भारत का विचार/ Idea of India that is Bharat
वास्तव में भारत में इस्लामिक स्थापना की पूर्व संध्या पर ही से ‘भारत का विचार’ आकार ले चुका था। 'भारत का विचार' की धमक न केवल भौगोलिक भूभाग को परिभाषित करती थी बल्कि इसने एक वृहत्तर भारत के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त किया। सिंधु, सरस्वती, यमुना, गंगा, ब्राहमपुत्र, नर्मदा, तुंगभद्रा और कावेरी जैसी पवित्र नदी भूगोलों मे उपजे अनुभवों और मूल्यों का समस्त योग ही ‘भारत का विचार’ का था जो वैदिक वांगमय और संगम साहित्य के द्वारा पोषित आदर्शों से निर्देशित हो रहा था। जहां तक इस भारत के विचार का प्रतिनिधि नायक का प्रश्न है वह निस्संदेह राम नाम का नायक था। यद्यपि उपनिवेशवाद के समय से ही ऐसे तत्व है जो ‘कई रामायण’ होने का दावा करते है ताकि राम को अखिल भारतीय स्वरूप को कमतर/कमजोर कर सकें लेकिन उनकी ‘कई रामायण’ की सूची ही अधूरी है क्योंकि रामायण का हर भारतीय परिवारों में उसका एक संस्करण बसता है जिसके नायक राम है और वो सर्वथा पूजनीय है।
ऐतिहासिक रूप से पहले पहल सिंधु सरस्वती की घाटियों के आसपास के भौगोलिक प्रदेशों 'भारत का विचार' जन्म लिया था। यह एक विस्तृत प्रदेश था। इसमें न केवल भारत का पहला नगरीय
प्रयोग सफल हुआ था बल्कि इसके मूल्य बोधों की रूपरेखा भी तैयार कर दी गई गई जिसके
दर्शन वैदिक वांगमय में वर्णित विचारों में प्राप्य है। नगरीकरण के उपर्युक्त
मानदंड, समस्त भारत के मानदंड बन गए और वैदिक विचार सार्वभौम बन गए। ‘एकां सद विप्रा
वहुधा वदंती’ भारतीय धार्मिक विविधता के पोषण करने का महान सूत्र बन
गया। फिर जब सभ्यतागत विस्तार हुआ तो यमुना-गंगा का भूगोल भारत के राजनीतिक पटल पर
छा गया। शुरुआत भले भारत को ग्राम्य स्तर से करना पड़ा हो, लेकिन जनपद फिर महाजनपद
और अंतत मगध के नेतृत्व में बड़े बड़े साम्राज्यों का युग वापस लौटता है और
पटलीपुत्र, काशी के नेतृत्व में एक बार फिर से नगरीय आदर्शों का लक्ष्य साकार हो
उठता है। इस पूरे काल मे ऐसा नहीं था था गण पर आधारित व्यवस्था समाप्त हो गई बल्कि
वे सतत रही साम्राज्यों के परिधि वाले क्षेत्रों में। संसाधनों की सीमितता और
जनसांख्यिकी शायद इसका कारन रहा होगा क्योंकि नगरों को चलाने के लिए भरपूर संसाधन
और पर्याप्त जनसंख्या का होना जरूरी होता है। उत्तर भारत ही तब भारत का
प्रतिनिधित्व कर रहा था न केवल सभ्यता के भौतिक मानदंडों पर बल्कि बौद्धिक विरासत का भी। जैन
और बौद्ध धर्म सहित लगभग 72 तरह के उपदेशक/श्रमण बौद्धिक विरासत को संभाल रहे थे।
वैदिक विमर्श तो सदैव रहा ही, कुछ अन्य विचार पर भी लोगों को सम्मोहित कर रहे थे।
लगभग अगले 500 वर्षों तक यही दृश्य आम रहा। परंतु लगभग 350 ईस्वी से 550 ईस्वी के बीच
भारतीय उपमहाद्वीप में हूणों के आक्रमण और वर्चस्व स्थापना के प्रयास ने स्थिति को
सद्य के लिए बदलने जा रही थी। पर्शियन, रोमन और प्राचीन भारतीय स्रोतों के आधार पर
यह कहा जा सकता है की हुणों का भारतीय उपमहाद्वीप में आना: 388 ईस्वी के आसपास
शुरू हुआ जो की महान गुप्त का अंतिम दौर था। हिंदू कुश पर्वत को पार करने का मुख्य
कारण संभवतः मध्य एशिया में जलवायु परिवर्तन और आर्थिक दबाव थे, जिससे उनके
जीवनयापन के संसाधन प्रभावित हुए। वे सैन्य दृष्टि से शक्तिशाली साबित हुए थे और
भारत आन्ने से पूर्व रोमन तथा सासानिद साम्राज्यों को भी चुनौती दी थी। हूणों ने
लगभग 5वीं और 6वीं शताब्दी में भारत के विभिन्न भागों में आक्रमण किए, जिनमें गुप्त साम्राज्य
भी प्रभावित हुआ। खासतौर पर,
वे
455 से 550 ईस्वी के बीच कई बार भारत में घुसे और कई नगरों, संस्कृतियों, और बौद्ध विहारों को
नष्ट किया जिससे सांस्कृतिक और राजनीतिक पतन हुआ। कौसाम्बी, उज्जैन, मथुरा आदि का विनाश उनके
आक्रमणों का सीधा परिणाम था। यद्यपि हुणों के आक्रमणों ने व्यापार को प्रभावित करने
के साथ साथ उत्तर भारत के राजनीतिक वातावरण में असुरक्षा का बोध कराया, समय के साथ
हुणों का भारतीयकरण संबहव हुआ। उन्होंने भारतीय संस्कारों को अपनाया और उत्तरी
भारत मे प्रचलित धार्मिक परंपराओं के साथ मेलजोल बढ़ाया। इसने विकेंद्रीकृत
व्यवस्था भूमिका को जन्म दिया किया। राजपूतों के चार मुख्य कुलों (प्रतिहार, परमार, चौहान, और चालुक्य) की
जन्म कथा में चार कुलों का उद्भव की कथा से विकेन्द्रीकरण को वैधता मिलती है। संभव
है विकेंद्रीकृत का प्रयोग सोच समझ कर किया गया था ताकि सुरक्षा संबंधी विचार जो
की युद्धह के ही रूप में ही था को सतत बनाया जाए और चुनौतियों को और गहरे तक
प्रायोजित किया गया। इन्ही उपक्रमों से ग्रामीण समुदायों ने स्वायत्तता बढ़ाई और
स्थानीय शासन मजबूत हुआ। इसका समग्र परिणाम यह था की अगले लगभग 1000 सालों तक बड़े
बड़े योद्धा सामने आए जिन्होंने विदेशी आक्रमणों को अतुलनीय चुनौती दी। उदाहरण के
तौर पर हम सिंध को लेते है। सिंध को यद्यपि 711 ईस्वी के जीत लिया गया था लेकिन
अगले 300 वर्षों तक इस्लाम का विस्तार सिंध से बाहर नहीं हो पाया। दिल्ली मे जाकर
पहली इस्लामिक सल्तनत 1206 मे ही जाकर स्थापित हो सकी। इन पूरे वर्षों में भारत के
उत्तर पश्चिमी भाग के इतिहास के पन्ने पर योद्धा ही राज करते है जबकि कावेरी का
भौगोलिक प्रदेश आर्थिक संपन्नता के उस स्तर को प्राप्त करता है जो अतुलनीय है।
दक्षिण भारत में यह नवाचार सर्वत्र शिक्षा, दर्शन, स्थापत्य, साहित्य और राजनीति के दोनों स्तरों केन्द्रीय
और विकेंद्रित में देखे गए।
राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्रीय सत्ता
संघर्ष, और छोटे-छोटे राज्यों के जन्म नें उत्तर भारत का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया।
आंतरिक क्षेत्रों मे इन राज्यों के बीच बीच शक्ति संतुलन देखने को मिला। पाल, प्रतिहार और
राष्ट्रकूट के बीच की प्रतिस्पर्धा को इतिहासकारों ने त्रिपक्षीय संघर्ष कहा है।
लेकिन इसमें मौखरी, पुष्यभूति की भी भूमिका थी। सामाजिक क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण
परिवर्तन हुए। वर्ण व्यवस्था के बदले जातीय व्यवस्था प्रचालन में आने लगी थी।
क्योंकि अब एक नए खतरे सामने थे, महिलाओं की सुरक्षा के निमित्त परदा और घूँघट
प्रथा को स्वीकार कर लिया गया। असुरक्षा संबंधी चिंताओं ने उन्हे आगे चलकर घर की
चारदीवारी में कैद कर दिया फिर इस्लाम की पाशविक हिंसा ने बाल विवाह जैसी
कुप्रथाओं को प्रोत्साहित किया।
लेकिन ऐसा नहीं था की यह
अंतिम था। नए शहर बसे भी। महाभारत के काल में पांडवों द्वारा स्थापित की गई राजधानी
इंद्रप्रस्थ को अगर दिल्ली का पहला स्वरूप माना जा सकता है तो तोमर वंश के राजा आनंदपाल
तोमर ने 1052 में लाल कूट (Lal
Kot) को बनाकर आधुनिक पुरानी दिल्ली की नींव रखी। बाद में इसे चौहान वंश के
प्रथ्वीराज चौहान ने और आगे बढ़ाया और राय पीठोरा (Qila Rai Pithora) की स्थापना की। इसी अवधि में एक अन्य
संस्थान जो खूब आगे बढ़ा और जिसे सभी राजाओं ने प्रश्रय दिया वह नालंदा परंपरा का
विकास था। एक संस्थान के रूप मे नालंदा महाविहार की स्थापना 5वीं शताब्दी ईस्वी
में गुप्त साम्राज्य के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने लगभग 427 ईस्वी में करवाई थी।
संभव है यह उससे बहुत पूर्व का रहा हो और कुमारगुप्त ने उसे विस्तार दिया। अपने
स्थापना काल से लेकर इस्लामिक आक्रान्ताओं के द्वारा अपने ध्वंस तक यह महाविहार
भारत ज्ञान विज्ञान का केंद्र बना रहा। इस पूरे काल मे नालंदा ने न केवल ज्ञान का
प्रसार किया बल्कि उसका संरक्षण और संवर्धन भी बिना किसी पूर्वाग्रह के किया।
समकालीन संसार के सभी विषय इसके सहित क्योंकि तब बौद्ध धर्म लोगों के विश्वास का
के केंद्र मे मे था नालंदा में भी बौद्ध धर्म से संबंधित अध्ययन केंद्र मे था।
आधुनिक काल में 1951 में इसके खंडहरों के पास नव नालंदा महाविहार की स्थापना हुई
और 2010 में इसे फिर से एक विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। इस युग की एक अन्य
विशेषता जो महत्वपूर्ण है वह है श्रुति परंपरा से लेखन परंपरा में संक्रमण। पाणिनी
ने संस्कृत व्याकरण को व्यवस्थित कर सूत्रबद्ध कर दिया था ताकि साहित्य विन्यास के
एकरूपता बनी रहे दूसरी और वेद व्यास के नेतृत्व में वेदों को भी संहितबद्ध किया जा
चुका था और इस इस तरह से इन दोनों ऋषियों ने मिलकर साहित्यिक संवर्धन का खाका
तैयार कर दिया जिसकी बुनियाद पर पुराणों, सूत्रों और स्मृतियों की रचना संभव हो सकी। सूत्र साहित्य
लगभग 800 ईसा पूर्व से शुरू हुई और 200 ईसा पूर्व तक तैयार हो चुके थे। स्मृतियों
का रचना कल 200 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी के बीच मानी जा सकती है। ये ग्रंथ धार्मिक, सामाजिक और कानूनी
नियमों को संकलित करती हैं जैसे मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, नारद स्मृति आदि। ये ग्रंथ वेदों के पश्चात
उनकी व्याख्या और विस्तार माने जाते हैं। पुराणों का रचना काल भी तीसरी शताब्दी से
छठी शताब्दी ईस्वी के बीच मन जाता है। हालांकि कुछ पुराणों का निर्माण इससे पहले
और बाद भी हुआ हो सकता है। लेखन काल एक निश्चित सीमा में नहीं बल्कि एक सतत
प्रक्रिया के रूप में बेहतर तरीके समझा जा सकता है, क्योंकि पुराणों का संशोधन और विस्तार कई
सदियों तक होता रहा। पुराणों में ब्रह्मांड विज्ञान, इतिहास, धर्म, मिथक और नीति संबंधी महान कथाओं का संग्रह
है। परंपरा के अनुसार इन ग्रंथों के रचना का श्रेय वेद व्यास को दिया जाता है। वेद
व्यास की भूमिका मुख्यतः पुरानी और मौखिक परंपराओं को लिखित रूप में संकलित करना
थी जिसे उनके शिष्य परंपरा ने और आगे बढ़ाया। इससे वेद सहित अन्य धार्मिक ग्रंथ एक व्यवस्थित
और संगठित रूप में आ सकें। भारत के प्राचीन इतिहास को पुराणों के आलोक मे समझने का
प्रयास किया गया है। पुराणों के पाँच विषय हैं- सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय, पुनर्जन्म), वंश (देवता व ऋषि
सूचियां), मन्वन्तर (चौदह
मनु के काल), और वंशानुचरित
(सूर्य चन्द्रादि वंशीय चरित)।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च
वंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरितं चैव पुराणं
पञ्चलक्षणम् ॥
पुराणों में प्रयुक्त
संस्कृत भाषा के विभिन्न कालखंडों की भाषाशैली मिलती है, जो लेखन के समय की पहचान में मदद करती है।
पुराणों में देवताओं,
राक्षसों, लोकों, तथा वंशों के बारे में
जो कथा और सामाजिक नियम हैं,
वे
समकालीन परिवेश और सामाजिक व्यवस्था के बारे मे अच्छी खासी जानकारी देते है। यह एक
सार्वभौम नियम है की समृद्धि का सिर्फ आर्थिक पक्ष ही नहीं होता। आर्थिक समृद्धि
अपने साथ सभ्यता, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य और कला जैसे
क्षेत्रों में भी नवाचारों को बढ़ावा देती है और नए सामाजिक संगठन और व्यवहार के
प्रतिमानों को गढ़ती है। सामाजिक विकास की इस नए पक्ष को छुआ महर्षि वात्स्यायन की
प्रसिद्ध रचना कामसूत्र ने। यह ग्रंथ ईसा की तीसरी शताब्दी के मध्य में लिखा गया
था। कामसूत्र न केवक प्रेम बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक, और अन्य मनोवैज्ञानिक पहलुओं की भी विस्तृत
व्याख्या करता है। यह गुप्त युग का शिष्ट और सभ्य समाज दर्शाता है। बुद्धिमानों के
अनुसार वात्स्यायन ने इस ग्रंथ को शहरी जीवन की आदतों और संस्कारों को ध्यान मे रखकर
लिखा है। भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र जो की भारतीय नाट्य और काव्यशास्त्र
का मूल और आधारभूत ग्रंथ है,
जिसमें
नाट्य, संगीत, छंद, अलंकार और रस आदि का
समग्र विवरण है, इस युग पंचम वेद
का दर्ज प्राप्त कर लेता है। विद्वानों का मत है कि नाट्यशास्त्र उस समय के
नाट्यकला के गहन अध्ययन और परंपराओं के आधार पर हुआ था, और यह ग्रंथ उस काल की सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति
को पूर्णरुपेन प्रतिबिंबित करता है। नाट्यशास्त्र के छंद नाट्य, संगीत, नृत्य, अभिनय, रंगमंच के निर्माण और
प्रस्तुति के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। यह ग्रंथ नाटक विधा से जुड़े लेखकों अभिनेताओं, और संगीतकारों के लिए
मरदर्शक है। इसमे वर्णित रस से अलग कोई अन्य वर्गीकरण ही संभव नहीं है।
नाट्यशास्त्र में कुल आठ प्रकार के रस की चर्चा की गई है। साहित्य और सिनेमा आज भी
इन्ही रसों का संयोग है। शृंगार रस का इसका स्थायी भाव प्रेम होता है। यह प्रेम, सौंदर्य और आकर्षण का
भाव दर्शाता है। हास्य रस में
हास्य की प्रधानता होती है जो हँसी और आनंद प्रदान करता है। करुण रस दुख, करुणा और संवेदना से
उत्पन्न होता है। रौद्र रस का स्थायी
भाव क्रोध है, जो उग्रता और
क्रोध का भाव व्यक्त करता है।वीर रस का प्रमुख भाव उत्साह वीरता, पराक्रम है। भयानक रस आतंक और डर की
भावना उत्पन्न करता है। वीभत्स रस का स्थायी
भाव घृणा या अस्वीकृति है। अद्भुत रस अंतिम रस है जिसका स्थायी भाव आश्चर्य और
विस्मय है। रस ही नहीं भाव भी मत्वपूर्ण होते है। भाव एक प्रकार की मानसिक स्थिति
या भावना है जो रस के निर्माण में सहायक होती है। नाट्यशास्त्र के अनुसार स्थायी
भाव रस के मूल होते हैं। इसमे जैसे रति, उत्साह,
शोक, क्रोध आदि शामिल किए
जाते है। व्यभिचारी भाव एक जागरूक भाव जो स्थायी भाव को प्रबल करते हैं, जैसे अश्रु, ह्रदयस्पंदन आदि। तीसरा
और अंतिम सात्विक भाव शारीरिक प्रतिक्रियाओं और मर्म भाव को दर्शाते हैं, जैसे कंपकंपी, वस्त्राभ्रंश आदि।यह
महत्वपूर्ण है की इस युग में पंचम वेद की अवधारणा सामने आती है। पंचम वेद यह
अवधारणा शायद इस समझ के बाद उपजी की तब वैदिक वांगमय की श्रुति परंपरा के और
विस्तार की संभावना नहीं बची थी। इसलिए नई परिपाटी के अनुसार वास कोई भी ग्रंथ जो
वैदिक ज्ञान के परंपरा का पोषण करने का दावा किया ‘पंचम वेद’ कहलाने की योग्यता
रखता था। न केवल भरतमुनी का नाट्यशास्त्र बल्कि महाभारत भी पंचम वेद की श्रेणी मे
आते है क्योंकि इसमें वेदों के सार का समृद्ध संग्रह है और यह वेदों के समान ही
धार्मिक, दार्शनिक, नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक ज्ञान
का समन्वय प्रस्तुत करता है। महाभारत में न केवल युद्ध कथा है, बल्कि इसमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से संबंधित
विस्तृत शिक्षाएँ, उपदेश, योगशास्त्र, न्यायशास्त्र, राजनीति शास्त्र, और कई अन्य शास्त्रों के
सार शामिल हैं।
महाभारत
के भीतर भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया गीता उपदेश वेदों के समान
आध्यात्मिक तथा दार्शनिक महत्व रखता है, जो पूरे वेदों के सार को समेटे हुए है। पुराणों को भी पंचम
वेद इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे वेदों की परंपरा के अनुसार महत्वपूर्ण धार्मिक
और दार्शनिक ज्ञान का प्रतिपादन करते है।
इसी समय के आसपास सभ्यता
के प्रतिमान दक्षिण की तरफ प्रयाण करते है। प्रयद्वीपीय भारत का जुड़ाव इस की प्रथम शताब्दी
मे हो चुका था। रामायण वर्णित करता है की अगस्त मुनि ने विंध्याचल को पार इसके विभिन्न प्रदेशीय भूगोल
से शेष भारत को अवगत कराया। दण्डक वन के बाद किष्किन्धा का पहाड़ (वर्तमान का
हम्पी) से लेकर रामेश्वरम तक के भूगोल का जीवंत वर्णन रामायण मे मिलता है। महाभारत
भी इस क्षेत्र का वर्णन करता है। कुल मिलकर दक्षिण का भौगोलिक स्वरूप विविधता से परिपूर्ण है।
दोनों ओर के तटीय
भागों से, समुद्र तक इसकी पहुँच ने इसके साहित्य, रहन-सहन,
खान पान सहित विश्वास प्रणालियों को गहरे तक प्रभावित किया है।
ऐतिहासिक रूप से तमिल का
विकास एक अद्भुत घटना है जिसमे तमिल संस्कृति और ऐतिहासिक प्रतिमानों को विशिष्टता
प्रदान की। माना जाता है की तमिल
लिपि का विकास ब्राह्मी
लिपि से लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व के आसपास हुई। यह एक लंबी सामाजिक प्रक्रिया थी, जिसने तमिल साहित्य और अभिलेखों की समृद्ध
विरासत की नींव रखी। ब्राह्मी
लिपि भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक है, जिसकी स्थापना लगभग छठी सदी ईसा पूर्व में मानी जाती है। ब्राह्मी से विकसित तमिल-ब्राह्मी
लिपि दक्षिण भारत में तमिल भाषा के सबसे प्राचीन लेखों में पायी जाती है, जिनका समय लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व से दूसरी
सदी ईस्वी के बीच माना जाता है। इसे खास
तौर पर तमिल भाषा की अभिव्यक्ति के लिए अनुकूलित किया गया था। इस लिपि ने समय के
साथ अक्षरों के आकार तथा लेखन शैली में बदलाव किए और अंततः आधुनिक तमिल लिपि का
रूप लिया। तमिल लिपि के इस विकास ने प्राचीन तमिल साहित्य, अभिलेख,
दानपत्रों और
प्रशासनिक दस्तावेजों के लेखन को संभव बनाया। भाषाई विकास की यह प्रक्रिया तमिल
क्षेत्र की भाषाई विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए हुई, जिससे वह मूल ब्राह्मी से भिन्न विशेषताएँ अपना ली। अरिकामेडु से प्राप्त बर्तन और
अन्य वस्तुओं पर मिले तमिल ब्राह्मी लिपि के अभिलेख, तमिल क्षेत्र के प्राचीनतम साहित्यिक तथा प्रशासनिक दस्तावेजों का
प्रमाण हैं। दक्षिण भारत की कुछ स्थलाकृति और गुफाओं सहित तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर, तिरुवेळ्ळरै लेख, पल्लव काल के दानपत्र और अन्य अभिलेख प्रमुख हैं, जो तमिल ब्राह्मी लिपि में हैं। जो की स्पष्ट रूप से ब्राह्मी लिपि की एक स्थानीय और
विशिष्ट संस्करण है। लगभग
सातवीं सदी के बाद आधुनिक
तमिल लिपि ने इसका स्थान लिया।
अब जब अपनी लिपि और भाषा
अस्तित्व मे या गई तो बौद्धिक विकास बहु स्वाभाविक हो गया। संगम साहित्य इस पूरे
दौर के बौद्धिक विरासत का
साक्षी है। 'भारत का विचार' की नींव डाली जा चुकी थी और
चोल चेर और पाण्डेय राजाओं के नेतृत्व में इतिहास की शुरुआत भी। यद्यपि कुछ
साम्राज्यवादी पक्षकार इस पूरे काल को अ-ऐतिहासिक बताते है। अब कावेरी नदी का
प्रदेश भूगोल न होकर इतिहास बन गया। यह पहला अवसर था जब भारत सीधे तौर पर
सामुद्रिक व्यापार में भागीदार बना और इससे समृद्धि के नए द्वार खुले। यह एक नया अनुभव
था और इस तरह से ईसा की तीसरी शताब्दी तक भारत का विचार तैयार हो चुका था। पहले
सिंधु-सरस्वती की घाटी,
फिर
यमुना-गंगा का प्रदेश और अब तुंगभद्रा-कावेरी का प्रदेश और इससे उपजी ऐतिहासिक
अनुभवों और ज्ञान ने भारत का निर्माण कर दिया। राष्ट्र का यह निर्माण की मायनों मे
अद्भुत था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी की इसका निर्माण किसी प्रांतीय राजा के विजय
अभियानों के फलस्वरूप नहीं हुआ था। राजनीतिक तौर पर राजा थे, उनके मंत्री थे और उनकी महत्वाकक्षाएं
भी थी जिसे पूरा करने का खूब प्रयास भी किया गया था लेकिन वृहत्तर भारत के निर्माण
की कहानी कही अधिक रोमांचकारी है। ऐतिहासिक रूप से संपूर्ण दक्षिण-पूर्व एशिया ने
अपनी अधिकांश संस्कृति भारत से प्राप्त की। ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी के आरंभ में
पहले पहल श्रीलंका में अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म का प्रचार का प्रयास किया
गया। कुछ भारतीय व्यापारी संभवतः मलाया, सुमात्रा और दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य भागों में भी पहुँच
गए थे। धीरे-धीरे उन्होंने स्थायी बस्तियाँ स्थापित कीं, और निस्संदेह, प्रायः स्थानीय महिलाओं से विवाह भी किया।
उनके बाद ब्राह्मण और बौद्ध भिक्षु आए, और भारतीय प्रभाव ने धीरे-धीरे स्थानीय संस्कृति को समृद्ध
किया, जब तक कि चौथी
शताब्दी ईस्वी तक संस्कृत इस क्षेत्र की राजभाषा नहीं बन गई, और यहाँ महान सभ्यताएँ उभरीं, जो विशाल समुद्री
साम्राज्यों का आयोजन करने और जावा में बोरोबुदुर के बौद्ध स्तूप या कंबोडिया में
अंगकोर के शैव मंदिरों जैसे अपनी महानता के अद्भुत स्मारकों का निर्माण करने में सक्षम
थीं। चीन और इस्लामी जगत से अन्य सांस्कृतिक प्रभाव भी दक्षिण-पूर्व एशिया में
महसूस किए गए, लेकिन सभ्यता को
प्राथमिक प्रोत्साहन भारत से मिला। इस तरह से चावल, कपास, गन्ना, अनेक मसाले, घरेलू मुर्गे, शतरंज का खेल और सबसे महत्वपूर्ण, अंक संकेतन की दशमलव
प्रणाली जाने अनजाने वैश्विक हो गया। पाइथागोरस से लेकर प्लोटिनस तक के विचारों पर
उपनिषदों का प्रभाव देखा जा सकता है।
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