रोजमर्रा का व्यवहार और औपनिवेशिक प्रभाव

आर्थिक शोषण, वि-औद्योगीकरण, नौकरशाही सहित वर्तमान राजनीतिक विमर्श कुछ ऐसे विषय हैं जिसपर औपनिवेशिक प्रभाव से संबंधित अध्यन भारतीय पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं। लेकिन इस आलेख में हम ऐसे सूत्रों को ढूंढ़ने निकले है जो हमारे आपके सभी के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े है। यह कहने की जरूरत नहीं है की उपनिवेशवाद का भारतीय समाज की चिंतन प्रणाली, रहन सहन (वेशभूषा), खान-पान, भाषा, शिक्षा और समकालीन राजनीतिक विमर्शों पर गहरा प्रभाव है। यह प्रभाव न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि वर्तमान जीवनशैली को आकार भी दे रहा है। रोज़मर्रा के संवादों में अंग्रेज़ी भाषा का प्रभुत्व उपनिवेशवाद की एक शानदार विरासत है, जो आज भी भारतीय मध्यवर्गीय के सपनों में घर बना ली है। चाय सहित पश्चिमी वस्त्र जैसे सूट-बूट ऐसे रच बस गए है इन्हें उपनिवेशवाद से जोड़ना बेतुका लगता है। इसके अलावा इससे जुड़े कई ऐसे पहलू है जो बेहद ही सामान्य प्रवृत्ति के लगते है लेकिन भारतीय समाज में औपनिवेशिक अनुभवों से उपजे हैं। आज हम इसकी ही पड़ताल करते हैं;

जन्म और विवाह

परंपरागत रूप से भारत का समाज किसी भी बच्चे के जन्म के अवसर पर स्थानीय पंचांग की प्रणाली के अनुसार जन्म से जुड़े कर्मकांडों को पूरा करता है। इसकी गणना भारतीय पद्धति के द्वारा निर्धारित ज्योतिषीय गणनाओं के अनुरूप होता है और जन्म के मास, दिवस आदि संस्कृत के मास के अनुसार होती है लेकिन जन्मदिन का उत्सव अब ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार ही सभी जगहों पर होता है। आज जिस कैलंडर के अनुसार हम सबका जन्मोत्सव होता है उस ग्रेगोरियन कैलेंडर को ब्रिटिश साम्राज्य ने 1752 में आधिकारिक रूप से अपनाया था। इसकी अधिकारिता में ब्रिटिश नियंत्रित क्षेत्र भी शामिल थे। ब्रिटिश संसद ने कैलेंडर (नई शैली) अधिनियम 1750 (Calendar (New Style) Act 1750) पारित किया, जो 1752 में लागू हुआ। इसकी सबसे रोचक बात यह थी की 2 सितंबर के बाद सीधे 14 सितंबर या गई ताकि जूलियन कैलेंडर से 11 दिनों का अंतर सुधारा जा सके। 1752 से प्रचलित यह कलेंडर स्वतंत्रता के बाद भी जारी रहा। यद्यपि शक संवत को राष्ट्रीय संवत कहा गया लेकिन उस पर आधारित कोई भी प्रशासनिक निर्णय नहीं हुए। लेकिन उपनिवेश वाद के सबसे पड़े सांस्कृतिक प्रभावों में शादी विवाह में गोरे लड़के लड़की की कामना है। आज का हर माता पिता इस बात से चिंतित राहत है की उसके बच्चे गोरे नहीं है, जिसके कारण से वर वधू की तलाश में दिक्कतें आएंगी और सच में आती भी है। fair & lovely का सारा कारोबार सिर्फ इसी एक चीज पर टीका था की काले श्याम स्किन को गोरा कर देता है। भारतीय समाज में विवाह के समय गोरी लड़की की कामना एक गहरे सामाजिक पूर्वाग्रह से जुड़ी है, जो सीधे तौर पर औपनिवेशिक प्रभाव से उपजी है। ब्रिटिश शासन ने गोरे रंग को श्रेष्ठता का प्रतीक बना दिया। आर्थर डी गोबिन्यू की पुस्तक Essai sur l’inégalité des races humaines (1853-55) के अनुसार श्वेत नस्ल बुद्धि, सौंदर्य और सभ्यता में अन्य नस्लों (काली, पीली) से श्रेष्ठ है। इससे पूर्व चार्ल्स व्हाइट की पुस्तक Account of the Regular Gradation in Man (1799)में श्वेतों को श्रेष्ठ सिद्ध करने हेतु पॉलीजनी (अलग उत्पत्ति) सिद्धांत गढ़ा जा चुका था। फिर जब भारत के संदर्भ इतिहास लेखन की बारी आई तो इसे आर्यन और अ-आर्यन के बीच विवाद खड़ा कर स्किन के गोरे रंग की अवधारणा को और पुष्ट किया गया। गोरे रंग के प्रति अंग्रेजी दुराग्रह का आलम यह था की यह खोपड़ी मापन (craniometry) का एक सिद्धांत बनाया गया जिसे विकासवाद से जोड़ दिया गया। craniometry की यह विधि खोपड़ी की लंबाई, चौड़ाई और घनत्व जैसे मापों से मस्तिष्क आकार का अनुमान लगाती थी और यह मानती थी की बड़ा मस्तिष्क अधिक बुद्धि दर्शाता है। craniometry की विधि कभी वैज्ञानिक नहीं रही क्योंकि मस्तिष्क आकार और बुद्धि का सीधा संबंध कभी था ही नहीं। यह पर्यावरण और पोषण पर निर्भर करता है। लेकिन जो भी हो इतना तो आज भी है की गोरी बहू से सामाजिक प्रतिष्ठा की उम्मीद की जाती है और पड़ोसियों की प्रशंसा भी। मीडिया, विज्ञापन और बॉलीवुड इस रंगभेद को आज भी विज्ञापनों में प्रचारित कर रहे है। यही बदलाव सौन्दर्य के प्रति अवधारणाओं का भी है। कालिदास [1] की नायिकाओं में गोलाकार अंग, नवयौवन और स्त्रीलिंग लक्षण सुंदरता के मानक है जैसे की शकुंतला का कमल-सदृश रूप या यक्षिणी का नितंब-वर्णन।

तस्या: किंचित्करधृतमिव प्राप्तवानीरशाखं
नीत्वा नीलं सलिलवसनं मुक्तरोघोनितम्बम्।
प्रस्थानं ते कथमपि सखे! लम्बमानस्य भावि
शातास्वादो विवृतजघनां को विहातुं समूर्थ:।।

हे मेघ, गम्भीरा के तट से हटा हुआ नीला जल, जिसे बेंत अपनी झुकी हुई डालों से छूते हैं, ऐसा जान पड़ेगा मानो नितम्ब से सरका हुआ वस्त्र उसने अपने हाथों से पकड़ा रक्खा है।

हे मित्र, उसे सरकाकर उसके ऊपर लम्बे-लम्बे झुके हुए तुम्हारा वहाँ से हटना कठिन ही होगा, क्योंकि स्वाद जाननेवाला कौन ऐसा है जो उघड़े हुए जघन भाग का त्याग कर सके।

तस्योत्सङ्गे प्रणयिन इव स्रोतङ्गादुकूलां
न त्वं दृष्ट्वा न पुनरलकां ज्ञास्यसे कामचारीन्!
या व: काले वहति सलिलोद्गारमुच्चैर्विमाना
मुक्ताजालग्रथितमलकं कामिनीवाभ्रवृन्दम्।।

हे कामचारी मेघ, जिसकी गंगारूपी साड़ी सरक गई है ऐसी उस अलका को प्रेमी कैलास की गोद में बैठी देखकर तुम न पहचान सको, ऐसा नहीं हो सकता।

बरसात के दिनों में उसके ऊँचे महलों पर जब तुम छा जाओगे तब तुम्हारे जल की झड़ी से वह ऐसी सुहावनी लगेगी जैसी मोतियों के जालों से गुँथे हुए घुँघराले केशोंवाली कोई कामिनी हो।

वाल्मीकि ने भी रामायण के अरण्यकांड के सर्ग 46 में रावण द्वारा सीता के प्रत्येक अंग की प्रशंसा करवाई है। यह वर्णन पतली कमर, मोटी जांघें सहित चंद्रमा जैसे मुख और कमल जैसी आंखों पर केंद्रित है।[2] वाल्मीकि ने सीता के सौंदर्यबोध के लिए"पीनोन्नतमुखौ कान्तौ स्निग्धतालफलोपमौ" कहकर वर्णित किया है—ये गोल, ऊंचे, चिकने, ताड़फल जैसे, एक-दूसरे से सटे और मणियों से सुशोभित हैं। उनकी कमर को "करान्तमितमध्यासि" अर्थात् मुट्ठी में आ सकने जितनी पतली बताया गया है, जबकि जांघें हाथी की सूंड जैसी मोटी और सुडौल हैं। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है की भारतीय परिवेश मे पारंपरिक रूप से गोल-मटोल, गर्विष्ठ शरीर (curvy figure) को उर्वरता का प्रतीक माना जाता था जबकि राज के द्वारा आरोपित नस्लीय आग्रहों ने महिलाओं पर गोरा रंग और स्लिम बॉडी को अपनाने का दबाव बनाया।

जातीय भेदभाव

यह कहने में कोई झिझक नहीं है की जातीय भेदभाव का सारा विमर्श उपनिवेशवाद द्वारा प्रायोजित विमर्श है। 1857 के बाद असल में हुआ यह था की वर्ष 1871 में एक आपराधिक जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act) 1871 लागू किया गया। यह विभिन्न जातियों को अपराधी जातियों की श्रेणी में वर्गीकृत करने का सफल औपनिवेशिक प्रयास था। इस कानून ने घुमंतू जनजातियों, शूद्रों और अस्पृश्य समुदायों जैसे गुज्जर, लोधी, चमार, भील आदि को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया। इससे एक ऐसा सामाजिक समूह तैयार हुआ जिसके प्रति सामाजिक पूर्वाग्रह का जन्म हुआ और जो विधिक रूप से मान्य भी थी। इस अधिनियम ने स्थानीय अधिकारियों को किसी भी जनजाति को "अपराध के आदी" मानकर सूचीबद्ध करने का अधिकार दिया। इसके लिए किसी ठोस प्रमाण की कोई जरूरत नहीं थी। ऐसे समुदाय के सदस्यों को साप्ताहिक पुलिस रिपोर्टिंग, यात्रा पर पास सिस्टम और बस्तियों में कैद जैसी बाध्यताएं झेलनी थी। समय के साथ 1924 तक पूरे भारत में इसका विस्तार कर दिया गया। कहा जाता है की 1947 तक इसमें 127 समुदाय और लगभग 1.3 करोड़ लोग सूचिगत थे। अंग्रेजी राज के ऐसे सुनियोजित कुप्रयासों से इस समूहों के खिलाफ सामाजिक कलंक का निर्माण हुआ जिसे रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार और संवाद प्रभावित हुए। इसमे शामिल समूहों की सूची देखते ही भेदभाव की बात समझ में या जाति है।कुछ प्रमुख उदाहरण जो विभिन्न स्रोतों में बार-बार उल्लिखित हैं:- गुज्जर (Gujjar), लोधी (Lodhi), चमार (Chamars), भील (Bhil), पासी (Pasi), मीणा (Meenas), बोवरी (Bowreah), बुद्दुक (Budducks), बेड़िया (Bedyas), डोम (Domes), डोरमा (Dormas), रेबारी (Rebari), दासाद (Dasads), नोनिया (Nonias), मुसाहिर (Moosaheers), राजवार (Rajwars), गहसी (Gahsees), बोया (Boayas)! अंग्रेजों ने 1871 और 1901 की जनगणनाओं के माध्यम से लोगों को जबरन निश्चित जातियों में वर्गीकृत किया, जो पहले लचीली वर्ण प्रणाली (गुण-कर्म आधारित) पर आधारित थी। उन्होंने मनुस्मृति जैसे ग्रंथों का चयनात्मक अनुवाद कर जातिगत भेदभाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, ताकि हिंदू समाज को कमजोर किया जा सके। इससे सामाजिक एकता भंग हुई और 'विभाजन और शासन' की नीति सफल रही।

उपरोक्त सूचियां प्रांतवार थी लेकिन सभी में एक बात समान यह थी की ये सूचियां 1871 से 1924 तक क्रमिक संशोधनों से बढ़ीं। यह मुख्यतः घुमंतू, विद्रोही या निम्न जातियों को लक्षित थी खासकर जिन जातियों नें भी राज के खिलाफ संघर्ष किया था। उदाहरण के तौर पर रामोशी (रमोशी) एक जाति थी जो इस सूची मे शामिल थी। ऐतिहासिक रूप से ये रामोशी (रमोशी) ने महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र में 1822-1839 के बीच ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया था। परम्परात रूप से रामोशी समुदाय माराठा साम्राज्य में पहरेदार और डाकिए थे। परंतु औपनिवेशिक नीतियाँ इनके खिलाफ थी जिसके कारण चित्तूर सिंह के नेतृत्व में इनलोगों ने 1822 में सतारा क्षेत्र लूटा, और अंग्रेजी प्रतिस्ठानों पर हमला किया। उसी तर्ज पर 1825-26 में उमाजी नाईक ने अकाल के दौरान विद्रोह किया, पुरंदर और सासवड़ में सक्रिय रहे थे। सत्तू नाईक जैसे नेताओं ने निरंतर छापामार युद्ध लड़ा। ब्रिटिश सेना ने विद्रोह दबाया, नेताओं को फांसी दी। रामोशियों को आपराधिक जनजाति घोषित कर निगरानी में रखा गया।

यही हाल कोली समुदाय के साथ भी था। इन समुदायों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई विद्रोह किए, विशेषकर गुजरात, महाराष्ट्र और खेड़ा क्षेत्र में। ये विद्रोह करों, भूमि हड़पने और शोषण के विरुद्ध थे। 1857 के आस पास खानपुर (लुनावाड़ा) के मालीवाड़ कोली ने सूरजमल के नेतृत्व में ब्रिटिश कार्यालय लूटे। ठाकोर कोली, पटेल कोली और कोली जमींदारों ने विद्रोह किया। नाथाजी और यमाजी भाइयों ने 2000 कोलियों के साथ महिकंठा में विद्रोह किया और गायकवाड़ के सैनिकों पर हमला बोला। 1857 मे ही 2000 कोलियों ने सूरत में लेफ्टिनेंट ग्लासपूल और 30 सिपाहियों को बंदी बनाया। कोली राजा भगवानराव को फांसी दी गई। अन्य महत्वपूर्ण घटनाएं में गोविंदास रामदास ने 1826-30 के आसपास ठसरा-डकोर पर कब्जा कर लिया था। प्रतिक्रिया स्वरूप अंग्रेजों ने गांव जलाए और नेताओं को फांसी दी।

यही कहानी बाजीगर (Bajigar) जाति की थी। यह समूह परंपरागत रूप से घुमंतू कलाकार और पहरेदार समुदाय थी। इन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ पंजाब, हरियाणा और राजस्थान क्षेत्र में कई विद्रोह किए। ये विद्रोह मुख्यतः कर वसूली, भूमि हड़पने और घुमंतू जीवन पर प्रतिबंधों के विरुद्ध 1857 में इन बाजीगरों ने पंजाब में ब्रिटिश थानों पर हमले किए, हथियार लूटे थे । वे सिख सैनिकों के साथ मिलकर दिल्ली और लाहौर की ओर बढ़े। 1820-40 तक ये इनके सरदारों ने ब्रिटिश अफसरों पर हमले करते रहे विशेषकर अंबाला और हिसार क्षेत्र में। दमन का तरीका फिर से वही। क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871 के तहत बाजीगरों को "जन्मजात अपराधी" घोषित किया गया। गांवों में पंजीकरण अनिवार्य कर घुमंतू जीवन समाप्त किया गया।

चमार जाति के संदर्भ में ऐतिहासिक अध्ययन उतने ही महत्वपूर्ण है। चमार जाति समूहों ने अंग्रेजों के खिलाफ मुख्य रूप से 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महत्वपूर्ण विद्रोह किया, जिसमें बांके चमार जैसे वीरों की नेतृत्वकारी भूमिका थी। उदैया चमार ने 1804-1807 के बीच अलीगढ़, हाथरस और भरतपुर क्षेत्र में नवाब नाहर खान के साथ मिलकर अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। बांके चमार पर अंग्रेजों ने 50,000 रुपये का इनाम घोषित किया था। यह कितना हास्यपद दावा है की ये सारे समुदाय परंपरागत भारतीय समाज द्वारा सम्मानित नहीं थे। ऐसा संभव है के ये सारे विद्रोह बिना किसी अन्य जातियों के सहयोग से हो रही थी।

तत्कालीन भारतीय समाज मे प्रचलित सामाजिक कानूनों (परंपरागत विधि) को समझने का पहला प्रयास गेंटू कोड (Gentoo Code) का 1776 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा प्रकाशन था। यह संस्कृत ग्रंथ विवादार्णवसेतु का फारसी और फिर अंग्रेजी अनुवाद था। नथानिएल ब्रासी हालहेड द्वारा अनुवादित यह कोड "A Code of Gentoo Laws, or, Ordinations of the Pundits" शीर्षक से 1776 में मुद्रित हुआ था। यह हिंदू कानूनों का संकलन था, जो ब्रिटिश शासन के लिए स्थानीय कानून समझने हेतु बनाया गया था। अपनी तमाम पूर्वाग्रहों के बावजूद गेंटू कोड में समाज का विभाजन चार वर्णों - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तक ही सीमित किया गया था। लेकिन 1924 तक जातीय दुराग्रहों पर आधारित प्रयास कहीं अधिक संगठित हो गए थे जिसे राज की जनगणना संबंधी नीतियों ने और मजबूत किया। 1920 के दशक तक यह विभेद प्रत्यक्ष हो गया जब समाज में जाति आधारित भेदभाव रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई देने लगा और यह भेदभाव अंततः ‘ठाकुर का कुआं’ के रूप में प्रेमचंद की कहानी 1930 के रूप में बाहर आया जब भारतीय परंपरा जो सत्यकाम जाबाल की कहानी पर आधारित थी से विचलित हो गई। सत्यकाम की कथा छांदोग्य उपनिषद से ली गई है, जो सत्य की शक्ति और गुणों पर आधारित एक प्रेरणादायक कथा है। यह एक निर्धन दासी जबाला के पुत्र सत्यकाम की यात्रा बयान करती है, जिन्हें गौतम ऋषि ने उनकी सत्यनिष्ठा के कारण शिष्य बनाया था। कथा के अनुसार सत्यकाम को शिक्षा ग्रहण करने की इच्छा हुई, इसलिए वे गौतम ऋषि के पास पहुंचे। गोत्र पूछने पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि उसके मां जबाला को पिता का पता नहीं, क्योंकि युवावस्था में सेवा के दौरान उनका जन्म हुआ। ऋषि उनकी ईमानदारी से प्रभावित होकर बोले, "सत्य बोलने वाला ब्राह्मण ही होता है" और सत्यकाम को बिना किसी भेदभाव के दीक्षा दी गई।

चिकित्सा की अंग्रेजी प्रणाली

अंग्रेजी कल से पूर्व भारत की स्वास्थ्य प्रणाली योग, आहार और आयुर्वेद के त्रिपक्षीय संबंधों पर आधारित थी। आँरेजी से राज के आरंभिक वर्षों में अंग्रेज भारत की इस प्रणाली को को समझने की कोशिश कर रहे थे। शुरुआत में आयुर्वेद की कक्षाएं संस्कृत कॉलेज में भी दी जाती थीं, जिसमें चरक और सुश्रुत की रचनाओं का इस्तेमाल किया जाता था, जबकि मुस्लिम छात्रों के लिए कलकत्ता मदरसा में उर्दू में यूनानी चिकित्सा की कक्षाएं आयोजित की जाती थीं। बंबई में भी अनुवाद और स्थानीय भाषा में शिक्षा का यही पैटर्न अपनाया गया।

लेकिन औद्योगिक क्रांति के अंत और 1835 के भारतीय शिक्षा अधिनियम के पारित होने के साथ चीजें तेजी से बदलने लगीं। बंगाल में 1833 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड बेंटिक ने नेटिव मेडिकल इंस्टीट्यूशन के 'संविधान में सुधार और लाभ बढ़ाने' तथा आधिकारिक आवश्यकताओं के लिए बेहतर प्रबंधन और शिक्षा प्रणाली बनाने के उद्देश्य से एक समिति नियुक्त की। समिति की सलाह के अनुसार 1835 में नेटिव मेडिकल इंस्टीट्यूशन की जगह न्यू मेडिकल कॉलेज की स्थापना की गई। 1909 के दशक में ब्रिटिश सरकार ने आयुर्वेदिक डॉक्टरों को प्रतिबंधित करने का कदम उठाया। 1912 में अंग्रेजों ने बॉम्बे मेडिकल रजिस्ट्रेशन एक्ट बनाया। इसके अंतर्गत ऐसे किसी भी मेडिकल प्रैक्टिशनर को अयोग्य घोषित कर दिया गया, जो पश्चिमी चिकित्सा में विशेष रूप से प्रशिक्षित नहीं थे और पंजीकरण के बिना अभ्यास पर प्रतिबंध लगाया। यह आज भी जारी है। इसी बीच जैसे-जैसे यूरोप में औषधियों का औद्योगिक उत्पादन बढ़ने लगा, पश्चिमी चिकित्सकों ने एकल "सक्रिय घटक" वाली औषधियों का उपयोग करना शुरू कर दिया, तथा उन्होंने सम्पूर्ण जड़ी-बूटी प्रति पारंपरिक भारतीय पसंद से खुद को अलग कर लिया।

धार्मिक प्रणाली पर अब्राहमिक प्रभाव

सनातन धर्म प्रणाली पर उपनिवेशवाद का प्रभाव मुख्य रूप से विभाजनकारी नीतियों, ग्रंथों की गलत व्याख्या सहित सती प्रथा जैसी अत्यंत अल्प प्रचालित परम्परा को बड़े स्तर पर विज्ञापित करने में दिखता है। ब्रिटिश विद्वानों जैसे मैक्स मूलर ने वेदों, गीता और रामायण का गलत अनुवाद किया, धर्म को 'कठोर विश्वास' के रूप में चित्रित कर सनातन धर्म की दार्शनिक गहराई को नकारा। अनुवाद की प्रक्रिया उन्होंने कर्म को भाग्यवाद के रूप में तोड़-मरोड़कर दिखाया और उत्तर दक्षिण में विभाजन के सिद्धांत गढ़े गए। गुरुकुल व्यवस्था जो कि राष्ट्र की साझी स्मृतियों को संप्रेषित करती थी नष्ट कर कर दिया गया। क्योंकि अंग्रेज अब्राहमिक की परम्परा से अवगत थे, मैक्स मूलर ने ऋग्वेद के काल को लगभग 1200 ईसा पूर्व माना क्योंकि यह बाइबिल की समयरेखा से प्रभावित था। उसका यह विश्वास था कि मानव सभ्यता की शुरुआत को 4000 ईसा पूर्व तक सीमित रखा। ईसाई प्रभाव से वेदों को पिरामिडों से कम प्राचीन दिखाने का प्रयास किया। मैक्स मूलर ने ऋग्वेद के काल निर्धारण के लिए वैदिक साहित्य को भाषाई विकास के आधार पर तीन कालखंडों में विभाजित किया। उसने प्रत्येक काल के बीच 200 वर्ष का अंतर माना, जो उनके अनुसार भाषा के क्रमिक परिवर्तन को दर्शाता था मूलर ने वैदिक ग्रंथों को संहिता (मंत्र) काल, ब्राह्मण काल और सूत्र काल में बांटा। संहिता काल को 1400-1200 ईसा पूर्व, ब्राह्मण काल को 1000-800 ईसा पूर्व और सूत्र काल को उसके बाद का माना, कुल मिलाकर वेदों को लगभग 1200 ईसा पूर्व का बताकर।

ब्रिटिश प्रशासन ने 1863 के धार्मिक संपत्ति अधिनियम के जरिए हिंदू मंदिरों के वित्त और प्रबंधन पर नियंत्रण स्थापित किया, जिससे इनकी स्वायत्तता कम हुई। कुछ त्योहारों, तीर्थयात्राओं और अनुष्ठानों पर प्रतिबंध लगाए गए, जो औपनिवेशिक शासन के लिए बाधक माने गए। कई मामलों ने ब्राह्मो समाज और आर्य समाज जैसे आंदोलन जो मूर्तिपूजा और बहुदेववाद को चुनौती दे रहे थे, अँग्रेजी राज इन्हें समर्थन दे रहा था। कई सुधारक पश्चिमी एकेश्वरवाद से प्रेरित होकर पूजा को सरल बना बना देने की अनावश्यक जिद कर रहे थे जबकि बंगाल जैसे क्षेत्रों में दुर्गा पूजा जैसे उत्सव कहीं अधिक खर्चीली और भव्य होते जा रहे थे। पहले ग्रामीण रही यह पूजा शहरी, सार्वजनिक और विलासितापूर्ण हो गई।

एक अन्य परिवर्तन तो बहुत ही सामान्य किस्म का लगता है वह यह है की किसी खास दिन कुछ चीजों की वर्जना। जैसे की कई हिन्दू मंगल और बृहस्पति वार को मांसाहार से परहेज करते है और किसी खास दिन को किसी विशेष देवता की पूजा करना महत्वपूर्ण बन गया है जैसे की सोमवार को शिव और मंगलवार को हनुमान। देवताओं का दिनों से गहरा संबंध सीधे सीधे ईसाई धर्म और इस्लाम से एक लंबे समय में विकसित संबंधों से प्रेरित लगता है जहाँ संडे चर्च ईसाईयों के लिए है और जुम्मा की नमाज़ मुसलमानों के लिए। सच तो यह है परंपरागत रूप से त्रिकाल संध्या का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा भक्त/याचक विश्वासी को पूजा पाठ और देवी देवता के चयन में काफी स्वतंत्रता दी गई है। ।

[1] https://www.amarujala.com/lifestyle/relationship/kalidasa-s-meghdoot-beauty-description

[2] https://www.poojn.in/post/30573/sitas-physical-characteristics-descriptions-from-valmikis-ramayana

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