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Showing posts from December, 2025

माओवादी हिंसा की बौद्धिक खादपानी

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18 नवंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के घने जंगलों में सुरक्षा बलों ने माओवादी कमांडर माडवी हिडमा को घेराबंदी के बाद मार गिराया। इससे पहले मई में छत्तीसगढ़ में महासचिव बसवराजु भी ढेर हो गया। दशक भर की कार्रवाई से नक्सली घटनाएँ 53% घटीं, प्रभावित जिले 126 से घटकर 3-4 रह गए। यह सब पुलिस की सफलता है जो उत्साही है लेकिन विचारधारात्मक जड़ें बाकी हैं। इन्हें न काटा तो उन्मूलन अधूरा रहेगा। इसका मूल कारण यह है की शिक्षित बुद्धिजीवियों ने नक्सलवाद को रोमांटिक बनाकर जिंदा रखा और उसे अपना वैचारिक समर्थन दिया है। भारतीय नक्सलवाद को बनाए रखने, वैचारिक रूप से पोषित करने और उसका रोमानीकरण करने में शिक्षित उच्चवर्गीय बुद्धिजीवियों की भूमिका, भारत की आंतरिक सुरक्षा बहस में लंबे समय तक उपेक्षित रही है। जब तक नक्सलवाद की वैचारिक और बौद्धिक जड़ें अक्षुण्ण हैं, तब तक इसका पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है। माओवादी हिंसा की बुनयादी समझ माओवाद, माओ त्से तुंग द्वारा विकसित साम्यवाद का एक रूप है। यह सशस्त्र विद्रोह, जन लामबंदी और रणनीतिक गठबंधनों के संयोजन के माध्यम से सत्ता पर कब्जा करने का सिद्धांत है। माओवादी अपने विद्रो...

रोजमर्रा का व्यवहार और औपनिवेशिक प्रभाव

आर्थिक शोषण, वि-औद्योगीकरण, नौकरशाही सहित वर्तमान राजनीतिक विमर्श कुछ ऐसे विषय हैं जिसपर औपनिवेशिक प्रभाव से संबंधित अध्यन भारतीय पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं। लेकिन इस आलेख में हम ऐसे सूत्रों को ढूंढ़ने निकले है जो हमारे आपके सभी के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े है। यह कहने की जरूरत नहीं है की उपनिवेशवाद का भारतीय समाज की चिंतन प्रणाली, रहन सहन (वेशभूषा), खान-पान, भाषा, शिक्षा और समकालीन राजनीतिक विमर्शों पर गहरा प्रभाव है। यह प्रभाव न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि वर्तमान जीवनशैली को आकार भी दे रहा है। रोज़मर्रा के संवादों में अंग्रेज़ी भाषा का प्रभुत्व उपनिवेशवाद की एक शानदार विरासत है, जो आज भी भारतीय मध्यवर्गीय के सपनों में घर बना ली है। चाय सहित पश्चिमी वस्त्र जैसे सूट-बूट ऐसे रच बस गए है इन्हें उपनिवेशवाद से जोड़ना बेतुका लगता है। इसके अलावा इससे जुड़े कई ऐसे पहलू है जो बेहद ही सामान्य प्रवृत्ति के लगते है लेकिन भारतीय समाज में औपनिवेशिक अनुभवों से उपजे हैं। आज हम इसकी ही पड़ताल करते हैं; जन्म और विवाह परंपरागत रूप से भारत का समाज किसी भी बच्चे के जन्म के अवसर पर स्थानीय पंचांग की प्रणाली के अ...

झारखंड : पूर्व ऐतिहासिक बस्तियां और निरन्तरता

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वर्तमान का झारखंड जिसकी साम्यता ऐतिहासिक मगध के दक्षिणी भूभागों से आसानी से बैठाई जा सकती है प्रागैतिहासिक काल से मानव बस्तियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। छोटानागपुर और आसपास के क्षेत्रों में महापाषाण (मेगालिथ) स्थलों के बारे में पहली खोजें 1872 में ब्रिटिश प्रशासन के कर्नल इटी डाल्टन और टीएफ पेपे जैसे अधिकारियों द्वारा की गई थीं। उन्होंने बड़े पैमाने पर समाधि पत्थर (मेगालिथ) और प्राचीन कब्रों का अध्ययन किया, जो लगभग 2000 वर्ष पुराने हैं। हाल के पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि यहाँ पुरापाषाण काल से ही मानव निवास के प्रमाण मिलते हैं। इस क्षेत्र में पुरापाषाण काल लगभग 25 लाख वर्ष पूर्व से 10,000 ई.पू. तक फैला हुआ था। लेकिन इस कहानी की शुरुआत हम  हजारीबाग का इस्को गांव से करते है।  यह गाँव प्रागैतिहासिक शैलकला के लिए प्रसिद्ध है। यह गांव झारखंड के हजारीबाग से 25 Km दूर बरकागांव के पास पुंकरी बरवाडीह महापाषाण स्थल के पास है। यहाँ महापाषाणों की शानदार परंपरा है क्योंकि महापाषाण स्थल बनाने के लिए सबसे जरूरी चीज पहाड़ियां थीं जो यहाँ सुलभ थी और समकालीन लोगों की अपनी गोत्रीय...

दक्षिण एशिया :सांस्कृतिक एकता के भारतीय तत्व

जिसे हम सब आज भारतीय उपमहाद्वीप कहते है वह वास्तव में वृहत्तर भारत है। इसका निर्माण किसी एक दिन में नहीं हुआ था बल्कि वह सतत रूप से लगभग 200 ईसापूर्व से शुरू होकर मौर्य, गुप्त, चोल, पाण्ड्य और हर्ष यदि राजाओं के काल तक चलता रहा। अगर देखा जाए तो व्यापार, साहसिक यात्राएं और राज्य विस्तार (सैनिक अभियान और वैवाहिक संबंध) ये तीन ऐसे बुनियादी विचार है जो किसी भी प्रदेश के लोगों द्वारा बाहरी प्रदेशों के लोगों और समाजों से संबंधों को सुनिश्चित करते है। इन तरीकों से ही सभ्यतागत और सांस्कृतिक विचार विमर्श के अवसर जन्म लेते है और फिर सभ्यता-संस्कृति का प्रचार प्रसार होता है। बृहतर भारत का निर्माण भी इसी आधार पर हुआ है। 2000 ईसापूर्व से बने संबंध समय के साथ और गहरे होते चले गए और इस तरह मध्य एशिया, पश्चिम एशिया सहित यूरोप फिर दक्षिण एशिया, म्यांमार, चीन सहित सुदूर पूर्व जापान तक इसके प्रभाव दिखाई पड़ने लगे। मेसोपोटामिया के कई नगरों जैसे उर, किश, लगश, सुसा, टेल अस्मर आदि से प्राप्त मुहरें विशेष रूप से सिंधु घाटी सभ्यता के साथ व्यापार की महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। लोथल जैसे बंदरगाह नगरों में भी कई मु...

आदिवासी प्रवासन : औपनिवेशिक उत्पाद का एक Faultline

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झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है। यहाँ की आदिवासी जनसंख्या विविध परंपराओं, भाषाओं, और सांस्कृतिक पहचान के साथ रहती है एवं इनकी सामाजिक, धार्मिक, और सांस्कृतिक गतिविधियाँ इस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर हैं। यद्यपि आर्थिक विकास के मुख्य धार अब ये समुदाय शामिल हो चुके है लेकिन कई ऐसे आदिवासी समूह, राज्य के कई जिलों में बसे हुए हैं जो कृषि, शिकार, खेती, वन आधारित परंपरागत जीवनशैली पर निर्भर हैं। झारखंड के आदिवासी समूहों की कुल अनुसूचित जनजाति आबादी लाखों में है, जो राज्य की एक महत्वपूर्ण सामाजिक इकाई बनाती है। ये जनजाति झारखंड के विभिन्न जिलों में निवास करती हैं और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और भाषा-परंपराओं के लिए जानी जाती हैं। इनका क्षेत्रीय प्रसार इससे लगे अन्य राज्यों यथा पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के साथ भी होता है जो सामुदायिक रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए है। जहां तक आदिवासियों के समाजशास्त्रीय अध्ययन का प्रश्न है, हर्बर्ट रिजले की पुस्तक दी पीपुल्स ऑफ इंडिया (The People of India) इस संदर्भ में एक क्लैसिकल कृति मानी जाती है। 1915 में प्रकाशित उनकी यह पुस्तक ब्रिटिश भारत के जाति, जन...