , ज्यादातर शक्ति पूजा में। वे हैं मद्य (नशीला पदार्थ, शराब), ममसा (मांस, जानवरों का मांस), मत्स्य (मछली), मुद्रा (अनाज भी इशारे करते हैं) और मैथुन (संभोग)। ऐसा माना जाता है कि इनमें से कई सामान्य व्याख्याएं रूपक के कारण छिपी हुई हैं जो शायद तांत्रिक साधकों को स्पष्ट हैं । किसी को यह समझना चाहिए कि तांत्रिक विचार अनभिज्ञ लोगों या जनता के लिए नहीं हैं।

पंचमहायज्ञ प्रत्येक गृहस्थ की पाँच दैनिक प्रथाएँ हैं । विचार यह है कि चारों ओर कृतज्ञता की भावना विकसित करके मैं-पन को वश में किया जाए। आधुनिकीकरण और पतन के साथ, ये लगभग भूले हुए हिंदू विचार हैं, प्रथाओं की तो बात ही छोड़ दें। वे हैं ब्रह्म यज्ञ ( ब्राह्मण को श्रद्धांजलि ), देव यज्ञ ( देवताओं को श्रद्धांजलि ), पितृ यज्ञ (पूर्वजों को श्रद्धांजलि), भूत यज्ञ (सभी प्राणियों को श्रद्धांजलि) और मनुष्य यज्ञ (मानवता को श्रद्धांजलि)।

ब्रह्म यज्ञ में शास्त्रों का अध्ययन और ज्ञान साझा करके ऋषियों के प्रति अपना ऋण चुकाना शामिल है । देव यज्ञ, यज्ञ और यज्ञ करके देवों के प्रति हमारा ऋण चुकाना है । पिंडदान , तर्पण वह तरीका है जिससे व्यक्ति पितरों (पूर्वजों) का ऋण चुकाता है । पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति सचेत रहना, पेड़ लगाना, झीलें खोदना और जानवरों को खाना खिलाकर उनकी मदद करना ही भूत यज्ञ करने का तरीका है । दान, परोपकार, अतिथियों और गरीबों को भोजन कराना मनुष्य यज्ञ के निश्चित उपाय हैं ।

जैसे ही हम इस लंबी सूची के करीब पहुंचते हैं, हमें विष्णुशर्मा द्वारा लिखित कहानियों के लोकप्रिय सेट - पंचतंत्र की याद आती है , जो पांच विचारों में से एक के इर्द-गिर्द घूमती कहानियों का एक क्लासिक सेट है। ये कहानियाँ बच्चों में बुद्धिमत्ता जगाती हैं, मूल रूप से कुछ सुस्त राजकुमारों की मदद करने के लिए निर्देशित की गई हैं। विचार मित्रभेद (दोस्तों की हानि), मित्रलाभ (मित्रता/सहयोगियों को जीतना), काकोलुकियम (कौवे और उल्लुओं पर), लब्धप्रणासम (लाभ खोना) और अपरीक्षितकारकम (जल्दबाजी में किए गए कार्यों पर) के आसपास केंद्रित हैं। यह बच्चों में मानवीय गुणों और बुराइयों के बारे में जागरूकता पैदा करता है।

पाँचों की सूची त्यागराजर की प्रसिद्ध पाँच रचनाओं , जिन्हें पंचरत्न कृतियाँ कहा जाता है, उपनिषदों में बताई गई पंचाग्निविद्या , केरल के मंदिरों में लोकप्रिय पंचवद्यम , पुराण (पंचलक्षण ) को परिभाषित करने वाली पाँच विशेषताएँ और कामदेव के पाँच बाण इत्यादि के साथ आगे बढ़ती है। यद्यपि वेद एक हैं, हमारी समझ के लिए व्यास द्वारा चार के रूप में वर्गीकृत किया गया है , अक्सर महाभारत को पंचमो वेद के रूप में संदर्भित किया जाता है क्योंकि इसमें वेदों के समान जटिलता और सूक्ष्मता के स्तर पर कई धार्मिक विचारों को शामिल किया गया है ।

जिस तरह पांचों उंगलियां एक ही हाथ की उपांग हैं, ठीक उसी तरह जैसे एक ही गंगा पंच प्रयाग से होकर बहती है , जो त्रिमूर्ति - ब्रह्मा, विष्णु और शिव से जुड़ी हुई है , सभी पांच चीजों के पीछे समानता एक ही ब्रह्म है । पांच की यह लंबी सूची पीछे की एकता को समझने का एक और बहाना है। वह ब्रह्म हमारे निम्न स्व को उच्च स्व तक उठाने के लिए मार्गदर्शक बने।

सात (६ ) का विचार

अंक ६ वास्तव में ज्ञान के प्रकारों की चर्चा करते है। वेद जो ज्ञान के पुंज है उन्हे समझने के लिए 6 उपांगों के अध्ययन की मर्यादा स्थापित की गई। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष ये 6 वेदांग होते है। “शिक्षा” वेदांग को हम ध्वनियों के शुद्ध उच्चारण की शिक्षा का प्राचीनतम शास्त्र कह सकते हैं। ऋक्प्रातिशाख्य” आदि अनेक प्रातिशाख्य-ग्रन्थ और “पाणिनीयशिक्षा” आदि अनेक शिक्षा-ग्रन्थ और शिक्षा-वेदांग में परिगणित होते हैं।

कल्प का सम्बन्ध वैदिक यज्ञों के विधि-विधान से है। कौन-सा यज्ञ कैसे किया जाए, इसी का नाम कल्प है. कल्प नाम के वेदांग में चार प्रकार के ग्रन्थ हैं, जो सूत्रशैली में रचित के कारण “कल्पसूत्र” नाम से प्रसिद्ध हैं। कल्पसूत्र के चार प्रकार हैं –

1. श्रोतसूत्र, जिनमें “श्रुति” अर्थात् कहे गए बड़े-बड़े यज्ञों की विधियाँ मिलती हैं।

2. गृह्यसूत्र, जिनमें गृह अर्थात् घरों में होने वाले यज्ञों की विधियाँ मिलती हैं।

3. धर्मसूत्र, जिनमें व्यक्ति और समाक के आधार-व्यवहार के नियम मिलते हैं।

4. शुल्वसूत्र, जिनमें यज्ञ की वेदी बनाने की विधि और नाम दी गयी है।

व्याकरण में वेदों में आये शब्दों और पदों की व्युत्पत्ति दी गई है और अनेक शुद्ध रूप को स्पष्ट किया गया है. इस वेदांग का प्रमुख ग्रन्थ “पाणिनि” की “अष्टाध्यायी” है। निरुक्त के माध्यम से वेदों में आये कुछ कठिन पदों (शब्दों) का निर्वाचन किया गया है, जो वेद का अर्थज्ञान कराने में सहायक हैं। “यास्क का निरुक्त” इस वेदांग का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ है। छन्द नाम की वेदांग शाखा में वैदिक ऋचाओं में प्रयुक्त गायत्री, अनुष्टप् और जगती आदि छंदों का विवेचन किया गया है जबकी ज्योतिषमें यज्ञादि, वेदविहित कार्यों को करने के लिए उचित समय, मुहूर्त आदि का विचार किया गया है।

छह दर्शन क्या हैं?

भारतीय दर्शन और धर्म में दर्शन का अर्थ है किसी देवता को देखना और उसके बारे में ज्ञान, हिंदू धर्म में किसी व्यक्ति या पवित्र वस्तुओं का सम्मान करना। अनुभव में आशीर्वाद प्राप्त करना शामिल है। रथ यात्रा, जिसमें देवताओं की छवियों को सड़कों के माध्यम से ले जाया जाता है, दूसरों को देवता के दर्शन के लिए मंदिर में प्रवेश करने में सक्षम बनाती हैं। दर्शन भी संतों और गुरुओं द्वारा अपने अनुयायियों को प्रदान किए जाते हैं।

हालाँकि, जब भारतीय दर्शन की बात आती है तो षड दर्शन शब्द एक अलग भूमिका निभाता है जहाँ प्रणाली चीजों को देखती है, जिसमें पवित्र शास्त्रों और आधिकारिक ज्ञान की व्याख्या शामिल है। हिंदू दर्शन के छह सिद्धांत निम्नलिखित हैं: सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत। गैर-हिंदू दर्शन में बौद्ध और जैन धर्म शामिल हैं। दर्शन की इन प्रणालियों में से प्रत्येक को प्राचीन काल में सूत्रों में तैयार किया गया था और इसके लेखकों द्वारा व्यापक रूप से विस्तृत किया गया था। वे सत्य का वर्णन करने और इसे खोजने के मार्ग पर विभिन्न प्रयासों को प्रदान करने के लिए समर्पित हैं। इनमें से प्रत्येक तत्व हिंदू शास्त्रों और स्वयं धर्म का एक मुख्य हिस्सा है।
सांख्य दर्शन

सांख्य ने दार्शनिक ईश्वरकृष्ण द्वारा छंदों का अपना रूप और अभिव्यक्ति प्राप्त की। सांख्य का अध्ययन दो शरीरों के अस्तित्व को मानता है, एक लौकिक और दूसरा सूक्ष्म पदार्थ के साथ जो मृत्यु के बाद बना रहता है। जब लौकिक शरीर नष्ट हो जाता है, तो सूक्ष्म पैंथर लौकिक शरीर में चला जाता है। सूक्ष्म पदार्थ के शरीर में चेतना, मैं-चेतना, छापों और सांसों के समन्वयक के रूप में मन होता है। वे संस्कृत में एक साथ बुद्धि, अहंकार, मानस और प्राण हैं।

सांख्य अनंत संख्या में पुरुषों के अस्तित्व को दर्शाता है जो समान हैं लेकिन अलग हैं और वास्तव में एक दूसरे से श्रेष्ठ नहीं हैं। पुरुष और प्रकृति ब्रह्मांड की व्याख्या करने के लिए पर्याप्त हैं, हालांकि, भगवान का अस्तित्व सम्मोहित नहीं है। क्रांति की श्रृंखला तब शुरू होती है जब पुरुष प्रकृति पर अपना प्रभाव डालता है। बिना किसी वस्तु के शुद्ध चेतना वाला पुरुष प्रकृति पर केंद्रित हो जाता है और यहाँ क्रिया में बुद्धि आती है। अगला अहंकार आता है, व्यक्तिगत अहंकार जो पुरुष की समझ को लागू करता है।

अहम्कार को आगे पाँच स्थूल तत्वों में विभाजित किया गया है: अंतरिक्ष, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। शब्द, स्पर्श, दृष्टि, रस और गंध ये पाँच सूक्ष्म तत्व हैं। ब्रह्मांड संयोजन और क्रमचय का परिणाम है और इस प्रकार इसके अस्तित्व से संबंधित विभिन्न सिद्धांत हैं।
योग दर्शन

योग दर्शन के अभ्यास का पहलू बौद्धिक तरीके से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह काफी हद तक उपर्युक्त सांख्य के दर्शन पर आधारित है। तालिका में यह एकमात्र अपवाद लाता है, योग दर्शन भगवान के अस्तित्व को मानता है जो आध्यात्मिक कल्याण की तलाश करने वाले मनुष्यों के लिए आदर्श है। विकास का सांख्य दृष्टिकोण पहचानने योग्य चरणों में है जो योग को बंधन, अज्ञान और भ्रम को उलटने का प्रयास करता है। एक आकांक्षी जो वांछित वस्तुओं को नियंत्रित करने और दबाने और मन की गतिविधियों को अस्पष्ट करने के लिए तत्पर है, वह भौतिकवादी जीवन की आसक्तियों को समाप्त करने में सफल होगा और इस प्रकार, समाधि में प्रवेश करेगा।

जब सैद्धांतिक दृष्टिकोण की बात आती है, तो योग दर्शन आठ अलग-अलग चरणों में वर्णित प्रक्रिया है। 20वीं शताब्दी की शुरुआत में, योग का दार्शनिक अभ्यास पूरी दुनिया में तेजी से लोकप्रिय हुआ।
न्याय दर्शन

न्याय दर्शन भारतीय दर्शन के छह दर्शनों में से एक है। यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा है क्योंकि इसमें तर्क और ज्ञानमीमांसा का विश्लेषण शामिल है। न्याय दर्शन मुख्य रूप से अनुमान के रूप में जाने जाने वाले ज्ञान के साधनों के गहन विवरण के बाहर काम करने में योगदान देता है।

अन्य षड दर्शनों की तरह, न्याय दर्शन दार्शनिक और धार्मिक दोनों है। यह मानवीय पीड़ा को समाप्त करने से संबंधित है, जो वास्तविकता की अज्ञानता के कारण होती है। सही ज्ञान के माध्यम से मानव आत्मा को मुक्ति दिलाई जा सकती है। न्याय का संबंध सही चीजों और प्रक्रियाओं के स्रोत और ज्ञान से है।

न्याय दर्शन मानता है कि ज्ञान का वैध साधन धारणा, अनुमान, करुणा और ध्वनि या गवाही है। जबकि यह मानता है कि ज्ञान के अमान्य स्रोत में संदेह, त्रुटियाँ और तर्क शामिल हो सकते हैं।
वैशेषिक दर्शन

यह अपनी प्रकृतिवाद के लिए छह दर्शनों की उपस्थिति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैशेषिक दर्शन संस्थाओं और उनके संबंधों को वर्तमान में पहचानने और वर्गीकृत करने का प्रयास करता है। यह उसी की मानवीय धारणाओं की ओर ले जाता है। होने के छह पादार्थों की एक सूची है। वे हैं: द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय।

वैशेषिक दर्शन प्रणाली में दुनिया के सबसे छोटे अविनाशी और अविभाज्य हिस्से शामिल हैं। इसमें परमाणुओं की अवधारणा शामिल है। सभी भौतिक चीजें वास्तव में विभिन्न रूपों और मात्राओं में परमाणुओं का एक संयोजन हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि परमाणुओं को ईश्वर की इच्छा के अनुसार गति में रखा जाता है और ऐसी अनदेखी ताकतें हैं जो उनकी नैतिक योग्यता और अवगुणों को धारण करती हैं।
मीमासा दर्शन

मीमासा दर्शन वेद की व्याख्या के नियम प्रदान करता है। वे आध्यात्मिक परंपरा और अनुष्ठानों के पालन के लिए दार्शनिक औचित्य प्रदान करते हैं। मीमासा का संबंध हिंदू धर्मग्रंथ के पहले भाग से है, इसे पूर्वा-मीमासा के नाम से भी जाना जाता है।

मीमासा दर्शन का अंतिम लक्ष्य धर्म का गहरा ज्ञान प्रदान करना है, जिसे अनुष्ठानिक दायित्वों के समुच्चय के रूप में समझा जाता है जो ठीक से किया जाता है और दुनिया के सामंजस्य को बनाए रखता है। यह कलाकार के लक्ष्यों को भी व्यक्त करता है। धर्म को तर्क या पढ़ने से नहीं जाना जा सकता है, यह केवल आध्यात्मिक ग्रंथों के रहस्योद्घाटन पर निर्भर करता है। इसलिए वेदों का पूरी तरह से पालन करना चाहिए। उन्हें वास्तव में परम ज्ञान का शाश्वत स्रोत माना जाता है।
वेदांत दर्शन

वेदांत दर्शन छह दर्शनों में से एक है जिसका अर्थ है वेदों का निष्कर्ष। यह उपनिषदों पर लागू होता है, जो वास्तव में वेदों का विस्तार है।

वेदांत ग्रंथों के तीन मूल सिद्धांत उपनिषद, ब्रह्म सूत्र और भगवद गीता हैं। वेदांत दर्शन के कई विद्यालयों ने व्यक्ति के मूल और पूर्ण स्व के बीच संबंधों की प्रकृति की अवधारणाओं को विकसित और विभेदित किया। अर्थात् आत्मा और ब्रह्म। वेदांत दर्शन का प्रभाव गहरा रहा है और इसने एक गलत धारणा दी है कि वेदांत दर्शन एक गैर-द्वैतवादी अद्वैत है।

सात (७) का विचार

सात एक अपेक्षाकृत बड़ा अंक है और जैसा की विदित होता है भारतीय अंकों का प्रयोग शून्य जो सूक्ष्म का प्रतीक है से प्रारंभ होकर स्थूल की यात्रा करती है और अंततः यह स्थूल इतना बड़ा हो जाता है की वह समस्त चर अचर जगत को अपने आप मे समेट लेता है। सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतोवृत्वात्यतिष्ठद्दशांगुलम् का यही भाव है। लेकिन यह हम विचार सात को लेकर कर रहे है और ऋग्वेद का दशम मण्डल के इसी पुरुष सूक्त में सात का पहला प्रयोग देखने को मिलता है यथा सप्तास्यासन्परिधयस्त्रि सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वानाः अबध्नन्पुरुषं पशुं अर्थात सप्त परिधयः' सात परिधियां- सात छन्द।

लेकिन जैसे हमने इस ग्रंथ की भूमिका में कहा है अंक प्राकृतिक होते है उनका प्रकृति के साथ एक गहरा संबंध होता है और तभी तो जगत की पूरी ब्रह्मांडीय व्यवस्था किसी न किसी रूप से गणितीय सिद्धांतों से संचालित होती है। जहां तक इस दृष्टिकोण से अंक सात का सवाल है सबसे पहले इसकी जरूरत शायद इंद्रधनुष के रंगों की गणना करने हेतु हुई थी जिसे सूर्य के सात घोड़ों की लोक उपमा दी गई। ज्योतिषीय और काल संबंधी गणनाओं में सप्ताह के सात दिन और और आसमान में असंख्य तारों के अध्ययन अध्यापन में सप्तऋषियों में सात तारों के समूह को भी पा लिया गया। फिर समय के प्रवाह के साथ लोक परलोक से दूरी अन्य क्रियाकलाप भी इस ७ की इकाई के साथ सम्बद्ध होते चले गए। सात लोक, सात पर्वत, सात द्वीप, सात पाताल, सात समुद्र, सप्त ऋषि, सप्त समिधा, यदि विचार इस ७ के प्रयोग और उसकी आवश्यकता ही परिलक्षित करते है। सनातन का सिद्धांत इस ब्रह्मांडीय के परिचालन को दो स्तरों पर देखते है जिसमे कुल मिलकर चौदह लोक की कल्पना की गई है जिसमें सात ऊपरी लोक है ७ निचला लोक। (स्रोत https://gobookmart.com/hi/fourteen-lokas-in-hindu-mythology-explained/)

सत्य या ब्रह्म लोक : यह सबसे ऊपर और सबसे ऊंची दुनिया है। यहीं से जीवन और पुनर्जन्म का चक्र शुरू होता है। यह सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का वासस्थल है।

तपर लोक : इस लोक को चार कुमारों (सनक कुमार, सनातन कुमार, सनंदन कुमार और सनत कुमार) और देवदासियां से सम्बद्ध किया जाता है। ​​इसे वैरागियों का निवास स्थल भी माना जाता है।

जन लोक : भगवान ब्रह्मा के पुत्रों का यह वास स्थल है । इसे जीवों की दुनिया भी माना जाता है। इस लोक मे लोक चेतना का सर्वोच्च स्थान दिया जाता है।

महार लोक : इस लोक को हमारे ऋषि मुनियों और अन्य संतों के निवास स्थल के रूप मे व्याख्यायित किया जाता है। लोक परंपरा मे यह माना जाता है की प्रलय के समय यह लोक विनाश से बच जाता है।

स्वर्ग लोक : यह लोक का अधिपति इन्द्र को माना जाता है। यही लोक सनातनी का एक स्वाभाविक देवलोक है। इसी मे असंख्य तारे और सभी देवता निवास करते है।

भुवर लोक : लोक अनुश्रुति में यश दूसरा ईश्वरीय संसार है जो पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी पर अवस्थित है और इसे सामान्यतः अर्धदेवता और जीव का वास स्थल माना जाता है।

भू लोक : यह हमारी धरती है जिस पर हम रहते हैं। यह ऊपरी लोक का सातवाँ तल है। यह वह लोक है जहां मनुष्य और जानवर रहते हैं।

पाताल –वे निम्न लोक कहलाते हैं। ये ऐसे लोक हैं जहां राक्षस, नाग, अर्ध-मनुष्य और बुरी आत्माएं निवास करती हैं। पाताल लोक भी इसके अंतर्गत सात अलग-अलग लोक हैं।

अटल लोक : माया के पुत्र बाला द्वारा शासित, जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके पास रहस्यमय शक्तियां हैं। एक ही जम्हाई की शक्ति से, उन्होंने तीन प्रकार की महिलाओं को जीवन में उतारा, जो पुरुषों को खुश करने के तरीके से विभाजित हैं।

विटल लोक : यह अटल लोक के ठीक नीचे की दुनिया है जिसके नियंता भगवान भाव है। भगवान भव के भक्त उन्हें ढेर सारा सोना चढ़ाते थे जिसके कारण यह माना जाता है की यहाँ सोने की कई खानें हैं।

सुतल लोक : राजा महाबली को इस लोक का एक न्यायप्रिय और निष्पक्ष शासक कहा जाता है। कहा जाता है कि उन्हें भगवान विष्णु के वामन अवतार ने पृथ्वी में धकेल दिया था। अगले युग या अगले जन्म में उन्हें स्वर्ग का राजा माना जाता है। उनके सम्मान में ओणम का त्योहार मनाया जाता है।

तलातला लोक : पुराणों के अनुसार जब भगवान शिव ने जब माया के तीनों लोकों को नष्ट कर दिया तो उसे उन्हें तलातल लोक दिया गया।

महताल लोक : यह नागों और उसी तरह के अन्य जीवों का वास स्थल है। कालिया, तक्षक, अनंतनाग आदि इस क्षेत्र में निवास करते हैं।

रसातल लोक : इस लोक को राक्षसों से सम्बद्ध किया जाता है। यहाँ रहने वाले बहुत ही शक्तिशाली होते है और इसी वजह से इन्हे स्वर्ग में देवताओं के शाश्वत शत्रु माना जाता है।

पाताल लोक : यह हिंदू पौराणिक कथाओं में सबसे निचला क्षेत्र या सबसे निचली दुनिया है। इसे नाग लोक के नाम से भी जाना जाता है। इस क्षेत्र पर सांप का शासन है जिसके सर्वेसर्वा है वासुकि जो जो शिव के गले में है। आश्चर्य की बात यह भी है की लोकों के सात सात समूहों की कल्पना सिर्फ सनातन का सिद्धांत् ही नहीं करता बल्कि इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान में भी सात स्वर्गों की बात करता है। यहूदी धर्म के साथ साथ ईसाई सांप्रदायिक प्रणाली में भी यह खास स्थान रखता है।
 लेकिन ७ की सबसे बड़ी आवश्यकता तब पड़ी जब काल की गणना के निमित्त एक सप्ताह की जरूरत पड़ी। ज्योतिष जो की गणितीय गणनाओं पर आधारित होती है, सात
 सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि जब भारतीय विवाह प्रणाली की बात आती है, तो सुखी वैवाहिक जीवन के लिए 7 वचन बोले जाते हैं। साथ ही पवित्र अग्नि के चारों ओर 7 फेरे भी लिए जाते हैं।निर्वाण के लिए भी 7 चरण मौजूद बताए गए हैं। म्यूजिकल नोट्स हों या फिर सात सितारे। 

आठ (8) का विचार

आठ अपेक्षाकृत एक बड़ा अंक है जिसे समझें के लिए चेतना के एक उच्चतर स्तर की समझ की आवश्यकता पड़ती है। सामान्य तौर पर जिसे आठ (8) के साथ समायोजित किया जाता है उसमे देवी लक्ष्मी के आठ स्वरूपों की चर्चा सर्वव्यापी है। चुकी लक्ष्मी धन और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी है धातुओं की गणना भी आठ ही की गई जिससे हमारा दिन प्रतिदिन का उद्यम और व्यवहार संपादित होता है। ये आठ धातु है सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा और पारा। जहां तक देवी के आठ रूपों का प्रश्न है आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी और विद्यालक्ष्मी मिलकर अष्टलक्ष्मी बनाती है।

1- आदि लक्ष्मी : श्रीमद्भागवत पुराण में आदि लक्ष्मी को मां लक्ष्मी का पहला स्वरूप कहा गया है। इन्हें मूल लक्ष्मी या महालक्ष्मी भी कहा गया है। मान्यता है कि आदि लक्ष्मी मां ने ही श्रृष्टि की उत्पत्ति की है तथा भगवान विष्णु के साथ जगत का संचालन करती हैं। आदि लक्ष्मी की साधना से भक्त को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2- धन लक्ष्मी : मां लक्ष्मी के दूसरे स्वरूप को धन लक्ष्मी कहा जाता है। इनके एक हाथ में धन से भरा कलश है तथा दूसरे हाथ में कमल का फूल है। धन लक्ष्मी की पूजा करने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं तथा कर्ज से मुक्ति मिलती है। पुराणों के अनुसार, मां लक्ष्मी ने ये रूप भगवान विष्णु को कुबेर के कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिया था।

3- धान्य लक्ष्मी : धान्य लक्ष्मी मां का तीसरा रूप है, ये संसार में धान्य यानि अन्न या अनाज के रूप में वास करती हैं। धान्य लक्ष्मी को मां अन्नपूर्णा का ही एक रूप माना जाता है। इनको प्रसन्न करने के लिए कभी भी अनाज या खाने का अनादर नहीं करना चाहिए।

4- गज लक्ष्मी : गज लक्ष्मी हाथी के ऊपर कमल के आसन पर विराजमान हैं। मां गज लक्ष्मी को कृषि और उर्वरता की देवी के रूप में पूजा जाता है। इनकी आराधना से संतान की प्राप्ति होती है। राजा को समृद्धि प्रदान करने के कारण इन्हें राज लक्ष्मी भी कहा जाता है।

5- संतान लक्ष्मी : संतान लक्ष्मी को स्कंदमाता के रूप में भी जाना जाता है। इनके चार हाथ हैं तथा अपनी गोद में कुमार स्कंद को बालक रूप में लेकर बैठी हुई हैं। माना जाता है कि संतान लक्ष्मी भक्तों की रक्षा अपनी संतान के रूप में करती हैं।

6- वीर लक्ष्मी : मां लक्ष्मी का ये रूप भक्तों को वीरता, ओज और साहस प्रदान करता है। वीर लक्ष्मी मां युद्ध में विजय दिलाती हैं। अपने हाथों में तलवार और ढाल जैसे अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं।

7- जय लक्ष्मी : माता लक्ष्मी के इस रूप को जय लक्ष्मी या विजय लक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है। मां के इस रूप की साधना से भक्तों की जीवन के हर क्षेत्र में जय–विजय की प्राप्ति होती है। जय लक्ष्मी मां यश, कीर्ति तथा सम्मान प्रदान करती हैं।

8- विद्या लक्ष्मी : मां के अष्ट लक्ष्मी स्वरूप का आठवां रूप विद्या लक्ष्मी है। ये ज्ञान, कला तथा कौशल प्रदान करती हैं। इनका रूप ब्रह्मचारिणी देवी के जैसा है। इनकी साधना से शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।



लेकिन इस संदर्भ में एक पौराणिक कहानी की चर्चा समीचीन होगी। कथा आठ वसु से संबंधित है और इस प्रकार है। जिन्हे ‘अष्ट वसु’ कहा जाता है। ये 8 पदार्थों है जो धरती से संबंधित है। इन वसुओं का साम्य धरती से बैठाने का कारण यह है की धरती के लिए वसुधा का प्रयोग संस्कृत साहित्य मे खूब हुआ है जैसे की वसुधैव कुटुम्बकं। ये आठों मिलकर विष्णु का रक्षक देव माना जाता है और यह कभी नहीं भूलना चाहिए की विष्णु इस जगत क भरण पोषण के लिए उत्तरदायी है। इन सभी आठों वसुओं का का जन्म दक्ष कन्या और धर्म की पत्नी वसु से हुआ है। ज्ञातव्य हो की दक्ष कन्याओं में से एक सती भी थी, जो शिव की पत्नी थीं। सती ने ही पार्वती के रूप में जन्म लिया था। स्कंद पुराण के अनुसार महिषासुर मर्दिनी दुर्गा के हाथों की अंगुलियों की सृष्टि अष्ट वसुओं के ही तेज से हुई थी।

लेकिन कहानी का पक्ष बिना आठ मातृकाओं के उल्लेख के पूरा हो ही नहीं सकता क्योंकि सृष्टि बिना पुरुष प्रकृति मे मेल के संभव हो ही नहीं सकती। ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही सहित चामुंडा की गणना आठ मातृकाओं मे की जाती है। यद्यपि वेद और पुराणों में इनके नामों में विभिन्नता है लेकिन इनकी संख्या आठ (8) ही है। स्कंद, विष्णु तथा हरिवंश पुराणों में 8 वसुओं के नाम आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभाष है।

इसकी एक व्याख्या इस प्रकार से भी की जाती है की सूर्य से निकालने वाली नौ प्रकार की रश्मियां कहर दिशाओं से मिलकर 36 रश्मियां बनती है जिनसे संस्कृत के 36 स्वर बने। जबकी सूर्य की यही रश्मियां पृथ्वी के आठ वसुओं से योग करके 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं जिनसे संस्कृत के 72 व्यंजन वर्णों की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार स्वर और वर्णों का कुल योग (36+72=108) न केवल संस्कृत की वर्ण माला का निर्माण करता है बल्कि यह वह पवित्र संख्या है जो किसी भी अनुकूलतम माला जाप या मंत्र जाप का विधान करता है। और तरह से हमे मिलने वाली सिद्धियाँ भी आठ प्रकार की होती है। अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ही आठ सिद्धियाँ है (अणिमा महिमा चैव लघिमा गरिमा तथा। प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्ट सिद्धयः ||) जिसके लिए एक मनुष्य इस चराचर जगत के साथ व्यवहार करता है।



अष्ट सिद्धियों का वर्णन हिन्दू धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णन किया गया है। लेकिन इन सिद्धियों को प्राप्त करना इतना आसान कार्य भी नहीं है। इसके लिए मनुष्य को कठोर अनुशासित होना पड़ता है और अपने मन पर नियंत्रण रखना भी होता है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है वह सब कुछ पा लेता है। पुराणों के अनुसार हनुमानजी ने माता सीता से आठ सिद्धियों का आशीर्वाद प्राप्त किया है। तुलसीदास जी हनुमान चालीसा के एक चौपाई में हनुमानजी के बारे में कहते भी है ‘अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, असवर दीन्ह जानकी माता’। इसका भाव यह है की जो साधक हनुमानजी की साधना करता है वह भी इन सिद्धियों को प्राप्त करता है। पुराणों में वर्णित अष्ट सिद्धियां इस प्रकार हैं

1. अणिमा – यह सिद्धि प्राप्त करने के उपरांत साधक स्वयं को शारीरिक रूप से अति सूक्ष्म बनाने की क्षमता प्राप्त कर लेता है. साधक परिस्थिति के अनुसार छोटा शरीर धारण कर सकता है और जब चाहे तब एक अणु के समान सूक्ष्म देह धारण करने में सक्षम होता हैं.

2. महिमा – महिमा सिद्धि को प्राप्त करने के पश्चात मनुष्य विशाल रूप धारण करने में योग्य बन जाता है. इस सिद्धि से साधक अपने शरीर को असीमित विशाल बनाने की क्षमता रखता है और अपने शरीर का किसी भी सीमा तक विस्तार कर सकता है. साथ ही वह प्रकृति और भौतिक वस्तुओं का विस्तार करने में भी सक्षम होता है.

3. गरिमा – गरिमा सिद्धि को प्राप्त करने से साधक अपने वास्तविक शरीर को किसी विशाल पर्वत के समान भारयुक्त बना सकता है. इसी साधना से हनुमानजी ने महाबली भीम का गर्वहरण किया था. हनुमानजी एक वृद्ध वानर का रूप धारण करके रास्ते में अपनी पूंछ फैलाकर बैठ गए थे, पूंछ को रास्ते से हटाने के लिए बलशाली भीम ने पूरी शक्ति का उपयोग किया, लेकिन सफलता नहीं मिली.

4. लघिमा – लघिमा सिद्धि को प्राप्त करने से साधक अपने शरीर का भार तिनके से भी बिल्कुल हल्का कर सकते हैं और पलभर में वे कहीं भी आ-जा सकते हैं. शरीर इतना हल्का हो सकता है कि वह हवा से भी तेज गति से सैर कर सकता है और शरीर का भार ना के बराबर हो जाता है. साथक अपनी कल्पना शक्ति से किसी भी वस्तु के पास जा सकता है और उसे अपने समीप ला भी सकता है.

5. प्राप्ति – प्राप्ति सिद्धि से साधक संसार में सभी मनोकामनाएं प्राप्त कर सकता है. प्राप्ति सिद्धि से साधक नामुमकिन को भी मुमकिन बना सकता है. वह पशु-पक्षियों की भाषा को जानने और समजने में सिद्ध हो जाता है और भविष्य में घटने वाली घटनाओं को देखने की दिव्यदृष्टि भी प्राप्त कर लेता है.

6. प्राकाम्य – इस सिद्धि की मदद से पृथ्वी की गहराइयों में पाताल तक जा सकते हैं, आकाश में उड़ सकते हैं और मनचाहे समय तक पानी के भीतर भी जीवित रह सकते हैं. यह साधक को चिरकाल तक युवा बनाये रखती है. साधक अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी देह को धारण कर सकता है. इस सिद्धि से वह किसी भी व्यक्ति या वस्तु को चिरकाल तक अपने अधीन कर सकते हैं.

7. ईशित्व – ईशित्व का अर्थ है ईश्वरीय तत्व यानि यह सिद्धि साधक को दैवीय शक्तियां प्रदान करती है. इस सिद्धि को प्राप्त करने के बाद साधक भगवान की श्रेणी में स्थित हो जाता है. वह संसार पर अपना स्वामित्व प्राप्त कर सकता है.

8. वशित्व – इस सिद्धि को प्राप्त करने से साधक किसी भी वस्तु या व्यक्ति को अपने वश में कर सकता है. इसका उपयोग करने से आप सम्मोहन शक्ति से किसी को भी वश में करके अपने काम करवा सकते है. इसके माध्यम से दूसरों को अपने इशारे पर नियंत्रित किया जा सकता है, चाहें फिर वह जानवर, पक्षी या फिर इंसान ही क्यों ना हो. यह आपको मन पर नियंत्रण पाने में और जितेंद्रिय बनता हैं.

नौ (9) का विचार

यह प्राकृतिक/मूल अंकों में से सबसे बड़ा अंक है। इसके गुणज (multiples) की एक विशेषता यह होती है उनके अंकों का योगफल हमेशा नौ (9) ही होता है। इस तरह से यह ब्रह्मांड का शायद सबसे रहस्यमयी अंक बन जाता है जो न केवल गणित के कई अन्य खेल/प्रहेलिकाओं को जन्म देता है बल्कि मानव जीवन को इस धरा पर अवतरित होने से पहले नौ महीने की आवश्यक गर्भ का भी प्रावधान करता है। और फिर ज्योतिष के अनुसार एक जातक पर नौ ग्रहों को आकाशीय स्थिति का भी प्रभाव पड़ता है।ग्रहों का स्वभाव का यह वर्णन https://www.astrosage.com/hindi/planet/ से उद्धृत है।

सूर्य ग्रह - वैदिक ज्योतिष में सूर्य को ऊर्जा, पराक्रम, आत्मा, अहं, यश, सम्मान, पिता और राजा का कारक माना गया है। ज्योतिष के नवग्रह में सूर्य सबसे प्रधान ग्रह है। इसलिए इसे ग्रहों का राजा भी कहा जाता है। पाश्चात्य ज्योतिष में फलादेश के लिए सूर्य राशि को आधार माना जाता है। यदि जिस व्यक्ति की कुंडली में सूर्य की स्थिति प्रबल हो अथवा यह शुभ स्थिति में बैठा हो तो जातक को इसके बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके सकारात्मक प्रभाव से जातक को जीवन में मान-सम्मान और सरकारी नौकरी में उच्च पद की प्राप्ति होती है। यह अपने प्रभाव से व्यक्ति के अंदर नेतृत्व क्षमता का गुण विकसित करता है। मानव शरीर में मस्तिष्क के बीचो-बीच सूर्य का स्थान माना गया है।

चंद्र ग्रह - नवग्रहों में चंद्रमा को मन, माता, धन, यात्रा और जल का कारक माना गया है। वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा जन्म के समय जिस राशि में स्थित होता है वह जातक की चंद्र राशि कहलाती है। हिन्दू ज्योतिष में राशिफल के लिए चंद्र राशि को आधार माना जाता है। यदि जिस व्यक्ति की जन्म कुण्डली में चंद्रमा शुभ स्थिति में बैठा हो तो उस व्यक्ति को इसके अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। इसके प्रभाव से व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहता है और उसका मन अच्छे कार्यों में लगता है। जबकि चंद्रमा के कमज़ोर होने पर व्यक्ति को मानसिक तनाव या डिप्रेशन जैसी समस्याएँ रहती हैं। मनुष्य की कल्पना शक्ति चंद्र ग्रह से ही संचालित होती है।

मंगल ग्रह - ज्योतिष विज्ञान में मंगल को शक्ति, पराक्रम, साहस, सेना, क्रोध, उत्तेजना, छोटे भाई, एवं शस्त्र का कारक माना जाता है। इसके अलावा यह युद्ध, शत्रु, भूमि, अचल संपत्ति, पुलिस आदि का भी कारक होता है। गरुण पुराण के अनुसार मनुष्य के नेत्रों में मंगल ग्रह का वास होता है। यदि किसी व्यक्ति का मंगल अच्छा हो तो वह स्वभाव से निडर और साहसी व्यक्ति होगा और उसे युद्ध में विजय प्राप्त होगी। परंतु यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल अशुभ स्थिति में बैठा हो तो जातक को नकारात्मक परिणाम मिलेंगे। जैसे- व्यक्ति छोटी-छोटी बातों से क्रोधित होगा तथा वह लड़ाई-झगड़ों में भी शामिल होगा। ज्योतिष में मंगल ग्रह को क्रूर ग्रह की श्रेणी में रखा गया है। वहीं मंगल दोष के कारण जातकों को वैवाहिक जीवन में समस्या का सामना करना पड़ता है।

बुध ग्रह - वैदिक ज्योतिष में बुध को बुद्धि, तर्क, गणित, संचार, चतुरता, मामा और मित्र का कारक माना गया है। बुध एक तटस्थ ग्रह है। इसलिए यह जिस भी ग्रह की संगति में आता है उसी के अनुसार जातक को इसके परिणाम प्राप्त होते हैं। यदि कुण्डली मे बुध की स्थिति कमज़ोर होती है तो जातक को गणित, तर्कशक्ति, बुद्धि और संवाद में समस्या का सामना करना पड़ता है। जबकि स्थिति मजबूत होने पर जातक को उपरोक्त क्षेत्र में बहुत अच्छे परिणाम देखने को मिलते हैं। बुध ग्रह मनुष्य के हृदय में बसता है। ज्योतिष के अनुसार बुध ग्रह का प्रिय रंग हरा है।

बृहस्पति ग्रह - ज्योतिष में बृहस्पति को गुरु के नाम से भी जाना जाता है। गुरु को शिक्षा, अध्यापक, धर्म, बड़े भाई, दान, परोपकार, संतान आदि का कारक माना जाता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में गुरु की स्थिति मजबूत हो तो वह व्यक्ति ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी होता है। इसके अलावा उस व्यक्ति का स्वभाव धार्मिक होता है और उसे जीवन में संतान सुख की प्राप्ति होती है। वहीं यदि बृहस्पति कुंडली में कमज़ोर हो तो उपरोक्त चीज़ों में इसका नकारात्मक असर पड़ता है। बृहस्पति ग्रह को पीला रंग प्रिय है।

शुक्र ग्रह - शुुक्र एक चमकीला ग्रह है। यह विवाह, प्रेम, सौन्दर्य, रोमांस, काम वासना, विलासिता, भौतिक सुख-सुविधा, पति-पत्नी, संगीत, कला, फ़ैशन, डिज़ाइन आदि का कारक होता है। विशेष रूप से पुरुषों की कुंडली में शुक्र को वीर्य का कारक माना गया है। यदि किसी जातक की कुंडली में शुक्र की स्थिति मजबूत हो तो जातक को जीवन में भौतिक और शारीरिक सुख-सुविधाओं का लाभ प्राप्त होता है। यदि व्यक्ति विवाहित है तो उसका वैवाहिक जीवन सुखी व्यतीत होता है। वहीं यदि शुक्र कुंडली में कमज़ोर हो तो जातक को उपरोक्त क्षेत्र में अशुभ परिणाम देखने को मिलते हैं। शुक्र के लिए गुलाबी रंग शुभ होता है।

शनि ग्रह - शनि पापी ग्रह है और इसकी चाल सबसे धीमी है। अतः सभी ग्रहों में से इसके गोचर की अवधि बड़ी होती है। शनि गोचर के दौरान एक राशि में क़रीब दो से ढ़ाई वर्ष तक रहता है। इसलिए व्यक्ति को इसके परिणाम देर से प्राप्त होते हैं। ज्योतिष में शनि को आयु, दुख, रोग, पीड़ा, विज्ञान, तकनीकी, लोहा, खनिज तेल, कर्मचारी, सेवक, जेल आदि का कारक माना जाता है। यदि किसी जातक की कुंडली शनि दोष हो तो उसे उपरोक्त क्षेत्र में हानि का सामना करना पड़ता है। ज्योतिष में शनि का बहुत बड़ा प्रभाव होता है। व्यक्ति के शरीर में नाभि का स्थान शनि का होता है। शनि के लिए काले रंग के वस्त्र धारण किए जाते हैं।

राहु ग्रह - राहु एक छाया ग्रह है। ज्योतिष में राहु कठोर वाणी, जुआ, यात्राएँ, चोरी, दुष्टता, त्वचा के रोग, धार्मिक यात्राएँ आदि का कारक होता है। यदि जिस व्यक्ति की कुंडली राहु अशुभ स्थान पर बैठा हो तो उसकी कुंडली में राहु दोष पैदा होता है और उसे कई क्षेत्रों समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके नकारात्मक प्रभाव से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। अपने स्वभाव के कारण ही राहु को ज्योतिष में एक पापी ग्रह माना गया है। राहु का स्थान मानव मुख में होता है। राहु-केतु दोनों का सूर्य और चंद्रमा से बैर है और इस बैर के कारण ही ये दोनों सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण के रूप में शापित करते हैं।

केतु ग्रह - राहु के समान केतु भी पापी ग्रह है। ज्योतिष में इसे किसी भी राशि का स्वामित्व प्राप्त नहीं है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार केतु को तंत्र-मंत्र, मोक्ष, जादू, टोना, घाव, ज्वर और पीड़ा का कारक माना गया है। यदि व्यक्ति की जन्मपत्रिका में केतु अशुभ स्थान पर बैठा हो तो जातक को विभिन्न क्षेत्रों हानि का सामना करना पड़ता है। जबकि केतु यदि कुंडली प्रबल हो तो यह व्यक्ति को सांसारिक दुनिया से दूर ले जाता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति गूढ़ विज्ञान में अधिक रुचि लेता है। मानव शरीर में केतु का स्थान व्यक्ति के कण्ठ से लेकर हृदय तक होता है। राहु-केतु दोनों के प्रभाव से व्यक्ति की कुंडली में काल सर्प दोष बनता है।

नवरात्रि में शक्ति के नौ (9) रूपों की पूज होती है और प्रत्येक का एक अपना सांकेतिक कहत्व है। इन नौ रूपों मे पूजित है पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चंद्रघंटा, चौथी कूष्मांडा, पांचवी स्कंध माता, छठी कात्यायिनी, सातवीं कालरात्रि, आठवीं महागौरी और नौवीं सिद्धिदात्री। (स्रोत :- https://www.bhaskar.com/religion/poojan-vidhi-aartiya/importance-of-9-avatars-worship-of-mata-durga-in-navratri-01514169.html)

हिमालय का एक नाम शैलेंद्र या शैल भी है। शैल मतलब पहाड़, चट्टान। देवी दुर्गा ने पार्वती के रुप में हिमालय के घर जन्म लिया। उनकी मां का नाम था मैना। इसी कारण देवी का पहला नाम पड़ा शैलपुत्री यानी हिमालय की बेटी। मां शैलपुत्री की पूजा, धन, रोजगार और स्वास्थ्य के लिए की जाती है। शैलपुत्री सिखाती है कि जीवन में सफलता के लिए सबसे पहले इरादों में चट्टान की तरह मजबूती और अडिगता होनी चाहिए।

हिमालय का एक नाम शैलेंद्र या शैल भी है। शैल मतलब पहाड़, चट्टान। देवी दुर्गा ने पार्वती के रुप में हिमालय के घर जन्म लिया। उनकी मां का नाम था मैना। इसी कारण देवी का पहला नाम पड़ा शैलपुत्री यानी हिमालय की बेटी। मां शैलपुत्री की पूजा, धन, रोजगार और स्वास्थ्य के लिए की जाती है। शैलपुत्री सिखाती है कि जीवन में सफलता के लिए सबसे पहले इरादों में चट्टान की तरह मजबूती और अडिगता होनी चाहिए।

ब्रह्मचारिणी का अर्थ है, जो ब्रह्मा के द्वारा बताए गए आचरण पर चले। जो ब्रह्म की प्राप्ति कराती हो। जो हमेशा संयम और नियम से रहे। जीवन में सफलता के लिए सिद्धांत और नियमों पर चलने की बहुत आवश्यकता होती है। इसके बिना कोई मंजिल नहीं पाई जा सकती। अनुशासन सबसे ज्यादा जरूरी है। ब्रह्मचारिणी की पूजा पराशक्तियों को पाने के लिए की जाती है। इनकी पूजा से कई सिद्धियां मिलती हैं।

ब्रह्मचारिणी का अर्थ है, जो ब्रह्मा के द्वारा बताए गए आचरण पर चले। जो ब्रह्म की प्राप्ति कराती हो। जो हमेशा संयम और नियम से रहे। जीवन में सफलता के लिए सिद्धांत और नियमों पर चलने की बहुत आवश्यकता होती है। इसके बिना कोई मंजिल नहीं पाई जा सकती। अनुशासन सबसे ज्यादा जरूरी है। ब्रह्मचारिणी की पूजा पराशक्तियों को पाने के लिए की जाती है। इनकी पूजा से कई सिद्धियां मिलती हैं।

ये देवी का तीसरा रूप है, जिसके माथे पर घंटे के आकार का चंद्रमा है, इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा है। ये देवी संतुष्टि की देवी मानी जाती है। जीवन में सफलता के साथ शांति का अनुभव तब तक नहीं हो सकता है, जब तक कि मन में संतुष्टि का भाव ना हो। आत्म कल्याण और शांति की तलाश जिसे हो, उसे मां चंद्रघंटा की आराधना करनी चाहिए।

ये देवी का तीसरा रूप है, जिसके माथे पर घंटे के आकार का चंद्रमा है, इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा है। ये देवी संतुष्टि की देवी मानी जाती है। जीवन में सफलता के साथ शांति का अनुभव तब तक नहीं हो सकता है, जब तक कि मन में संतुष्टि का भाव ना हो। आत्म कल्याण और शांति की तलाश जिसे हो, उसे मां चंद्रघंटा की आराधना करनी चाहिए।

कुष्मांडा देवी का चौथा स्वरूप है। ग्रंथों के अनुसार इन्हीं देवी की मंद मुस्कार से अंड यानी ब्रह्मांड की रचना हुई थी। इसी कारण इनका नाम कूष्मांडा पड़ा। ये देवी भय दूर करती हैं। भय यानी डर ही सफलता की राह में सबसे बड़ी मुश्किल होती है। जिसे जीवन में सभी तरह के भय से मुक्त होकर सुख से जीवन बिताना हो, उसे देवी कुष्मांडा की पूजा करनी चाहिए।

कुष्मांडा देवी का चौथा स्वरूप है। ग्रंथों के अनुसार इन्हीं देवी की मंद मुस्कार से अंड यानी ब्रह्मांड की रचना हुई थी। इसी कारण इनका नाम कूष्मांडा पड़ा। ये देवी भय दूर करती हैं। भय यानी डर ही सफलता की राह में सबसे बड़ी मुश्किल होती है। जिसे जीवन में सभी तरह के भय से मुक्त होकर सुख से जीवन बिताना हो, उसे देवी कुष्मांडा की पूजा करनी चाहिए।

भगवान शिव और पार्वती के पहले पुत्र हैं कार्तिकेय, उनका ही एक नाम है स्कंद। कार्तिकेय यानी स्कंद की माता होने के कारण देवी के पांचवें रुप का नाम स्कंद माता है। उसके अलावा ये शक्ति की भी दाता हैं। सफलता के लिए शक्ति का संचय और सृजन की क्षमता दोनों का होना जरूरी है। माता का ये रूप यही सिखाता है और प्रदान भी करता है।

भगवान शिव और पार्वती के पहले पुत्र हैं कार्तिकेय, उनका ही एक नाम है स्कंद। कार्तिकेय यानी स्कंद की माता होने के कारण देवी के पांचवें रुप का नाम स्कंद माता है। उसके अलावा ये शक्ति की भी दाता हैं। सफलता के लिए शक्ति का संचय और सृजन की क्षमता दोनों का होना जरूरी है। माता का ये रूप यही सिखाता है और प्रदान भी करता है।

कात्यायिनी ऋषि कात्यायन की पुत्री हैं। कात्यायन ऋषि ने देवी दुर्गा की बहुत तपस्या की थी और जब दुर्गा प्रसन्न हुई तो ऋषि ने वरदान में मांग लिया कि देवी दुर्गा उनके घर पुत्री के रुप में जन्म लें। कात्यायन की बेटी होने के कारण ही नाम पड़ा कात्यायिनी। ये स्वास्थ्य की देवी हैं। रोग और कमजोर शरीर के साथ कभी सफलता हासिल नहीं की जा सकती। मंजिल पाने के लिए शरीर का निरोगी रहना जरूरी है। जिन्हें भी रोग, शोक, संताप से मुक्ति चाहिए उन्हें देवी कात्यायिनी को मनाना चाहिए।

कात्यायिनी ऋषि कात्यायन की पुत्री हैं। कात्यायन ऋषि ने देवी दुर्गा की बहुत तपस्या की थी और जब दुर्गा प्रसन्न हुई तो ऋषि ने वरदान में मांग लिया कि देवी दुर्गा उनके घर पुत्री के रुप में जन्म लें। कात्यायन की बेटी होने के कारण ही नाम पड़ा कात्यायिनी। ये स्वास्थ्य की देवी हैं। रोग और कमजोर शरीर के साथ कभी सफलता हासिल नहीं की जा सकती। मंजिल पाने के लिए शरीर का निरोगी रहना जरूरी है। जिन्हें भी रोग, शोक, संताप से मुक्ति चाहिए उन्हें देवी कात्यायिनी को मनाना चाहिए।

काल यानी समय और रात्रि मतलब रात। जो सिद्धियां रात के समय साधना से मिलती हैं उन सब सिद्धियों को देने वाली माता कालरात्रि हैं। आलौकिक शक्तियों, तंत्र सिद्धि, मंत्र सिद्धि के लिए इन देवी की उपासना की जाती है। ये रूप सिखाता है कि सफलता के लिए दिन-रात के भेद को भूला दीजिए। जो बिना रुके और थके, लगातार आगे बढ़ना चाहता है वो ही सफलता के शिखर पर पहुंच सकता है।

काल यानी समय और रात्रि मतलब रात। जो सिद्धियां रात के समय साधना से मिलती हैं उन सब सिद्धियों को देने वाली माता कालरात्रि हैं। आलौकिक शक्तियों, तंत्र सिद्धि, मंत्र सिद्धि के लिए इन देवी की उपासना की जाती है। ये रूप सिखाता है कि सफलता के लिए दिन-रात के भेद को भूला दीजिए। जो बिना रुके और थके, लगातार आगे बढ़ना चाहता है वो ही सफलता के शिखर पर पहुंच सकता है।

देवी का आठवा स्वरूप है महागौरी। गौरी यानी पार्वती, महागौरी यानी पार्वती का सबसे उत्कृष्ट स्वरूप। अपने पाप कर्मों के काले आवरण से मुक्ति पाने और आत्मा को फिर से पवित्र और स्वच्छ बनाने के लिए महागौरी की पूजा और तप किया जाता है। ये चरित्र की पवित्रता की प्रतीक देवी हैं, सफलता अगर कलंकित चरित्र के साथ मिलती है तो वो किसी काम की नहीं, चरित्र उज्जवल हो तो ही सफलता का सुख मिलता है।

देवी का आठवा स्वरूप है महागौरी। गौरी यानी पार्वती, महागौरी यानी पार्वती का सबसे उत्कृष्ट स्वरूप। अपने पाप कर्मों के काले आवरण से मुक्ति पाने और आत्मा को फिर से पवित्र और स्वच्छ बनाने के लिए महागौरी की पूजा और तप किया जाता है। ये चरित्र की पवित्रता की प्रतीक देवी हैं, सफलता अगर कलंकित चरित्र के साथ मिलती है तो वो किसी काम की नहीं, चरित्र उज्जवल हो तो ही सफलता का सुख मिलता है।

ये देवी सारी सिद्धियों का मूल (Origin) हैं। देवी पुराण कहता है भगवान शिव ने देवी के इसी स्वरूप से कई सिद्धियां प्राप्त की। शिव के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप में जो आधी देवी हैं वो ये सिद्धिदात्री माता ही हैं। हर तरह की सफलता के लिए इन देवी की आराधना की जाती है। सिद्धि के अर्थ है कुशलता, कार्य में कुशलता और सलीका हो तो सफलता आसान हो जाती है।

इसी तरह जीवन की भौतिक समृद्धि के आवश्यक नवरत्न का भी विधान किया गया है जिसका प्रयोग से अपेक्षित की प्राप्ति की जा सकती है। ये नौ रत्न है हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया। इनका अनुप्रयोग ग्रहों के बूरे प्रभाव से बचाव के लिए किया जाता है। लेकिन नौ के आर्मभीत संकेतों में से सबसे प्रमुख है नौ निधियां जिसकी चर्चा गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान चालीसा मे की है ‘अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, असवर दीन्ह जानकी माता’। कुबेर जो धन के स्वामी और देवताओं के कोषपाल है, कुबेर के कोष (खजाना) का नाम निधि है जिसमें नौ प्रकार की निधियां हैं। पुराणों में वर्णित नौ निधियां इस प्रकार हैं।

1. पद्म निधि – पद्मनिधि लक्षणो से संपन्न मनुष्य सात्विक आचरण वाला होता है तथा स्वर्ण और चांदी आदि का संचयन करके दान करने योग्य होता है. पद्म निधि के लक्षणों से संपन्न साधकों की कमाई गई साधन संपदा भी सदाचार-पूर्ण होती है.

2. महापद्म निधि – महापद्म निधि से लक्षित व्यक्ति अपने संचित धन-दौलत आदि का उपयोग दान धार्मिक कार्यों में करता है. हालांकि इस निधि का प्रभाव 7 पीढ़ियों तक ही सिमित रहता है. इस निधि से संपन्न व्यक्ति भी दानी और उदार स्वभाव वाला होता है और 7 पीढियों तक सुख ऐश्वर्य भोगता है.

3. नील निधि – निल निधि से सुशोभित मनुष्य सात्विक गुणों के तेजसे संयुक्त और सत्वगुण-प्रधान होता है. ऐसी निधि व्यापार द्वारा ही प्राप्त होती है इसलिए इस निधि से संपन्न व्यक्ति में दोनों ही गुणों का प्राबल्य पाया जाता है. उसका वैभव तीन पीढीतक बना रहता है.

4. मुकुंद निधि – मुकुंद निधि से लक्षित मनुष्य रजोगुण संपन्न होता है वह सत्ता शासन में रममाण रहता है. यह निधि एक पीढ़ी बाद समाप्त हो जाती है.

5. नन्द निधि – नन्दनिधि युक्त व्यक्ति संयुक्त रूप से राजस और तामस गुणोंवाला होता है वही कुल का मुख्य आधार होता है. माना जाता है कि यह निधि साधक को दीर्घ आयु व निरंतर उत्कर्ष प्रदान करती है. ऐसी निधि से संपन्न व्यक्ति अपनी प्रशंसा से खुश होता है.

6. मकर निधि – मकर निधि से संपन्न पुरुष अस्त्रों और शस्त्रों का संग्रह करनेवाला होता है. ऐसे व्यक्ति का राजनीति और शासन में हस्तक्षेप होता है. वह शत्रुओं पर अंकुश कायम करता है और युद्ध के लिए सदैव तैयार रहता है. इनकी मृत्यु भी अस्त्र-शस्त्र द्वारा या किसी अघटित विपदा से होती है.

7. कच्छप निधि – कच्छप निधि से लक्षित व्यक्ति तामस गुणवाला होता है. कच्छप निधि का साधक अपनी संपत्ति को गुप्त रूप से छुपाकर रखता है. न तो स्वयं उसका उपभोग करता है, न किसी को उपयोग करने देता है. वह सांप की भाती उसकी रक्षा करता है. ऐसे व्यक्ति धन होते हुए भी उसका उपभोग करने से वंचित रहते है.

8. शंख निधि – शंख निधि को प्राप्त व्यक्ति स्वयं का हित और स्वयं के ही भोग की इच्छा-आकांशा करता है. वह कमाता तो बहुत है, लेकिन उसके परिवार के सदस्य गरीबी में ही जीते हैं. ऐसा व्यक्ति स्वार्थ हेतु से धन का उपयोग स्वयं के सुख-भोग के लिए करता है, जिससे उसका परिवार सदैव गरीबी में जीवन गुजारता है. शंख निधि एक पीढी तक ही सिमित होती है.

9. खर्व निधि – खर्व निधि वाले व्यक्ति के स्वभाव में उपरोक्त सभी मिश्रीत फल दिखाई देते हैं. इस निधि से संपन्न व्यक्ति का स्वभाव मिला-जुला होता है. उसके कार्य व्यवहार और स्वभाव के बारे में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता. माना जाता है कि इस निधि को प्राप्त व्यक्ति संभवतः विकलांग व घमंडी होता हैं, यह मौका मिलने पर दूसरों का धन-दौलत, संपत्ति और सुख भी छीन सकता है.

दस (10) का विचार

यह भारतीय अंकीय प्रणाली की पहली संख्या है जिसे शून्य (0) के प्रयोग के द्वारा निर्मित किया गया है। यही गणित के दशमलव प्रणाली का मूल आधार भी है जिसे किसी भी संख्या रेखा पर प्रदर्शित किया जा सकता है। क्योंकि दस (10) में पहली बार शून्य (0) का प्रयोग है और शून्य अनंत को भी व्यक्त करता है, इस दस की व्यापकता भी बहुत बड़ी है और इसमे जाने-अनजाने अनंत भी समाहित हो गया है। भारतीय वांगमय में वर्णित दशावतर (दस अवतार) अगर सृष्टि के विकास क्रम को काफी हद तक एक सरलतम रूप से व्याख्यायित करता है तो दस दिशाओं का विचार स्वाभिक रूप से उसके भौतिक विकास और विस्तार के रूप मे वर्णित है। फिर इन दिशाओं में बिना पुरुष और प्रकृति के मेल से सृजन हो ही नहीं सकता तो इसके अनुरूप दस दिशाओ के रक्षक दस दिक्पाल की की व्यवस्था की गई जो चेतना के पुरूप रूप को व्यक्त करते है और प्रकृति के रूप में इन दस दिशाओं की अधिष्ठात्री देवी दसमहाविद्या की कल्पना की गई है। इस तरह से इनके बीच आपसी सामंजस्य और तारतम्यता ही सृष्टि के विकास और विस्तार के लिए उत्तरदायी है।

यह भी कितना आश्चर्य है की सृष्टि सतत विकासमान रहे और निर्विघ्न रूप से आगे बढ़े उसके लिए मर्यादाओं की संख्या भी दस ही विहित की गई है। आचार्य मनु द्वारा वर्णित ये दस मर्यादाएं धर्म के दस (10) लक्षण के रूप में जाने जाते है। चुकी सृष्टि जिस परिवेश मे रहती है उसका प्रकृति के साथ ही क्रियाकलाप और समायोजन होता है प्रतीकात्मक रूप से ऐसे पेड़ों की संख्या भी 10 बताई गई है जो पूजनीय है और वो पवित्र माने जाते है। फिर इसी के साथ दस पुण्य और दस पाप का भी विचार किया गया है जो सृष्टि के दिन प्रतिदिन के व्यवहार और उद्यम को नियमित करते है। अर्थात दस की संख्या सृष्टि के वैज्ञानिक विकास और विस्तार के गत्यात्मकता से जुड़े है और बहुत ही महत्वपूर्ण है जिसे विस्तार से समझने की जरूरत है। सबसे बड़ी बात यह है जब सबसे पहले इस धरती पर ज्ञान का अभ्युदय जो की अपौरुषेय था और है ऋग्वेद के दस मंडलों में ही पहले पहल संग्रहीत हुए।

दशावतार (10 अवतार): इसकी व्याख्या डार्विन के विकसवादी सिद्धांतों से प्रेरित है। इसके अनुसार अवतार जलचर से भूमिवास की ओर बढ़ते क्रम में हैं; फिर आधे जानवर से विकसित मानव तक विकास का क्रम चलते गया है। इस प्रकार दशावतार क्रमिक विकास का प्रतीक या रूपक की तरह है जो निम्न है:

1. मत्स्य : मनु को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु मछली के रूप में प्रकट हुए। दिलचस्प बात यह है कि मछली जीवन के पहले रूपों में से एक थी। विकास पानी के भीतर शुरू हुआ, और इसलिए मत्स्य अवतार का महत्व।

2. कूर्मा : जब देवता और असुर अमृत (दिव्य अमृत) के लिए क्षीर सागर का मंथन कर रहे थे , तब कूर्म या कछुए के रूप में , भगवान विष्णु ने मंदार पर्वत का भार उठाया था। दिलचस्प बात यह है कि विकास के संदर्भ में, कछुआ एक उभयचर है, जो पानी के नीचे और जमीन दोनों पर जीवित रह सकता है।

3. वराह : वराह या जंगली सूअर के रूप में , भगवान विष्णु ने पृथ्वी को बचाने के लिए हिरण्याक्ष के साथ भयंकर युद्ध लड़ा । हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को ब्रह्माण्ड से दूर डुबो दिया था। भगवान विष्णु ने अपने दाँतों से पृथ्वी को नकारात्मकता के सागर से बाहर निकाला और इस प्रकार उसे विनाश से बचाया। वराह या सूअर पृथ्वी की सतह पर रहता है। और यह विकास ग्राफ में वृद्धि को इंगित करता है।

4. नरसिंह : भगवान विष्णु प्रहलाद को उसके पिता हिरण्यकश्यप से बचाने के लिए आधे मनुष्य और आधे शेर के रूप में प्रकट हुए और धर्म को बहाल किया । इस प्रकार, भगवान विष्णु ने नरसिम्हा के रूप में प्रकट होकर दिखाया कि पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के जीवन का विकास कैसे हुआ।

5. वामन : राजा बलि के चंगुल से तीन लोकों - पृथ्वी , देव और पाताल को पुनर्स्थापित करने के लिए भगवान विष्णु एक बौने वामन के रूप में प्रकट हुए । एक यज्ञ के दौरान , भगवान वामन प्रकट हुए और उन्होंने राजा से भूमि का कुछ हिस्सा मांगा जिसे वह अपने छोटे पैरों से ढक सकें। राजा बलि सहमत हो गए लेकिन अंततः उन्हें एहसास हुआ कि वह छोटा लड़का कोई और नहीं बल्कि श्री हरि विष्णु थे। यह अवतार मनुष्य के विकास की ओर संकेत करता है।

6. परशुराम : ब्राह्मण और क्षत्रिय के कर्तव्यों को समझाने के लिए भगवान विष्णु परशुराम के रूप में प्रकट हुए । वह भगवान शिव का भक्त था और उसे वरदान के रूप में एक कुल्हाड़ी दी गई थी। यदि हम परशुराम के हथियार कुल्हाड़ी पर नजर डालें तो यह मानव जाति के विकास का संकेत देता है। मनुष्य जंगलों में जीवित रहते थे, और कुल्हाड़ी जीवित रहने के लिए बनाए गए सबसे शुरुआती हथियारों में से एक थी।

7. राम : भगवान राम के रूप में, भगवान विष्णु ने त्रेता युग में राक्षस-राजा रावण को मारने के लिए एक राजकुमार के रूप में जन्म लिया । अवतार ने स्वयं के प्रति व्यक्ति के कर्तव्यों पर भी जोर दिया। इसमें समाज में धार्मिकता की बात की गई। इस प्रकार, विकास के दृष्टिकोण से, मनुष्य ने जंगलों से दूर जाकर एक सभ्य समाज का निर्माण किया।

8. बलराम : बलराम , जिन्हें शेषनाग का अवतार भी माना जाता है, श्री हरि विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। जैसा कि नाम से पता चलता है, बाला ताकत को दर्शाता है, और वह किसानों द्वारा उपयोग किए जाने वाले हल से जुड़ा है। विकास ग्राफ के दृष्टिकोण से, बलराम अवतार ने कृषि के महत्व पर ध्यान केंद्रित किया।

9. कृष्ण : श्री विष्णु ने न केवल कंस को मारने के लिए कृष्ण के रूप में अवतार लिया , बल्कि मनुष्यों को एक समाज के रूप में विकसित होने में भी मदद की। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन को अपना विश्वरूपम दिखाकर और उन्हें गीतोपदेशम देकर, कृष्ण ने जीवन नामक इस यात्रा के बारे में मौलिक वास्तविकता पर जोर दिया। विकास के संदर्भ में, अवतार ने मानव बुद्धि की ताकत पर प्रकाश डाला।

10. कल्कि : विष्णु का दसवां और अंतिम अवतार अभी आना बाकी है। उनके ऐसे समय आने की उम्मीद है जब दुनिया मानवता का सबसे काला पक्ष देख रही है। कल्कि अधर्म को उखाड़ फेंकने और एक नए युग की शुरुआत के लिए एक नई सभ्यता के बीज बोने के लिए प्रकट होंगे ।

लेकिन सनातन परंपरा बिना पुरुष और प्रकृति के मेल से संभव ही नहीं है । वराह पुराण के अनुसार सृष्टि सृजन हेतु चिंतनरत ब्रह्मा के कान से 10 कन्याएं उत्पन्न हुईं जिनमें मुख्य 6 और 4 गौण थीं। इनके नाम इस प्रकार है पूर्वा: जो पूर्व दिशा कहलाई, आग्नेयी: जो आग्नेय दिशा कहलाई, दक्षिणा: जो दक्षिण दिशा कहलाई, नैऋती: जो नैऋत्य दिशा कहलाई, पश्चिमा: जो पश्चिम दिशा कहलाई, वायवी: जो वायव्य दिशा कहलाई, उत्तर: जो उत्तर दिशा कहलाई, ऐशानी: जो ईशान दिशा कहलाई, उर्ध्व: जो उर्ध्व दिशा कहलाई और अधस्‌: जो अधस्‌ दिशा कहलाई।

तत्क्षण उत्पन्न उन कन्याओं ने पतियों की कामना की और तब ब्रह्मा ने आदेशनुसार उन कन्याओं ने अलग अलग दिशा की ओर प्रस्थान किया। इसके पश्चात ब्रह्मा ने 8 दिग्पालों की सृष्टि की और उन्हे आठ दिशाओं की कन्यायों के साथ सम्बद्ध कर दिया। इसके बाद वे सभी लोकपाल/दिक्पाल उन कन्याओं के साथ अपनी-अपनी दिशाओं में चले गए। शेष जो दीक्षाएं बची रह गई उर्ध्व या आकाश की ओर वे स्वयं चले गए और नीचे की ओर उन्होंने शेष को प्रतिष्ठित किया।

दस (10) दिशाएं : सनातन विश्वास प्रणाली में 10 दिशाओं की गणना की गई है। इनके नाम और क्रम इस प्रकार हैं- उर्ध्व, ईशान, पूर्व, आग्नेय, दक्षिण, नैऋत्य, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और अधो। एक मध्य को भी एक दिशा माँ लें तो कुल मिलाकर 11 दिशाएं होती है। सनातन विश्वास प्रणाली में प्रत्येक दिशा का एक देवता नियुक्त किया गया है जिसे 'दिग्पाल' कहा गया है जो दिशाओं के रक्षक है।

1. उर्ध्व दिशा : उर्ध्व दिशा के देवता ब्रह्मा हैं। इस दिशा का सबसे ज्यादा महत्व है। आकाश ही ईश्वर है। जो व्यक्ति उर्ध्व मुख होकर प्रार्थना करते हैं उनकी प्रार्थना में असर होता है। वेदानुसार मांगना है तो ब्रह्म और ब्रह्मांड से मांगें, किसी और से नहीं। उससे मांगने से सब कुछ मिलता है।

2. ईशान दिशा : पूर्व और उत्तर दिशाएं जहां पर मिलती हैं उस स्थान को ईशान दिशा कहते हैं। चूंकि भगवान शिव का आधिपत्य उत्तर-पूर्व दिशा में होता है इसीलिए इस दिशा को ईशान कोण कहा जाता है।

3. पूर्व दिशा : ईशान के बाद पूर्व दिशा का नंबर आता है। जब सूर्य उत्तरायण होता है तो वह ईशान से ही निकलता है, पूर्व से नहीं। इस दिशा के देवता इंद्र और स्वामी सूर्य हैं।

4. आग्नेय दिशा : दक्षिण और पूर्व के मध्य की दिशा को आग्नेय दिशा कहते हैं। इस दिशा के अधिपति हैं अग्निदेव।

5. दक्षिण दिशा : दक्षिण दिशा के अधिपति देवता हैं भगवान यमराज। दक्षिण दिशा में वास्तु के नियमानुसार निर्माण करने से सुख, संपन्नता और समृद्धि की प्राप्ति होती है।

6. नैऋत्य दिशा : दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य के स्थान को नैऋत्य कहा गया है। यह दिशा नैऋत देव के आधिपत्य में है। इस दिशा के स्वामी राहु और केतु हैं।

7. पश्चिम दिशा : पश्चिम दिशा के देवता, वरुण देवता हैं और शनि ग्रह इस दिशा के स्वामी हैं। यह दिशा प्रसिद्धि, भाग्य और ख्याति की प्रतीक है। इस दिशा में घर का मुख्‍य द्वार होना चाहिए।

8. वायव्य दिशा : उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में वायव्य दिशा का स्थान है। इस दिशा के देव वायुदेव हैं और इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है।

9. उत्तर दिशा : उत्तर दिशा के अधिपति हैं रावण के भाई कुबेर। कुबेर को धन का देवता भी कहा जाता है।

10. अधो दिशा : अधो दिशा के देवता हैं शेषनाग जिन्हें अनंत भी कहते हैं।



लेकिन उपर्युक्त वर्णित 10 दिशाओं का एक वैज्ञानिक आधार है और विज्ञान के जटिल सिद्धांत को व्याख्यायित करने का प्रयास करता है। ब्रह्मांड जिसका अनंत विस्तार है में किसी चीज को स्थिति को दर्शाने के लिए एक संदर्भ बिन्दु (reference point) की जरूरत पड़ती है और संदर्भ बिन्दु वह बिन्दु वह होता है जहां से किसी आयाम के सापेक्ष दूरियों की गणना कर ब्रह्मांड के किसी पिंड की स्थिति को वर्णित किया जाता है और फिर सृष्टि के सृजन को किसी एक दिशा मे कैसे सीमित किया जा सकता है। किसी किसी पुस्तकों में केंद्र/मध्य को भी एक दिशा बताया गया और कहा गया की दिशाओं की कुल संख्या ग्यारह (11) है। क्या 11 दिशाओं का यह विचार वर्तमान मे प्रचलित सिद्धांतिक भौतिकी के स्ट्रिंग सिद्धांत में कल्पित 11 आयामों से मेल नहीं खाता है। क्या गीत मे श्री कृष्ण द्वारा कथित की दिशाओं में पूर्व हूँ किसी जटिल वैज्ञानिक सिद्धांत के तो सूत्र नहीं है। इतना तो अवश्य है की ‘दिशाओं में मौन पूर्व हूँ’ आज की उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह पृथ्वी की उस गति को व्याख्यायित कर रही है जिसके अनुसार पृथ्वी पूर्व से पश्चिम की ओर घूमती है और इसी कारण से सूर्य पूर्व मे उदित होता प्रतीत होता है।

अब जब दस अवतारों से सृष्टि का विकास क्रम चल और दसों दिशाओं मे पुरुष प्रकृति के मेल से इसका विस्तार संभव हुआ तो इसके निमित्त दस (10) महाविद्याओं का भी विचार हुआ। ये महाविद्याओं को माँ दुर्गा का ही दशावतार माना गया है जो सिद्धि देने वाली होती है। मां दुर्गा के इन दस महाविद्याओं की साधना करने वाला व्यक्ति सभी भौतिक सुखों को प्राप्त कर लेता है। ये दस महाविद्याएं इस प्रकार है।

1- काली : सभी 10 महाविद्याओं में काली को प्रथम रूप माना जाता है। माता दुर्गा ने राक्षसों का वध करने के लिए माता ने यह रूप धारण किया था। सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता के इस रूप की पूजा की जाती है।

2- तारा : सर्वप्रथम महर्षि वशिष्ठ ने तारा की आराधना की थी। लोक परंपरा में यह तांत्रिकों की मुख्य देवी हैं। देवी के इस रूप की आराधना करने पर आर्थिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। बीरभूम जिले के तारापीठ में देवी तारा की उपासना महर्षि वशिष्ठ ने करके तमाम सिद्धियां हासिल की थी। परेशनियों को दूर करने के कारण इन्हें तारने वाली माता तारा कहा जाता है।

3- त्रिपुर सुंदरी : इन्हें ललिता, राज राजेश्वरी और त्रिपुर सुंदरी भी कहते हैं। त्रिपुरा में स्थित त्रिपुर सुंदरी का शक्तिपीठ है। यहां पर माता की चार भुजा और 3 नेत्र हैं। नवरात्रि में रुद्राक्ष की माला

4- भुवनेश्वरी : पुत्र प्राप्ति के लिए माता भुवनेश्वरी की आराधना फलदायी मानी जाती है। यह शताक्षी और शाकम्भरी नाम से भी जानी जाती है। इस महाविद्या की आराधना से सूर्य के समान तेज ऊर्जा प्राप्ति होती है और जीवन में मान सम्मान मिलता है।

5- छिन्नमस्ता : इनका स्वरूप कटा हुआ सिर और बहती हुई रक्त की तीन धाराएं से सुशोभित रहता है। इस महाविद्या की उपासना शांत मन से करने पर शांत स्वरूप और उग्र रूप में उपासना करने पर देवी के उग्र रूप के दर्शन होते है। कामाख्या के बाद यह दूसरा सबसे लोकप्रिय शक्तिपीठ है।

6-भैरवी : भैरवी की उपासना से व्यक्ति सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है। इनकी पूजा से व्यापार में लगातार बढ़ोतरी और धन सम्पदा की प्राप्ति होती है।

7-धूमावती : धूमावती माता को अभाव और संकट को दूर करने वाली माता कहते है। इनका कोई भी स्वामी नहीं है। इनकी साधना से व्यक्ति की पहचान महाप्रतापी और सिद्ध पुरूष के रूप में होती है। ऋग्वेद में इन्हें 'सुतरा' कहा गया है।

8- बगलामुखी : बगलामुखी की साधना दुश्मन के भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है। महाभारत के युद्ध में कृष्ण और अर्जुन ने कौरवों पर विजय हासिल करने के लिए माता बगलामुखी की पूजा अर्चना की थी।

9- मातंगी : जो भक्त अपने गृहस्थ जीवन को सुखमय और सफल बनाना चाहते हैं उन्हें मां मातंगी की आराधना करना चाहिए। मतंग भगवान शिव का भी एक नाम है। जो भक्त मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करता है वह अपने खेल, कला और संगीत के कौशल से दुनिया को अपने वश में कर लेता है।

10- कमला : मां कमला की साधना समृद्धि, धन, नारी, पुत्र की प्राप्ति के लिए की जाती है। इनकी साधना से व्यक्ति धनवान और विद्यावान हो जाता है।

धर्म के दस लक्षण

और अंत सबसे महत्वपूर्ण बात यह की धर्म जो सृष्टि के सतत प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए आचार्य मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं:

धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।

धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। (मनुस्‍मृति 6:92)

अर्थात धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना ) धर्म के दस लक्षण है।


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